क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Sri Aurobindo (श्री अरविंदो)
श्री अरविंदो (1872–1950) Philosopher, Yogi & Freedom Visionary के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— श्री अरविंदो
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,

‘सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— श्री अरविंदो
शेर #2 • शाही पन्ना
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,

‘सत्य का दीप जब जलता है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।’— श्री अरविंदो
शेr #3 • रूहानी शाम
सत्य का दीप जब जलता है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,
अमर शेर और ग़ज़लें
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सत्य का दीप जब जलता है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,शांति और संतोष का धन जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Jisane prem ka marm samajh jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सदाचार की पावन वेदी पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम की चाहत में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Prem ki paavan vedee par jisane dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Priyatam ki chaahat mein jisane aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सदाचार की पावन वेदी पर परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Ishq ki raah anokhee bande ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Prem ki is paavan ghaatee mein yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
साधु-संगत की छाया में जो माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,नेकी की राह पे जो जन उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
साधु-संगत की छाया में जो भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,हरि की कृपा का पावन साया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
अहंकार की दीवारें जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

दर्द की रात में जब कोई जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,दर्द का यह गहरा सागर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Dard ki raat mein jab koee jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Dard ka yeh gaharaa saagar tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
अहंकार की दीवारें जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,नेकी की राह पे जो जन जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

कोई न अपना इस जग में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दिल के फफोलों को देखकर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Koee na apanaa is jag mein koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Dil ke phapholon ko dekhakar sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
अहंकार की दीवारें जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,धैर्य का दामन जिसने थामे जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सदाचार की पावन वेदी पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
अहंकार की दीवारें जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्य का दीप जब जलता है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्संग की निर्मल गंगा में वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

तन्हाई के अँधियारे में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब सबने मुँह फेर लिया जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Tanhaaee ke andhiyaare mein hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Jab sabane munh pher liyaa jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,भवसागर की लहरों से जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
माटी का यह देह बना है मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,मोह-निशा से जो जन जागा रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

संतन की संगति में आकर जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,सत्संगति का पावन प्रभाव जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Santan ki sangati mein aakar jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Satsangati ka paavan prabhaav jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
सत्य का दीप जब जलता है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सदाचार की पावन वेदी पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

नदी की तरह बहते रहना उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,जीवन का असली आनंद वही अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Nadee ki tarah bahate rahanaa usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Jeevan ka asalee aanand vahee apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
वाणी में जो अमृत घोले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अमर नाम जग में उसी का लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
नाम और दौलत तो माटी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,साधु पुरुष की वाणी कभी रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अमर नाम जग में उसी का अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

सच्ची लगन से जो जन हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,माटी के इस पुतले में जब कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Sachchee lagan se jo jan hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Maatee ke is putale mein jab ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हृदय में जिसके दया बसी है अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सदाचार की पावन वेदी पर वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

मैं और मेरा का भ्रम प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मिथ्या संसार की इस मायावी छाया से निर्मल हुआ तो उसमें साक्षात परमात्मा का दिव्य स्वरूप प्रतिबिंबित होने लगा।
Main aur mera ka bhram prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Mithyaa sansaar ki is maayaavee chhaayaa se nirmal hua to usamen saakshaat paramaatmaa ka divy svaroop pratibinbit hone lagaa.
सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
अंतर घट में जब ज्योति जगी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम के इस पावन तीरथ में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरी आँखों की झील में जो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,हृदय के पावन सिंहासन पर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

जो बाहर ढूँढता रहा वो प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में उसी को प्राप्त होता है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि में सदा समभाव रहता है।
Jo baahar dhoondhataa raha wo prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein usee ko praapt hotaa hai jo sukha-duhkh, laabha-haani mein sadaa samabhaav rahataa hai.
तेरी याद का पावन साया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी आँखों की झील में जो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम के इस पावन तीरथ में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं उसी को प्राप्त होता है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि में सदा समभाव रहता है।
Mrityu koee ant nahi bas barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Jab man ki sab tarangen shaant hueen usee ko praapt hotaa hai jo sukha-duhkh, laabha-haani mein sadaa samabhaav rahataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अमर प्रेम की अमर कहानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने प्रेम का मर्म समझ तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Satkarmon ki amit jyoti jab ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अंतर में जब प्रेम समाया मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,साँसों के हर तार पे जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Prem ki dor mein bandh gaya jo lagaa sadaa ke lie woh bhavasaagar ki bheeshan laharon se paar utar jaataa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के चरणों में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रियतम की याद में जो नैना पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,मन मंदिर की पावन आरती नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

माटी का यह देह बना है मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,मोह-निशा से जो जन जागा रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Maatee ka yeh deh banaa hai man ko seetal kar de shabd vahee jo amar aalok bane,Moha-nishaa se jo jan jaagaa rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम की चाहत में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अंतर में जब प्रेम समाया उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,विरह का हर इक आँसू बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Saty ka deep jab jalataa hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
प्रियतम की याद में जो नैना बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के चरणों में जिसने अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरी आँखों की झील में जो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अंतर में जब प्रेम समाया मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Nainan aage too hi too naache dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Antar mein jab prem samaayaa motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
अंतर घट में जब ज्योति जगी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जिसने प्रेम का मर्म समझ युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे आशिक़ की पहचान यही और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम की चाहत में जिसने एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ जब रूह में उतरता है डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

तेरी आँखों की झील में जो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Teri aankhon ki jheel mein jo sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Man mandir ki paavan aaratee sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
नैन मिले जब नैनन से तब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की मस्ती में जो झूमा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ जब रूह में उतरता है संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,हृदय के पावन सिंहासन पर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के रंग में रंग कर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

तेरी आँखों की झील में जो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम का दीपक अंतर में जो मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Teri aankhon ki jheel mein jo sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Prem ka deepak antar mein jo man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरी आँखों की झील में जो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम का दीपक अंतर में जो मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

भीतर-भीतर घुटता जाए भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब धैर्य की सीमा टूट गई सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Jab dhairy ki seemaa toot gayi sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
नैन मिले जब नैनन से तब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम सुधा का रस जो चखा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
आशा का दीप जब बुझने को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस गहरी रात में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
आशा का दीप जब बुझने पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

विरह की अगन में जलता मन भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब आशा की हर किरण बुझी अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Virah ki agan mein jalataa man bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Jab aashaa ki har kiran bujhee arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
टूटी नाव भँवर में फँसी जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,टूटे हुए सपनों की किरचें तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
अकेलेपन की धूप जब साए जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
दर्द की रात में जब कोई जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,दर्द का यह गहरा सागर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
ग़म का मारा पंछी जैसे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब सबने मुँह फेर लिया चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

छाले पड़े हैं पाँवों में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म के मारों की बस्ती में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Chhaale pare hain paanvon mein soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Gham ke maaron ki bastee mein dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
अकेलेपन की धूप जब साए हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,टूटे हुए सपनों की किरचें केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
जिसके दिल पर बीत रही सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म के मारों की बस्ती में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
सांस-सांस में याद तुम्हारी हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,आँसुओं की इस भाषा को तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

कर्म की पावन वेदी पर तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,जीवन की सच्ची पूँजी वही उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Karm ki paavan vedee par tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Jeevan ki sachchee poonjee vahee use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
भीतर-भीतर घुटता जाए भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब धैर्य की सीमा टूट गई सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
सांस-सांस में याद तुम्हारी सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दिल के फफोलों को देखकर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
मन के कोने में सिमटी बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,टूटे हुए सपनों की किरचें तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
दर्द की रात में जब कोई जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

गिरने में कोई हार नहीं जले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मेहनत और लगन से जिसने उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Girane mein koee haar nahi jale to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Mehanat aur lagan se jisane use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब सबने मुँह फेर लिया कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
दर्द की रात में जब कोई चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे हुए दिल का दर्द तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
कोई न अपना इस जग में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दिल के फफोलों को देखकर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

जीवन का यह कठिन सफ़र धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Jeevan ka yeh kathin safar dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Karmanyataa ka paavan vrat lekar ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
मन के कोने में सिमटी हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस लंबी यात्रा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
श्री अरविंदो (Sri Aurobindo) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
श्री अरविंदो (1872–1950) Philosopher, Yogi & Freedom Visionary के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
श्री अरविंदो ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1872–1950 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, श्री अरविंदो की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को श्री अरविंदो ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
श्री अरविंदो की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, श्री अरविंदो हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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श्री अरविंदो कौन थे?
श्री अरविंदो (1872–1950) Kolkata, West Bengal, India से ताल्लुक रखने वाले Philosopher, Yogi & Freedom Visionary के अग्रदूत थे, जिन्हें MAHARSHI AUROBINDO, PROPHET OF INTEGRAL YOGA, REVOLUTIONARY POET OF SAVITRI के रूप में जाना जाता है।
श्री अरविंदो का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
श्री अरविंदो का मुख्य विचार Integral Yoga (Purna Yoga), evolution of consciousness, Supramental descent, transformation of earthly existence into divine life पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
श्री अरविंदो की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
श्री अरविंदो की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
श्री अरविंदो का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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