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Kabir Das (संत कबीर)

کبیر داس

संत कबीर दास 15वीं सदी के महान रहस्यवादी संत, समाज-सुधारक और क्रांतिकारी कवि थे। काशी के जुलाहे परिवार में पले-बढ़े कबीर के दोहे पाखंड, जातिवाद और धार्मिक कट्टरता पर सीधे प्रहार करते हैं और निश्छल प्रेम, समभाव तथा आत्म-बोध की अमर ज्योति जलाते हैं।

• संत कबीर • 01/08
आज का शेर
संत कबीर Portrait
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संत कबीर(کبیر داس)15th Century Bhakti Movement & Sant Mat
प्रमाणित विरासत
सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सई न दाति। हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥

— संत कबीर • 15TH CENTURY BHAKTI MOVEMENT & SANT MAT

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शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
‘सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सई न दाति। हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥’
— संत कबीर

शेर #1 • कॉस्मिक कलाम

सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सई न दाति। हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥

शेर #2 • शाही पन्ना
‘बलिहारी गुरु आपणैं, द्यौं हाड़ी कै वार। जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी वार॥’
— संत कबीर

शेर #2 • शाही पन्ना

बलिहारी गुरु आपणैं, द्यौं हाड़ी कै वार। जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी वार॥

शेr #3 • रूहानी शाम
‘सतगुरु की महिमा अनँत अनँत उपकार। लोचन अनँत उघाड़िया अनँत दिखावण्हआर॥’
— संत कबीर

शेr #3 • रूहानी शाम

सतगुरु की महिमा अनँत अनँत उपकार। लोचन अनँत उघाड़िया अनँत दिखावण्हआर॥

शेर #4 • ज़मर्रद फ़लसफ़ा
‘संदर्भ —सतगुरु दिव्यशक्ति से सम्पन्न है। उनकी महत्ता, महिमा अनिर्वचनीय है। उन्होंने अनन्त कृपा करके शिष्य को अपरिमेय शक्ति प्रदान की।’
— संत कबीर

शेर #4 • ज़मर्रद फ़लसफ़ा

संदर्भ —सतगुरु दिव्यशक्ति से सम्पन्न है। उनकी महत्ता, महिमा अनिर्वचनीय है। उन्होंने अनन्त कृपा करके शिष्य को अपरिमेय शक्ति प्रदान की।

प्रमाणित शायरी संग्रह

अमर शेर और ग़ज़लें

falsafa#01
सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सई न दाति। हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 1)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#02
बलिहारी गुरु आपणैं, द्यौं हाड़ी कै वार। जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी वार॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 2)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#03
सतगुरु की महिमा अनँत अनँत उपकार। लोचन अनँत उघाड़िया अनँत दिखावण्हआर॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 3)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#04
संदर्भ —सतगुरु दिव्यशक्ति से सम्पन्न है। उनकी महत्ता, महिमा अनिर्वचनीय है। उन्होंने अनन्त कृपा करके शिष्य को अपरिमेय शक्ति प्रदान की।
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 4)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
Crimson Velvet
शच्दार्थ—सूता=सोता=सुप्त। दिना=दिना=दिन । सोवणा=सोवना= सोना । पसारि= पसार फैलाकर ।

Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 48)

#_सुमिरन_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#05
राम नाम कै पटंतरै देबै कौं कुछ नाँहि। क्या ले गुरु संतोषिए, हौस रही मन माँहि॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 5)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#06
संदर्भ —शिष्य के मन में असीम कृतज्ञता की भाव है। वह सतगुरु के प्रति प्रतिदान की इच्छा रखता है, पर गुरुदेव के प्रति क्या समर्पित किया जाय यह संकल्प विकल्प मन में साकार रहता है। उसकी अभिलाषा अपूर्ण ही रह गई।
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 6)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#07
सतगुर के सदकै करूँ दिल अपणीं का साछ। कलियुग हम स्यूँ लड़ि पड़या मुहकम मेरा बाछ॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 7)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#08
संदर्भ — सतगुरु सर्वथा प्रशंसनीय है, वंदनीय है। उसकी महती कृपा से शिष्य कलियुग से पराभूत होने से बच गया।
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 8)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
Celestial Mystic
और भांति-भांति की बाधाओ से सम्पन्न है । ऐसी स्थिति से प्रियतम के दुर्लभ दीदार कैसे प्रास होगे ?

Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 61)

#_सुमिरन_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#09
सतगुरु लई कमांण करि, बांहण लागा तीर॥ एक जु बाह्या प्रीति सूँ, भीतरि रह्या शरीर॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 9)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#10
सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक। लागत ही मैं मिल गया, पड्या कलेजै छेक॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 10)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#11
सतगुरु मारया बाण भरि धरि करिसूधी मूठि। श्रंगि उघाडै लागिया,गई दवा सूँ फूटि़॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 11)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#12
हँसै न बोलै उन्मनी चंचल मेहल्या मारि। कहै कबीर भीतरि भिद्य,सतगुरु कै हथियारि॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 12)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
Royal Sapphire
आइ न सकौ तुझ पै, सकूॅ न तुझे बुलाइ । जियरा यौंही लेहुगे, विरह तपाइ तपाइ ।।१०।।

Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 74)

#_बिरह_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#13
भवार्थ --शब्द वाण रुपी सतगुरु के हथियार ने शिष्य के अन्तस य मर्म को गई कर दिया। अब वह् हपं-विपाद की मानव से परै होकर संसार से उन्म या उटामीन हो गया और उसका चचंल मन प्रवान्त हो गया।
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 13)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#14
गूंगा हुवा बावला, बहरा हुआ कान। पाऊँ मैं पंगुल भया, सतगुर मार्या बाण॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 14)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#15
पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगैं थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 15)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#16
दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट। पूरा किया विसाहुणां बहुरि न आँवौ हट्ट॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 16)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
Golden Amber
विरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ। राम वियोगी ना जिवै, जिवै त बौरा होइ।।१६।।

Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 87)

#_बिरह_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#17
ग्यान प्रकारया गुर मिल्या, सो जिनि वीसरि जाइ। जब गोविन्द कृपा करी, तब गुर मिलिया आइ॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 17)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#18
जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध। अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूं कूप पडंत॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 18)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#19
नां गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेला डाव। दून्यूं बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 19)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#20
चौसठ दीवा जोइ करि, चौदह चंदा मांहि। तिहिं घरि किसकौ चानिणौ, जिहि घरि गोविन्द नाहिं॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 20)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
Cosmic Violet
जो रोऊँ वौ बल घटै, हँसौ तोव राम रिसाइ। मनही मांहि विसूरणां, क्यूँ घूँरग काठहि खाइ ॥

Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 100)

#_बिरह_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#21
निस अँधियारी कारणौं, चौरासी लख चन्द। अति आतुर ऊदै किया, तऊ दिष्टि नहि मन्द॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 21)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#22
भली भई जु गुर मिल्या, नहीं वर होती हांणि। दीपक दिष्टि पतंग ज्यूँ पड़ता पूरी जाणि॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 22)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#23
माया दीपक नर पतंग, भ्रमि-भ्रमि इवैं पडन्त। कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उतरन्त॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 23)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#24
सतगुर बपुरा क्या करै, जे सिपही मांहै चूक। भावै त्यूं प्रमोधि ले, ज्यूं बँसि बजाई फूंक॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 24)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
Emerald Radiance
परबति परबति मैं फिर्या, नैन गँवाये रोइ। सो बूटी पाँऊँ नहीं, जातै जीबनि होइ॥

Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 113)

#_बिरह_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#25
संसै खाया सक्ल जुग, संसा किनहूँ न खद्ध। जै वेधे गुरु अप्पिरां, तिनि संसा चुणि-चुणि खद्ध॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 25)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#26
चेतनि चौकी बैसि करि, सतगुर दीन्हांँ धीर। निरभै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 26)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#27
संदर्भ —सतगुरु ने शिष्य के अनन्त लोचन ही नहीं उदघाटित किया, वरन् उसे धैर्य का वरदान भी दिया। साथ ही सतगुरु ने निःशक होकर ईश्वराराधना करने का भी उपदेश दिया।
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 27)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#28
सतगुर मिल्यात का भया, जे मनि पाड़ी भोल। पामि विनंठा कप्पढा, क्या करै विचारी चोल॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 28)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
Sunset Aura
शब्दर्थ - दौ = दावाग्नि । मायर = सागर पंपो = रधो । दापी=दघ । पालयै=चड़ेतौ है ।

Kabir Granthavali: Gyan Viraha & Inner Fire (Doha 126)

#_ग्यान_विरह_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#29
बूड़े थे परि ऊबरे, गुर की लहरि चमंकि। भेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरकि॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 29)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#30
गुर गोविंद तौ एक है, दूजा यहु आकार। आपा मेट जीवत मरै, तौ पावै करतार॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 30)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#31
सतगुर साँचा सूरिवाँ, तातैं लोहिं लुहार। कसणी दे कंचन किया, ताइ लिया ततसार॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 31)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#32
थापणि पाई विति भई, सतगुर दीन्हीं धीर। कबीर हीरा-बण्जिया, मानसरोवर तीर॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 32)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
Imperial Gold
घट मांहैं औघट लह्या, औघट माहैं घाट। कहि कबीर परचा भया, गुरू दिखाई बाट॥

Kabir Granthavali: Gyan Viraha & Inner Fire (Doha 139)

#_ग्यान_विरह_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#33
निश्चल निधि मिलाइ तत, सतगुर साहस घीर। निपजी मैं साझी घणां, बाँटे नहीं कबीर॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 33)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#34
चौपडि मांड़ी चौहटै, अरध उरध बाजार । कहै कबीरा रामजन, खोलौ संत विचार ॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 34)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#35
संदर्भ--कबीर ने प्रस्तुत अग की साखी १२ एव्ं १६ मे वाणिज्य का उल्लेख किया है । अब प्रस्तुत साखी एवं आगामी साखी मे चौपड़ एवं पासा के खेल का उल्लेख किया । आध्यात्मिक जगत मे चौपड का भिन्न अर्थ होना है ।
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 35)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#36
पासा पकड़या प्रेम का, सारी किया सरीर । सतगुर दाव घताइया, खेलै दास कबीर ॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 36)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
Crimson Velvet
आया था संसार में, देषरग कौं बहु रूप। कहै कबीरा संत हौ, पढ़ि गया नजरि अनुप ॥

Kabir Granthavali: Gyan Viraha & Inner Fire (Doha 152)

#_ग्यान_विरह_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#37
सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग । बरस्या बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग ॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 37)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#38
पूरे सूँ परचा भया, सब दुःख मेल्या दूरि । निर्मल कीन्ही आत्मा, ताथै सदा हजूर ॥
Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 38)
#_गुरुदेव_कौ_अंग
falsafa#39
कबिर कहता जात हुँ, सुणता है सय कोइ । राम कहें भला होइगा, नहिं तर भला न छोइ ॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 39)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#40
(२) सत दरिया ने भी इसकी प्रस्तुत विशेषता की ओर संकेत करते हुए कहा है "राम नाम निजु सार है " कबीर दास दरिया के शब्दो का समर्थन करते हुए केहते है "नाम सरोवर सार है सोह सुरत लगाय"।
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 40)
#_सुमिरन_कौ_अंग
Celestial Mystic
थिति पाई मन थिर भया, सतगुरु करी सहाइ। अनिन कथा तनि आचरी, हिरदै त्रिभुवन राइ॥

Kabir Granthavali: Gyan Viraha & Inner Fire (Doha 165)

#_ग्यान_विरह_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#41
तत तिलक तिहुँँ लोक मैं, राम नाँव निज सार | जन फबीर मस्तक दिया, सोभा अधिक अपार ॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 41)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#42
भगति भजन हरि नांव है , दूजा दुक्ख आपार। मनसा बाचा क्रमनां , कबीर सुमिरण सार ॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 42)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#43
च्य्ंता तौ हरि नांव की, और न चिंता दास। जे कुछ चितवैं राम विन,सोइ काल की पास ॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 43)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#44
यंच संगी पिव करै,छठा जुसुमिरै मन। आई सूति कबीर की, पाया राम,रतन॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 44)
#_सुमिरन_कौ_अंग
Royal Sapphire
गगन गरजि अंमृत चबै, कदली कवल प्रकाश। तहाँ कभीरा बंदिगी, कै कोेेई निज दास्र।।४०।।

Kabir Granthavali: Parcha & Experiential Realization (Doha 178)

#_परचा_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#45
मेरा मन सुमिरै राम कॅू, मेरा मन रामहिं प्पहि। अव मन रामहिं है रहा, सीस नवावौ काहि॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 45)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#46
संदर्भ—समाधि मे ब्रह्म का दर्शन प्राप्त कर लेने पर आत्मा ब्रह्म वाण हो जाती है। जब आत्मा परमात्मा मे समाहित हो गई , मन भेद सम्मान होगए और माया जीवन भेद के विनष्ट हो जाने मे उभय एक हो गए तो दान करे और कौन किसकी उपमाना?
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 46)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#47
तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझमें रही न हूँ । वारी फेरी वलि गई, जित देखौ तित तूँ ।६॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 47)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#48
शच्दार्थ—सूता=सोता=सुप्त। दिना=दिना=दिन । सोवणा=सोवना= सोना । पसारि= पसार फैलाकर ।
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 48)
#_सुमिरन_कौ_अंग
Golden Amber
संदर्भ —प्रभु प्राप्ति के लिए सर्वस्व त्याग करना पड़ता है प्रत्येक कष्ट लना पड़ता है।

Kabir Granthavali: Rasa & Devotional Nectar (Doha 191)

#_रस_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#49
केसौ कहि कहि कूकिये, ना सौइयै असरार। रात दिवस कैं कृकणों, (मन) कबहूँ लागै पुकार॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 49)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#50
जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस,फुर्न रसना नहिं राम । ते नर इस स्ंसार में, उपजि पये बेकाम ॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 50)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#51
पहली बुरा कमाइ करि,बाँधी विष की पोट । कोटि करम पेलै पलक मैं (जय) आया हरि ओट॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 51)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#52
कोटि कम पेलै पलक मै,जे रचक आवै नाउॉ। अनेक जुग जे पुत्रि करै,नहीं राम विन ठाउॉ॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 52)
#_सुमिरन_कौ_अंग
Cosmic Violet
बलिहारी गुरु आपणैं, द्यौं हाड़ी कै वार। जिनि मानिप तैं देवता, करत न लागी वार॥

Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 2)

#_गुरुदेव_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#53
जिही ह्र्री जैसा जाँरिग्याँ,तिन कूँ तैसा लाभ। ओसो प्यास न भाजई जब लग धसै आभ॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 53)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#54
का० मा० पा०—७ शब्दार्थ—आपसा=आपन=अपना। कहि = कह। ओरा=औरो=अन्योसे। कहाइ=कहा, कहलाइये। जिहि=जिहु=जिस। मूखि=मुख। ऊचरै=उच्यरै =उचारण हो। फेरि=पुन:।
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 54)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#55
जैसे माया मन रमैं, यूं जे राम रमाइ। (तौ) तारा मडंल छाँड़ि करि, जहाँ केसो तहाँ जाइ॥।।
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 55)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#56
लुटि सकै तौ लूटियौ, राम नाम है लूटि। पीछैं ही पछिताहुगे, यहु तन जैहै छूटि।।२५।।
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 56)
#_सुमिरन_कौ_अंग
Emerald Radiance
पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगैं थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥

Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 15)

#_गुरुदेव_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#57
लूटि सकै तौ लूटियौ, राम नाम भंडार। काल कंठ तै गहैगा, रुंधै दसू दुवार॥
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 57)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#58
संदर्भ — प्रस्तुत साखी मे कबीर ने काल को प्रबलता, मानव जीवन की क्षण भंगुरता, मानव की विवशता और राम नाम की सुलभता की ओर संकेत करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मानव समाज को चेतावनी प्रदान की हैं।
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 58)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#59
लंबा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु मार । कहौ संतौ कू पाइये, दुर्लभ हरि दीदार ॥।।
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 59)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#60
संदर्भ— प्रियतमा का प्रदेश बहुत दूर है । वहा का मार्ग अत्यन्त लम्बा
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 60)
#_सुमिरन_कौ_अंग
Sunset Aura
सतगुर मिल्यात का भया, जे मनि पाड़ी भोल। पामि विनंठा कप्पढा, क्या करै विचारी चोल॥

Kabir Granthavali: Guru Bhakti & Awakening (Doha 28)

#_गुरुदेव_कौ_अंग— संत कबीर
falsafa#61
और भांति-भांति की बाधाओ से सम्पन्न है । ऐसी स्थिति से प्रियतम के दुर्लभ दीदार कैसे प्रास होगे ?
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 61)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#62
गुण गायें गुण नाम कटै, रटै न राम वियोग । अह निसि हरि ध्यावै नहीं, क्या पावै दुर्लभ जोग ।।२८।।
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 62)
#_सुमिरन_कौ_अंग
falsafa#63
संदर्भ-प्रसतुत साखी मे कबीर ने राम नाम के महत्व का पुन: उल्लेख किया है । राम नाम का प्रभाव वहा व्यापक और असाधारण है । नाम जप के प्रभाव से मध्या के वचनं विच्छिन्न हो जाते । फिर भी मानव इस पुण्य कर्तव्य से विमुख है ।
Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 63)
#_सुमिरन_कौ_अंग
dard#64
रात्यू रूंनी बिरहिनीं, ज्यूं बंचौ कूं कुंज। कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगठ्या विरहा पुंज॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 64)
#_बिरह_कौ_अंग
Imperial Gold
तत तिलक तिहुँँ लोक मैं, राम नाँव निज सार | जन फबीर मस्तक दिया, सोभा अधिक अपार ॥

Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 41)

#_सुमिरन_कौ_अंग— संत कबीर
dard#65
अंबर कुंजा कुरलियां, गरजि भरे सत्र ताल। जिनि थैं गोविन्द वीछुटे, तिनके कौंण हवाल॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 65)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#66
चकवी बिछुटी रैणी की, आइ मिलि परभाति। जे जन बिछुटे राम सूं, ते दिन मिले न राति॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 66)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#67
वासर सुख नाँ रैन सुख, ना सुख सुपिनै माहि। कबीर बिछुढ्या राम सूँ, नौ सुख धूप न छाँह॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 67)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#68
विरहिन ऊभी पंथ सिरि, पंथी बूझे धाइ। एक सवद कहि पीव का, कवर मिलैंगे आइ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 68)
#_बिरह_कौ_अंग
Crimson Velvet
का० मा० पा०—७ शब्दार्थ—आपसा=आपन=अपना। कहि = कह। ओरा=औरो=अन्योसे। कहाइ=कहा, कहलाइये। जिहि=जिहु=जिस। मूखि=मुख। ऊचरै=उच्यरै =उचारण हो। फेरि=पुन:।

Kabir Granthavali: Sumiran & Divine Remembrance (Doha 54)

#_सुमिरन_कौ_अंग— संत कबीर
dard#69
बहुत दिनन की जोबती, बाट तुम्हारी राम। जिब तरसैं तुझ मिलन कूँ, माने नांही विश्राम॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 69)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#70
बिरहिन ऊठै भी पडै, दरसन कारनि राम। मृवां पीछे देहुगे सो दरसन किहि काम॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 70)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#71
मृवा पीछै जिनि मिलै कहै कबीरा राम । पाथर घाटा लोह सव (तथ) पारस कौणे काम ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 71)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#72
सन्दभॆ- प्रस्तुत साखी का वण्यं-विषय सप्तम साखी के विषय से साम्य रखता है । कवि ब्रह्म अनुग्रह का आकांक्षी हैं, परन्तु शरीर रहते ही ।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 72)
#_बिरह_कौ_अंग
Celestial Mystic
वासर सुख नाँ रैन सुख, ना सुख सुपिनै माहि। कबीर बिछुढ्या राम सूँ, नौ सुख धूप न छाँह॥

Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 67)

#_बिरह_कौ_अंग— संत कबीर
dard#73
अन्देसडा़ न भाजिसी, सन्देसौ कहियाँ । कै हरि आया भाजिसी, के हरि ही पासि गयाँ ।।६१।।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 73)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#74
आइ न सकौ तुझ पै, सकूॅ न तुझे बुलाइ । जियरा यौंही लेहुगे, विरह तपाइ तपाइ ।।१०।।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 74)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#75
यह तन जालौं मुसि करुं ज्यूं धूवाँ जाइ सरग्गि । मति वै राम दया करैं, बरसि बुझावे अग्नि ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 75)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#76
यहु तन जालौ मसि करौं,लिखौं राम का नाउँ। लेखणि करूँ करंक की,लिखि लिख राम पठाऊँ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 76)
#_बिरह_कौ_अंग
Royal Sapphire
प्रसंग— विरह की चोट एव पीड़ा से विरही का समस्त शरीर जंजर हो रहा है।

Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 80)

#_बिरह_कौ_अंग— संत कबीर
dard#77
संदर्भ—विरहीणि की इच्छाएँ नए-नए रुपों में प्रकट हो रही हैं। यहाँ एक और अभिनव कामना। जिस प्रकार भी-प्रिय का ध्यान आकर्षित हो वह कार्य करना है गंतव्य तक पहुंचना है। लक्ष्य की स्मुप्लब्धि ही व्यय बन गया है।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 77)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#78
प्रसंग प्रेम एवं विरह की पीड़ा ने पिंजर या शरीर एवं ममं को अभिभूत कर रखा है।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 78)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#79
चोट सताँणी विरह की,सब तन जर जर होइ । मारणहारा जाँणि है, कै जिहि लागी सोइ ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 79)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#80
प्रसंग— विरह की चोट एव पीड़ा से विरही का समस्त शरीर जंजर हो रहा है।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 80)
#_बिरह_कौ_अंग
Golden Amber
अंषणियां झांई पड़ी,पंथ निहारि निहारि। जीभडियाँ छाला पड़या,राम पुकारि पुकारि॥

Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 93)

#_बिरह_कौ_अंग— संत कबीर
dard#81
कर कमाण सर साँधि करि, खैचि जुमारया मांहि । भीतर भिधा सुमार है, जीव कि जिवै नांहि ॥र१५।।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 81)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#82
प्रसंग— सदगुरु ने जब से शब्द रुपी बाण मारा है तब से प्रेम की मधुर पीड़ा, विरह की चोट सवल हो छठी है ।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 82)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#83
जब हूँ मारया खैचिकर, तब मैं पाई जांणि। लागी चोट मरम्म की, गई कलेजा छाणि।।१६।।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 83)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#84
प्रसंग— शब्द वासा के लगते ही ज्ञान जाग्रत हो गया । अब उस प्रेम और विरह को व्यधा ने ममॆ को आहत कर डाला है ।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 84)
#_बिरह_कौ_अंग
Cosmic Violet
डारी खाँड पटकि करि अतरि रोस उपाइ । रोवत रोवत मिल गया, पिता पियांरे जाइ ।।३२।।

Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 106)

#_बिरह_कौ_अंग— संत कबीर
dard#85
जिहि सरि मारि काल्हि, सो सर मेरे मन समझा। तिहि सरि मारि ,सरबिन सचपाँऊ नहीं ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 85)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#86
प्रसंग— सतगुरु द्वारा मारा हुआ शब्द रूपी वाण और उससे समुप्तन्न पीडा मन को मधुर प्रतीत होती है।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 86)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#87
विरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ। राम वियोगी ना जिवै, जिवै त बौरा होइ।।१६।।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 87)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#88
प्रसंग — विरह के प्रभाव से साधक का तन क्षीरग, मन उन्मन प्रतीत होता है। राम वियोगी संसार से वियुक्त होकर जीवन यापन करता है।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 88)
#_बिरह_कौ_अंग
Emerald Radiance
दीपक पावक आँखिया, तेल भी आँण्या संग। तीन्यूँ मिल करि जोइया, (तब) उडि उड़ि पड़े पतंग॥

Kabir Granthavali: Gyan Viraha & Inner Fire (Doha 119)

#_ग्यान_विरह_कौ_अंग— संत कबीर
dard#89
विरहा भुवंगम पैसि करि, किया कलेजै घाव। साघू अंग न मोड़ही, ज्यूँ भावै त्यूँ खाव।।१६।।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 89)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#90
संदर्भ— विरहानुभूति साधुजनों को प्रिय लगता है। विरह जनित आनन्द अद्वितीय है।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 90)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#91
सब रॅग नंतर बाव तन,विरह बजावै नित्त। और न कोई सुणि सकै, कै सांई कै चित्त॥।।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 91)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#92
विरहा वुरहा जनि कहौ,बिहरा है सुलितान। जिह् घटि विरह न संचरै,सो घटि सदा मसान ।।२१॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 92)
#_बिरह_कौ_अंग
Sunset Aura
पारब्रह्म के तेज का, कैसा है उसमान। कहिबे कूं सोभा नहीं देखया ही परबान॥

Kabir Granthavali: Gyan Viraha & Inner Fire (Doha 132)

#_ग्यान_विरह_कौ_अंग— संत कबीर
dard#93
अंषणियां झांई पड़ी,पंथ निहारि निहारि। जीभडियाँ छाला पड़या,राम पुकारि पुकारि॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 93)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#94
इस तन का दीवा करौ,वाती मेल्यूँ जीव। लोही सीचौं तेल ज्यूँ,कब मुख देखौ पीव ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 94)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#95
नैनां नीझर लाइया,रहट बहै निस जाम। पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं,कबरु मिलहुगे राम ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 95)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#96
शब्दार्य—नीझर =निझर= झरना । रहट = कुआं जल निकालने का यंत्र । निसजाम= निशयाम । कवरु = अरे कब ।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 96)
#_बिरह_कौ_अंग
Imperial Gold
मन लागा उन मन्न सौं, गगन पहुँचा जाइ। देख्या चंद बिहूँणां, चांदिणाँ, तहाँ अलख निरंजन राइ॥

Kabir Granthavali: Gyan Viraha & Inner Fire (Doha 145)

#_ग्यान_विरह_कौ_अंग— संत कबीर
dard#97
आपडिंयां प्रेम कसाइयां, लोग जांरगौ दुखडि़याँ । साँईं अपणै, कारणौ, रोइ रोइ रतडि़याँ ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 97)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#98
सोइ आंसू सजरणां सोई लोक बिड़ँहि । जे लोइगा लोंहीं चुवै,तौ जारणौ हेत हियाँहि ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 98)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#99
संदर्भ— आँसु आँसु मे भेद है । वही सच्चे आँसू है जो हृदय से प्रस्फुटित होते हैं ।
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 99)
#_बिरह_कौ_अंग
dard#100
जो रोऊँ वौ बल घटै, हँसौ तोव राम रिसाइ। मनही मांहि विसूरणां, क्यूँ घूँरग काठहि खाइ ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 100)
#_बिरह_कौ_अंग
Crimson Velvet
पंषि उडानीं गगन कॅू,प्यंड रह्या परदेश। पांणी पीया चंच बिन,भूलि गया यहु देश।।२०।।

Kabir Granthavali: Gyan Viraha & Inner Fire (Doha 158)

#_ग्यान_विरह_कौ_अंग— संत कबीर
dard#101
हॉसि हॉसि कंत न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ । जो हाँसेही हरि मिलै, दुतौ नही दुहागनि कोइ ॥
Kabir Granthavali: Viraha & Longing for Truth (Doha 101)
#_बिरह_कौ_अंग
साहित्यिक परिचय एवं आलोचनात्मक सम्मान

संत कबीर (Kabir Das) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत

संत कबीर दास 15वीं सदी के महान रहस्यवादी संत, समाज-सुधारक और क्रांतिकारी कवि थे। काशी के जुलाहे परिवार में पले-बढ़े कबीर के दोहे पाखंड, जातिवाद और धार्मिक कट्टरता पर सीधे प्रहार करते हैं और निश्छल प्रेम, समभाव तथा आत्म-बोध की अमर ज्योति जलाते हैं।

साहित्यिक विधा और मौलिक शैली

संत कबीर ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।

ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान

15th Century Bhakti Movement & Sant Mat के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, संत कबीर की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।

दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति

प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को संत कबीर ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।

संत कबीर की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?

कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, संत कबीर हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

संत कबीर के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब

संत कबीर के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।

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What is the historical time period of Sant Kabir?

Sant Kabir lived during the 15th century (approx. 1398–1518 CE), primarily in Varanasi (Kashi) during the Delhi Sultanate and Bhakti movement era.

What is the meaning of 'Dhaai Aakhar Prem Ka'?

Kabir taught that reading thousands of holy scriptures is meaningless without experiencing the 'two-and-a-half letters' of selfless love and universal compassion.

What are Kabir's 'Bijak' and 'Sakhi'?

The 'Bijak' is the foundational compilation of Kabir's teachings preserved by the Kabir Panth, while 'Sakhis' (from Sanskrit 'Sakshi', meaning witness) are two-line poems testifying to spiritual truth.

Is Kabir's poetry included in the Guru Granth Sahib?

Yes, Guru Arjan Dev Ji included over 500 hymns and couplets of Bhagat Kabir into the Sikh holy scripture, Sri Guru Granth Sahib.

Why did Kabir choose to pass away in Maghar?

To defy the superstitious orthodoxy claiming that dying in Kashi guarantees heaven while dying in Maghar leads to rebirth as a donkey, proving that righteousness lies in deeds, not geographic locations.

Can I copy and share Kabir's dohas on Emotion Hub?

Yes! All 202 authentic dohas feature single-click copying, WhatsApp sharing, and 300 DPI wallpaper image downloads.

What was Kabir's occupation?

Kabir was a weaver (Julaha) by profession, often using the loom, thread, and fabric as metaphors for the human body and cosmic spirit.

Where can I customize Kabir dohas into greeting cards?

Click the palette icon on any doha card to customize typography, colors, and layouts in the Emotion Hub Canvas Studio.

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