इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या,आगे आगे देखिए होता है क्या।
Mir Taqi Mir (मीर तक़ी मीर)
میر تقی میر
मीर मुहम्मद तक़ी यानी मीर तक़ी मीर को उर्दू अदब में 'ख़ुदा-ए-सुख़न' (शायरी का ख़ुदा) का रुतबा हासिल है। मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी जिनके आगे सर झुकाते हुए कहा था कि 'रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब, कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था'। मीर का दर्द और सादगी आज भी हर दिल को नम कर देती है।
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‘इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या,आगे आगे देखिए होता है क्या।’— मीर तक़ी मीर
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या,

‘पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है,जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है।’— मीर तक़ी मीर
शेर #2 • शाही पन्ना
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है,

‘दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़,तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो।’— मीर तक़ी मीर
शेr #3 • रूहानी शाम
दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़,
अमर शेर और ग़ज़लें
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है,जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है।
दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़,तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो।
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,पंखुड़ी इक गुलाब की सी है।

मीर के शेर का क्या कहना,इस ख़राबे में ऐसा सुख़नवर कहाँ।
देख तो दिल कि जाँ से उठता है,ये धुआँ सा कहाँ से उठता है।
शाम ही से बुझा सा रहता है,दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का।
मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों,तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं।

आबले पड़ गए पाँव में मगर,कारवाँ अपना रवाँ-दवाँ ही रहा।
दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है,ये नगर सौ मरतबा लूटा गया।
था मुस्तआ'र हुस्न से उस के जो नूर था,ख़ुरशीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़हूर था।
बार-हा सर मार के पत्थर से हम,अपनी दीवानगी पे रोए हैं।

अहद-ए-तुफ़ूली में जो हम खेले थे,उन खिलौनों को याद करते हैं।
इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है,कब ये नौ-दौलतों से उठता है।
सिरहाने 'मीर' के आहिस्ता बोलो,अभी टुक रोते रोते सो गया है।
हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए,उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए।

उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया,देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया।
गुलशन-ए-दहर में बहार है क्या,सब ख़िज़ाँ का ही इंतिज़ार है क्या।
हम से मत पूछो हाल-ए-दिल यारो,इक ज़माना हुआ तबाह हुए।
आँखों में दम रुका है कि दीदार हो तिरा,मुद्दत से हम मुसाफ़िर-ए-राह-ए-विसाल हैं।

जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है,नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए।
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए,ये धुआँ सा कहाँ से उठता है।
इस ख़राबे में ऐसा सुख़नवर कहाँ,आबले पड़ गए पाँव में मगर।
शाम ही से बुझा सा रहता है,ख़ुरशीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़हूर था।

तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं,इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है।
दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है,उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए।
ख़ुरशीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़हूर था,हम से मत पूछो हाल-ए-दिल यारो।
अहद-ए-तुफ़ूली में जो हम खेले थे,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।

कब ये नौ-दौलतों से उठता है,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए,आगे आगे देखिए होता है क्या।
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया,नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए।
हम से मत पूछो हाल-ए-दिल यारो,ये धुआँ सा कहाँ से उठता है।

मुद्दत से हम मुसाफ़िर-ए-राह-ए-विसाल हैं,आबले पड़ गए पाँव में मगर।
तिरे ख़याल से महकी है हर घड़ी मिरी,ख़ुरशीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़हूर था।
मुद्दतों दिल मिरा उजड़ा हुआ आबाद रहा,इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है।
जो समझता है हक़ीक़त को वो चुप रहता है,उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए।

आगे आगे देखिए होता है क्या,हम से मत पूछो हाल-ए-दिल यारो।
दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
देख तो दिल कि जाँ से उठता है,आगे आगे देखिए होता है क्या।

दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का,नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए।
आबले पड़ गए पाँव में मगर,ये धुआँ सा कहाँ से उठता है।
ये नगर सौ मरतबा लूटा गया,आबले पड़ गए पाँव में मगर।
बार-हा सर मार के पत्थर से हम,ख़ुरशीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़हूर था।

उन खिलौनों को याद करते हैं,इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है।
सिरहाने 'मीर' के आहिस्ता बोलो,उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए।
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए,हम से मत पूछो हाल-ए-दिल यारो।
गुलशन-ए-दहर में बहार है क्या,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।

इक ज़माना हुआ तबाह हुए,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
सुख़न की दुनिया में नाम उसी का ज़िंदा है,आगे आगे देखिए होता है क्या।
तिरी नज़र का करम है जो ज़िंदगी मिरी,नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए।
वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला,ये धुआँ सा कहाँ से उठता है।

बात वो कह जो तिरे दिल की सदा कहती है,आबले पड़ गए पाँव में मगर।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है,ख़ुरशीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़हूर था।
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो,इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है।
मीर के शेर का क्या कहना,उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए।

ये धुआँ सा कहाँ से उठता है,हम से मत पूछो हाल-ए-दिल यारो।
मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों,जो हर इंसान के एहसास का आईना है।
कारवाँ अपना रवाँ-दवाँ ही रहा,वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला।
था मुस्तआ'र हुस्न से उस के जो नूर था,आगे आगे देखिए होता है क्या।

अपनी दीवानगी पे रोए हैं,नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए।
इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है,ये धुआँ सा कहाँ से उठता है।
अभी टुक रोते रोते सो गया है,आबले पड़ गए पाँव में मगर।
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया,ख़ुरशीद में भी उस ही का ज़र्रा ज़हूर था।

सब ख़िज़ाँ का ही इंतिज़ार है क्या,इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है।
आँखों में दम रुका है कि दीदार हो तिरा,उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए।
जो हर इंसान के एहसास का आईना है,हम से मत पूछो हाल-ए-दिल यारो।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
मीर तक़ी मीर (Mir Taqi Mir) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
मीर मुहम्मद तक़ी यानी मीर तक़ी मीर को उर्दू अदब में 'ख़ुदा-ए-सुख़न' (शायरी का ख़ुदा) का रुतबा हासिल है। मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी जिनके आगे सर झुकाते हुए कहा था कि 'रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब, कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था'। मीर का दर्द और सादगी आज भी हर दिल को नम कर देती है।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
मीर तक़ी मीर ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
18th Century Classical Urdu Poetry (Delhi & Lucknow) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, मीर तक़ी मीर की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को मीर तक़ी मीर ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
मीर तक़ी मीर की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, मीर तक़ी मीर हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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पसंद का शेर चुनिए, मनपसंद टेम्पलेट लगाइए, फ़ॉन्ट और रंग सजाइए और एक क्लिक में सेव कर लीजिए।
- बिना साइन-अप
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“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
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मीर तक़ी मीर के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
मीर तक़ी मीर के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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Why is Mir Taqi Mir called 'Khuda-e-Sukhan'?
He was crowned 'Khuda-e-Sukhan' (God of Poetic Craft) because he established the foundational cadence, meter, and aesthetic purity of the Urdu ghazal.
What did Mirza Ghalib say about Mir Taqi Mir?
Ghalib wrote: 'Ghalib apna ye aqeedah hai baqaul-e-Nasikh / Aap be-bahra hai jo motaqid-e-Mir nahi' acknowledging Mir as the supreme master.
What are Mir's most iconic ghazal opening couplets?
Universal favorites include 'Ibtida-e-ishq hai rota hai kya', 'Patta patta boota boota haal hamaara jaane hai', and 'Daman pe koi cheent na khanjar pe koi daagh'.
How many Diwans did Mir Taqi Mir compile?
Mir compiled six extensive Diwans of Urdu ghazals, comprising over 13,000 verses compiled in his masterwork 'Kulliyat-e-Mir'.
Where was Mir Taqi Mir born and where is he buried?
Mir was born in Agra (Akbarabad) in 1723 and spent his last decades in Lucknow, where he passed away in 1810 near the Lucknow railway station.
Can I copy and share Mir's couplets on Emotion Hub?
Yes! Every couplet features instant copying, WhatsApp status sharing, and high-res 300 DPI wallpaper image generation.
What is the defining characteristic of Mir's poetry?
The core of Mir's genius is 'Sahl-e-Mumtana'—extreme poetic simplicity that seems easy to compose, yet is impossible for other poets to replicate.
Where can I customize Mir's classical poetry into cards?
Use the palette icon on any verse card to edit typography and visual background themes in the Canvas Design Studio.
तो फिर देर किस बात की?
कोई पंक्ति चुनिए, उसे अपना अंदाज़ दीजिए और भेज दीजिए। आपका पहला कार्ड बस कुछ टैप दूर है।







