जीने मरने की कहाँ फ़िक्र है दीवानों को,घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए।
Faiz Ahmed Faiz (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़)
فیض احمد فیض
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ तरक़्क़ीपसंद तहरीक के सबसे महान शायर, नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित और लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित विश्व-प्रसिद्ध रचनाकार थे। उनकी शायरी इश्क़ के नाज़ुक जज़्बात और सामाजिक आज़ादी की लड़ाई का अमर संगम है।
डाउनलोड करें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के एस्थेटिक स्टोरी कार्ड्स

‘जीने मरने की कहाँ फ़िक्र है दीवानों को,घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए।’— फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
जीने मरने की कहाँ फ़िक्र है दीवानों को,

‘कौन किस के साथ है जब तक न आए शाम,यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है।’— फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर #2 • शाही पन्ना
कौन किस के साथ है जब तक न आए शाम,

‘पत्थरों के दरमियाँ आईना रखने वाले,जब शहर ही वो नहीं रहा जो दिल के अंदर था।’— फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेr #3 • रूहानी शाम
पत्थरों के दरमियाँ आईना रखने वाले,
अमर शेर और ग़ज़लें
कौन किस के साथ है जब तक न आए शाम,यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है।
पत्थरों के दरमियाँ आईना रखने वाले,जब शहर ही वो नहीं रहा जो दिल के अंदर था।
छाँव की चाह में बैठो तो उम्र ढलेगी,जीने मरने की कहाँ फ़िक्र है दीवानों को।

रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़,खै़रात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती।
जो हर इंसान के एहसास का आईना है,इंसान की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं।
सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में, अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव स्वयं खेते हैं, किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है।
नाम और दौलत तो माटी का खिलौना है, इंसान वही जो किसी रोते हुए को हँसा सके।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल को वो चैन दिया, जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तो इबादत बन जाता है, हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है।

फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
तेरी आँखों की झील में जो डूब गया इक बार, उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही।
आँखों में जो नमी है वो कोई शिकवा नहीं, दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें यह ख़ामोशी बख़्शी, वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी।

अकेलेपन की धूप जब साए को भी छीन ले, तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।
ज़िंदगी और कुछ नहीं बस धूप-छाँव का सफ़र है, आज जो ग़म है कल वही उम्मीद का सूरज बनेगा।
गिरने में कोई हार नहीं अगर उठने का हौसला हो, हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है।

नदी की तरह बहते रहना ही जीवन का नियम है, जो रुक गया वो अपनी ही सीमाओं में खो गया।
चंद साँसों की मोहलत में अगर किसी के काम आ सको, तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया।
जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
मैं और मेरा का भ्रम जब टूटता है, तभी उस परमसत्य का द्वार खुलता है।

काल का पहिया घूमता है बिना किसी आवाज़ के, राजा हो या रंक सब उसी मिट्टी में विलीन होते हैं।
मृत्यु कोई अंत नहीं बस एक वस्त्र बदलने का नाम है, आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी।
नाम और दौलत तो माटी का खिलौना है, इंसान वही जो किसी रोते हुए को हँसा सके,फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें यह ख़ामोशी बख़्शी, वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
ज़िंदगी और कुछ नहीं बस धूप-छाँव का सफ़र है, आज जो ग़म है कल वही उम्मीद का सूरज बनेगा,वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।
चंद साँसों की मोहलत में अगर किसी के काम आ सको, तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
काल का पहिया घूमता है बिना किसी आवाज़ के, राजा हो या रंक सब उसी मिट्टी में विलीन होते हैं,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।

वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल को वो चैन दिया, जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।
तेरी आँखों की झील में जो डूब गया इक बार, उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
अकेलेपन की धूप जब साए को भी छीन ले, तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।

गिरने में कोई हार नहीं अगर उठने का हौसला हो, हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।
मृत्यु कोई अंत नहीं बस एक वस्त्र बदलने का नाम है, आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव स्वयं खेते हैं, किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।

इश्क़ जब रूह में उतरता है तो इबादत बन जाता है, हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
आँखों में जो नमी है वो कोई शिकवा नहीं, दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं,फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी।
नदी की तरह बहते रहना ही जीवन का नियम है, जो रुक गया वो अपनी ही सीमाओं में खो गया,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।

मैं और मेरा का भ्रम जब टूटता है, तभी उस परमसत्य का द्वार खुलता है,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में, अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे, शब्द वही जो सदियों तक अमर आलोक बने।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा, मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें, असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर चुपचाप रिसते हैं।
Phaasale mit gaye jab dil se dil ka taar juraa, maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Zakhm wo nahi jo jism par dikhaaee den, asalee zakhm to wo hain jo rooh par chupachaap risate hain.
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

इश्क़ जब रूह में उतरता है तो इबादत बन जाता है, हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र भर भटकता रहा, जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai to ibaadat ban jaataa hai, husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Jo baahar dhoondhataa raha wo umr bhar bhatakataa raha, jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa.
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ (Faiz Ahmed Faiz) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ तरक़्क़ीपसंद तहरीक के सबसे महान शायर, नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित और लेनिन शांति पुरस्कार से सम्मानित विश्व-प्रसिद्ध रचनाकार थे। उनकी शायरी इश्क़ के नाज़ुक जज़्बात और सामाजिक आज़ादी की लड़ाई का अमर संगम है।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Progressive Writers Movement (Urdu) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
30 सेकंड में बनाइए अपना कार्ड
पसंद का शेर चुनिए, मनपसंद टेम्पलेट लगाइए, फ़ॉन्ट और रंग सजाइए और एक क्लिक में सेव कर लीजिए।
- बिना साइन-अप
- बिना वॉटरमार्क
- हमेशा मुफ़्त
“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
EmotionHub.in • Cosmic Poetryहर मौक़े और हर अपने के लिए संदेश
जिसके लिए लिखना है, उसे या कोई त्योहार चुनिए और तैयार संग्रह खोल लीजिए।
- पापा का जन्मदिनजिन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया
- सालगिरह की बधाईजोड़ों के लिए मीठी-सी पंक्तियाँ
- परिवार को सुप्रभातघर के ग्रुप के लिए सुबह की शुरुआत
- प्यार भरी शुभ रात्रिसोने से पहले भेजने लायक़ बातें
- दिवाली की बधाईअपनों के लिए रोशनी भरे संदेश
- होली की बधाईरंगों वाले संदेश दोस्तों के नाम
- ईद मुबारकअपनों तक पहुँचाइए ईद की ख़ुशी
- साथी को विदाईसहकर्मी के लिए अपनापन भरे अल्फ़ाज़
- सफलता पर बधाईकिसी की बड़ी जीत पर हौसला बढ़ाइए
- किसी की याद मेंजब दूरी कुछ ज़्यादा ही लंबी लगे
- दोस्त का जन्मदिनयार के लिए हँसी-ख़ुशी वाली दुआएँ
- क्रिसमस की शुभकामनाएँपूरे परिवार के लिए त्योहार की बधाई
लोग यही खोजते हैं
- अकेलेपन की शायरी
- दिल टूटने की शायरी
- पहले प्यार की शायरी
- हमसफ़र पर शायरी
- आगे बढ़ने की शायरी
- किंग एटीट्यूड शायरी
- क्वीन एटीट्यूड शायरी
- बेस्ट फ्रेंड शायरी
- देर रात की याद शायरी
- गहरे जज़्बात की शायरी
- हार न मानने की शायरी
- पत्नी को जन्मदिन की बधाई
- भाई को जन्मदिन की बधाई
- शादी की छोटी शुभकामनाएँ
- पहली सालगिरह की बधाई
- प्रेरणादायक सुप्रभात
कवि, त्योहार और स्टेटस
शेरों के पीछे की आवाज़ें पढ़िए, त्योहार की तैयारी कीजिए और स्टेटस के लिए छोटी पंक्ति उठाइए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
कोई अन्य सवाल है? संपर्क करें
What is the Lenin Peace Prize that Faiz received?
In 1962, Faiz was awarded the prestigious International Lenin Peace Prize, the Soviet equivalent of the Nobel Peace Prize, for championing human liberation.
What is the historical background of 'Hum Dekhenge'?
Faiz wrote 'Hum Dekhenge' (Va Yabqa Wajho Rabbika) in 1979 in response to General Zia-ul-Haq's military dictatorship, which became an immortal anthem of resistance.
What makes Faiz's ghazals unique?
Faiz seamlessly merged the beloved (mehboob) with the homeland (watan) and justice, giving classical romance an electrifying socio-political resonance.
Which prominent singers popularized Faiz's poetry?
Iqbal Bano's legendary 1986 performance of 'Hum Dekhenge', Mehdi Hassan's 'Gulon Mein Rang Bhare', and Begum Akhtar's renditions brought Faiz into millions of homes.
Was Faiz Ahmed Faiz ever imprisoned?
Yes, Faiz was imprisoned for over four years during the Rawalpindi Conspiracy Case (1951–1955), during which he penned the classic collection 'Zindan-Nama'.
How can I copy or share Faiz's couplets on Emotion Hub?
Every couplet has one-click copy, direct WhatsApp sharing, and HD 300 DPI canvas card download buttons.
When did Faiz pass away?
Faiz passed away on November 20, 1984, in Lahore, Pakistan, shortly after receiving news of his nomination for the Nobel Prize in Literature.
Where can I design my own poster with Faiz's poetry?
Click the palette icon on any verse to launch the verse directly into Emotion Hub's online Canvas Design Studio.
तो फिर देर किस बात की?
कोई पंक्ति चुनिए, उसे अपना अंदाज़ दीजिए और भेज दीजिए। आपका पहला कार्ड बस कुछ टैप दूर है।







