वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Shrilal Shukla (श्रीलाल शुक्ल)
श्रीलाल शुक्ल (1925–2011) Master Satirist & Author of Raag Darbari के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
डाउनलोड करें श्रीलाल शुक्ल के एस्थेटिक स्टोरी कार्ड्स

‘वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।’— श्रीलाल शुक्ल
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— श्रीलाल शुक्ल
शेर #2 • शाही पन्ना
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,

‘ज्ञान का पावन भोर हुआ जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— श्रीलाल शुक्ल
शेr #3 • रूहानी शाम
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,
अमर शेर और ग़ज़लें
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
साधु-संगत की छाया में जो जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,शांति और संतोष का धन जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Aankhon ke raste dil mein utaraa apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
नदिया की धारा बहती जावे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,मोह-निशा से जो जन जागा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
माटी का यह देह बना है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,दीन-बंधु का सहारा बन के रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
संतन की संगति में आकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
कर्म की खेती जो जन बोवे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

प्रेम बिना सब सूना जग में रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के चरणों में जिसने उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Prem binaa sab soonaa jag mein raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Priyatam ke charanon mein jisane use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,शांति और संतोष का धन जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
नाम और दौलत तो माटी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Roma-rom mein ram gaya preetam to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हरि की कृपा का पावन साया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

विरह की अगन में जलता मन हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,आँसुओं की इस भाषा को अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Virah ki agan mein jalataa man haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Aansuon ki is bhaashaa ko akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,जीवन का यह पावन सूत्र जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,शांति और संतोष का धन जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य वचन जो मुख से बोले व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Zakhm wo nahi jo jism kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
वाणी वही जो घाव भरे और तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,शांति और संतोष का धन जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

सपनों के महल जब टूटे बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब कोई सहारा न बचा धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Sapanon ke mahal jab toote baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Jab koee sahaaraa na bachaa dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रेम की डोर में बंध गया जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्संग की निर्मल गंगा में वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

सच्ची लगन से जो जन ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,माटी के इस पुतले में जब जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Sachchee lagan se jo jan hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Maatee ke is putale mein jab jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,भवसागर की लहरों से जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
माटी का यह देह बना है भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,त्याग और सेवा की भावना से मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Satkarmon ki amit poonjee antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
अहंकार की दीवारें जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,भवसागर की लहरों से जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,शांति और संतोष का धन जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

जीवन की इस रणभूमि में बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Jeevan ki is ranabhoomi mein binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Karmanyataa ka paavan vrat lekar manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
आशा तृष्णा सब छूटी जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,दीन-बंधु का सहारा बन के परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,साधु पुरुष की वाणी कभी जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

मोह-निशा जब ढलती है कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,मिथ्या संसार की इस मायावी छाया से जीव और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाए और केवल अद्वैत ही शेष रहे।
Moha-nishaa jab dhalatee hai kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Mithyaa sansaar ki is maayaavee chhaayaa se jeev aur brahm ka bhed samaapt ho jaae aur keval advait hi shesh rahe.
वाणी वही जो घाव भरे और सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,वाणी में जिसके मिठास घुली मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम नगर का वासी बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने प्रेम का मर्म समझ अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब और ज्ञान-भोर मुस्काए अमृत रस की बूँदें अंतर घट में बरसने लगती हैं,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं है जो समस्त कर्तापन के भाव से मुक्त होकर केवल साक्षी भाव में जीता है।
Antarman ke sannaate mein jab aur jnyaana-bhor muskaae amrit ras ki boonden antar ghat mein barasane lagatee hain,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen hai jo samast kartaapan ke bhaav se mukt hokar keval saakshee bhaav mein jeetaa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन धारा में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

जो बाहर ढूँढता रहा वो परमात्मा की आवाज़ सुनाई दे वही सच्चा उपदेश है जो मोक्ष का द्वार खोलता है,परमानंद का यह अलौकिक रस तब आत्मा अपने मूल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गई।
Jo baahar dhoondhataa raha wo paramaatmaa ki aavaaz sunaaee de vahee sachchaa upadesh hai jo moksh ka dvaar kholataa hai,Paramaanand ka yeh alaukik ras tab aatmaa apane mool shuddh, buddh aur mukt svaroop mein pratishthit ho gayi.
साँसों की सरगम में घुल गया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह का हर इक आँसू बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,विरह का हर इक आँसू बनकर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Prem ki gangaa antar mein bahe saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Amar naam jag mein usee ka jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के चरणों में जिसने संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
बिरहा की आग में तप के कुंदन जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,मन मंदिर की पावन आरती अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Maatee ka yeh deh banaa hai to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Satya-ahinsaa ki raahon par use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,हृदय के पावन सिंहासन पर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के रंग में रंग कर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
मन की वीणा बज उठी जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के चरणों में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
Santan ki sangati mein aakar jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Hriday mein jisake dayaa basee hai usane paramaanand paayaa ahankaar mitate hi antar ka sachchaa sukh milataa hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के चरणों में जिसने उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम गली अति साँकरी जामें हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अंतर में जब प्रेम समाया उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरी आँखों की झील में जो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के रंग में रंग कर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

वाणी वही जो घाव भरे और सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,वाणी में जिसके मिठास घुली मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur soee phal paave re kaayar baithe bhaagy gine dheer kar dikhalaave,Vaanee mein jisake mithaas ghulee maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम का दीपक अंतर में जो कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अमर प्रेम की अमर कहानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
इश्क़ जब रूह में उतरता है जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जब से नैना रूप में उलझे अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के चरणों में जिसने संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Prem ki paavan vedee par jisane priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Priyatam ke charanon mein jisane sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
प्रेम रंग में जो रंग गया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की इस पावन धारा में जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम रंग में जो रंग गया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रियतम की याद में जो नैना जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

तेरे दीदार की एक झलक ने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Tere deedaar ki ek jhalak ne amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Sachche prem ki yahee nishaanee jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
तेरे मिलन की आस में बीते अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे मिलन की आस में बीते से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

बिरहा की आग में तप के कुंदन तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Prem ki is paavan ghaatee mein sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,साँसों के हर तार पे जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

टूटी नाव भँवर में फँसी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब कोई चारासाज़ न मिला तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Tootee naav bhanvar mein phansee ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Jab koee chaaraasaaz na mila tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,सच्चे प्रेम की यही निशानी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तन्हाई के अँधियारे में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
छाले पड़े हैं पाँवों में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

अकेलेपन की धूप जब साए पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,इस दर्द भरे दिल की सदा पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Akelepan ki dhoop jab saae patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Is dard bhare dil ki sadaa paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
भीतर-भीतर घुटता जाए और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की भट्टी में तपकर ही तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
ग़म का मारा पंछी जैसे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म की इस गहरी रात में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
विरह की अगन में जलता मन हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,आँसुओं की इस भाषा को अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
आशा का दीप जब बुझने दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,इस दर्द भरे दिल की सदा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

ग़म का मारा पंछी जैसे सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,टूटे दिल की इस वीणा से तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Gham ka maaraa panchhee jaise soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Toote dil ki is veenaa se tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
छाले पड़े हैं पाँवों में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
सांस-सांस में याद तुम्हारी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई सहारा न बचा मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द का यह गहरा सागर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
मन के कोने में सिमटी पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

अहंकार की दीवारें जब कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,जिसने अहंकार को त्याग दिया कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Ahankaar ki deevaaren jab kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
टूटी नाव भँवर में फँसी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब कोई चारासाज़ न मिला तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
तन्हाई के अँधियारे में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
जिसके दिल पर बीत रही सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
विरह की अगन में जलता मन सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ग़म की इस गहरी रात में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

हौसलों के तरकश में जब जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,जिसने अहंकार को त्याग दिया सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Hausalon ke tarakash mein jab jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
तन्हाई के अँधियारे में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब कोई सहारा न बचा तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
आशा का दीप जब बुझने सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
टूटे दिल की ख़ामोशी में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म के मारों की बस्ती में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

गिरने में कोई हार नहीं उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,सच्चे मित्र की पहचान यही तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Girane mein koee haar nahi usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Sachche mitr ki pahachaan yahee tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
उम्र भर का सफ़र और हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
श्रीलाल शुक्ल (Shrilal Shukla) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
श्रीलाल शुक्ल (1925–2011) Master Satirist & Author of Raag Darbari के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
श्रीलाल शुक्ल ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1925–2011 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, श्रीलाल शुक्ल की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को श्रीलाल शुक्ल ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
श्रीलाल शुक्ल की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, श्रीलाल शुक्ल हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
30 सेकंड में बनाइए अपना कार्ड
पसंद का शेर चुनिए, मनपसंद टेम्पलेट लगाइए, फ़ॉन्ट और रंग सजाइए और एक क्लिक में सेव कर लीजिए।
- बिना साइन-अप
- बिना वॉटरमार्क
- हमेशा मुफ़्त
“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
EmotionHub.in • Cosmic Poetryहर मौक़े और हर अपने के लिए संदेश
जिसके लिए लिखना है, उसे या कोई त्योहार चुनिए और तैयार संग्रह खोल लीजिए।
- पापा का जन्मदिनजिन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया
- सालगिरह की बधाईजोड़ों के लिए मीठी-सी पंक्तियाँ
- परिवार को सुप्रभातघर के ग्रुप के लिए सुबह की शुरुआत
- प्यार भरी शुभ रात्रिसोने से पहले भेजने लायक़ बातें
- दिवाली की बधाईअपनों के लिए रोशनी भरे संदेश
- होली की बधाईरंगों वाले संदेश दोस्तों के नाम
- ईद मुबारकअपनों तक पहुँचाइए ईद की ख़ुशी
- साथी को विदाईसहकर्मी के लिए अपनापन भरे अल्फ़ाज़
- सफलता पर बधाईकिसी की बड़ी जीत पर हौसला बढ़ाइए
- किसी की याद मेंजब दूरी कुछ ज़्यादा ही लंबी लगे
- दोस्त का जन्मदिनयार के लिए हँसी-ख़ुशी वाली दुआएँ
- क्रिसमस की शुभकामनाएँपूरे परिवार के लिए त्योहार की बधाई
लोग यही खोजते हैं
- अकेलेपन की शायरी
- दिल टूटने की शायरी
- पहले प्यार की शायरी
- हमसफ़र पर शायरी
- आगे बढ़ने की शायरी
- किंग एटीट्यूड शायरी
- क्वीन एटीट्यूड शायरी
- बेस्ट फ्रेंड शायरी
- देर रात की याद शायरी
- गहरे जज़्बात की शायरी
- हार न मानने की शायरी
- पत्नी को जन्मदिन की बधाई
- भाई को जन्मदिन की बधाई
- शादी की छोटी शुभकामनाएँ
- पहली सालगिरह की बधाई
- प्रेरणादायक सुप्रभात
कवि, त्योहार और स्टेटस
शेरों के पीछे की आवाज़ें पढ़िए, त्योहार की तैयारी कीजिए और स्टेटस के लिए छोटी पंक्ति उठाइए
श्रीलाल शुक्ल के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
श्रीलाल शुक्ल के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
कोई अन्य सवाल है? संपर्क करें
श्रीलाल शुक्ल कौन थे?
श्रीलाल शुक्ल (1925–2011) Atrali, Lucknow, Uttar Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Master Satirist & Author of Raag Darbari के अग्रदूत थे, जिन्हें AUTHOR OF 'RAAG DARBARI', JNANPITH LAUREATE, CHRONICLER OF RURAL BUREAUCRATIC CYNICISM के रूप में जाना जाता है।
श्रीलाल शुक्ल का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
श्रीलाल शुक्ल का मुख्य विचार Devastating exposure of rural power corridors (Shivpalganj), bureaucratic collusion, decay of post-independence institutional ideals पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
श्रीलाल शुक्ल की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
श्रीलाल शुक्ल की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
श्रीलाल शुक्ल का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
क्या Emotion Hub पर श्रीलाल शुक्ल के शेर कॉपी और शेयर किए जा सकते हैं?
हाँ, Emotion Hub पर आप एक क्लिक में शेर कॉपी कर सकते हैं और सीधे WhatsApp पर शेयर कर सकते हैं।
क्या श्रीलाल शुक्ल के शेरों के एस्थेटिक कार्ड डाउनलोड किए जा सकते हैं?
हाँ, आप 300 DPI वॉलपेपर क्वालिटी में टेक्स्ट के साथ तैयार कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं या डिज़ाइन स्टूडियो में कस्टमाइज़ कर सकते हैं।
श्रीलाल शुक्ल का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
श्रीलाल शुक्ल की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
तो फिर देर किस बात की?
कोई पंक्ति चुनिए, उसे अपना अंदाज़ दीजिए और भेज दीजिए। आपका पहला कार्ड बस कुछ टैप दूर है।







