सतगुरु मिले तो राह दिखावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
Shakeb Jalali (शकेब जलाली)
शकेब जलाली (1934–1966) Poet of Piercing Pain & Imagery के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— शकेब जलाली
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,

‘आशा तृष्णा सब छूटी जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— शकेब जलाली
शेर #2 • शाही पन्ना
आशा तृष्णा सब छूटी जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,

‘नदिया की धारा बहती जावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— शकेब जलाली
शेr #3 • रूहानी शाम
नदिया की धारा बहती जावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,
अमर शेर और ग़ज़लें
आशा तृष्णा सब छूटी जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नदिया की धारा बहती जावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

प्रेम बिना सब सूना जग में का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Prem binaa sab soonaa jag mein ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Prem ki mastee mein jo jhoomaa sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
दीन-दुखी का आसरा बनकर का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,मन के मैल को जिसने धोया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,वाणी में जिसके मिठास घुली अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,माटी का चोला पाकर जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

तेरी याद का पावन साया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Teri yaad ka paavan saaya doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Aankhon ke raste dil mein utaraa ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
नदिया की धारा बहती जावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
अहंकार की दीवारें जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,परहित में जिसने जीवन सौंपा के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
नदिया की धारा बहती जावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
आशा तृष्णा सब छूटी जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,नेकी की राह पे जो जन के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

तेरे रूप की पावन झांकी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अमर प्रेम की अमर कहानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Tere roop ki paavan jhaankee doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Amar prem ki amar kahaanee sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
वाणी में जो अमृत घोले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सदाचार की पावन वेदी पर उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,वाणी में जिसके मिठास घुली निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
संतन की संगति में आकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
धरती की छाती पर जिसने बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सदाचार की पावन वेदी पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

ग़म का मारा पंछी जैसे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म की इस गहरी रात में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Gham ka maaraa panchhee jaise jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Gham ki is gaharee raat mein dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
वाणी में जो अमृत घोले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
मन के निर्मल दर्पण में जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,अहंकार का त्याग किया जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
माटी का यह देह बना है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अमर नाम जग में उसी का वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

दिल का आईना जब टूटा लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,अंधेरी रात के सन्नाटे में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Dil ka aaina jab tootaa lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Andheree raat ke sannaate mein tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
वाणी में जो अमृत घोले रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्य वचन जो मुख से बोले रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
मन मंदिर में जो दीप जले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हृदय में जिसके दया बसी है वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,माटी का चोला पाकर जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
धरती की छाती पर जिसने सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

टूटी नाव भँवर में फँसी दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए सपनों की किरचें कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Tootee naav bhanvar mein phansee doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Toote hue sapanon ki kirachen koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
माटी का यह देह बना है भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,प्रेम की डोर में बंध गया जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
नदिया की धारा बहती जावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन मंदिर में जो दीप जले स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जो अपने वचन का पक्का है उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Jo apane vachan ka pakkaa hai usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
माटी का यह देह बना है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,भवसागर की लहरों से जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,धैर्य का दामन जिसने थामे रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

संतन की संगति में आकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Santan ki sangati mein aakar saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Jo doosaron ke sukh ki khaatir jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हृदय में जिसके दया बसी है जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,दीन-बंधु का सहारा बन के रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सदाचार की पावन वेदी पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नाम और दौलत तो माटी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,हरि की कृपा का पावन साया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

मन मंदिर में जो दीप कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,हृदय में जिसके दया और करुणा तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Man mandir mein jo deep kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
वाणी वही जो घाव भरे और बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

आत्मा अजर-अमर अविनाशी है अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं का दर्शन होने लगा तब कोई शत्रु न रहा और न कोई पराया बचा।
Aatmaa ajara-amar avinaashee hai avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Jab man ki sab tarangen shaant hueen ka darshan hone lagaa tab koee shatru na raha aur na koee paraayaa bachaa.
नाम और दौलत तो माटी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
तेरे मिलन की आस में बीते का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने प्रेम का मर्म समझ कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
फासले मिट गए जब दिल से उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

जो बाहर ढूँढता रहा वो में जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को अंतर में जलाए रखा,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Jo baahar dhoondhataa raha wo mein jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko antar mein jalaae rakhaa,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
अंतर घट में जब ज्योति जगी से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,हृदय के पावन सिंहासन पर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की मस्ती में जो झूमा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम बिना सब सूना जग में का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

साधु वो ही जो अंतर में जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को अंतर में जलाए रखा,जब 'अहं' का विसर्जन हो गया हुआ उसे तीनों लोकों का कोई भी प्रलोभन अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता।
Saadhu wo hi jo antar mein jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko antar mein jalaae rakhaa,Jab 'ahan' ka visarjan ho gaya hua use teenon lokon ka koee bhi pralobhan apanee or aakarshit nahi kar sakataa.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह का हर इक आँसू बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
मन की वीणा बज उठी जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जब से नैना रूप में उलझे जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैन मिले जब नैनन से तब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,विरह की रात जब ढलने लगी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Satkarmon ki amit kamaaee hi use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
तेरे दीदार की एक झलक ने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैनों के दर्पण में बसा जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अंतर में जब प्रेम समाया कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

संतन की संगति में आकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Santan ki sangati mein aakar maatee mein mil jaanaa lobh moh mad tyaag ke nij svaroop cheenh le,Satsang ki nirmal gangaa mein jisane dubakee lagaaee usake janma-janmaantar ke sab paap dhul jaate hain.
अंतर घट में जब ज्योति जगी तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम सुधा का रस जो चखा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैन मिले जब नैनन से तब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे प्रेम की यही निशानी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

मन मंदिर में जो दीप जले स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Man mandir mein jo deep jale svayan khete hain kinaaraa unake svaagat mein sir jhukaataa hai,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
तेरी याद का पावन साया डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम का अनुराग ही जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैनन आगे तू ही तू नाचे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरी याद का पावन साया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जिसने प्रेम का मर्म समझ सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

नाम और दौलत तो माटी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Naam aur daulat to maatee ghata-ghat mein pragat bhaee ajnyaan ka ghor andhera pal bhar mein bhaag gaya,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम सुधा का रस जो चखा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,अमर प्रेम की अमर कहानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

नैनों के दर्पण में बसा जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Nainon ke darpan mein basaa jab jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem sudhaa ka ras jo chakhaa jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,हृदय के पावन सिंहासन पर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
अंतर घट में जब ज्योति जगी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की इस पावन धारा में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम के इस पावन तीरथ में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Roma-rom mein ram gaya preetam sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Jisane prem ka marm samajh use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
तेरी आँखों की झील में जो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरे रूप की पावन झांकी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अमर प्रेम की अमर कहानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
मन की वीणा बज उठी जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम सुधा का रस जो चखा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Jisane prem ka marm samajh ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
तेरी याद का पावन साया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
फासले मिट गए जब दिल से डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अमर प्रेम की अमर कहानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
मन मंदिर में बसा जो मूरति संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

आशा का दीप जब बुझने सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Aashaa ka deep jab bujhane sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Toote hue sapanon ki kirachen tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,अंतर में जब प्रेम समाया संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम का दीपक अंतर में जो लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे हुए दिल का दर्द ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
जिसके दिल पर बीत रही जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,टूटे दिल की इस वीणा से पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे दिल की इस वीणा से धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Zakhm wo nahi jo jism ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Toote dil ki is veenaa se dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
सांस-सांस में याद तुम्हारी यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म की इस गहरी रात में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
मन के कोने में सिमटी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब आशा की हर किरण बुझी केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
ग़म का मारा पंछी जैसे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म की इस गहरी रात में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
आँखों के आँसू जब सूखे हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,ग़म के मारों की बस्ती में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

ग़म की तपती दुपहरी में जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,अकेलेपन की इस राह पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Gham ki tapatee dupaharee mein jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Akelepan ki is raah par tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
छाले पड़े हैं पाँवों में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ग़म की इस लंबी यात्रा में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
आँखों में जो नमी है वो कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ग़म की इस आँधी ने जब पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
भीतर-भीतर घुटता जाए लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,आँसुओं की इस भाषा को जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

नदी की तरह बहते रहना अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,सदाचार के पावन नियमों पर मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Nadee ki tarah bahate rahanaa agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Sadaachaar ke paavan niyamon par manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
आशा का दीप जब बुझने सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
कोई न अपना इस जग में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
टूटी नाव भँवर में फँसी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,इस दर्द भरे दिल की सदा केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
घायल की गति घायल जाने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई चारासाज़ न मिला तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

दीन-दुखी का आसरा बनकर मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जिसने समय की चाल पहचानी पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jisane samay ki chaal pahachaanee paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
ग़म का मारा पंछी जैसे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
घायल की गति घायल जाने लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस आँधी ने जब सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
दिल का आईना जब टूटा सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,आँसुओं की इस भाषा को तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
दिल का आईना जब टूटा लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,अंधेरी रात के सन्नाटे में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

वाणी में जो अमृत घोले ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,माटी के इस पुतले में जब जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Vaanee mein jo amrit ghole hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Maatee ke is putale mein jab jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
दर्द की रात में जब कोई हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
शकेब जलाली (Shakeb Jalali) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
शकेब जलाली (1934–1966) Poet of Piercing Pain & Imagery के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
शकेब जलाली ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1934–1966 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, शकेब जलाली की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को शकेब जलाली ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
शकेब जलाली की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, शकेब जलाली हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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शकेब जलाली के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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शकेब जलाली कौन थे?
शकेब जलाली (1934–1966) Jalal, Aligarh, Uttar Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Poet of Piercing Pain & Imagery के अग्रदूत थे, जिन्हें MASTER OF SHOCKING METAPHOR AND RAW GRIEF, AUTHOR OF 'ROSHNI AE ROSHNI' के रूप में जाना जाता है।
शकेब जलाली का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
शकेब जलाली का मुख्य विचार Trauma of partition and loss, raw existential desolation, groundbreaking sensory metaphors in classical Ghazal format पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
शकेब जलाली की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
शकेब जलाली की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
शकेब जलाली का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
क्या Emotion Hub पर शकेब जलाली के शेर कॉपी और शेयर किए जा सकते हैं?
हाँ, Emotion Hub पर आप एक क्लिक में शेर कॉपी कर सकते हैं और सीधे WhatsApp पर शेयर कर सकते हैं।
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शकेब जलाली का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
शकेब जलाली की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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