छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?।
Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत)
सुमित्रानंदन पंत (1900–1977) Hindi/Chhayavaad साहित्य के एक अत्यंत प्रतिष्ठित एवं कालजयी रचनाकार हैं, जिनकी कृतियाँ मानवीय संवेदना और दर्शन का अनुपम उदाहरण हैं।
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‘छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?।’— सुमित्रानंदन पंत
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,

‘छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।’— सुमित्रानंदन पंत
शेर #2 • शाही पन्ना
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,

‘छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?’— सुमित्रानंदन पंत
शेr #3 • रूहानी शाम
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,
अमर शेर और ग़ज़लें
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

सुमित्रानंदन पंत कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
सुमित्रानंदन पंत (Sumitranandan Pant) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
सुमित्रानंदन पंत (1900–1977) Hindi/Chhayavaad साहित्य के एक अत्यंत प्रतिष्ठित एवं कालजयी रचनाकार हैं, जिनकी कृतियाँ मानवीय संवेदना और दर्शन का अनुपम उदाहरण हैं।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
सुमित्रानंदन पंत ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Chhayavaad & Pragativad (1900–1977) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, सुमित्रानंदन पंत की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को सुमित्रानंदन पंत ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
सुमित्रानंदन पंत की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, सुमित्रानंदन पंत हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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सुमित्रानंदन पंत (1900–1977) Hindi/Chhayavaad साहित्य के एक महान कवि एवं लेखक थे।
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उनकी रचनाओं में मानवीय प्रेम, जीवन-दर्शन, सामाजिक चेतना, आध्यात्मिक उत्कर्ष और विरह-वेदना के गहरे भाव मिलते हैं।
सुमित्रानंदन पंत की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
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