ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।
Allama Iqbal (अल्लामा इक़बाल)
علامہ محمد اقبال
सर मुहम्मद इक़बाल यानी अल्लामा इक़बाल उर्दू और फ़ारसी के दार्शनिक महाकवि (शायर-ए-मशरिक़) थे। उनका 'ख़ुदी' (आत्मसम्मान एवं आत्मबोध) का दर्शन, 'सारे जहाँ से अच्छा' का राष्ट्रीय गान और असीम आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे शेर विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।
— अल्लामा इक़बाल • EARLY 20TH CENTURY CLASSICAL & PHILOSOPHICAL URDU/PERSIAN

ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।
— अल्लामा इक़बाल • EARLY 20TH CENTURY CLASSICAL & PHILOSOPHICAL URDU/PERSIAN
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‘ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।’— अल्लामा इक़बाल
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले,

‘सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं।’— अल्लामा इक़बाल
शेर #2 • शाही पन्ना
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,

‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा,हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा।’— अल्लामा इक़बाल
शेr #3 • रूहानी शाम
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा,
अमर शेर और ग़ज़लें
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं।
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा,हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा।
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है,बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा।

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा,तिरे सामने आसमाँ और भी हैं।
अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी,ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है।
तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ,मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ।
नशा पिला के गिराना तो सब को आता है,मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी।

वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है,तिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में।
क़नाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर,चमन और भी आशियाँ और भी हैं।
माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं,तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख।
मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने,मन अपना पुराना पापी था बरसों में नमाज़ी बन न सका।

मौज है दरिया में और बेरून-ए-दरिया कुछ नहीं,फ़र्द क़ाइम रब्त-ए-मिल्लत से है तन्हा कुछ नहीं।
जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में,या शम्अ जल रही है फूलों की अंजुमन में।
गुफ़्तार-ए-सफ़ा से दिल बहल तो सकता है,मगर बदल नहीं सकती किसी की तक़दीर।
ख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी है,निकल कर हलक़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जा।

अनोखी वज़अ है सारे ज़माने से निराले हैं,ये आशिक़ कौन सी बस्ती के या रब रहने वाले हैं।
ढूँढता फिरता हूँ ऐ 'इक़बाल' अपने आप को,आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं।
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है,पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है।
यक़ीन-ए-मोहकम अमल-ए-पैहम मोहब्बत फ़ातह-ए-आलम,जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें।

अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं,हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है।
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है,ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है।
तिरे सामने आसमाँ और भी हैं,वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है।
तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ,तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख।

मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी,जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में।
क़नाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर,निकल कर हलक़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जा।
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख,दिल से जो बात निकलती है असर रखती है।
मौज है दरिया में और बेरून-ए-दरिया कुछ नहीं,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।

या शम्अ जल रही है फूलों की अंजुमन में,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
ख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी है,ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।
ये आशिक़ कौन सी बस्ती के या रब रहने वाले हैं,हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है।
दिल से जो बात निकलती है असर रखती है,ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है।

जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें,वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है।
तिरे ख़याल से महकी है हर घड़ी मिरी,तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख।
मुद्दतों दिल मिरा उजड़ा हुआ आबाद रहा,जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में।
जो समझता है हक़ीक़त को वो चुप रहता है,निकल कर हलक़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जा।

ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है,दिल से जो बात निकलती है असर रखती है।
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी,ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।

मेरी सादगी देख क्या चाहता हूँ,हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है।
वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है,ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है।
चमन और भी आशियाँ और भी हैं,वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है।
मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने,तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख।

फ़र्द क़ाइम रब्त-ए-मिल्लत से है तन्हा कुछ नहीं,जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में।
गुफ़्तार-ए-सफ़ा से दिल बहल तो सकता है,निकल कर हलक़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जा।
निकल कर हलक़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जा,दिल से जो बात निकलती है असर रखती है।
ढूँढता फिरता हूँ ऐ 'इक़बाल' अपने आप को,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।

पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
सुख़न की दुनिया में नाम उसी का ज़िंदा है,ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।
तिरी नज़र का करम है जो ज़िंदगी मिरी,हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है।
वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला,ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है।

बात वो कह जो तिरे दिल की सदा कहती है,वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है।
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं,तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख।
हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुलसिताँ हमारा,जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में।
तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा,निकल कर हलक़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जा।

ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है,दिल से जो बात निकलती है असर रखती है।
नशा पिला के गिराना तो सब को आता है,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
तिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं,ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।

मन अपना पुराना पापी था बरसों में नमाज़ी बन न सका,हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है।
जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में,ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है।
मगर बदल नहीं सकती किसी की तक़दीर,वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है।
अनोखी वज़अ है सारे ज़माने से निराले हैं,तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख।

आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं,जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में।
यक़ीन-ए-मोहकम अमल-ए-पैहम मोहब्बत फ़ातह-ए-आलम,निकल कर हलक़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जा।
जो हर इंसान के एहसास का आईना है,दिल से जो बात निकलती है असर रखती है।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
अल्लामा इक़बाल (Allama Iqbal) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
सर मुहम्मद इक़बाल यानी अल्लामा इक़बाल उर्दू और फ़ारसी के दार्शनिक महाकवि (शायर-ए-मशरिक़) थे। उनका 'ख़ुदी' (आत्मसम्मान एवं आत्मबोध) का दर्शन, 'सारे जहाँ से अच्छा' का राष्ट्रीय गान और असीम आध्यात्मिक ऊर्जा से भरे शेर विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
अल्लामा इक़बाल ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Early 20th Century Classical & Philosophical Urdu/Persian के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, अल्लामा इक़बाल की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को अल्लामा इक़बाल ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
अल्लामा इक़बाल की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, अल्लामा इक़बाल हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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What does Allama Iqbal's concept of 'Khudi' mean?
'Khudi' refers to moral selfhood, spiritual willpower, and self-realization—where the human soul strengthens its integrity until it co-creates its own destiny with the Divine.
When did Allama Iqbal write 'Saare Jahaan Se Achha'?
He wrote 'Tarana-e-Hindi' in 1904, published in the journal Ittihad, celebrating the pluralistic harmony and natural splendor of India.
What are Iqbal's primary Urdu poetry books?
His foundational Urdu collections are 'Bang-e-Dara' (The Call of the Marching Bell), 'Bal-e-Jibril' (Gabriel's Wing), and 'Zarb-e-Kaleem' (The Stroke of Moses).
Did Iqbal write poetry in Persian as well?
Yes, nearly 60% of Iqbal's poetic corpus is in Persian, including monumental philosophical treatises such as 'Asrar-e-Khudi', 'Rumuz-e-Bekhudi', and 'Javid Nama'.
Why is the metaphor of 'Shaheen' (Eagle) prominent in Iqbal's works?
Iqbal used the Shaheen as the ideal archetype for youth—symbolizing fearless flight, high ambition, detachment from petty comfort, and relentless pursuit of excellence.
Can I download Iqbal's verses as aesthetic greeting cards?
Yes! Emotion Hub allows downloading all 202 verses in 300 DPI high-resolution card formats with beautiful typography.
Where did Iqbal receive his higher education?
He earned his BA from Cambridge, was called to the Bar at Lincoln's Inn, London, and earned his Ph.D. in philosophy from the University of Munich.
When did Allama Iqbal pass away?
He passed away on April 21, 1938, in Lahore, remembered universally as Shair-e-Mashriq (The Poet of the East).
तो फिर देर किस बात की?
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