उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।
Bashir Badr (बशीर बद्र)
बशीर बद्र (1935–Present) Urdu/Contemporary साहित्य के एक अत्यंत प्रतिष्ठित एवं कालजयी रचनाकार हैं, जिनकी कृतियाँ मानवीय संवेदना और दर्शन का अनुपम उदाहरण हैं।
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‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’— बशीर बद्र
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’— बशीर बद्र
शेर #2 • शाही पन्ना
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

‘कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।’— बशीर बद्र
शेr #3 • रूहानी शाम
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
अमर शेर और ग़ज़लें
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा,कश्ती के मुसाफ़िर ने समंदर नहीं देखा।
सराय की किसी दीवार पर लिखा हुआ था,मुसाफ़िरों को किनारों पे घर नहीं मिलता।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
जी बहुत चाहता है सच बोलें,ख़ू-ए-इंसान मगर इजाज़त नहीं देती।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैंने,बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
बशीर बद्र (Bashir Badr) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
बशीर बद्र (1935–Present) Urdu/Contemporary साहित्य के एक अत्यंत प्रतिष्ठित एवं कालजयी रचनाकार हैं, जिनकी कृतियाँ मानवीय संवेदना और दर्शन का अनुपम उदाहरण हैं।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
बशीर बद्र ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Contemporary Urdu Ghazal (1935–Present) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, बशीर बद्र की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को बशीर बद्र ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
बशीर बद्र की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, बशीर बद्र हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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