मन मंदिर में जो दीप जले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Ram Prasad Bismil (राम प्रसाद बिस्मिल)
राम प्रसाद बिस्मिल (1897–1927) Revolutionary Poet & Patriot के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘मन मंदिर में जो दीप जले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।’— राम प्रसाद बिस्मिल
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
मन मंदिर में जो दीप जले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,

‘धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।’— राम प्रसाद बिस्मिल
शेर #2 • शाही पन्ना
धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,

‘मन मंदिर में जो दीप जले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।’— राम प्रसाद बिस्मिल
शेr #3 • रूहानी शाम
मन मंदिर में जो दीप जले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,
अमर शेर और ग़ज़लें
धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
मन मंदिर में जो दीप जले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हृदय में जिसके दया बसी है अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

बिरहा की आग में तप के कुंदन जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Priyatam ka anuraag hi jisakaa man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
माटी का यह देह बना है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
आशा तृष्णा सब छूटी जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य वचन जो मुख से बोले लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,शांति और संतोष का धन जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

तेरी याद का पावन साया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Teri yaad ka paavan saaya tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Sachche prem ki yahee nishaanee naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अमर नाम जग में उसी का उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
संतन की संगति में आकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह का हर इक आँसू बनकर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Phaasale mit gaye jab dil se dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Virah ka har ik aansoo banakar to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
नदिया की धारा बहती जावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,मन के मैल को जिसने धोया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

नैनों से जो नीर बहे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे हुए सपनों की किरचें तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Nainon se jo neer bahe patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Toote hue sapanon ki kirachen tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,साधु पुरुष की वाणी कभी जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
संतन की संगति में आकर तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सदाचार की पावन वेदी पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

आँखों में जो नमी है वो पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Aankhon mein jo namee hai wo patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Waqt ke is kroor prahaar ne keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,भवसागर की लहरों से जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
साधु-संगत की छाया में जो मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
माटी का यह देह बना है भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,अमर नाम जग में उसी का रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,अहंकार का त्याग किया जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे हुए दिल का दर्द अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Toote dil ki khaamoshi mein ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Toote hue dil ka dard akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,वाणी में जिसके मिठास घुली रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
वाणी में जो अमृत घोले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

वाणी में जो अमृत घोले अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जीवन की सच्ची पूँजी वही उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Vaanee mein jo amrit ghole agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jeevan ki sachchee poonjee vahee use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
वाणी वही जो घाव भरे और अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,माटी का चोला पाकर जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,भवसागर की लहरों से जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
संतन की संगति में आकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्य वचन जो मुख से बोले अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,हृदय में जिसके दया और करुणा और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
वाणी वही जो घाव भरे और सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,शांति और संतोष का धन जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,जीवन का यह पावन सूत्र जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन के इस महासमर में विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Jeevan ke is mahaasamar mein vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
माटी का यह देह बना है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,भवसागर की लहरों से जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

काल का पहिया घूमता है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,ब्रह्मलीन होकर जो जन स्थित समस्त चराचर जगत लीन है जो इसे जान लेता है वह अमरता को प्राप्त होता है।
Kaal ka pahiyaa ghoomataa hai man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Brahmaleen hokar jo jan sthit samast charaachar jagat leen hai jo ise jaan letaa hai woh amarataa ko praapt hotaa hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
तेरे मिलन की आस में बीते दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरे रूप की पावन झांकी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अंतर में जब प्रेम समाया युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

मन की चंचलता को जिसने इसे शस्त्र काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकती जल गला नहीं सकता,अंतःकरण जब दर्पण की तरह तो समस्त जगत उस एक ही अनंत परमात्मा का स्वरूप नज़र आने लगा।
Man ki chanchalataa ko jisane ise shastr kaat nahi sakate agni jalaa nahi sakatee jal galaa nahi sakataa,Antahkaran jab darpan ki tarah to samast jagat us ek hi anant paramaatmaa ka svaroop nazar aane lagaa.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम सुधा का रस जो चखा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरे दीदार की एक झलक ने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

मोह-निशा जब ढलती है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परम चेतना का आलोक जब फैला जो विलीन हो गया उसकी नदियाँ सागर में मिलकर सदा के लिए अमर हो गईं।
Moha-nishaa jab dhalatee hai man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Param chetanaa ka aalok jab phailaa jo vileen ho gaya usakee nadiyaan saagar mein milakar sadaa ke lie amar ho gaeen.
नैनन आगे तू ही तू नाचे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन धारा में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरी याद का पावन साया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम का दीपक अंतर में जो जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह का हर इक आँसू बनकर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane ghata-ghat mein pragat bhaee ajnyaan ka ghor andhera pal bhar mein bhaag gaya,Saty vachan jo mukh se bole usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम का दीपक अंतर में जो जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Sataguru mile to raah dikhaave nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Sadaachaar ki paavan vedee par usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,साँसों के हर तार पे जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
फासले मिट गए जब दिल से बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,मन मंदिर की पावन आरती जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Vaanee mein jo amrit ghole man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Satsang ki nirmal gangaa mein vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
तेरी याद का पावन साया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
नैन मिले जब नैनन से तब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन घाटी में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अमर प्रेम की अमर कहानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

कर्म की खेती जो जन बोवे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Karm ki khetee jo jan bove amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Man ke mail ko jisane dhoyaa apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
प्रेम गली अति साँकरी जामें जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के चरणों में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जब से नैना रूप में उलझे जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम सुधा का रस जो चखा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

अंतर घट में जब ज्योति जगी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Antar ghat mein jab jyoti jagee do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Sachche aashiq ki pahachaan yahee ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
नैनन आगे तू ही तू नाचे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन धारा में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जब से नैना रूप में उलझे जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Jab se nainaa roop mein ulajhe jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
प्रेम बिना सब सूना जग में रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन धारा में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह का हर इक आँसू बनकर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

फासले मिट गए जब दिल से संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Phaasale mit gaye jab dil se sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Prem nagar ka vaasee banakar jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
तेरे मिलन की आस में बीते दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अंतर में जब प्रेम समाया नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की पावन ज्योति जगाई एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,अंतर में जब प्रेम समाया सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
फासले मिट गए जब दिल से संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

विरह की अगन में जलता मन लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,आँसुओं की इस भाषा को चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Virah ki agan mein jalataa man lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Aansuon ki is bhaashaa ko chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
नैनन आगे तू ही तू नाचे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जब से नैना रूप में उलझे मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरे मिलन की आस में बीते तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
टूटे दिल की ख़ामोशी में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म की इस गहरी रात में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
आशा का दीप जब बुझने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब कोई चारासाज़ न मिला कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

टूटी नाव भँवर में फँसी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,इस दर्द भरे दिल की सदा तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Tootee naav bhanvar mein phansee antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Is dard bhare dil ki sadaa tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
आँखों में जो नमी है वो सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस गहरी रात में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
वक़्त की आँधी ने तोड़े दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म की इस आँधी ने जब धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
नैनों से जो नीर बहे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे हुए सपनों की किरचें तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
दिल का आईना जब टूटा दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

दर्द की रात में जब कोई को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,आँसुओं की इस भाषा को केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Dard ki raat mein jab koee ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Aansuon ki is bhaashaa ko keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
ग़म का मारा पंछी जैसे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जब धैर्य की सीमा टूट गई सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म के मारों की बस्ती में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
मन के कोने में सिमटी सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जीवन के इस कठिन मोड़ पर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
टूटे दिल की ख़ामोशी में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द का यह गहरा सागर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

ठोकर खाकर जो संभलता अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जीवन के इस महासमर में वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Thokar khaakar jo sanbhalataa agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jeevan ke is mahaasamar mein woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
विरह की अगन में जलता मन लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,आँसुओं की इस भाषा को चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
अकेलेपन की धूप जब साए हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जीवन के इस कठिन मोड़ पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
दर्द की रात में जब कोई कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ग़म की इस गहरी रात में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
वक़्त की आँधी ने तोड़े जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,जीवन का असली आनंद वही बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Jeevan ka asalee aanand vahee bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,अंधेरी रात के सन्नाटे में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
वक़्त की आँधी ने तोड़े को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दिल के फफोलों को देखकर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
छाले पड़े हैं पाँवों में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब कोई चारासाज़ न मिला चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
आँखों में जो नमी है वो पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

नदी की तरह बहते रहना हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,जो गिरतों को उठाना जानता है का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Nadee ki tarah bahate rahanaa hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
सपनों के महल जब टूटे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
राम प्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
राम प्रसाद बिस्मिल (1897–1927) Revolutionary Poet & Patriot के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
राम प्रसाद बिस्मिल ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1897–1927 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, राम प्रसाद बिस्मिल की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को राम प्रसाद बिस्मिल ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
राम प्रसाद बिस्मिल की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, राम प्रसाद बिस्मिल हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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राम प्रसाद बिस्मिल के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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राम प्रसाद बिस्मिल कौन थे?
राम प्रसाद बिस्मिल (1897–1927) Shahjahanpur, Uttar Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Revolutionary Poet & Patriot के अग्रदूत थे, जिन्हें LEADER OF KAKORI ACTION, REVOLUTIONARY POET 'BISMIL', CO-FOUNDER OF HRA के रूप में जाना जाता है।
राम प्रसाद बिस्मिल का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
राम प्रसाद बिस्मिल का मुख्य विचार Hindu-Muslim revolutionary unity, poetic defiance of tyranny, supreme national sacrifice, literary fervor पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
राम प्रसाद बिस्मिल की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
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