प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Wasif Ali Wasif (वासिफ़ अली वासिफ़)
वासिफ़ अली वासिफ़ (1929–1993) Sufi Sage, Aphorist & Mystic Poet के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।’— वासिफ़ अली वासिफ़
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— वासिफ़ अली वासिफ़
शेर #2 • शाही पन्ना
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,

‘माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— वासिफ़ अली वासिफ़
शेr #3 • रूहानी शाम
माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,
अमर शेर और ग़ज़लें
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,धैर्य का दामन जिसने थामे परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जब से नैना रूप में उलझे जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Prem ki doree baandh laee jab do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Jab se nainaa roop mein ulajhe jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
साधु-संगत की छाया में जो घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
माटी का यह देह बना है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,भवसागर की लहरों से जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Nainon ke darpan mein basaa jab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Sachche aashiq ki pahachaan yahee utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
मन के निर्मल दर्पण में जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,वाणी में जिसके मिठास घुली परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
अहंकार की दीवारें जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,मोह-निशा से जो जन जागा उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

अंतर घट में जब ज्योति जगी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Antar ghat mein jab jyoti jagee doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Sachche aashiq ki pahachaan yahee jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
सत्य का दीप जब जलता है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,वाणी में जिसके मिठास घुली व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
वाणी वही जो घाव भरे और का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सदाचार की पावन वेदी पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,इस दर्द भरे दिल की सदा तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Toote dil ki khaamoshi mein hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Is dard bhare dil ki sadaa tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
नाम और दौलत तो माटी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सत्य का दीप जब जलता है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हरि की कृपा का पावन साया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

टूटी नाव भँवर में फँसी जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Tootee naav bhanvar mein phansee jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Jab apanon ne hi diye zakhm chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,वाणी में जिसके मिठास घुली अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नाम और दौलत तो माटी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सदाचार की पावन वेदी पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

आँखों में जो नमी है वो चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,अंधेरी रात के सन्नाटे में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Aankhon mein jo namee hai wo cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Andheree raat ke sannaate mein saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
अहंकार की दीवारें जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य वचन जो मुख से बोले के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हरि की कृपा का पावन साया उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
नाम और दौलत तो माटी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सच्चे मित्र की पहचान यही बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Santan ki sangati mein aakar man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Sachche mitr ki pahachaan yahee bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मोह-निशा से जो जन जागा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,शांति और संतोष का धन जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
नाम और दौलत तो माटी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,माटी के इस पुतले में जब उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Satkarmon ki amit poonjee tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Maatee ke is putale mein jab usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,परहित में जिसने जीवन सौंपा परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्य का दीप जब जलता है मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

मन मंदिर में जो दीप जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,त्याग और सेवा की भावना से उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Man mandir mein jo deep jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
मन मंदिर में जो दीप जले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सदाचार की पावन वेदी पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

सत्य का दीप जब जलता अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,जब द्वैत का सारा भ्रम मिट गया जिसने अपना शीश नवाया उसने परम मुक्ति का अमर वरदान प्राप्त कर लिया।
Saty ka deep jab jalataa avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Jab dvait ka saaraa bhram mit gaya jisane apanaa sheesh navaayaa usane param mukti ka amar varadaan praapt kar liyaa.
सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,शांति और संतोष का धन जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
तेरी याद का पावन साया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,साँसों के हर तार पे जिसका जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
मन की वीणा बज उठी जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

शाश्वत शांति का अनुभव वही मानुष की जात देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात,परम शांति का यह पावन धाम तो सारे बंधन टूट गए और वह परमब्रह्म में लीन होकर एक रूप हो गया।
Shaashvat shaanti ka anubhav vahee maanush ki jaat dekhat hi chhip jaaegaa jyon taaraa parabhaat,Param shaanti ka yeh paavan dhaam to saare bandhan toot gaye aur woh paramabrahm mein leen hokar ek roop ho gaya.
मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैनों के दर्पण में बसा जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,हृदय के पावन सिंहासन पर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जब से नैना रूप में उलझे जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

अहंकार की दीवारें जब अंतर अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं अंतर में जागा तो अविद्या का सारा अंधकार पल भर में समाप्त हो गया।
Ahankaar ki deevaaren jab antar avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Jab man ki sab tarangen shaant hueen antar mein jaagaa to avidyaa ka saaraa andhakaar pal bhar mein samaapt ho gaya.
प्रेम रंग में जो रंग गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,साँसों के हर तार पे जिसका जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन घाटी में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम की चाहत में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,हृदय के पावन सिंहासन पर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Hari sumiran mein jisakaa chitt saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Prem ki dor mein bandh gaya jo jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम की चाहत में जिसने संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने प्रेम का मर्म समझ जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

आशा तृष्णा सब छूटी जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Satya-ahinsaa ki raahon par use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन धारा में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन धारा में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अमर प्रेम की अमर कहानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

नाम और दौलत तो माटी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Naam aur daulat to maatee man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरे मिलन की आस में बीते जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम नगर का वासी बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,शांति और संतोष का धन जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Saty ka deep jab jalataa hai to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Shaanti aur santosh ka dhan jo rahataa hai jisane doosaron ke aansoo ponchh kar unake cheharon pe muskaan laa dee.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
साँसों की सरगम में घुल गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह का हर इक आँसू बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
साँसों की सरगम में घुल गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Ishq ki raah anokhee bande palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Saanson ke har taar pe jisakaa jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम गली अति साँकरी जामें तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरी आँखों की झील में जो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम का अनुराग ही जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Man mandir mein basaa jo moorati jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem ki mastee mein jo jhoomaa liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
तेरी याद का पावन साया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,साँसों के हर तार पे जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
अंतर घट में जब ज्योति जगी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
इश्क़ जब रूह में उतरता है जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की इस पावन धारा में अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

इश्क़ जब रूह में उतरता है तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Ishq jab rooh mein utarataa hai tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Aankhon ke raste dil mein utaraa ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की मस्ती में जो झूमा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम सुधा का रस जो चखा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

वक़्त की आँधी ने तोड़े सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Waqt ki aandhee ne tore sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Gham ki is lanbee yaatraa mein sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
तेरे दीदार की एक झलक ने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन घाटी में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
सांस-सांस में याद तुम्हारी और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,आँसुओं की इस भाषा को तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,टूटे दिल की इस वीणा से सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

घायल की गति घायल जाने जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे दिल की इस वीणा से चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Toote dil ki is veenaa se chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
तन्हाई के अँधियारे में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब आशा की हर किरण बुझी सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
घायल की गति घायल जाने जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,टूटे दिल की इस वीणा से सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
टूटे दिल की ख़ामोशी में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,इस दर्द भरे दिल की सदा तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
आँखों में जो नमी है वो सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

टूटी नाव भँवर में फँसी कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Tootee naav bhanvar mein phansee koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Dard ki bhattee mein tapakar hi keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
भीतर-भीतर घुटता जाए यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब आशा की हर किरण बुझी सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,टूटे हुए सपनों की किरचें केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
टूटे दिल की ख़ामोशी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब आशा की हर किरण बुझी पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
आशा का दीप जब बुझने पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

ठोकर खाकर जो संभलता जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जो अपने वचन का पक्का है और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Thokar khaakar jo sanbhalataa jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jo apane vachan ka pakkaa hai aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
वक़्त की आँधी ने तोड़े सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब कोई चारासाज़ न मिला मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
नैनों से जो नीर बहे और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,अंधेरी रात के सन्नाटे में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

जीवन की इस रणभूमि में जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,जीवन का असली आनंद वही है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Jeevan ki is ranabhoomi mein jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Jeevan ka asalee aanand vahee hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
भीतर-भीतर घुटता जाए यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,अंधेरी रात के सन्नाटे में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
दर्द की रात में जब कोई पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
टूटी नाव भँवर में फँसी जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

जिसने मन को जीत लिया है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,विपदाओं से जो कभी न डरा चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Jisane man ko jeet liyaa hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Vipadaaon se jo kabhee na daraa chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब कोई सहारा न बचा पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
वासिफ़ अली वासिफ़ (Wasif Ali Wasif) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
वासिफ़ अली वासिफ़ (1929–1993) Sufi Sage, Aphorist & Mystic Poet के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
वासिफ़ अली वासिफ़ ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1929–1993 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, वासिफ़ अली वासिफ़ की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को वासिफ़ अली वासिफ़ ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
वासिफ़ अली वासिफ़ की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, वासिफ़ अली वासिफ़ हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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वासिफ़ अली वासिफ़ के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
वासिफ़ अली वासिफ़ के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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वासिफ़ अली वासिफ़ कौन थे?
वासिफ़ अली वासिफ़ (1929–1993) Khushab, Punjab, Pakistan से ताल्लुक रखने वाले Sufi Sage, Aphorist & Mystic Poet के अग्रदूत थे, जिन्हें MODERN SUFI MASTER OF LAHORE, MASTER OF SPIRITUAL APHORISMS, AUTHOR OF 'DIL DARYA SAMUNDAR' के रूप में जाना जाता है।
वासिफ़ अली वासिफ़ का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
वासिफ़ अली वासिफ़ का मुख्य विचार Inner contentment (Raza), transforming suffering into spiritual insight, simplicity, loving the divine through everyday service पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
वासिफ़ अली वासिफ़ की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
वासिफ़ अली वासिफ़ की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
वासिफ़ अली वासिफ़ का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
क्या Emotion Hub पर वासिफ़ अली वासिफ़ के शेर कॉपी और शेयर किए जा सकते हैं?
हाँ, Emotion Hub पर आप एक क्लिक में शेर कॉपी कर सकते हैं और सीधे WhatsApp पर शेयर कर सकते हैं।
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वासिफ़ अली वासिफ़ का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
वासिफ़ अली वासिफ़ की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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