हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Dr. Rajendra Prasad (डॉ. राजेंद्र प्रसाद)
डॉ. राजेंद्र प्रसाद (1884–1963) First President of India & Scholar के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— डॉ. राजेंद्र प्रसाद • 1884–1963

हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— डॉ. राजेंद्र प्रसाद • 1884–1963
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‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— डॉ. राजेंद्र प्रसाद
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
हरि सुमिरन में जिसका चित्त अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,

‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।’— डॉ. राजेंद्र प्रसाद
शेर #2 • शाही पन्ना
सतगुरु मिले तो राह दिखावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अमर नाम जग में उसी का परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।’— डॉ. राजेंद्र प्रसाद
शेr #3 • रूहानी शाम
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,
अमर शेर और ग़ज़लें
सतगुरु मिले तो राह दिखावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अमर नाम जग में उसी का परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
वाणी में जो अमृत घोले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,माटी का चोला पाकर जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,हृदय के पावन सिंहासन पर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Hriday ke paavan sinhaasan par usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,शांति और संतोष का धन जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,नेकी की राह पे जो जन जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

साँसों की सरगम में घुल गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Saanson ki saragam mein ghul gaya dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Prem nagar ka vaasee banakar jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
साधु-संगत की छाया में जो सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

बिरहा की आग में तप के कुंदन डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अमर प्रेम की अमर कहानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Amar prem ki amar kahaanee apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
सत्य का दीप जब जलता है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,जीवन का यह पावन सूत्र जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
माटी का यह देह बना है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,साधु पुरुष की वाणी कभी के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

दर्द की रात में जब कोई चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Dard ki raat mein jab koee cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Jeevan ke is kathin mod par dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
सत्य का दीप जब जलता है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सदाचार की पावन वेदी पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Toote dil ki khaamoshi mein hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Jeevan ke is kathin mod par sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

वक़्त की आँधी ने तोड़े लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Waqt ki aandhee ne tore lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Gham ki is lanbee yaatraa mein tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,दीन-बंधु का सहारा बन के रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
संतन की संगति में आकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
धरती की छाती पर जिसने बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

संतन की संगति में आकर उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,जीवन की सच्ची पूँजी वही चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Santan ki sangati mein aakar usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Jeevan ki sachchee poonjee vahee chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अमर नाम जग में उसी का अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,भवसागर की लहरों से जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,दीन-बंधु का सहारा बन के रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

सच्ची लगन से जो जन जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,विपदाओं से जो कभी न डरा है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Sachchee lagan se jo jan jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Vipadaaon se jo kabhee na daraa hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,प्रेम की डोर में बंध गया जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,नेकी की राह पे जो जन उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,भवसागर की लहरों से जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

संतन की संगति में आकर करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,विपदाओं से जो कभी न डरा जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Santan ki sangati mein aakar karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Vipadaaon se jo kabhee na daraa jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

ज्ञान की पावन भोर भई उम्र भर भटकता रहा जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,परम पद की प्राप्ति उसी को होती जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Jnyaan ki paavan bhor bhaee umr bhar bhatakataa raha jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa,Param pad ki praapti usee ko hotee jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,मन मंदिर की पावन आरती नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस भेद मिटा के देखा उसने संसार के मिथ्या मोह से स्वयं को मुक्त कर लिया,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में तो सारे बंधन टूट गए और वह परमब्रह्म में लीन होकर एक रूप हो गया।
Mrityu koee ant nahi bas bhed mitaa ke dekhaa usane sansaar ke mithyaa moh se svayan ko mukt kar liyaa,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein to saare bandhan toot gaye aur woh paramabrahm mein leen hokar ek roop ho gaya.
प्रेम रंग में जो रंग गया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह का हर इक आँसू बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,हृदय के पावन सिंहासन पर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

संतन की संगति में आकर भेद मिटा के देखा उसने संसार के मिथ्या मोह से स्वयं को मुक्त कर लिया,परम शांति का यह पावन धाम जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Santan ki sangati mein aakar bhed mitaa ke dekhaa usane sansaar ke mithyaa moh se svayan ko mukt kar liyaa,Param shaanti ka yeh paavan dhaam jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Sataguru mile to raah dikhaave to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan woh sabake man ko bhaataa hai katu vachan tyaag ke jo bole vahee sant kahaataa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम का दीपक अंतर में जो अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रियतम की याद में जो नैना तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

माटी का यह देह बना है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,साधु पुरुष की वाणी कभी के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Maatee ka yeh deh banaa hai antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Saadhu purush ki vaanee kabhee ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
प्रेम रंग में जो रंग गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे आशिक़ की पहचान यही संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम के इस पावन तीरथ में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरी याद का पावन साया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह का हर इक आँसू बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

धरती की छाती पर जिसने बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Dharatee ki chhaatee par jisane baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Man ke mail ko jisane dhoyaa jisane dubakee lagaaee usake janma-janmaantar ke sab paap dhul jaate hain.
साँसों की सरगम में घुल गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,अंतर में जब प्रेम समाया युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,मन मंदिर की पावन आरती संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
मन की वीणा बज उठी जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Maatee ka cholaa paakar jisane ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ जब रूह में उतरता है डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम नगर का वासी बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे मिलन की आस में बीते हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम के इस पावन तीरथ में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन धारा में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

इश्क़ जब रूह में उतरता है जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Ishq jab rooh mein utarataa hai jisane ik baar lakhee use sansaar ka koee doosaraa roop suhaataa nahi,Prem sudhaa ka ras jo chakhaa usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
नैनों के दर्पण में बसा जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
मन की वीणा बज उठी जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे मिलन की आस में बीते अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम नगर का वासी बनकर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

तेरे मिलन की आस में बीते हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम के इस पावन तीरथ में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Tere milan ki aas mein beete haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Prem ke is paavan teerath mein sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
मन मंदिर में बसा जो मूरति डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अमर प्रेम की अमर कहानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन धारा में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे रूप की पावन झांकी रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की मस्ती में जो झूमा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

मन की वीणा बज उठी जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Man ki veenaa baj uthee jab haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Virah ki raat jab dhalane lagee prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अंतर में जब प्रेम समाया अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,साँसों के हर तार पे जिसका उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

कोई न अपना इस जग में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब कोई चारासाज़ न मिला ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Koee na apanaa is jag mein antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Jab koee chaaraasaaz na mila zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
अंतर घट में जब ज्योति जगी बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे आशिक़ की पहचान यही लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,साँसों के हर तार पे जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
घायल की गति घायल जाने पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
नैनों से जो नीर बहे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

ग़म की तपती दुपहरी में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,ग़म के मारों की बस्ती में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Gham ki tapatee dupaharee mein hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Gham ke maaron ki bastee mein arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
दर्द की रात में जब कोई बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब नयनों के सब आँसू सूखे अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
विरह की अगन में जलता मन किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,आँसुओं की इस भाषा को अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
दर्द की रात में जब कोई चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
सांस-सांस में याद तुम्हारी हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

सपनों के महल जब टूटे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Sapanon ke mahal jab toote hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Zindagi ki is soonee dagar par tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
टूटी नाव भँवर में फँसी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
छाले पड़े हैं पाँवों में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अकेलेपन की इस राह पर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
उम्र भर का सफ़र और जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब धैर्य की सीमा टूट गई जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
नैनों से जो नीर बहे सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,इस दर्द भरे दिल की सदा चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

जिसने मन को जीत लिया जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,सदाचार के पावन नियमों पर मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Jisane man ko jeet liyaa jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Sadaachaar ke paavan niyamon par manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
कोई न अपना इस जग में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब कोई चारासाज़ न मिला ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
उम्र भर का सफ़र और यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दिल के फफोलों को देखकर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
दर्द की रात में जब कोई रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,टूटे हुए दिल का दर्द अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
टूटी नाव भँवर में फँसी और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

धरती की छाती पर जिसने करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,मेहनत और लगन से जिसने उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Mehanat aur lagan se jisane usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
आँखों के आँसू जब सूखे लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब सबने मुँह फेर लिया सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
दिल का आईना जब टूटा कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब कोई सहारा न बचा ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
आँखों के आँसू जब सूखे बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म की इस आँधी ने जब तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

वाणी में जो अमृत घोले तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,जो सबको अपना मान के चले चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Vaanee mein jo amrit ghole tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Jo sabako apanaa maan ke chale chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
कोई न अपना इस जग में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस लंबी यात्रा में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद (Dr. Rajendra Prasad) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
डॉ. राजेंद्र प्रसाद (1884–1963) First President of India & Scholar के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1884–1963 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, डॉ. राजेंद्र प्रसाद की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, डॉ. राजेंद्र प्रसाद हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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डॉ. राजेंद्र प्रसाद कौन थे?
डॉ. राजेंद्र प्रसाद (1884–1963) Ziradei, Bihar, India से ताल्लुक रखने वाले First President of India & Scholar के अग्रदूत थे, जिन्हें FIRST PRESIDENT OF INDIA, PRESIDENT OF CONSTITUENT ASSEMBLY, DESH RATNA, BHARAT RATNA के रूप में जाना जाता है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
डॉ. राजेंद्र प्रसाद का मुख्य विचार Uncompromising moral character, constitutional dignity, Gandhian simplicity, scholar-statesmanship, selfless service पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
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डॉ. राजेंद्र प्रसाद की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
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