ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,शांति और संतोष का धन जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Ramakrishna Paramahamsa (रामकृष्ण परमहंस)
रामकृष्ण परमहंस (1836–1886) Mystic of Dakshineswar & Spiritual Pioneer के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,शांति और संतोष का धन जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— रामकृष्ण परमहंस
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— रामकृष्ण परमहंस
शेर #2 • शाही पन्ना
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,शांति और संतोष का धन जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— रामकृष्ण परमहंस
शेr #3 • रूहानी शाम
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,
अमर शेर और ग़ज़लें
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,शांति और संतोष का धन जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

प्रियतम की याद में जो नैना रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम की चाहत में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Priyatam ki chaahat mein jisane usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सत्संग की निर्मल गंगा में रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
माटी का यह देह बना है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
धरती की छाती पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
संतन की संगति में आकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अमर नाम जग में उसी का उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Saanson ke har taar pe jisakaa utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्य का दीप जब जलता है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

प्रियतम की याद में जो नैना हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जब से नैना रूप में उलझे अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Jab se nainaa roop mein ulajhe apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,परहित में जिसने जीवन सौंपा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
अहंकार की दीवारें जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

ग़म का मारा पंछी जैसे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,टूटे हुए सपनों की किरचें कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Gham ka maaraa panchhee jaise kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Toote hue sapanon ki kirachen koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,नेकी की राह पे जो जन अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रेम की डोर में बंध गया जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
नाम और दौलत तो माटी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

भीतर-भीतर घुटता जाए अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे दिल की इस वीणा से अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Toote dil ki is veenaa se akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
सत्य के पावन पथ पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रेम की डोर में बंध गया जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
संतन की संगति में आकर का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
माटी का यह देह बना है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

कोई न अपना इस जग में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब धैर्य की सीमा टूट गई अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Koee na apanaa is jag mein patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Jab dhairy ki seemaa toot gayi arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
मन मंदिर में जो दीप जले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,धैर्य का दामन जिसने थामे उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
वाणी में जो अमृत घोले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अमर नाम जग में उसी का रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
नदिया की धारा बहती जावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अहंकार का त्याग किया जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

नेकी की राह पे जो जन जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,जीवन के इस महासमर में जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Nekee ki raah pe jo jan jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Jeevan ke is mahaasamar mein jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
सत्य के पावन पथ पर जिसने अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,नेकी की राह पे जो जन उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
माटी का यह देह बना है स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मन के मैल को जिसने धोया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हरि की कृपा का पावन साया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

दुःख में सुमिरन सब कोई जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,संतोषी सदा सुखी रहता है जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Duhkh mein sumiran sab koee jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Santoshee sadaa sukhee rahataa hai jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हृदय में जिसके दया बसी है उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
धरती की छाती पर जिसने भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,भवसागर की लहरों से जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
धरती की छाती पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
धरती की छाती पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,धैर्य की नौका पर सवार होकर विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Vaanee mein jo amrit ghole man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Dhairy ki naukaa par savaar hokar vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,वाणी में जिसके मिठास घुली लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
मन मंदिर में जो दीप जले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्संग की निर्मल गंगा में रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
मन मंदिर में जो दीप जले अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

मोह-निशा जब ढलती है जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,वैराग्य की इस पावन धारा में जिसने स्नान किया उसने संसार के समस्त दुःखों से मुक्ति पा ली।
Moha-nishaa jab dhalatee hai jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Vairaagy ki is paavan dhaaraa mein jisane snaan kiyaa usane sansaar ke samast duhkhon se mukti paa lee.
अहंकार की दीवारें जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रेम की डोर में बंध गया जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
साँसों की सरगम में घुल गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम नगर का वासी बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम की चाहत में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जब से नैना रूप में उलझे मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

संतन की संगति में आकर है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा स्वयं पिघल जाता है,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में तो समस्त जगत उस एक ही अनंत परमात्मा का स्वरूप नज़र आने लगा।
Santan ki sangati mein aakar hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa svayan pighal jaataa hai,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein to samast jagat us ek hi anant paramaatmaa ka svaroop nazar aane lagaa.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम के चरणों में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,हृदय के पावन सिंहासन पर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,हृदय के पावन सिंहासन पर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम की चाहत में जिसने उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

अमृत की बूँद अंतर में पार उतरना हो तो हरि नाम की पावन नौका का आश्रय लेना पड़ता है,परम पद की प्राप्ति उसी को होती तब आत्मा अपने मूल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गई।
Amrit ki boond antar mein paar utaranaa ho to hari naam ki paavan naukaa ka aashray lenaa padta hai,Param pad ki praapti usee ko hotee tab aatmaa apane mool shuddh, buddh aur mukt svaroop mein pratishthit ho gayi.
बिरहा की आग में तप के कुंदन का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरे रूप की पावन झांकी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम रंग में जो रंग गया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Hari sumiran mein jisakaa chitt saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
प्रेम रंग में जो रंग गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जब से नैना रूप में उलझे मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,विरह की रात जब ढलने लगी कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरे दीदार की एक झलक ने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

नदिया की धारा बहती जावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Nadiyaa ki dhaaraa bahatee jaave antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Satsang ki nirmal gangaa mein jisane dubakee lagaaee usake janma-janmaantar ke sab paap dhul jaate hain.
मन की वीणा बज उठी जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जिसने प्रेम का मर्म समझ मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
साँसों की सरगम में घुल गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,साँसों के हर तार पे जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

नदिया की धारा बहती जावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अहंकार का त्याग किया जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Nadiyaa ki dhaaraa bahatee jaave to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम नगर का वासी बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अमर प्रेम की अमर कहानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
साँसों की सरगम में घुल गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,सच्चे प्रेम की यही निशानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

अहंकार की दीवारें जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रेम की डोर में बंध गया जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Ahankaar ki deevaaren jab ramaa rahe har dam use sansaar ki koee chintaa kabhee sataa nahi sakatee,Prem ki dor mein bandh gaya jo paralok mein sang jaaegee baakee sab maayaa-moh yaheen dharaa rah jaaegaa.
प्रियतम की याद में जो नैना पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरी याद का पावन साया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जिसने प्रेम का मर्म समझ और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह का हर इक आँसू बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरे रूप की पावन झांकी जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

नैन मिले जब नैनन से तब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,विरह की रात जब ढलने लगी कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Nain mile jab nainan se tab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Virah ki raat jab dhalane lagee ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम का दीपक अंतर में जो मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैन मिले जब नैनन से तब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के चरणों में जिसने उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरी याद का पावन साया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम सुधा का रस जो चखा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जिसने प्रेम का मर्म समझ सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह का हर इक आँसू बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Tere milan ki aas mein beete jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Virah ka har ik aansoo banakar ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,अमर प्रेम की अमर कहानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रियतम की याद में जो नैना हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जब से नैना रूप में उलझे अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम सुधा का रस जो चखा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम के इस पावन तीरथ में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Saanson ki saragam mein ghul gaya to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Prem ke is paavan teerath mein utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह का हर इक आँसू बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरे रूप की पावन झांकी अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम नगर का वासी बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,हृदय के पावन सिंहासन पर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम के इस पावन तीरथ में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

आँखों के आँसू जब सूखे भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,टूटे दिल की इस वीणा से धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Aankhon ke aansoo jab sookhe bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Toote dil ki is veenaa se dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
तेरी आँखों की झील में जो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनों के दर्पण में बसा जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जिसने अपना सब कुछ सौंपा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
सपनों के महल जब टूटे भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
जिसके दिल पर बीत रही अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जीवन के इस कठिन मोड़ पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

ग़म की तपती दुपहरी में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Gham ki tapatee dupaharee mein sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Is dard bhare dil ki sadaa to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
अकेलेपन की धूप जब साए अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ग़म की इस आँधी ने जब मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
टूटी नाव भँवर में फँसी हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,इस दर्द भरे दिल की सदा अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
ग़म का मारा पंछी जैसे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,टूटे हुए सपनों की किरचें कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
टूटी नाव भँवर में फँसी सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

आँखों में जो नमी है वो को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस आँधी ने जब केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Aankhon mein jo namee hai wo ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Gham ki is aandhee ne jab keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
विरह की अगन में जलता मन लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,दिल के फफोलों को देखकर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
घायल की गति घायल जाने दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब नयनों के सब आँसू सूखे जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
आशा का दीप जब बुझने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
विरह की अगन में जलता मन हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,टूटे दिल की इस वीणा से सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

अहंकार की दीवारें जब अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जिसने अहंकार को त्याग दिया और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Ahankaar ki deevaaren jab agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
आँखों के आँसू जब सूखे भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,टूटे दिल की इस वीणा से धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
जिसके दिल पर बीत रही पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
अकेलेपन की धूप जब साए भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब आशा की हर किरण बुझी सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
दिल का आईना जब टूटा लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,टूटे हुए सपनों की किरचें तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

हौसलों के तरकश में जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,संतोषी सदा सुखी रहता है उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Hausalon ke tarakash mein jab jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Santoshee sadaa sukhee rahataa hai use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
आशा का दीप जब बुझने अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब धैर्य की सीमा टूट गई तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
टूटी नाव भँवर में फँसी हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,दर्द का यह गहरा सागर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस लंबी यात्रा में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
भीतर-भीतर घुटता जाए अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे दिल की इस वीणा से अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,समय की अमूल्य बूँदों को वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Satkarmon ki amit poonjee karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Samay ki amooly boondon ko vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
जिसके दिल पर बीत रही जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,इस दर्द भरे दिल की सदा चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
रामकृष्ण परमहंस (Ramakrishna Paramahamsa) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
रामकृष्ण परमहंस (1836–1886) Mystic of Dakshineswar & Spiritual Pioneer के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
रामकृष्ण परमहंस ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1836–1886 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, रामकृष्ण परमहंस की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को रामकृष्ण परमहंस ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
रामकृष्ण परमहंस की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, रामकृष्ण परमहंस हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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रामकृष्ण परमहंस के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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रामकृष्ण परमहंस कौन थे?
रामकृष्ण परमहंस (1836–1886) Kamarpukur, West Bengal, India से ताल्लुक रखने वाले Mystic of Dakshineswar & Spiritual Pioneer के अग्रदूत थे, जिन्हें PARAMAHAMSA OF DAKSHINESWAR, GURU OF SWAMI VIVEKANANDA, MYSTIC OF MOTHER KALI के रूप में जाना जाता है।
रामकृष्ण परमहंस का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
रामकृष्ण परमहंस का मुख्य विचार Yato mat, tato path (As many faiths, so many paths), direct communion with the Divine Mother, childlike purity पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
रामकृष्ण परमहंस की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
रामकृष्ण परमहंस की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
रामकृष्ण परमहंस का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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