आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Sarveshwar Dayal Saxena (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (1927–1983) Poet of Human Pain & Dinman Editor के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।

आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— सर्वेश्वर दयाल सक्सेना • 1927–1983

आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— सर्वेश्वर दयाल सक्सेना • 1927–1983
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रेम की डोर में बंध गया जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।’— सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
शेर #2 • शाही पन्ना
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
शेr #3 • रूहानी शाम
दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,
अमर शेर और ग़ज़लें
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रेम की डोर में बंध गया जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Prem ki paavan vedee par jisane priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Aankhon ke raste dil mein utaraa ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हरि की कृपा का पावन साया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन के निर्मल दर्पण में जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
माटी का यह देह बना है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मन के मैल को जिसने धोया उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

तेरे दीदार की एक झलक ने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम का दीपक अंतर में जो उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Tere deedaar ki ek jhalak ne jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem ka deepak antar mein jo utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
नाम और दौलत तो माटी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
संतन की संगति में आकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
कर्म की खेती जो जन बोवे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की इस पावन घाटी में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Roma-rom mein ram gaya preetam se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Prem ki is paavan ghaatee mein sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
साधु-संगत की छाया में जो मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,अमर नाम जग में उसी का जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
नदिया की धारा बहती जावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
धरती की छाती पर जिसने अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी में जो अमृत घोले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

नैनों से जो नीर बहे हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब कोई चारासाज़ न मिला पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Nainon se jo neer bahe haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Jab koee chaaraasaaz na mila paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य वचन जो मुख से बोले वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
माटी का यह देह बना है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

जिसके दिल पर बीत रही लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब कोई चारासाज़ न मिला पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Jisake dil par beet rahi lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Jab koee chaaraasaaz na mila paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हरि की कृपा का पावन साया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म के मारों की बस्ती में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Waqt ke thaperon ne hamen baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Gham ke maaron ki bastee mein tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
वाणी वही जो घाव भरे और सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,माटी का चोला पाकर जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
वाणी वही जो घाव भरे और माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

हौसलों के तरकश में जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,त्याग और सेवा की भावना से उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Hausalon ke tarakash mein jab bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
मन के निर्मल दर्पण में जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य-अहिंसा की राहों पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्संग की निर्मल गंगा में लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मन के मैल को जिसने धोया अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

वाणी में जो अमृत घोले जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,कर्म की खेती में जो पसीना पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Vaanee mein jo amrit ghole jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Karm ki khetee mein jo paseenaa paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अहंकार का त्याग किया जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अमर नाम जग में उसी का उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
वाणी वही जो घाव भरे और जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

ठोकर खाकर जो संभलता हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Thokar khaakar jo sanbhalataa hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Jo doosaron ke sukh ki khaatir chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,वाणी में जिसके मिठास घुली के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
वाणी में जो अमृत घोले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हरि की कृपा का पावन साया रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
वाणी वही जो घाव भरे और भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,माटी का चोला पाकर जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

घट-घट में वह एक अनंता ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,जिसने सर्वत्र एक ही परमात्मा देखा तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Jisane sarvatr ek hi paramaatmaa dekhaa to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
फासले मिट गए जब दिल से अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम नगर का वासी बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,हृदय के पावन सिंहासन पर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,जब आत्मा ने जाना अपना सत्य स्वरूप जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Jab aatmaa ne jaanaa apanaa saty svaroop jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
मन की वीणा बज उठी जब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम का दीपक अंतर में जो एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
मन की वीणा बज उठी जब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के चरणों में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

साधु वो ही जो अंतर भेद मिटा के देखा उसने संसार के मिथ्या मोह से स्वयं को मुक्त कर लिया,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह समस्त चराचर जगत लीन है जो इसे जान लेता है वह अमरता को प्राप्त होता है।
Saadhu wo hi jo antar bhed mitaa ke dekhaa usane sansaar ke mithyaa moh se svayan ko mukt kar liyaa,Jisane is nashvar shareer ka moh samast charaachar jagat leen hai jo ise jaan letaa hai woh amarataa ko praapt hotaa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम सुधा का रस जो चखा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम बिना सब सूना जग में डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम के इस पावन तीरथ में अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
साँसों की सरगम में घुल गया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने प्रेम का मर्म समझ प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रेम की डोर में बंध गया जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Karm ki khetee jo jan bove antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Prem ki dor mein bandh gaya jo avichal kadam barhaataa hai usakaa yash teenon lokon mein sadaa phailataa hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रियतम की याद में जो नैना से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,हृदय के पावन सिंहासन पर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जब से नैना रूप में उलझे तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

धरती की छाती पर जिसने अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Dharatee ki chhaatee par jisane amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Parahit mein jisane jeevan saunpaa nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
नैन मिले जब नैनन से तब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के रंग में रंग कर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी याद का पावन साया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन धारा में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,हृदय के पावन सिंहासन पर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Man ke nirmal darpan mein jab maatee mein mil jaanaa lobh moh mad tyaag ke nij svaroop cheenh le,Jeevan ka yeh paavan sootr jo maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम का दीपक अंतर में जो उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन घाटी में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरे मिलन की आस में बीते जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम के चरणों में जिसने कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
Jo toofaanon mein apanee naav baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke usane paramaanand paayaa ahankaar mitate hi antar ka sachchaa sukh milataa hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम का दीपक अंतर में जो प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम का दीपक अंतर में जो मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

प्रियतम की याद में जो नैना से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,हृदय के पावन सिंहासन पर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Hriday ke paavan sinhaasan par use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
तेरी याद का पावन साया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,आँखों के रस्ते दिल में उतरा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जब से नैना रूप में उलझे जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरे मिलन की आस में बीते सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम नगर का वासी बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

नैनन आगे तू ही तू नाचे बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Nainan aage too hi too naache banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ki is paavan ghaatee mein aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की इस पावन घाटी में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे दीदार की एक झलक ने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम के इस पावन तीरथ में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अंतर में जब प्रेम समाया युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

मन मंदिर में बसा जो मूरति बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम सुधा का रस जो चखा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Man mandir mein basaa jo moorati barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Prem sudhaa ka ras jo chakhaa liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
प्रेम गली अति साँकरी जामें जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनों के दर्पण में बसा जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,साँसों के हर तार पे जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरे दीदार की एक झलक ने जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम सुधा का रस जो चखा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

दिल का आईना जब टूटा दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,इस दर्द भरे दिल की सदा मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Dil ka aaina jab tootaa doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Is dard bhare dil ki sadaa manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रियतम की याद में जो नैना जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,अंधेरी रात के सन्नाटे में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
सांस-सांस में याद तुम्हारी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ग़म की इस आँधी ने जब मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

सपनों के महल जब टूटे सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द का यह गहरा सागर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Sapanon ke mahal jab toote so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Dard ka yeh gaharaa saagar saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
ग़म का मारा पंछी जैसे बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,दर्द का यह गहरा सागर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
वक़्त की आँधी ने तोड़े और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म के मारों की बस्ती में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
नैनों से जो नीर बहे हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब कोई चारासाज़ न मिला पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
छाले पड़े हैं पाँवों में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

नैनों से जो नीर बहे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस आँधी ने जब तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Nainon se jo neer bahe doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Gham ki is aandhee ne jab tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
टूटी नाव भँवर में फँसी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
ग़म की तपती दुपहरी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
आँखों में जो नमी है वो यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

ठोकर खाकर जो संभलता जले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,जो गिरतों को उठाना जानता है का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Thokar khaakar jo sanbhalataa jale to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
दिल का आईना जब टूटा दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,इस दर्द भरे दिल की सदा मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
भीतर-भीतर घुटता जाए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
सांस-सांस में याद तुम्हारी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब धैर्य की सीमा टूट गई सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
घायल की गति घायल जाने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

दुःख में सुमिरन सब कोई जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,हृदय में जिसके दया और करुणा जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Duhkh mein sumiran sab koee jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
वक़्त की आँधी ने तोड़े हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,टूटे हुए दिल का दर्द ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जीवन के इस कठिन मोड़ पर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
ग़म की तपती दुपहरी में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
जिसके दिल पर बीत रही लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब कोई चारासाज़ न मिला पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

माटी का यह चोला पाकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का असली आनंद वही का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Maatee ka yeh cholaa paakar jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Jeevan ka asalee aanand vahee ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
वक़्त की आँधी ने तोड़े दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस आँधी ने जब मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (Sarveshwar Dayal Saxena) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (1927–1983) Poet of Human Pain & Dinman Editor के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1927–1983 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (1927–1983) Basti, Uttar Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Poet of Human Pain & Dinman Editor के अग्रदूत थे, जिन्हें AUTHOR OF 'KHUNTIYON PAR TANGE LOG', CREATOR OF 'BAKRI' (PLAY), EDITOR OF PARAG, SAHITYA AKADEMI AWARDEE के रूप में जाना जाता है।
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