आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Sagar Siddiqui (साग़र सिद्दीक़ी)
साग़र सिद्दीक़ी (1928–1974) Dervish-King of Footpaths & Pure Lyricism के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।’— साग़र सिद्दीक़ी
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,भवसागर की लहरों से जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— साग़र सिद्दीक़ी
शेर #2 • शाही पन्ना
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,दीन-बंधु का सहारा बन के रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।’— साग़र सिद्दीक़ी
शेr #3 • रूहानी शाम
मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,
अमर शेर और ग़ज़लें
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,भवसागर की लहरों से जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,दीन-बंधु का सहारा बन के रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
नाम और दौलत तो माटी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अमर नाम जग में उसी का रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

नैन मिले जब नैनन से तब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Nain mile jab nainan se tab us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
वाणी में जो अमृत घोले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Prem ki doree baandh laee jab amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Sachche prem ki yahee nishaanee apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Man ki veenaa baj uthee jab palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Priyatam ki chaahat mein jisane apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
कर्म की खेती जो जन बोवे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
मन मंदिर में जो दीप जले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
माटी का यह देह बना है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,वाणी में जिसके मिठास घुली जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

दर्द की रात में जब कोई जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस गहरी रात में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Dard ki raat mein jab koee jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Gham ki is gaharee raat mein paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
नाम और दौलत तो माटी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Toote dil ki khaamoshi mein cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Jeevan ke is kathin mod par dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
दीन-दुखी का आसरा बनकर निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,माटी का चोला पाकर जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सदाचार की पावन वेदी पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

अकेलेपन की धूप जब साए पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Akelepan ki dhoop jab saae par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Jab apanon ne hi diye zakhm keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नाम और दौलत तो माटी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
संतन की संगति में आकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

माटी का यह चोला पाकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन की सच्ची पूँजी वही है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Maatee ka yeh cholaa paakar antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jeevan ki sachchee poonjee vahee hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
वाणी वही जो घाव भरे और सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
अहंकार की दीवारें जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,नेकी की राह पे जो जन उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

नेकी की राह पे जो जन अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,जो गिरतों को उठाना जानता है मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Nekee ki raah pe jo jan agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
वाणी वही जो घाव भरे और सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
वाणी में जो अमृत घोले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

गिरने में कोई हार नहीं जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Girane mein koee haar nahi jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Karmanyataa ka paavan vrat lekar vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
मन के निर्मल दर्पण में जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अहंकार का त्याग किया जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
मन मंदिर में जो दीप जले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,वाणी में जिसके मिठास घुली उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,नेकी की राह पे जो जन लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,सच्चा मोक्ष वही कहलाता है जहाँ वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Mrityu koee ant nahi bas jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Sachchaa moksh vahee kahalaataa hai jahaan woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
तेरे रूप की पावन झांकी सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,मन मंदिर की पावन आरती युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरे मिलन की आस में बीते संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

जो भीतर झाँक के देखता कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,परमात्मा के इस विराट स्वरूप में उसे न मृत्यु का भय होता है और न जीवन की कोई आस, वह सदा मुक्त है।
Jo bheetar jhaank ke dekhataa kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Paramaatmaa ke is viraat svaroop mein use na mrityu ka bhay hotaa hai aur na jeevan ki koee aas, woh sadaa mukt hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम के इस पावन तीरथ में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम का अनुराग ही जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैन मिले जब नैनन से तब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,जब द्वैत का सारा भ्रम मिट गया जिसने स्नान किया उसने संसार के समस्त दुःखों से मुक्ति पा ली।
Mrityu koee ant nahi bas jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Jab dvait ka saaraa bhram mit gaya jisane snaan kiyaa usane sansaar ke samast duhkhon se mukti paa lee.
प्रेम रंग में जो रंग गया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,सच्चे आशिक़ की पहचान यही एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम बिना सब सूना जग में पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,अंतर में जब प्रेम समाया संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,भवसागर की लहरों से जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Prem ki gangaa antar mein bahe antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Bhavasaagar ki laharon se jo use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,मन मंदिर की पावन आरती अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम की चाहत में जिसने मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैन मिले जब नैनन से तब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम के इस पावन तीरथ में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Sataguru mile to raah dikhaave saagar se milan ko man paavan ho jaae jab hari gun dina-raat sunaave,Saadhu purush ki vaanee kabhee ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
तेरी आँखों की झील में जो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम के रंग में रंग कर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी आँखों की झील में जो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम नगर का वासी बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
साँसों की सरगम में घुल गया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अंतर में जब प्रेम समाया उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

संतन की संगति में आकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Santan ki sangati mein aakar antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Vaanee mein jisake mithaas ghulee usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम के रंग में रंग कर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरी आँखों की झील में जो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

सत्य का दीप जब जलता है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Saty ka deep jab jalataa hai saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Satya-ahinsaa ki raahon par use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
फासले मिट गए जब दिल से हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,अमर प्रेम की अमर कहानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम नगर का वासी बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम की चाहत में जिसने मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Prem galee ati saankaree jaamen dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Priyatam ki chaahat mein jisane man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
तेरी आँखों की झील में जो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन घाटी में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जिसने प्रेम का मर्म समझ कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने प्रेम का मर्म समझ लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

बिरहा की आग में तप के कुंदन बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जब से नैना रूप में उलझे अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,साँसों के हर तार पे जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
मन मंदिर में बसा जो मूरति अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Man ki veenaa baj uthee jab ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Priyatam ke rang mein rang kar man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
प्रेम बिना सब सूना जग में बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

जिसके दिल पर बीत रही पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दर्द की भट्टी में तपकर ही पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Jisake dil par beet rahi patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Dard ki bhattee mein tapakar hi pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
प्रेम गली अति साँकरी जामें से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,मन मंदिर की पावन आरती अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम बिना सब सूना जग में बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,साँसों के हर तार पे जिसका सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तन्हाई के अँधियारे में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस आँधी ने जब केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
ग़म की तपती दुपहरी में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

वक़्त की आँधी ने तोड़े लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस लंबी यात्रा में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Waqt ki aandhee ne tore lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Gham ki is lanbee yaatraa mein to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
टूटी नाव भँवर में फँसी हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब आशा की हर किरण बुझी चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
घायल की गति घायल जाने हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
दर्द की रात में जब कोई जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस गहरी रात में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
दिल का आईना जब टूटा दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

टूटे दिल की ख़ामोशी में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब कोई सहारा न बचा तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Toote dil ki khaamoshi mein hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Jab koee sahaaraa na bachaa tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
ग़म की तपती दुपहरी में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
अकेलेपन की धूप जब साए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जीवन के इस कठिन मोड़ पर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
आशा का दीप जब बुझने हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
वक़्त की आँधी ने तोड़े बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म की इस लंबी यात्रा में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

गिरने में कोई हार नहीं सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,विपदाओं से जो कभी न डरा उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Girane mein koee haar nahi saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Vipadaaon se jo kabhee na daraa usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
जिसके दिल पर बीत रही पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दर्द की भट्टी में तपकर ही पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
सांस-सांस में याद तुम्हारी पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म के मारों की बस्ती में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
वक़्त की आँधी ने तोड़े और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस आँधी ने जब अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
सपनों के महल जब टूटे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

चंद साँसों की मोहलत में है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,त्याग और सेवा की भावना से पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Chand saanson ki mohalat mein hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
अकेलेपन की धूप जब साए और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
दर्द की रात में जब कोई जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,इस दर्द भरे दिल की सदा सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
वक़्त की आँधी ने तोड़े सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,अकेलेपन की इस राह पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

गिरने में कोई हार नहीं धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जीवन के इस महासमर में तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Girane mein koee haar nahi dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jeevan ke is mahaasamar mein tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
वक़्त की आँधी ने तोड़े लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,इस दर्द भरे दिल की सदा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
साग़र सिद्दीक़ी (Sagar Siddiqui) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
साग़र सिद्दीक़ी (1928–1974) Dervish-King of Footpaths & Pure Lyricism के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
साग़र सिद्दीक़ी ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1928–1974 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, साग़र सिद्दीक़ी की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को साग़र सिद्दीक़ी ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
साग़र सिद्दीक़ी की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, साग़र सिद्दीक़ी हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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साग़र सिद्दीक़ी के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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साग़र सिद्दीक़ी कौन थे?
साग़र सिद्दीक़ी (1928–1974) Ambala, Haryana, India से ताल्लुक रखने वाले Dervish-King of Footpaths & Pure Lyricism के अग्रदूत थे, जिन्हें THE DERVISH POET OF DATA DARBAR, KING OF THE FOOTPATH, HOMELESS SAINT-SHAYAR के रूप में जाना जाता है।
साग़र सिद्दीक़ी का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
साग़र सिद्दीक़ी का मुख्य विचार Total non-attachment to worldly possessions, unmasking hypocrisies of polished society, pure bohemian ecstasy पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
साग़र सिद्दीक़ी की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
साग़र सिद्दीक़ी की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
साग़र सिद्दीक़ी का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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साग़र सिद्दीक़ी का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
साग़र सिद्दीक़ी की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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