श्लोक — वर्णानामर्थसङ्घनां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥
Goswami Tulsidas (गोस्वामी तुलसीदास)
गोस्वामी तुलसीदास भक्ति काल की रामभक्ति शाखा के सिरमौर कवि थे, जिन्होंने जनभाषा अवधी में कालजयी महाकाव्य "रामचरितमानस" और "हनुमान चालीसा" की रचना की।
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‘श्लोक — वर्णानामर्थसङ्घनां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥’— गोस्वामी तुलसीदास
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
श्लोक — वर्णानामर्थसङ्घनां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥

‘भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥’— गोस्वामी तुलसीदास
शेर #2 • शाही पन्ना
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥

‘वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं, शङ्कररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥’— गोस्वामी तुलसीदास
शेr #3 • रूहानी शाम
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं, शङ्कररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥
अमर शेर और ग़ज़लें
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं, शङ्कररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ। वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥
यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुराः। यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाऽहेर्भ्रमः। यत्पादप्लव एक एव हि भवास्सोधेस्तितीविताम्। वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि। स्वान्तःसुखायतुलसी रघुनाथगाथाभाषानिवन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥
सोरठा-जेहि सुमिरत सिधि होइ, गन-नायक करि-बर-बदन। करउ अनुग्रह सोइ, बुद्धि-रासि सुभ-गुन-सदन॥

मूक होइ बाचाल, पङ्गु चढ़इ गिरिवर गहन। जासु कृपा सो दयाल, द्रवउ सकल-कलिमल-दहन॥
जिनकी कृपा से मूंगा बोलनेवाला होता है और पंगुल दुरारोह पहाड़ पर बढ़ जाता है, कलि के सम्पूर्ण पापों को जलानेवाले वे (सूर्य भगवान) मुझ पर प्रसन्न हों।
नील-सरोरुह-स्याम, तरुन-अरुन-बारिज नयन। करउ सो मम उर धाम, सदा छीर-सागर-सयन।
जिनका शरीर नील-कमल के समान श्याम है और नवीन लिखे हुए लाल कमल के समान नेत्र हैं, जो सदा क्षीरसागर में शयन करते हैं, वे (विष्णु भगवान्) मेरे हृदयमन्दिर में निवास करें।

कुन्द-इन्दु-सम देह, उमा-रमन करुना-अयन। जाहि दोन पर नेह, करउ कृपा मर्दन-मयन॥
कुन्द के फूल और चन्द्रमा के समान देहवाले, उमावर, दया के स्थान, कामदेव को भस्म करनेवाले, जिन्हें दीनजनों पर स्नेह है, वे (शिवजी मुझ पर) कृपा करें।
बन्दउँ गुरु-पद-कञ्ज, कृपा-सिन्धु नर-रूप-हरि। महामोह-तम-पुञ्ज, जासु बचन-रबि-कर-निकर॥
चौ॰—बन्दउँ गुरु-पद-पदुम-परागा। सुरुचि-सुबास सरस अनुरागा॥ अमिय मूरि-मय चूरन चारू समन सकल-भव-रुज-परिवारू॥

सुकृत सम्भू-तन विमल बिभूती। मज्जुल मङ्गल-मोद-प्रसूती॥ जन मन मज्जु मुकुर मल हरनी। किये तिलक गुन-गन बस करनी॥
श्रीगुरु-पद-नख मनि-गन-जोती। सुमिरत दिव्य-दृष्टि हिय होती। दलन मोह-तम सासु प्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू॥
उघरहिँ बिमल बिलोचन ही के। मिटहिँ दोष दुख भव-रजनी के॥ सूझहिँ रामचरित-मनि-मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥
दो॰—जथा सुअञ्जन अञ्जि दृग, साधक सिद्ध सुजान। कौतुक देखहिँ सैल बन, भूतल भूरि निधान॥

चौ॰—गुरु-पद-रज मृदु मञ्जुल अञ्जन। नयन-अमिय दृग दोष बिभञ्जन। तेहि करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ रामचरित भव-मोचन॥
बन्दउँ प्रथम महोसुरचरना। माह जनित संसय सब हरना॥ सुजन-समाज सकल-गुन-खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥
साधु चरित सुभ सरिस कपासू। निरस बिसद गुन-मय फल जासू॥ जो सहि दुख पर-छिद्र दुरावा। वन्दनीय जेहि जग जस पावा॥
मुद-मङ्गल-मय सन्त-समाजू। जो जग जङ्गम तीरथराजू॥ रामभगति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म-विचार-प्रचारा॥

आनन्द मङ्गलमय सन्तों को समाज जो जगत् में चलता फिरता नीर्थराज-प्रयाग है। जिसमें रामभक्ति गङ्गाजी की धारा (अखण्ड प्रवाह) है और ब्रह्मविचार का फैलाव सरस्वती है॥
विधि-निषेध-मय कलिमल-हरनी। करम कथा रविनन्दिनि बरनी॥ हरि-हर-कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल-मुद-मङ्गल देनी॥
करने और न करने योग्य कर्मों की कथा का वर्णन कलि के पापों को हरनेवाली यमुना नदी है। विष्णु भगवान और शिवजी की कथा त्रिवेणी रूप विराजती है, जो सुनते ही आनन्द मङ्गल देती है॥
बट बिस्वास अचल निज-धर्मा। तीरथराज-समाज सुकर्मा॥ सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत साइर समन कलेसा॥

अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रमाऊ॥
यह तीर्थराज अवर्णनीय और लोकोत्तर है, तत्काल फल देने में इसकी महिमा विख्यात है॥
दो॰ – सुनि समुझहिँ जन मुदित मन, मज्जहिँ अति अनुराग। लहहिं चारि-फल अछत-तनु, साधु-समाज प्रयाग॥
चौ॰ – मज्जन फल पेखिय ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला॥ सुनि आचरज करइ जनि कोई। सत-सङ्गति-महिमा नहिँ गाई॥

सन्तसमाज रूपी प्रयाग के संसर्ग से कौए और बगुले का दोष दूर हो कर उनका गुण-गान होना 'प्रथम उल्लास अलंकार' है।
बालमीकि नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥ जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़-चेतन जीव जहाना॥
वाल्मीकि, नारद और अगस्त ने अपनी अपनी उत्पत्ति अपने ही मुख से कही है। संसार में जलचारी, भूमिचारी और आकाशचारियों में नाना प्रकार के जितने जड़ चेतन जीव हैं॥
वाल्मीकि मुनि बिल से, नारद दासी से और अगस्तजी घड़े से उत्पन्न हैं। इनकी उत्पत्ति के योग्य एक भी कारण पर्याप्त न होना 'चतुर्थ विभावना अलंकार' है।

मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहि जतन जहाँ जेहि पाई।। सो जानब सतसङ्ग प्रभाऊ। लोकहु बेद न आन उपाऊ॥
बिनु सतसङ्ग बिबेक न होई। राम-कृपा-बिनु सुलम न सोई॥ सतसङ्गति मुद-मङ्गल मूला। साइ फल सिधि सब साधन फूला॥
बिना सत्संग के ज्ञान नहीं होता और बिना रामचन्द्रजी की कृपा वह (सत्संग) महज में प्राप्त नहीं होता। आनन्द-मङ्गल रूपी वृक्ष की जड़ सत्सग ही है, सब साधन फूल हैं वही एक सिद्ध फल है ॥
बिना सत्सङ्ग के ज्ञान नहीं होता और बिना राम-कृपा के सत्सङ्ग नहीं मिलता 'द्वितीय कारणमाला अलंकार' है।

सठ सुधरहिँ सतसङ्गति पाई। पारस परस कुधातु सुहाई॥ विधि बस सुजन कुसङ्गति परहीं। फनि मनि सभ निज गुन अनुसरहीँ॥
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु-महिमा सकुचानी॥ सो मो सन कहि जात न कैसे। साक-बनिक मनि-गन-गुन जैसे॥
ब्रह्मा, विष्णु, महेश, कवि, विद्वान और सरस्वती साधुओं की महिमा कहने में लजा जाते हैं। वह मुझसे कैसे नहीं कही जाती, जैसे साग का बेचनेवाला (कुंजड़ा-खटिक) मणियों का गुण नहीं कह सकता॥
दो॰ – बन्दउँ सन्त समान चित, हित अनहित नहिं कोउ। अञ्जलि-गत सुभ-सुमन जिमि, सम सुगन्ध कर दोउ॥

सन्त सरल चित जगत हित, जानि सुभाउ सनेहु। बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि, राम-चरन-रति देहु॥
चौ॰ – बहुरिवन्दि खलगन सतिभाये। जे बिनु काज दाहिनेहुँ बाँये। पर-हित-हानि लाभ जिन्ह केरे। उजरे हरष विषाद बसेरे॥
हरि-हर-जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥ जे पर-दोष लखहिँ सहसाखी। परहित घृत जिनके मन माखी॥
एक खल उपमेय के पृथक् धर्मों के लिए भिन्न उपमानों का वर्णन 'मालोपमा अलंकार' है। 'सहसास्त्री' शब्द का कोई कोई साक्षी के सहित अर्थ करते हैं।

तेज-कृपानु रोष महिषेसा। अघ-अवगुन-धन धनी धनेसा॥ उदय केतु सम हित सबही के। कुम्भकरन सम सोवत नीके॥
पर अकाज लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम-उपल कृषी दलि गरहीं॥ बन्दउँ खल जस सेष सरोषा। सहस-बदन बरनइ पर-दोषा॥
शेष सरोप नहीं हैं पर खल सरोप शेप के समान हैं, शेष हज़ार मुख से हरि यश वर्णन करते हैं, खलों के एक ही मुख पराये का दोष कहने के लिए हज़ार मुख के समान 'पूर्णोपमा अलंकार' है।
पुनि प्रनववोँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस-दस-काना॥ बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। सन्तत सुरा-नीक हित जेही॥

बचन बज्र जेहि सदा पियारा। सहस-नयन पर दोष निहारा॥
दो॰ – उदासीन-अरि-मीत-हित, सुनत जरहिं खल रीति। जानि पानि जुग जीरि जन, विनती करइ सप्रीति॥
खलों की यही रीति है कि वे उदासीन, शत्रु, और मित्र की भलाई सुन कर जलते हैं। ऐसा जानते हुए भी यह जन (तुलसीदास) दोनों हाथ जोड़ कर प्रीति पूर्वक उनसे विनती करता है॥
चौ॰ – में अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥ बायस पालिय अति अनुरागा। होहिँ निरामिष कबहुँ कि कागा॥

बन्दउँ सन्त असज्जन चरना। दुख-प्रद-उभय बीच कछु धरना। मिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दारुन दुख देहीं॥
मैं सज्जन और दुर्जन दोनों के चरणों की वन्दना करता है, दोनों दुःख देनेवाले हैं पर उसमें कुछ अन्तर कहा जाता है। एक बिछुड़ने पर प्राण हर लेते हैं, दूसरे मिलने पर भीषण कष्ट देते हैं॥
उपजहिँ एक सङ्ग जग माहीं। जलज जोँक जिमि गुन बिलगाहीं॥ सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥
भल अनभलनिजनिज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥ सुधा-सुधाकर-सुरसरि-साधू। गरल-अनल-कलिमलसरि-ब्याधू॥

भले और बुरे अपनी अपनी करनी के अनुसार सुयश और अयश की सिद्धि पाते है। सज्जन लोग अमृत, चन्द्रमा और गङ्गाजी है, दुष्ट प्राणी विष, अग्नि और पाप की नदी (कर्मनासा) हैं॥
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥
गुण और दोष को सब कोई जानता है, पर जिसको जो अच्छा लगता है उसको वही सुहाता है॥
दो॰ – भलो भलाइहि पै लहइ, लहइ निचाइहि नीचु। सुधा सराहिय अमरता, गरल सराहिय मीचु॥

परन्तु भले भलाई हो पाते हैं और नीच निचाई ही लहते हैं। अमृत की प्रशंसा अमर करने में और विष की सराहना मृत्यु करने में होती है॥
इस दोहा में पद और अर्थ को बार बार आवृत्ति होना 'पदार्थावृति दीपक अलंकार, है।
चौ॰ – खल-अघ-अगुन साधु-गुन-गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा॥ तेहि तेँ कछु गुन दोष बखाने। सङ्ग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥
दुष्टों के पाप और अवगुण का वृत्तान्त एवम् साधुओं के गुणों की कथा दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं। उनके गुण दोष कुछ इसलिए कहे गये हैं कि बिना पहचान के ग्रहण वा त्याग नहीं होता॥

भलेउ पोच सब विधि उपजाये। गनि गुन दोष बेद बिलगाये॥ कहहिँ बेद इतिहास पुराना। बिधि-प्रपञ्च गुन अवगुन साना॥
दुख-सुख पाप-पुन्य दिन-राती। साधु-असाधु सुजाति-कुजाती॥ दानव-देव ऊँच अरु नीचू। अमिय सजीवन माहुर मीचू॥
दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, सजन-असज्जन, सुजाति-कुजाति, दानव-देवता, ऊँच और नीच, अमृत जिलानेवाला तथा विष मृत्यु करनेवाला॥
माया ब्रह्म जीव-जगदीसा। लच्छि-अलच्छि रङ्क-अवनीसा॥ कासी-मग सुरसरि-क्रमनासा। मरु-मालव महिदेव-गवासा॥

माया-ब्रह्म, जीव-ईश्वर, लक्ष्मीवान-बिना लक्ष्मी का, कङ्गाल-राजा, काशी-मगह, गङ्गा-कर्मनासा, मारवाड़-मालवा, ब्राह्मण और कसाई॥
ब्रह्म-ईश्वर को ब्रह्मा के प्रपञ्च में मिलाजुला कहना 'विरोधाभास अलंकार' है, क्योंकि वे ब्रह्मा की सृष्टि से परे हैं, यहाँ गुण-दोष की गणना मात्र है।
सरग-नरक अनुराग-बिरागा। निगम-अगम गुन-दोष-विभागा॥
स्वर्ग-नरक, प्रीति और वैराग्य, वेद शास्त्रों ने इनके गुण दोष अलगाये है॥

दो॰ – जड़-चेतन गुन-दोष मय, बिस्व कीन्ह करतार। सन्त हंस गुन गहहिँ पय, परिहरि बारि बिकार॥
ब्रह्मा ने संसार को जड़-चेतन और गुण-दोष मय बनाया है। सन्त रूपी हंस गुण रूपी दूध को ग्रहण करते और दोष रूपी जल को त्याग देते हैं॥
चौ॰ – अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहि मन राता॥ काल सुभाउ करम बरिआई। अलउ प्रकृति-बस चुकइ भलाई॥
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीँ। दलि दुख दोष बिमल जस देहीं। खलउ करहिँ अल पाइ सुसङ्ग। मिटइ न मलिन सुभाउ अभङ्गू॥

उस (भूल) को जिस प्रकार हरिभक्त सुधार लेते हैं कि दुःख और दोषों का नाश कर निर्मल यश देते हैं। दुष्ट भी अच्छा संग पा कर भलाई करते हैं, पर उनकी अभङ्ग नीच-प्रकृति नहीं मिटती॥
लखि सुबेष जग बञ्चक जेऊ। बेष प्रताप पूजियहि तेऊ। उघरहिँ अन्त न हाइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥
जो ससार को ठगनेवाले हैं, उन्हें भी अच्छा वेष बनाये देख कर वेष के प्रताप से लोग पूजते ही हैं। अन्त में कपट खुल जाने पर उनकी रहायस नहीं होती, जैसे – कालनेमि, रावण और राहु की गति हुई थी॥
कालिनेमि और रावण ने यती वेष बना कर और राहु ने देवता बन कर उगबाज़ी की कलई खुल जाने पर तीनों मारे गये।

किये कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवन्त हनुमानू॥ हानि-कुसङ्ग सुसङ्गति-लाहू। लोकहु बेद बिदित सब काहू॥
कुवेष किए रहने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे संसार में जाम्बवान और हनूमान। यह लोक में तथा वेद में प्रसिद्ध है और सब को मालूम है कि कुसङ्ग से हानि और सुसङ्ग से लाभ होता है॥
गगन चढ़इ रज पवन प्रसङ्गा। कोचहि मिलइ नीच जल सङ्गा॥ साधु-असाधु-सदन सुक सारी। सुमिरहिं राम देहि गनि गारी॥
हवा के सङ्ग से धूल आकाश पर चढ़ती है और नीच जल के साथ से कीचड़ में मिलती है। साधुओं के घर में (पलनेवाले) सुग्गा-मैना राम-राम स्मरण करते हैं और असाधुओं के घरवाले गिन गिन कर गालियाँ देते हैं॥

धूम कुसङ्गति कारिख होई। लिखिय पुरान मज्जु मसि सोई॥ सोइ जल अनल अनिल सङ्घाता। होइ जलद जग-जीवन-दाता॥
कुसङ्ग में पड़ कर धुनाँ कारिख होता है, वही पुराण लिखने पर सुन्दर स्याही कहलाता है। वही (धूम) पानी, अग्नि और वायु के सङ्ग से संसार को जीवन (जल) देनेवाला बादल होता है॥
दो॰ – ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुजोग सुजोग। होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग, लखहिँ सुलच्छन लोग।
ग्रह, औषधि, पानी, हवा और वस्त्र कुसङ्ग सुसङ्ग पाकर (सङ्ग के प्रभाव से) अच्छी वस्तु बुरी चीज़ हो जाती है, इसको सुलक्षण (चतुर) लोग लखते हैं।

सम प्रकास तम पाख दुहुँ, नाम भेद बिधि कीन्ह। ससि पोषक सेोषक समुझि, जग जस अपजस दीन्ह॥
जड़ चेतन जग जीव जत, सकल राम-मय जानि। बन्दउँ सब के पद-कमल, सदा जारि जुग पानि॥
देव दनुज नर नाग खग, प्रेत पितर गन्धर्व। बन्दउँ किन्नर रजनिचर, कृपा करहु अब सर्व॥
चौ॰ – आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल-थल-नभ-वासी॥ सीय-राम-मय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥

सभा की प्रति में 'सियाराम-मय' पाठ है। चौरासी लक्ष योनियों की संख्या इस प्रकार है। ४ लाख मनुष्य, ६ लाख जलचर, १० लाख पक्षी, ११ लाख कृमि, २० लाख वृक्ष, ३० लाख पशु।
जानि कृपाकर किङ्कर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू॥ निजबुधिबल भरोस मोहिँनाहीँ। ता तें बिनय करउँ सब पाहीं॥
करन चहउँ रघुपति-गुन-गाहा। लघु-मति-मोरि चरित अवगाहा। सूझ न एकउ अङ्ग उपाऊ। मन-मति-मनोरथ राऊ॥
मैं रघुनाथजी के गुणों की कथा वर्णन करना चाहता है, परन्तु मेरी बुद्धि छोटी हैं और चरित अथाह (अपरम्पार) है। उपाय का एक भी अङ्ग नहीं सूझता है, मन और बुद्धि दरिद्र है, पर मनोरथ राजा जैसा है॥

मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिय अमिय जग जुरइ न छाछी॥ छमिहहिँ सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिँ बाल बचन मन लाई॥
गोस्वामी तुलसीदास (Goswami Tulsidas) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
गोस्वामी तुलसीदास भक्ति काल की रामभक्ति शाखा के सिरमौर कवि थे, जिन्होंने जनभाषा अवधी में कालजयी महाकाव्य "रामचरितमानस" और "हनुमान चालीसा" की रचना की।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
गोस्वामी तुलसीदास ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Bhakti Kal (Rama Bhakti) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, गोस्वामी तुलसीदास की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
गोस्वामी तुलसीदास की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, गोस्वामी तुलसीदास हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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गोस्वामी तुलसीदास कौन थे?
गोस्वामी तुलसीदास भारत के महान संत और रामचरितमानस के रचयिता थे।
रामचरितमानस किस भाषा में रचित है?
रामचरितमानस की रचना अवधी भाषा में की गई है।
गोस्वामी तुलसीदास की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
गोस्वामी तुलसीदास की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
गोस्वामी तुलसीदास का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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गोस्वामी तुलसीदास की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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