हरि सुमिरन में जिसका चित्त बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Samarth Ramdas (समर्थ रामदास)
समर्थ रामदास छत्रपति शिवाजी महाराज के आध्यात्मिक गुरु और महान संत-दार्शनिक हैं, जिनके ग्रंथ 'दासबोध' और 'मनाचे श्लोक' कर्मयोग और राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा हैं।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— समर्थ रामदास • MARATHA RENAISSANCE (1608–1681)

हरि सुमिरन में जिसका चित्त बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— समर्थ रामदास • MARATHA RENAISSANCE (1608–1681)
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‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— समर्थ रामदास
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
हरि सुमिरन में जिसका चित्त बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,

‘संतन की संगति में आकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,धैर्य का दामन जिसने थामे जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— समर्थ रामदास
शेर #2 • शाही पन्ना
संतन की संगति में आकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,

‘क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मोह-निशा से जो जन जागा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।’— समर्थ रामदास
शेr #3 • रूहानी शाम
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,
अमर शेर और ग़ज़लें
संतन की संगति में आकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,धैर्य का दामन जिसने थामे जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मोह-निशा से जो जन जागा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Prem nagar ka vaasee banakar jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
साधु-संगत की छाया में जो तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
माटी का यह देह बना है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,भवसागर की लहरों से जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्संग की निर्मल गंगा में जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन घाटी में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Phaasale mit gaye jab dil se priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Prem ki is paavan ghaatee mein jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सदाचार की पावन वेदी पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नाम और दौलत तो माटी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,शांति और संतोष का धन जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,भवसागर की लहरों से जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

प्रेम गली अति साँकरी जामें सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन धारा में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Prem galee ati saankaree jaamen sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Prem ki is paavan dhaaraa mein utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हृदय में जिसके दया बसी है लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य वचन जो मुख से बोले रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

विरह की अगन में जलता मन सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Virah ki agan mein jalataa man so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Jab dhairy ki seemaa toot gayi keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,माटी का चोला पाकर जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्य-अहिंसा की राहों पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,वाणी में जिसके मिठास घुली के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

जिसके दिल पर बीत रही सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,अकेलेपन की इस राह पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Jisake dil par beet rahi so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Akelepan ki is raah par manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,शांति और संतोष का धन जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सदाचार की पावन वेदी पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,दीन-बंधु का सहारा बन के रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
नाम और दौलत तो माटी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हृदय में जिसके दया बसी है मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

आँखों के आँसू जब सूखे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द का यह गहरा सागर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Aankhon ke aansoo jab sookhe doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Dard ka yeh gaharaa saagar zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
नदिया की धारा बहती जावे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मन के मैल को जिसने धोया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
नदिया की धारा बहती जावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
नाम और दौलत तो माटी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अमर नाम जग में उसी का निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी में जो अमृत घोले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

गिरने में कोई हार नहीं जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,जीवन की सच्ची पूँजी वही चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Girane mein koee haar nahi jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Jeevan ki sachchee poonjee vahee chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
माटी का यह देह बना है मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,भवसागर की लहरों से जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
वाणी में जो अमृत घोले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,मोह-निशा से जो जन जागा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रेम की डोर में बंध गया जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
संतन की संगति में आकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जीवन का यह पावन सूत्र जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

जीवन का यह कठिन सफ़र जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,धैर्य की नौका पर सवार होकर जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Jeevan ka yeh kathin safar jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Dhairy ki naukaa par savaar hokar jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,भवसागर की लहरों से जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,मन के मैल को जिसने धोया अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मन के मैल को जिसने धोया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
वाणी वही जो घाव भरे और सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,शांति और संतोष का धन जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

नदी की तरह बहते रहना अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन की सच्ची पूँजी वही विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Nadee ki tarah bahate rahanaa antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jeevan ki sachchee poonjee vahee vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
वाणी में जो अमृत घोले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,शांति और संतोष का धन जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

जो भीतर झाँक के देखता है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,जिसने सर्वत्र एक ही परमात्मा देखा तब आत्मा अनादि और अनंत काल के पार शाश्वत धाम में पहुँच गई।
Jo bheetar jhaank ke dekhataa hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Jisane sarvatr ek hi paramaatmaa dekhaa tab aatmaa anaadi aur anant kaal ke paar shaashvat dhaam mein pahunch gayi.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अमर नाम जग में उसी का के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन की वीणा बज उठी जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जिसने अपना सब कुछ सौंपा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

जो भीतर झाँक के देखता मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सृष्टि के कण-कण में जब प्रभु तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Jo bheetar jhaank ke dekhataa man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Srishti ke kana-kan mein jab prabhu tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
मन मंदिर में बसा जो मूरति रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,शाश्वत सत्य की इस पावन वेदी पर हुआ उसे तीनों लोकों का कोई भी प्रलोभन अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता।
Mrityu koee ant nahi bas kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Shaashvat saty ki is paavan vedee par hua use teenon lokon ka koee bhi pralobhan apanee or aakarshit nahi kar sakataa.
नैन मिले जब नैनन से तब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,मन मंदिर की पावन आरती युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम सुधा का रस जो चखा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

संतन की संगति में आकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,धैर्य का दामन जिसने थामे जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Santan ki sangati mein aakar soee phal paave re kaayar baithe bhaagy gine dheer kar dikhalaave,Dhairy ka daaman jisane thaame jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन धारा में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी आँखों की झील में जो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Prem ki gangaa antar mein bahe bharam ka pardaa tore amrit ras ki varshaa hove jab moh mukh more,Hriday mein jisake dayaa basee hai jisane dubakee lagaaee usake janma-janmaantar ke sab paap dhul jaate hain.
तेरी आँखों की झील में जो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम की चाहत में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जब से नैना रूप में उलझे तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

वाणी में जो अमृत घोले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Vaanee mein jo amrit ghole jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन घाटी में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
नैन मिले जब नैनन से तब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम सुधा का रस जो चखा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
अंतर घट में जब ज्योति जगी जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,अंतर में जब प्रेम समाया कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अमर नाम जग में उसी का के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Amar naam jag mein usee ka ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
मन मंदिर में बसा जो मूरति सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरे मिलन की आस में बीते हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम के चरणों में जिसने उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन घाटी में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
नैन मिले जब नैनन से तब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

तेरी आँखों की झील में जो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Teri aankhon ki jheel mein jo jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem ki paavan jyoti jagaaee man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अंतर में जब प्रेम समाया मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरी आँखों की झील में जो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरे दीदार की एक झलक ने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम की चाहत में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जब से नैना रूप में उलझे उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

तेरे मिलन की आस में बीते दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन घाटी में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Tere milan ki aas mein beete dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Prem ki is paavan ghaatee mein ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
तेरी याद का पावन साया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,आँखों के रस्ते दिल में उतरा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम गली अति साँकरी जामें सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन धारा में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम गली अति साँकरी जामें हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे मिलन की आस में बीते जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,मन मंदिर की पावन आरती कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम का दीपक अंतर में जो संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Prem ki paavan vedee par jisane do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Prem ka deepak antar mein jo sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे आशिक़ की पहचान यही सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम का दीपक अंतर में जो संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

टूटी नाव भँवर में फँसी हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अकेलेपन की इस राह पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Tootee naav bhanvar mein phansee hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Akelepan ki is raah par tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
अंतर घट में जब ज्योति जगी सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम नगर का वासी बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन धारा में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
अकेलेपन की धूप जब साए कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,दर्द की भट्टी में तपकर ही अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म की इस लंबी यात्रा में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

मन के कोने में सिमटी सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Man ke kone mein simatee sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Dard ki is ekaant gufaa mein sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
विरह की अगन में जलता मन सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,अंधेरी रात के सन्नाटे में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

जिसके दिल पर बीत रही हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,टूटे दिल की इस वीणा से पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Jisake dil par beet rahi haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Toote dil ki is veenaa se paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म की इस आँधी ने जब तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब आशा की हर किरण बुझी तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
वक़्त की आँधी ने तोड़े भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
भीतर-भीतर घुटता जाए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

धरती की छाती पर जिसने धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Dharatee ki chhaatee par jisane dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Karmanyataa ka paavan vrat lekar jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
टूटी नाव भँवर में फँसी हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अकेलेपन की इस राह पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब सबने मुँह फेर लिया पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
दर्द की रात में जब कोई सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब कोई सहारा न बचा मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
आशा का दीप जब बुझने भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दर्द का यह गहरा सागर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

दीन-दुखी का आसरा बनकर बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जो अपने वचन का पक्का है विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jo apane vachan ka pakkaa hai vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
वक़्त की आँधी ने तोड़े हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,इस दर्द भरे दिल की सदा अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
कोई न अपना इस जग में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब नयनों के सब आँसू सूखे कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
भीतर-भीतर घुटता जाए सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,इस दर्द भरे दिल की सदा तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
जिसके दिल पर बीत रही सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,अकेलेपन की इस राह पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

दुःख में सुमिरन सब कोई अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,जो अपने वचन का पक्का है मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Duhkh mein sumiran sab koee agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Jo apane vachan ka pakkaa hai manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
आशा का दीप जब बुझने और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म के मारों की बस्ती में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
समर्थ रामदास (Samarth Ramdas) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
समर्थ रामदास छत्रपति शिवाजी महाराज के आध्यात्मिक गुरु और महान संत-दार्शनिक हैं, जिनके ग्रंथ 'दासबोध' और 'मनाचे श्लोक' कर्मयोग और राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा हैं।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
समर्थ रामदास ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Maratha Renaissance (1608–1681) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, समर्थ रामदास की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
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प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को समर्थ रामदास ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
समर्थ रामदास की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, समर्थ रामदास हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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समर्थ रामदास (1608–1681) Marathi/Bhakti साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
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