मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Dr. Sarvepalli Radhakrishnan (डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन)
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888–1975) Philosopher-President & Diplomat के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।

मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
— डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन • 1888–1975

मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
— डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन • 1888–1975
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‘मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।’— डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
शेर #2 • शाही पन्ना
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘वाणी में जो अमृत घोले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,भवसागर की लहरों से जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
शेr #3 • रूहानी शाम
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,
अमर शेर और ग़ज़लें
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,भवसागर की लहरों से जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,माटी का चोला पाकर जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Phaasale mit gaye jab dil se dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Prem ki is paavan dhaaraa mein utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
मन मंदिर में जो दीप जले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,परहित में जिसने जीवन सौंपा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मन के मैल को जिसने धोया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हरि की कृपा का पावन साया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

इश्क़ जब रूह में उतरता है पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Hriday ke paavan sinhaasan par use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
आशा तृष्णा सब छूटी जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,शांति और संतोष का धन जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
अहंकार की दीवारें जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हरि की कृपा का पावन साया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
नाम और दौलत तो माटी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,शांति और संतोष का धन जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन के निर्मल दर्पण में जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,वाणी में जिसके मिठास घुली अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Prem ki paavan vedee par jisane priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Jab se nainaa roop mein ulajhe usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,माटी का चोला पाकर जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
मन के निर्मल दर्पण में जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,नेकी की राह पे जो जन लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

मन के कोने में सिमटी लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,दर्द की भट्टी में तपकर ही अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Man ke kone mein simatee lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Dard ki bhattee mein tapakar hi akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
सत्य के पावन पथ पर जिसने भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
माटी का यह देह बना है रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
नदिया की धारा बहती जावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

ग़म की तपती दुपहरी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Gham ki tapatee dupaharee mein ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
अहंकार की दीवारें जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
धरती की छाती पर जिसने भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
कर्म की खेती जो जन बोवे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

छाले पड़े हैं पाँवों में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म की इस गहरी रात में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Chhaale pare hain paanvon mein jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Gham ki is gaharee raat mein tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
माटी का यह देह बना है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
अहंकार की दीवारें जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रेम की डोर में बंध गया जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्य का दीप जब जलता है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

जीवन का यह कठिन सफ़र मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जिसने परोपकार का दीप जलाया जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Jeevan ka yeh kathin safar mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
साधु-संगत की छाया में जो रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,परहित में जिसने जीवन सौंपा लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जीवन के इस महासमर में है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Satkarmon ki amit poonjee mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jeevan ke is mahaasamar mein hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
अहंकार की दीवारें जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,नेकी की राह पे जो जन अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,शांति और संतोष का धन जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
मन मंदिर में जो दीप जले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,विपदाओं से जो कभी न डरा जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Vipadaaon se jo kabhee na daraa jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अहंकार का त्याग किया जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अमर नाम जग में उसी का अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

ज्ञान की पावन भोर भई है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,परम पद की प्राप्ति उसी को होती त्याग दिया वह इस संसार में रहते हुए भी विदेही की तरह विचरता है।
Jnyaan ki paavan bhor bhaee hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Param pad ki praapti usee ko hotee tyaag diyaa woh is sansaar mein rahate hue bhi videhee ki tarah vicharataa hai.
नाम और दौलत तो माटी प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरी याद का पावन साया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने प्रेम का मर्म समझ जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
तेरे मिलन की आस में बीते डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

ज्ञान की पावन भोर भई जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,मिथ्या संसार की इस मायावी छाया से त्याग दिया वह इस संसार में रहते हुए भी विदेही की तरह विचरता है।
Jnyaan ki paavan bhor bhaee jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Mithyaa sansaar ki is maayaavee chhaayaa se tyaag diyaa woh is sansaar mein rahate hue bhi videhee ki tarah vicharataa hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरी याद का पावन साया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन घाटी में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

सत्य-अहिंसा की राहों पर है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Satya-ahinsaa ki raahon par hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa svayan pighal jaataa hai,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
प्रियतम की याद में जो नैना जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,साँसों के हर तार पे जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
मन की वीणा बज उठी जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,हृदय के पावन सिंहासन पर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी आँखों की झील में जो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह की रात जब ढलने लगी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन घाटी में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
Prem ki gangaa antar mein bahe antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu usane paramaanand paayaa ahankaar mitate hi antar ka sachchaa sukh milataa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे मिलन की आस में बीते सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे प्रेम की यही निशानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,मन मंदिर की पावन आरती जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरे रूप की पावन झांकी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम की चाहत में जिसने युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने प्रेम का मर्म समझ प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे मिलन की आस में बीते से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

सत्य का दीप जब जलता है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Saty ka deep jab jalataa hai ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Satsang ki nirmal gangaa mein us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
नैन मिले जब नैनन से तब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,अंतर में जब प्रेम समाया जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,साँसों के हर तार पे जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

नाम और दौलत तो माटी प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Naam aur daulat to maatee prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Bhavasaagar ki laharon se jo vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
नैन मिले जब नैनन से तब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैन मिले जब नैनन से तब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

प्रेम रंग में जो रंग गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Prem rang mein jo rang gaya dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Jab se nainaa roop mein ulajhe usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
तेरे दीदार की एक झलक ने हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जब से नैना रूप में उलझे लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,मन मंदिर की पावन आरती लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
मन की वीणा बज उठी जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की इस पावन घाटी में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
बिरहा की आग में तप के कुंदन रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,अमर प्रेम की अमर कहानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Prem ki paavan vedee par jisane ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Priyatam ka anuraag hi jisakaa use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
तेरी याद का पावन साया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के चरणों में जिसने नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
नैनन आगे तू ही तू नाचे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,साँसों के हर तार पे जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
नैन मिले जब नैनन से तब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

उम्र भर का सफ़र और सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब कोई सहारा न बचा तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Umr bhar ka safar aur soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Jab koee sahaaraa na bachaa tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम सुधा का रस जो चखा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
विरह की अगन में जलता मन सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म के मारों की बस्ती में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

कोई न अपना इस जग में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Koee na apanaa is jag mein ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Zindagi ki is soonee dagar par saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
टूटे दिल की ख़ामोशी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,अकेलेपन की इस राह पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
उम्र भर का सफ़र और जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दर्द की भट्टी में तपकर ही चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
मन के कोने में सिमटी लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,दर्द की भट्टी में तपकर ही अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब आशा की हर किरण बुझी चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दर्द की भट्टी में तपकर ही तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Zakhm wo nahi jo jism patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Dard ki bhattee mein tapakar hi tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
जिसके दिल पर बीत रही हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,टूटे हुए सपनों की किरचें पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
सांस-सांस में याद तुम्हारी जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब आशा की हर किरण बुझी तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
नैनों से जो नीर बहे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए सपनों की किरचें तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
ग़म की तपती दुपहरी में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ग़म के मारों की बस्ती में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

चंद साँसों की मोहलत में जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जिसने परोपकार का दीप जलाया तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Chand saanson ki mohalat mein jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
उम्र भर का सफ़र और सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब कोई सहारा न बचा तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
मन के कोने में सिमटी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
तन्हाई के अँधियारे में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,ग़म की इस गहरी रात में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

अहंकार की दीवारें जब करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सच्चे मित्र की पहचान यही अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Ahankaar ki deevaaren jab karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Sachche mitr ki pahachaan yahee apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
विरह की अगन में जलता मन चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब आशा की हर किरण बुझी तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
कोई न अपना इस जग में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
दर्द की रात में जब कोई रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,अकेलेपन की इस राह पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
ग़म की तपती दुपहरी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

सच्ची लगन से जो जन जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,अंत समय जब निकट आएगा उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Sachchee lagan se jo jan jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Ant samay jab nikat aaegaa use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (Dr. Sarvepalli Radhakrishnan) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888–1975) Philosopher-President & Diplomat के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1888–1975 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
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प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन कौन थे?
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888–1975) Tiruttani, Tamil Nadu, India से ताल्लुक रखने वाले Philosopher-President & Diplomat के अग्रदूत थे, जिन्हें 2ND PRESIDENT OF INDIA, OXFORD SPALDING PROFESSOR, INSPIRATION FOR TEACHERS' DAY, BHARAT RATNA के रूप में जाना जाता है।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मुख्य विचार Comparative philosophy, bridge between East and West, spiritual idealism, the teacher as the architect of nation's destiny पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
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