एक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़।मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे!
Sahir Ludhianvi (साहिर लुधियानवी)
साहिर लुधियानवी प्रगतिशील शायरी और भारतीय सिनेमा के अमर गीतकार थे, जिन्होंने ताजमहल के वैभव से लेकर ग़रीबों के हक तक को अपनी ओजस्वी आवाज़ दी।

एक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़।मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे!
— साहिर लुधियानवी • PROGRESSIVE WRITERS' MOVEMENT & GOLDEN AGE CINEMA

एक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़।मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे!
— साहिर लुधियानवी • PROGRESSIVE WRITERS' MOVEMENT & GOLDEN AGE CINEMA
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‘एक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़।मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे!’— साहिर लुधियानवी
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
एक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,

‘कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है,कि जैसे तुझ को बनाया गया है मेरे लिए।’— साहिर लुधियानवी
शेर #2 • शाही पन्ना
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है,

‘ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया,ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया,ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!’— साहिर लुधियानवी
शेr #3 • रूहानी शाम
ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया,
अमर शेर और ग़ज़लें
कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है,कि जैसे तुझ को बनाया गया है मेरे लिए।
ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया,ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया,ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!
तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम,ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम।

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है,ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया।
ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया,ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम।
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा,दर्द की धूप में साया तिरी याद का रहा।
सुख़न की दुनिया में नाम उसी का ज़िंदा है,बात वो कह जो तिरे दिल की सदा कहती है।

तिरी नज़र का करम है जो ज़िंदगी मिरी,कि जैसे तुझ को बनाया गया है मेरे लिए।
वक्त के मोड़ पे हम को जो मिला सब्र मिला,बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा।
बात वो कह जो तिरे दिल की सदा कहती है,तिरे ख़याल से महकी है हर घड़ी मिरी।
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे!,हर नए ग़म से जीने का नया तर्ज़ मिला।

ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया,मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे!।
हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है,ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!।
ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम,सुख़न की दुनिया में नाम उसी का ज़िंदा है।
तिरे ख़याल से महकी है हर घड़ी मिरी,मुद्दतों दिल मिरा उजड़ा हुआ आबाद रहा।

मुद्दतों दिल मिरा उजड़ा हुआ आबाद रहा,एक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर।
जो समझता है हक़ीक़त को वो चुप रहता है,ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया।
हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़,तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम।
कि जैसे तुझ को बनाया गया है मेरे लिए,तिरी नज़र का करम है जो ज़िंदगी मिरी।

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!,जो समझता है हक़ीक़त को वो चुप रहता है।
तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम,कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है।
जो हर इंसान के एहसास का आईना है,हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है।
एक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर,हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
साहिर लुधियानवी (Sahir Ludhianvi) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
साहिर लुधियानवी प्रगतिशील शायरी और भारतीय सिनेमा के अमर गीतकार थे, जिन्होंने ताजमहल के वैभव से लेकर ग़रीबों के हक तक को अपनी ओजस्वी आवाज़ दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
साहिर लुधियानवी ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Progressive Writers' Movement & Golden Age Cinema के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, साहिर लुधियानवी की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को साहिर लुधियानवी ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
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