हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।
Mirza Ghalib (मिर्ज़ा ग़ालिब)
مرزا اسد اللہ خان غالب
मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान उर्फ़ ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी शायरी के सबसे अज़ीम शायर हैं। मुग़ल सल्तनत के आख़िरी दौर में रची गई उनकी ग़ज़लें इश्क़, विरह, मानवीय अस्तित्व और गहरे फलसफे का वो आईना हैं जो आज भी करोड़ों दिलों की धड़कन बना हुआ है।
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‘हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।’— मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,

‘इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश 'ग़ालिब',कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।’— मिर्ज़ा ग़ालिब
शेर #2 • शाही पन्ना
इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश 'ग़ालिब',

‘दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?।’— मिर्ज़ा ग़ालिब
शेr #3 • रूहानी शाम
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,
अमर शेर और ग़ज़लें
इश्क़ पर ज़ोर नहीं, है ये वो आतिश 'ग़ालिब',कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है,आख़िर इस दर्द की दवा क्या है?।
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है।

रंज से ख़ूगर हुआ इंसाँ तो मिट जाता है रंज,मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं।
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता?।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता,अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता।
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का,उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।

हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और।
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब,दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक?।
क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ,रंग लाएगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन।
कोई उम्मीद बर नहीं आती,कोई सूरत नज़र नहीं आती।

मौत का एक दिन मुअय्यन है,नींद क्यूँ रात भर नहीं आती?।
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद,जो नहीं जानते वफ़ा क्या है।
बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मिरे आगे,होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे।
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना,आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।

तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना,कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए'तिबार होता।
उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़,वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब',शर्म तुम को मगर नहीं आती।
ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री 'ग़ालिब',हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे।

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया,वर्ना हम भी आदमी थे काम के।
पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है,कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या।
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा,लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल,जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?।

वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है,कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं।
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक,कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक?।
क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं,मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यों?।
ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है पर कहाँ बचें कि दिल है,ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता।

हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।
उम्र भर 'ग़ालिब' यही भूल करता रहा,धूल चेहरे पे थी और आइना साफ़ करता रहा।
ये मसाइल-ए-तसव्वुफ़ ये तिरा बयान 'ग़ालिब',तुझे हम वली समझते जो न बादा-ख़्वार होता।
लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और,तन्हा गए क्यों अब रहो तन्हा कोई दिन और।

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन,ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होने तक।
जब तवक़्क़ो ही उठ गई 'ग़ालिब',क्यों किसी का गिला करे कोई?।
या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मिरी बात,दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़ुबाँ और।
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ,मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है,तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है?।
नक़्श फ़रियादी है किसकी शोख़ी-ए-तहरीर का,काग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यों,रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यों?।
फिर मुझे दीदा-ए-तर याद आया,दिल जिगर तश्ना-ए-फ़रियाद आया।

गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है,रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मिरे आगे।
कहाँ मयख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़,पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले।
मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त,मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ।
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना,दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।

आईना देख अपना सा मुँह लेके रह गए,साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था।
न गुल-ए-नग़्मा हूँ न पर्दा-ए-साज़,मैं हूँ अपनी शिकस्त की आवाज़।
बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब',कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है।
ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर,या वो जगह बता जहाँ पर ख़ुदा न हो।

सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं,ख़ाक में क्या सूरतें होंगी जो पिन्हाँ हो गईं।
इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही,मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही।
क़ता कीजे न ताल्लुक़ हम से,कुछ नहीं है तो अदावत ही सही।
हम भी तस्लीम की ख़ू डालेंगे,बेनयाज़ी तिरी आदत ही सही।

न सुनो गर बुरा कहे कोई,न कहो गर बुरा करे कोई।
रोक लो गर ग़लत चले कोई,बख़्श दो गर ख़ता करे कोई।
कौन है जो नहीं है हाजत-मंद,किस की हाजत रवा करे कोई?।
तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो,मुझ को भी पूछते रहो तो क्या गुनाह हो?।

क़तरे में दजला दिखाई न दे और जुज़्व में कुल,खेल लड़कों का हुआ दीदा-ए-बीना न हुआ।
बना कर फ़क़ीरों का हम भेस 'ग़ालिब',तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं।
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है?।
रग-ए-संग से टपकता वो लहू कि फिर न थमता,जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता।

क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ,मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में।
मुझ तक कब उन की बज़्म में आता था दौर-ए-जाम,साक़ी ने कुछ मिला न दिया हो शराब में।
बंदगी में भी वो आज़ादा ओ ख़ुद-बीं हैं कि हम,उल्टे फिर आए दर-ए-काबा अगर वा न हुआ।
सब रक़ीबों से हों नाख़ुश पर न हों हम से ख़फ़ा,हम भी कुछ रखते हैं हक़ ऐ शोख़-ए-बे-परवा तिरा।

रेख्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो 'ग़ालिब',कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था।
चाहिए अच्छों को जितना चाहिए,ये अगर चाहें तो फिर क्या चाहिए?।
शम्अ बुझती है तो उसमें से धुआँ उठता है,शो'ला-ए-इश्क़ सियह-पोश हुआ मेरे बाद।
पिन्हाँ था दाम-ए-सख़्त क़रीब-ए-आशियाँ के,उड़ने न पाए थे कि गिरफ़्तार हम हुए।

हैरान हूँ दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं,मक़दूर हो तो साथ रखूँ नौहा-गर को मैं।
आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीं ख़याल में,'ग़ालिब' सरीर-ए-ख़ामा नवा-ए-सरोश है।
हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी,कुछ हमारी ख़बर नहीं आती।
ग़म-ए-हस्ती का असद किस से हो जुज़ मर्ग इलाज,शमा हर रंग में जलती है सहर होने तक।

उन के आने की जो ख़ुशबू है ये आसार तो हैं,आज 'ग़ालिब' की ग़ज़ल में कोई दम ख़ास तो है।
वो फिराक़ और वो विसाल कहाँ,वो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहाँ?।
'ग़ालिब' छुटी शराब पर अब भी कभी कभी,पीता हूँ रोज़-ए-अब्र-ओ-शब-ए-माहताब में।
हर इक बात पर कहता हूँ मैं कि ऐसा भी होता है,वरना दुनिया में क्या होता है बस यूँही होता है।

ग़ालिब-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं,रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाय हाय क्यों?।
जो नक़्श-ए-पा तुम्हारा है वो है सजदा-गाह अपनी,जहाँ तुम हो वहीं काबा वहीं मेहराब है अपनी।
हस्ती के मत फ़रेब में आ जाइयो असद,आलम तमाम हल्क़ा-ए-दाम-ए-ख़याल है।
वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा,तो फिर ऐ संग-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यों हो?।

दिए हैं दिल अगर उस को बशर है क्या कहिए,हुए हैं ख़ाक मगर हम भी जर्रह क्या कहिए।
क्या किया ख़िज़्र ने सिकंदर से,अब किसे रहनुमा करे कोई?।
कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ख़ुद-पसंद है,आईना उस के हाथ में दे कर तो देखिए।
तासीर को न पूछ कि क्या क्या असर हुआ,नाफ़े में मुश्क दिल में लहू चश्म में है अश्क।

हुई ताख़ीर तो कुछ बाइस-ए-ताख़ीर भी था,आप आते थे मगर कोई इनाँ-गीर भी था।
दर-पर्दा वो लब-ए-जाँ-बख़्श की जुम्बिश तो देख,कहते हैं कुछ कि सुन के कोई बात रह न जाए।
है ग़ैब-ए-ग़ैब जिस को समझते हैं हम शुहूद,हैं ख़्वाब में हुनूज़ जो जागे हैं ख़्वाब में।
फिर इस अंदाज़ से बहार आई,कि हुए मेहर-ओ-माह तमाशाई।

देखो ऐ साकिनान-ए-ख़ित्ता-ए-ख़ाक,इस को कहते हैं आलम-आराई।
'ग़ालिब' तिरा अहवाल सुना देंगे हम सब को,मशहूर जो है बात वो पोशीदा नहीं है।
हुस्न-ए-मह गरचे ब-हंगाम-ए-कमाल अच्छा है,उस से मेरा वो महताब-ए-हिलाल अच्छा है।
यूँ ही गर रोता रहा 'ग़ालिब' तो ऐ अहल-ए-जहाँ,देखना इन बस्तियों को तुम कि वीराँ हो गईं।

दो-एक दिन में जो था नक़्शा-ए-वफ़ा खींचा,उसी को अक़्ल-ओ-दानिश का तमाशा कह दिया हमने।
होगा किसी दीवार के साए में मुक़द्दर,आज उन को भी उम्मीद नहीं जो तिरे दर पर।
दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग,देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक।
यार से छेड़ चली जाए असद,गर नहीं वस्ल तो हसरत ही सही।

हुस्न-ए-फ़रोग़-ए-शमअ-ए-सुख़न दूर है असद,पहले दिल-ए-गुदाख़्ता पैदा करे कोई।
ख़ुदा के वास्ते पर्दा न का'बे से उठा ज़ाहिद,कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफ़िर सनम निकले।
सोहबत-ए-रिंदाँ से बाज़ आया न ज़ाहिद उम्र भर,मय से बचता भी रहा और रिंद भी कहता रहा।
ग़ैर लें महफ़िल में बोसे जाम के,हम रहें यूँ तिश्ना-काम-ए-आरज़ू।

पिएँ शराब अगर ख़ुम भी तो नहीं ख़ाली,नशा-ए-मय है वो दरिया कि जिसका छोर नहीं।
मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान उर्फ़ ग़ालिब उर्दू और फ़ारसी शायरी के सबसे अज़ीम शायर हैं। मुग़ल सल्तनत के आख़िरी दौर में रची गई उनकी ग़ज़लें इश्क़, विरह, मानवीय अस्तित्व और गहरे फलसफे का वो आईना हैं जो आज भी करोड़ों दिलों की धड़कन बना हुआ है।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
मिर्ज़ा ग़ालिब ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Late Mughal Era (Delhi & Agra) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, मिर्ज़ा ग़ालिब की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को मिर्ज़ा ग़ालिब ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, मिर्ज़ा ग़ालिब हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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कवि, त्योहार और स्टेटस
शेरों के पीछे की आवाज़ें पढ़िए, त्योहार की तैयारी कीजिए और स्टेटस के लिए छोटी पंक्ति उठाइए
मिर्ज़ा ग़ालिब के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
मिर्ज़ा ग़ालिब के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
कोई अन्य सवाल है? संपर्क करें
मिर्ज़ा ग़ालिब का असली नाम और तख़ल्लुस क्या था?
मिर्ज़ा ग़ालिब का पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ान था। उन्होंने शुरुआत में 'असद' (शेर) और बाद में 'ग़ालिब' (विजयी या प्रभावी) तख़ल्लुस का इस्तेमाल किया।
मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म कब और कहाँ हुआ था, और वे दिल्ली में कहाँ रहे?
ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा के कला महल में हुआ था। 13 वर्ष की आयु में निकाह के बाद वे दिल्ली आ गए और पुरानी दिल्ली की बल्लीमारान स्थित गली क़ासिम जान की हवेली में जीवन बिताया।
मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी इतनी अनोखी और दार्शनिक क्यों मानी जाती है?
ग़ालिब ने पारंपरिक इश्क़िया शायरी से आगे बढ़कर मानव अस्तित्व, ब्रह्मांडीय संदेह, पीड़ा, गहरे दर्शन और तंज़ को अपनी शायरी का विषय बनाया। उनके अशआर जीवन के गहरे सत्यों को उजागर करते हैं।
'दीवान-ए-ग़ालिब' क्या है और यह इतना प्रसिद्ध क्यों है?
'दीवान-ए-ग़ालिब' मिर्ज़ा ग़ालिब की उर्दू ग़ज़लों का प्रामाणिक संग्रह है। हालाँकि यह ग्रंथ बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन इसका प्रत्येक शेर अपनी भाषाई गहराई और दार्शनिक भावों के लिए अमर है।
अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र से ग़ालिब का क्या संबंध था?
1850 में अंतिम मुग़ल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र ने ग़ालिब को 'दबीर-उल-मुल्क' और 'नज्म-उद-दौला' के ख़िताब दिए और उन्हें मुग़ल इतिहास लिखने का शाही ज़िम्मा सौंपा।
मिर्ज़ा ग़ालिब के सबसे लोकप्रिय और अमर शेर कौन से हैं?
उनके सबसे मशहूर शेरों में 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले', 'दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है', 'इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश ग़ालिब' और 'ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता' प्रमुख हैं।
उर्दू गद्य और ख़तूत (पत्र-लेखन) में ग़ालिब का क्या ऐतिहासिक योगदान है?
ग़ालिब ने अपने अनूठे पत्रों (ख़तूत) के ज़रिए उर्दू गद्य को नया जीवन दिया। उन्होंने कठिन शैली त्यागकर कहा: 'मैंने मुरासले को मुकालमा बना दिया'—यानी पत्र को एक जीवंत बातचीत का रूप दे दिया।
मिर्ज़ा ग़ालिब का इंतिक़ाल कब हुआ और उनका मज़ार कहाँ स्थित है?
मिर्ज़ा ग़ालिब का इंतिक़ाल 15 फ़रवरी 1869 को दिल्ली में हुआ। उनका मज़ार हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के समीप निज़ामुद्दीन बस्ती, नई दिल्ली में स्थित है।
तो फिर देर किस बात की?
कोई पंक्ति चुनिए, उसे अपना अंदाज़ दीजिए और भेज दीजिए। आपका पहला कार्ड बस कुछ टैप दूर है।







