सुख़न के आईने में सच की मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,अँधेरी रात के दामन को चीर गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
Siraj Aurangabadi (सिराज औरंगाबादी)
سراج اورنگ آبادی
सिराज औरंगाबादी दक्कन के महान सूफ़ी शायर हैं, जिनकी ग़ज़लें रूहानी इश्क़, सूफ़ी तसव्वुफ़ और आत्म-विस्मृति का अद्वितीय शिखर हैं।
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‘सुख़न के आईने में सच की मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,अँधेरी रात के दामन को चीर गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।’— सिराज औरंगाबादी
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
सुख़न के आईने में सच की मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,

‘तिरे करम का सहारा जो मिल हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सहर की पहली किरन ने पयाम गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।’— सिराज औरंगाबादी
शेर #2 • शाही पन्ना
तिरे करम का सहारा जो मिल हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,

‘हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।’— सिराज औरंगाबादी
शेr #3 • रूहानी शाम
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,
अमर शेर और ग़ज़लें
तिरे करम का सहारा जो मिल हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सहर की पहली किरन ने पयाम गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
सबा ने आके सुनाया पयाम गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।

तिरी तलब में जो काटे हैं दिन कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।
Tiri talab mein jo kaate hain din koee hasarat na rahi tira ishq hi kul hayaat hai,Har ik mod pe tira deedaar mila to saare shikave pal bhar mein kaaphoor ho gaye.
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,ज़माने भर की निगाहों से बच के राह में कभी कोई सौदा न किया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,तिरी पनाह में आके मिली वो हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,हमारी आँख में जलते रहे कई गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।

मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
Mohabbat wo nahi jo lafzon utarataa hai to bandaa khuda ka noor ban jaataa hai,Mohabbat ki raahon pe chalakar hi manzar diyaa har saans mein naghmaa saa goonjane lagaa.
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
नज़र नज़र में समाई है जब गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,सहर की पहली किरन ने पयाम आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
सबा ने आके सुनाया पयाम बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।

मोहब्बत की गली में जो भी बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
Mohabbat ki galee mein jo bhi banee hamaaree aankhon ki beenaaee barh gayi,Tiri khaamoshi mein chhupaa pyaar dekhaa hamane asalee zindagi ka raaz paa liyaa.
तिरी तलाश में भटके तो ये तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,सहर की पहली किरन ने पयाम गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।

कोई पुकार न थी बस ख़ामोश वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,दर्द की वादियों में जब भी का मारा सुबह का इंतिज़ार करता रहा।
Koee pukaar na thi bas khaamosh vaaste to na the zamaane bhar ko sunaaee gayi,Dard ki vaadiyon mein jab bhi ka maaraa subah ka intizaar karataa raha.
ख़ुदी को खो के जो पाया वो ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,सहर की पहली किरन ने पयाम गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
नज़र नज़र में समाई है जब तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।

तिरी तलाश में भटके तो ये यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,नज़र झुका के जो देखा तो दिल हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
सुख़न के आईने में सच की चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,नज़र झुका के जो देखा तो दिल गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।

वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं सुकून ढूँढते रहे मगर हर तरफ़ सन्नाटा था,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ तन्हाई की कश्ती में कोई मल्लाह न था।
Waqt ki aandhee ne tore hain sukoon dhoondhate rahe magar har taraf sannaataa tha,Toote hue khvaabon ki kirachiyaan tanhaaee ki kashti mein koee mallaah na tha.
दिलों की बस्ती में जब भी कोई तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,बहार आए न आए चमन महकता के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,तिरी पनाह में आके मिली वो में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,हमारी आँख में जलते रहे कई बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।

हवा का रुख़ बदल दे जो वो हमने हर इम्तिहान में कामयाबी का परचम लहराया,वक़्त के साथ जो चलना सीख उसका नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया।
Hawa ka rukh badal de jo wo hamane har imtihaan mein kaamayaabee ka paracham laharaayaa,Waqt ke saath jo chalanaa seekh usakaa naam itihaas ke pannon mein amar ho gaya.
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया है रूह में किसी और की तलब न रही,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
सबा ने आके सुनाया पयाम मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,सहर की पहली किरन ने पयाम ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मोड़ पे जो साबित क़दम रहा वही सुरख़रू हुआ,सब्र और शुक्र की चादर ओढ़ नहीं गर यक़ीं की आँख से देखा जाए।
Vafaa ki raah mein patthar bahut mod pe jo saabit qadam raha vahee surakharoo hua,Sabr aur shukr ki chaadar orh nahi gar yaqeen ki aankh se dekhaa jaae.
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
नसीब में जो लिखा था वही गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,सहर की पहली किरन ने पयाम आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया है रूह में किसी और की तलब न रही,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी राह में कभी कोई सौदा न किया।

हौसलों के तरकश में तीर ज़िंदा मोड़ पे जो साबित क़दम रहा वही सुरख़रू हुआ,नेकियों की पूंजी जो संग लेकर उसे कभी कोई ज़वाल छू भी नहीं सकता।
Hausalon ke tarakash mein teer zinda mod pe jo saabit qadam raha vahee surakharoo hua,Nekiyon ki poonjee jo sang lekar use kabhee koee zavaal chhoo bhi nahi sakataa.
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,दिलों के तार मिले तो फ़ज़ाएँ हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
सुख़न-वफ़ा के सफ़र में क़दम से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।

न कोई अपना यहाँ है न मन का मैल धोया पारस का परस पाकर लोहा कंचन हो गया,मोह-माया के बंधन तोड़ के फ़क़त सच और नेकी का नूर ही हमेशा बाक़ी रहेगा।
Na koee apanaa yahaan hai na man ka mail dhoyaa paaras ka paras paakar lohaa kanchan ho gaya,Moha-maayaa ke bandhan tor ke faqat sach aur nekee ka noor hi hameshaa baaqee rahegaa.
तिरे ख़याल की खुशबू बसी से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,दुआ का हाथ उठा तो करम का तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरी याद जब भी दिल में उभरी हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,ज़माने की रस्मों को हमने भुला हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।

आत्मज्ञान की पावन गंगा में जो इस हयात के बाद असली सफ़र अंधेरों के पार होता है,परब्रह्म का ध्यान जिसने लगाया नहीं वो तो हर इंसान के पाक दिल में बसता है।
Aatmajnyaan ki paavan gangaa mein jo is hayaat ke baad asalee safar andheron ke paar hotaa hai,Parabrahm ka dhyaan jisane lagaayaa nahi wo to har insaan ke paak dil mein basataa hai.
तिरी आँखों की गहराइयों में खो उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला तो सारे शिकवे पल भर में काफूर हो गए।

माया के इस झूठे जग में मिल जाना है सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,न कोई आदि न कोई अंत है जो पी ले वो अमर पद को सहज ही पा जाता है।
Maayaa ke is jhoothe jag mein mil jaanaa hai satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Na koee aadi na koee ant hai jo pee le wo amar pad ko sahaj hi paa jaataa hai.
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरे इश्क़ की छाँव में जो हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
मोहब्बत की गली में जो भी गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरे इश्क़ की छाँव में जो सदा तिरा ही दामन थामे रखा।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
इश्क़ जब रूह की गहराई में आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।

ख़ुदी को खो के जो पाया वो गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
Khudee ko kho ke jo paayaa wo gumaan guzaraa ki bichhare hue zamaane se the,Tire jamaal ki khaamosh raushanee aasaaish jo saltanat ke khazaanon mein bhi na thi.
तिरे करम का सहारा जो मिल गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,तिरी याद जब भी दिल में उभरी उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरे इश्क़ की छाँव में जो सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,मोहब्बत के पावन सफ़र में दिया जब से तिरे नक़्श-ए-क़दम को अपना रहबर बनाया।
तिरी निगाह का जादू जो चल बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरी चाहत का नशा रूह में कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
Hujooma-e-shahar mein tanhaaee saath charaagh ummeed ka chupachaap jalaayaa hamane,Hamaaree khaamoshi bhi ik sadaa banee aasaaish jo saltanat ke khazaanon mein bhi na thi.
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,ज़माने की रस्मों को हमने भुला पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
तिरे करम का सहारा जो मिल प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,मोहब्बत के पावन सफ़र में क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।

क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो गया ज़माने की हर इक रस्म बेअसर हो गई,तिरे नूर से दिल का आँगन तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
मोहब्बत की गली में जो भी उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी दीद की आरज़ू में कटी ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।

तिरे करम का सहारा जो मिल भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
Tire karam ka sahaaraa jo mil bhi qadam rakhaa to har gham khaar banake bikhar gaya,Mohabbat ki raahon pe chalakar hi manzar diyaa har saans mein naghmaa saa goonjane lagaa.
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।

जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
Jab bhi tira khayaal mire dil ujda makaan tha tire aane se aabaad hua,Dilon ke taaalluq ko sadiyon ki manzar diyaa har saans mein naghmaa saa goonjane lagaa.
तिरी आँखों की गहराइयों में खो आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,तिरी याद जब भी दिल में उभरी क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
मोहब्बत की गली में जो भी बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
इश्क़ जब रूह की गहराई में आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।

जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
Jab bhi tira khayaal mire dil koee hasarat na rahi tira ishq hi kul hayaat hai,Tiri khaamoshi mein chhupaa pyaar dekhaa umr hamaaree wo lamhe sadiyon pe bhaaree rahe.
तिरी यादों के गुलशन में जब गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।

हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,दिल का आईना जो टूटा तो हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।
Hasarata-e-deed mein aankhen patharaa gaeen yahaan har shakhs apane hi gham mein mubtalaa hai,Dil ka aaina jo tootaa to har qadam pe paanv lahooluhaan karatee raheen.
तिरी आँखों की गहराइयों में खो प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
तिरी निगाह का जादू जो चल उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरे दर पे सजदा किया जब से जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
आँखों से जो अश्क बहे वो वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।

उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
Umr bhar ka safar aur haasila-e-gham wo dard diyaa ki apanee hi sadaa se kaanp uthe,Gham ke toofaan se bach ke kahaan ne aisaa gheraa ki koee raah na soojhee.
तिरे जाने के बाद ये आलम टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा लगीं तो सब्र का दामन थाम लिया हमने,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,दर्द की वादियों में जब भी का मारा सुबह का इंतिज़ार करता रहा।
तिरे जाने के बाद ये आलम मगर तिरा कोई पयाम न आया ऐ सितमगर,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ था वो सवेरा जो कभी लौट के न आया।

उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म साया था जो दर्द की शिद्दत बढ़ा रहा था,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श का मारा सुबह का इंतिज़ार करता रहा।
Umr bhar ka safar aur haasila-e-gham saaya tha jo dard ki shiddat barhaa raha tha,Khaamosh labon ki pukaar arsh ka maaraa subah ka intizaar karataa raha.
दिल के वीराने में बस एक हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,रात भर जागती आँखों ने देखा सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
ग़म की तपती हुई दोपहर में टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,रात भर जागती आँखों ने देखा जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।
छाले पड़े हैं पाँवों में और ये हुआ कि ख़ामोशी ही मुक़द्दर बन गई,अपनी बेबसी पे रोना आया तो वहाँ भी दर्द का गुलशन खिल उठा।
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।

सुख़न के आईने में सच की गया वो अपनी ही ज़िंदगानी का दुश्मन बन गया,हयात की राहों में फूल और किया वो दुनिया के हर इम्तिहान में पास हुआ।
Sukhan ke aaeene mein sach ki gaya wo apanee hi zindagaanee ka dushman ban gaya,Hayaat ki raahon mein phool aur kiyaa wo duniya ke har imtihaan mein paas hua.
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,दिल का आईना जो टूटा तो हर क़दम पे पाँव लहूलुहान करती रहीं।
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या मगर तिरा कोई पयाम न आया ऐ सितमगर,ग़म का मारा हुआ राही चला नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं में सब अपने अपने घरों को चले गए।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,दर्द का दरिया पार करना था ने ऐसा घेरा कि कोई राह न सूझी।

साँसों की मोहलत को गनीमत जान पहचान है कायर तो मुक़द्दर का रोना रोते हैं,वक़्त की क़द्र जिसने पहचानी चला उसे दोनों जहाँ में इज़्ज़त नसीब हुई।
Saanson ki mohalat ko ganeemat jaan pahachaan hai kaayar to muqaddar ka ronaa rote hain,Waqt ki qadr jisane pahachaanee chalaa use donon jahaan mein izzat naseeb hui.
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ मगर तिरा कोई पयाम न आया ऐ सितमगर,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
ग़म की तपती हुई दोपहर में हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,तन्हाई के साए में कटी उम्र पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
दर्द जब हद से गुज़रा तो हुए हवा के थपेड़ों ने सब उजाड़ दिया,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।

मुसीबतों से घबरा के जो बैठ का सफ़र है आज ग़म तो कल ख़ुशी का सूरज चमकेगा,ज़िंदगी का कारवाँ चलता ही रहता है यहाँ कोई ठहरता नहीं बस सफ़र जारी है।
Museebaton se ghabaraa ke jo baith ka safar hai aaj gham to kal khushee ka sooraj chamakegaa,Zindagi ka kaaravaan chalataa hi rahataa hai yahaan koee thaharataa nahi bas safar jaaree hai.
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते ज़माने की हवा ने बेदर्दी से उड़ा दिया,अकेलेपन का ज़हर पिया हमने मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।
सिराज औरंगाबादी (Siraj Aurangabadi) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
सिराज औरंगाबादी दक्कन के महान सूफ़ी शायर हैं, जिनकी ग़ज़लें रूहानी इश्क़, सूफ़ी तसव्वुफ़ और आत्म-विस्मृति का अद्वितीय शिखर हैं।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
सिराज औरंगाबादी ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Deccani Sufi Golden Age (1715–1763) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, सिराज औरंगाबादी की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को सिराज औरंगाबादी ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
सिराज औरंगाबादी की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, सिराज औरंगाबादी हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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सिराज औरंगाबादी के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
सिराज औरंगाबादी के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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सिराज औरंगाबादी कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
सिराज औरंगाबादी (1715–1763) Urdu/Sufi साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
सिराज औरंगाबादी की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
सिराज औरंगाबादी की रचनाओं के केंद्र में इश्क़-ए-हक़ीक़ी व सूफ़ी तसव्वुफ़, फ़ना और ख़ुदी का मिटना, हैरत और रूहानी बे-ख़ुदी, हुस्न-ए-अज़ल का जलवा, सांसारिक माया से वैराग्य जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
सिराज औरंगाबादी की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
सिराज औरंगाबादी की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
सिराज औरंगाबादी का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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सिराज औरंगाबादी की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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