साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Ramana Maharshi (रमण महर्षि)
रमण महर्षि (1879–1950) Sage of Arunachala & Master of Self-Inquiry के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।’— रमण महर्षि
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,

‘क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।’— रमण महर्षि
शेर #2 • शाही पन्ना
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,

‘धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— रमण महर्षि
शेr #3 • रूहानी शाम
धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,
अमर शेर और ग़ज़लें
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अहंकार का त्याग किया जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
संतन की संगति में आकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,माटी का चोला पाकर जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Prem ki paavan vedee par jisane priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Prem ke is paavan teerath mein ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,हरि की कृपा का पावन साया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
साधु-संगत की छाया में जो जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
नाम और दौलत तो माटी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

तेरी याद का पावन साया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Teri yaad ka paavan saaya palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Prem sudhaa ka ras jo chakhaa to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नाम और दौलत तो माटी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,शांति और संतोष का धन जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्य के पावन पथ पर जिसने बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

ग़म की तपती दुपहरी में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,आँसुओं की इस भाषा को तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Gham ki tapatee dupaharee mein lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Aansuon ki is bhaashaa ko tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
मन मंदिर में जो दीप जले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,प्रेम की डोर में बंध गया जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
वाणी में जो अमृत घोले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
माटी का यह देह बना है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,अमर नाम जग में उसी का जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,धैर्य का दामन जिसने थामे अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

सपनों के महल जब टूटे हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Sapanon ke mahal jab toote hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Zindagi ki is soonee dagar par tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,शांति और संतोष का धन जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सत्य का दीप जब जलता है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

घायल की गति घायल जाने को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस आँधी ने जब पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Gham ki is aandhee ne jab paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
वाणी में जो अमृत घोले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हरि की कृपा का पावन साया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

धैर्य और संतोष का धन बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,धैर्य की नौका पर सवार होकर अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Dhairy aur santosh ka dhan binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Dhairy ki naukaa par savaar hokar apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
संतन की संगति में आकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हृदय में जिसके दया बसी है अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
संतन की संगति में आकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,शांति और संतोष का धन जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
नदिया की धारा बहती जावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

धरती की छाती पर जिसने जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,अंत समय जब निकट आएगा उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Ant samay jab nikat aaegaa use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
नाम और दौलत तो माटी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,जीवन का यह पावन सूत्र जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,प्रेम की डोर में बंध गया जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हरि की कृपा का पावन साया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

अहंकार की दीवारें जब जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,जो दूसरों के सुख की ख़ातिर विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Ahankaar ki deevaaren jab jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Jo doosaron ke sukh ki khaatir vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हरि की कृपा का पावन साया उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

मोह-निशा जब ढलती है है उसने समस्त वेदों का सार जान लिया बाहर तो केवल माया की छाया है,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Moha-nishaa jab dhalatee hai hai usane samast vedon ka saar jaan liyaa baahar to keval maayaa ki chhaayaa hai,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
माटी का यह देह बना है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अमर नाम जग में उसी का उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
तेरी आँखों की झील में जो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
नैनों के दर्पण में बसा जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे प्रेम की यही निशानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

अहंकार की दीवारें जब अंतर व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,जब 'अहं' का विसर्जन हो गया तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Ahankaar ki deevaaren jab antar vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Jab 'ahan' ka visarjan ho gaya tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
प्रियतम की याद में जो नैना सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम के चरणों में जिसने नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरी आँखों की झील में जो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरी आँखों की झील में जो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

पानी केरा बुदबुदा अस है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,परम शांति का यह पावन धाम जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Paani keraa budabudaa as hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa svayan pighal jaataa hai,Param shaanti ka yeh paavan dhaam jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह का हर इक आँसू बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
साँसों की सरगम में घुल गया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,हृदय के पावन सिंहासन पर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैन मिले जब नैनन से तब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Dhairy ka daaman jisane thaame apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
नैनों के दर्पण में बसा जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
मन की वीणा बज उठी जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे मिलन की आस में बीते जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन घाटी में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम के इस पावन तीरथ में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

सत्य के पावन पथ पर जिसने बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Saty ke paavan path par jisane baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Man ke mail ko jisane dhoyaa jisane dubakee lagaaee usake janma-janmaantar ke sab paap dhul jaate hain.
तेरी याद का पावन साया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जब से नैना रूप में उलझे जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
अंतर घट में जब ज्योति जगी जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरी आँखों की झील में जो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के रंग में रंग कर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हरि की कृपा का पावन साया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Man ke nirmal darpan mein jab to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Hari ki kripaa ka paavan saaya paralok mein sang jaaegee baakee sab maayaa-moh yaheen dharaa rah jaaegaa.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरी याद का पावन साया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जब से नैना रूप में उलझे उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,मन मंदिर की पावन आरती नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

माटी का यह देह बना है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अमर नाम जग में उसी का उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Maatee ka yeh deh banaa hai saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Amar naam jag mein usee ka use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,हृदय के पावन सिंहासन पर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरी याद का पावन साया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
फासले मिट गए जब दिल से का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,हृदय के पावन सिंहासन पर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

मन की वीणा बज उठी जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Man ki veenaa baj uthee jab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem ke is paavan teerath mein usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
मन मंदिर में बसा जो मूरति का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अंतर में जब प्रेम समाया तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह की रात जब ढलने लगी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Ishq ki raah anokhee bande tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Prem ki is paavan ghaatee mein yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जब से नैना रूप में उलझे जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरी याद का पावन साया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

अंतर घट में जब ज्योति जगी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Antar ghat mein jab jyoti jagee doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Man mandir ki paavan aaratee ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जब से नैना रूप में उलझे जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

दिल का आईना जब टूटा किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,टूटे हुए सपनों की किरचें अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Dil ka aaina jab tootaa kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Toote hue sapanon ki kirachen arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरी आँखों की झील में जो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन घाटी में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
सांस-सांस में याद तुम्हारी दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

नैनों से जो नीर बहे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Nainon se jo neer bahe dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
नैनों से जो नीर बहे को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,आँसुओं की इस भाषा को सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस आँधी ने जब तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
ग़म की तपती दुपहरी में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,आँसुओं की इस भाषा को तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
ग़म की तपती दुपहरी में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

विरह की अगन में जलता मन और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब सबने मुँह फेर लिया तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Virah ki agan mein jalataa man aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Jab sabane munh pher liyaa to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
वक़्त की आँधी ने तोड़े जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
सांस-सांस में याद तुम्हारी बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
नैनों से जो नीर बहे रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,आँसुओं की इस भाषा को मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब सबने मुँह फेर लिया कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,जीवन के इस महासमर में पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Zindagi aur kuchh nahi bas jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Jeevan ke is mahaasamar mein paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
दिल का आईना जब टूटा किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,टूटे हुए सपनों की किरचें अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
ग़म की तपती दुपहरी में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दिल के फफोलों को देखकर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
जिसके दिल पर बीत रही सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,अकेलेपन की इस राह पर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
कोई न अपना इस जग में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे हुए दिल का दर्द सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।

संतन की संगति में आकर करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,समय की अमूल्य बूँदों को उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Santan ki sangati mein aakar karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Samay ki amooly boondon ko use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
ग़म की तपती दुपहरी में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,अंधेरी रात के सन्नाटे में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
आँखों में जो नमी है वो जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
नैनों से जो नीर बहे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
सपनों के महल जब टूटे हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

मन मंदिर में जो दीप जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,सच्चे मित्र की पहचान यही जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Man mandir mein jo deep jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Sachche mitr ki pahachaan yahee jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
वक़्त की आँधी ने तोड़े जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म के मारों की बस्ती में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
रमण महर्षि (Ramana Maharshi) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
रमण महर्षि (1879–1950) Sage of Arunachala & Master of Self-Inquiry के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
रमण महर्षि ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1879–1950 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, रमण महर्षि की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को रमण महर्षि ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
रमण महर्षि की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, रमण महर्षि हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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रमण महर्षि के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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रमण महर्षि कौन थे?
रमण महर्षि (1879–1950) Tiruchuli, Tamil Nadu, India से ताल्लुक रखने वाले Sage of Arunachala & Master of Self-Inquiry के अग्रदूत थे, जिन्हें BHAGAVAN SRI RAMANA MAHARSHI, SAGE OF ARUNACHALA, MASTER OF VICHARA (SELF-INQUIRY) के रूप में जाना जाता है।
रमण महर्षि का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
रमण महर्षि का मुख्य विचार Self-inquiry (Atma-Vichara: 'Who am I?'), silent transmission (Mouna), abiding in the Heart, non-dual realization पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
रमण महर्षि की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
रमण महर्षि की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
रमण महर्षि का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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