धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
Sant Tukaram Maharaj (संत तुकाराम महाराज)
जगद्गुरु संत तुकाराम महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय के शिखर संत-कवि हैं, जिनकी 'तुकाराम गाथा' के अभंगों ने पीड़ित मानवता की सेवा को ही ईश्वर प्राप्ति का सच्चा मार्ग बताया।
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‘धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।’— संत तुकाराम महाराज
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,

‘आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।’— संत तुकाराम महाराज
शेर #2 • शाही पन्ना
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Tukaram Gatha। 4,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।’— संत तुकाराम महाराज
शेr #3 • रूहानी शाम
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Tukaram Gatha। 4,
अमर शेर और ग़ज़लें
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Tukaram Gatha। 4,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Tukaram Gatha। 4,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Tukaram Gatha। 4,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Tukaram Gatha। 4,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
संत तुकाराम महाराज कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Tukaram Gatha। 4,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Tukaram Gatha। 4,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Tukaram Gatha। 4,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Tukaram Gatha। 4,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Tukaram Gatha। 4,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Tukaram Gatha। 4,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Tukaram Gatha। 4,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Tukaram Gatha। 4,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
संत तुकाराम महाराज कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Tukaram Gatha। 4,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
संत तुकाराम महाराज कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Tukaram Gatha। 4,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Tukaram Gatha। 4,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
संत तुकाराम महाराज कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Tukaram Gatha। 4,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Tukaram Gatha। 4,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। Tukaram Gatha। 4,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,। Tukaram Gatha। 4,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Tukaram Gatha। 4,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Tukaram Gatha। 4,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। Tukaram Gatha। 4,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Tukaram Gatha। 4,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Tukaram Gatha। 4,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Tukaram Gatha। 4,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Tukaram Gatha। 4,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Tukaram Gatha। 4,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Tukaram Gatha। 4,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Tukaram Gatha। 4,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
संत तुकाराम महाराज कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Tukaram Gatha। 4,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
संत तुकाराम महाराज (Sant Tukaram Maharaj) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
जगद्गुरु संत तुकाराम महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय के शिखर संत-कवि हैं, जिनकी 'तुकाराम गाथा' के अभंगों ने पीड़ित मानवता की सेवा को ही ईश्वर प्राप्ति का सच्चा मार्ग बताया।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
संत तुकाराम महाराज ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
17th-Century Varkari Bhakti Movement के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, संत तुकाराम महाराज की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को संत तुकाराम महाराज ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
संत तुकाराम महाराज की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, संत तुकाराम महाराज हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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संत तुकाराम महाराज (1608–1650) Marathi/Varkari साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
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संत तुकाराम महाराज की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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