सतगुरु मिले तो राह दिखावे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Winston Churchill (विंस्टन चर्चिल)
विंस्टन चर्चिल (1874–1965) Wartime Statesman, Orator & Nobel Laureate के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।’— विंस्टन चर्चिल
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,

‘मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्संग की निर्मल गंगा में निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— विंस्टन चर्चिल
शेर #2 • शाही पन्ना
मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,

‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,धैर्य का दामन जिसने थामे निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— विंस्टन चर्चिल
शेr #3 • रूहानी शाम
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,
अमर शेर और ग़ज़लें
मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्संग की निर्मल गंगा में निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,धैर्य का दामन जिसने थामे निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मोह-निशा से जो जन जागा उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Prem ki paavan vedee par jisane barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Jisane prem ka marm samajh apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हरि की कृपा का पावन साया उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
साधु-संगत की छाया में जो सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

तेरे रूप की पावन झांकी दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम के चरणों में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Tere roop ki paavan jhaankee dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Priyatam ke charanon mein jisane motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्य-अहिंसा की राहों पर उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हृदय में जिसके दया बसी है के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
साधु-संगत की छाया में जो प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

तेरी याद का पावन साया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Teri yaad ka paavan saaya us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Prem ki mastee mein jo jhoomaa use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,हृदय में जिसके दया बसी है लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
माटी का यह देह बना है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मोह-निशा से जो जन जागा लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

घायल की गति घायल जाने पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,अकेलेपन की इस राह पर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Akelepan ki is raah par keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
अहंकार की दीवारें जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,शांति और संतोष का धन जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
साधु-संगत की छाया में जो अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
माटी का यह देह बना है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हरि की कृपा का पावन साया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

मन के कोने में सिमटी हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,अंधेरी रात के सन्नाटे में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Man ke kone mein simatee hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Andheree raat ke sannaate mein dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
धरती की छाती पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,दिल के फफोलों को देखकर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Waqt ke thaperon ne hamen hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Dil ke phapholon ko dekhakar zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
वाणी में जो अमृत घोले सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,नेकी की राह पे जो जन जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
धरती की छाती पर जिसने भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

हौसलों के तरकश में जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्संगति का पावन प्रभाव का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Hausalon ke tarakash mein jab bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Satsangati ka paavan prabhaav ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
साधु-संगत की छाया में जो जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
नाम और दौलत तो माटी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

धरती की छाती पर जिसने बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जिसने समय की चाल पहचानी विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jisane samay ki chaal pahachaanee vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,शांति और संतोष का धन जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,दीन-बंधु का सहारा बन के रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

संतन की संगति में आकर कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,माटी के इस पुतले में जब और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Santan ki sangati mein aakar kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Maatee ke is putale mein jab aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य वचन जो मुख से बोले जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

पानी केरा बुदबुदा अस और ज्ञान-भोर मुस्काए अमृत रस की बूँदें अंतर घट में बरसने लगती हैं,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं है जो समस्त कर्तापन के भाव से मुक्त होकर केवल साक्षी भाव में जीता है।
Paani keraa budabudaa as aur jnyaana-bhor muskaae amrit ras ki boonden antar ghat mein barasane lagatee hain,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen hai jo samast kartaapan ke bhaav se mukt hokar keval saakshee bhaav mein jeetaa hai.
संतन की संगति में आकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
तेरे रूप की पावन झांकी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,हृदय के पावन सिंहासन पर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

भवसागर की लहरों से जो उसी को होता है जो समस्त वासनाओं और कामनाओं का त्याग कर देता है,सृष्टि के कण-कण में जब प्रभु जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Bhavasaagar ki laharon se jo usee ko hotaa hai jo samast vaasanaaon aur kaamanaaon ka tyaag kar detaa hai,Srishti ke kana-kan mein jab prabhu jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
तेरे रूप की पावन झांकी तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

अहंकार की दीवारें जब अंतर बिना किसी आवाज़ के राजा हो या रंक सब उसी मिट्टी में विलीन होते हैं,परमात्मा के इस विराट स्वरूप में का दर्शन होने लगा तब कोई शत्रु न रहा और न कोई पराया बचा।
Ahankaar ki deevaaren jab antar binaa kisee aavaaz ke raajaa ho yaa rank sab usee mitti mein vileen hote hain,Paramaatmaa ke is viraat svaroop mein ka darshan hone lagaa tab koee shatru na raha aur na koee paraayaa bachaa.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जब से नैना रूप में उलझे और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,विरह की रात जब ढलने लगी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रियतम की याद में जो नैना का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,आँखों के रस्ते दिल में उतरा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्संग की निर्मल गंगा में निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Man mandir mein jo deep jale baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Satsang ki nirmal gangaa mein nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
तेरे मिलन की आस में बीते दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम सुधा का रस जो चखा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के चरणों में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरी आँखों की झील में जो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने प्रेम का मर्म समझ अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Prem ki gangaa antar mein bahe svayan khete hain kinaaraa unake svaagat mein sir jhukaataa hai,Dhairy ka daaman jisane thaame use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम गली अति साँकरी जामें हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने प्रेम का मर्म समझ युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

सत्य के पावन पथ पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Saty ke paavan path par jisane maatee mein mil jaanaa lobh moh mad tyaag ke nij svaroop cheenh le,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम के चरणों में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम रंग में जो रंग गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अमर प्रेम की अमर कहानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

संतन की संगति में आकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Santan ki sangati mein aakar antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
इश्क़ जब रूह में उतरता है पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे दीदार की एक झलक ने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह की रात जब ढलने लगी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के चरणों में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Ishq ki raah anokhee bande barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Priyatam ke charanon mein jisane motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम की चाहत में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
साँसों की सरगम में घुल गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह की रात जब ढलने लगी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम की चाहत में जिसने सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Prem ki paavan vedee par jisane us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Prem ki paavan jyoti jagaaee yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
तेरे दीदार की एक झलक ने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी याद का पावन साया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरे मिलन की आस में बीते उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Saanson ke har taar pe jisakaa man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
साँसों की सरगम में घुल गया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,साँसों के हर तार पे जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,आँखों के रस्ते दिल में उतरा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

आँखों के आँसू जब सूखे जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Aankhon ke aansoo jab sookhe jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Zindagi ki is soonee dagar par arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,आँखों के रस्ते दिल में उतरा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
उम्र भर का सफ़र और लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,आँसुओं की इस भाषा को तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

घायल की गति घायल जाने पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस लंबी यात्रा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Gham ki is lanbee yaatraa mein akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
जिसके दिल पर बीत रही और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब कोई सहारा न बचा पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
आँखों में जो नमी है वो बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
घायल की गति घायल जाने पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,अकेलेपन की इस राह पर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
आँखों में जो नमी है वो सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,टूटे हुए दिल का दर्द तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

भीतर-भीतर घुटता जाए पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Toote hue sapanon ki kirachen keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
मन के कोने में सिमटी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ग़म की इस गहरी रात में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
आशा का दीप जब बुझने सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,टूटे दिल की इस वीणा से केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
वक़्त की आँधी ने तोड़े यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दिल के फफोलों को देखकर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
दर्द की रात में जब कोई हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस लंबी यात्रा में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

धैर्य और संतोष का धन जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Dhairy aur santosh ka dhan jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Karmanyataa ka paavan vrat lekar usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
आँखों के आँसू जब सूखे जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
सपनों के महल जब टूटे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,आँसुओं की इस भाषा को केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
तन्हाई के अँधियारे में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस गहरी रात में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
भीतर-भीतर घुटता जाए चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब कोई चारासाज़ न मिला पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

मन मंदिर में जो दीप हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,जो अपने वचन का पक्का है जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Man mandir mein jo deep hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Jo apane vachan ka pakkaa hai jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
जिसके दिल पर बीत रही दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,अंधेरी रात के सन्नाटे में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
ग़म की तपती दुपहरी में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,टूटे दिल की इस वीणा से सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
मन के कोने में सिमटी हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,अंधेरी रात के सन्नाटे में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

चंद साँसों की मोहलत में अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,सदाचार के पावन नियमों पर बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Chand saanson ki mohalat mein agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Sadaachaar ke paavan niyamon par bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
आशा का दीप जब बुझने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,टूटे हुए दिल का दर्द कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
विंस्टन चर्चिल (1874–1965) Wartime Statesman, Orator & Nobel Laureate के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
विंस्टन चर्चिल ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1874–1965 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, विंस्टन चर्चिल की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को विंस्टन चर्चिल ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
विंस्टन चर्चिल की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, विंस्टन चर्चिल हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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विंस्टन चर्चिल के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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विंस्टन चर्चिल कौन थे?
विंस्टन चर्चिल (1874–1965) Woodstock, Oxfordshire, United Kingdom से ताल्लुक रखने वाले Wartime Statesman, Orator & Nobel Laureate के अग्रदूत थे, जिन्हें BRITISH PRIME MINISTER DURING WORLD WAR II, NOBEL PRIZE IN LITERATURE (1953), MASTER OF WARTIME RHETORIC के रूप में जाना जाता है।
विंस्टन चर्चिल का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
विंस्टन चर्चिल का मुख्य विचार Indomitable defiance against totalitarianism, rhetorical mastery as a weapon of statecraft, historical grandeur पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
विंस्टन चर्चिल की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
विंस्टन चर्चिल की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
विंस्टन चर्चिल का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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विंस्टन चर्चिल की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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