अमर बेलि बिन मूल की, प्रति-पालत है ताहि,रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि।
Abdul Rahim Khan-i-Khana (रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना))
अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना मुग़ल काल के प्रमुख सेनापति, विद्वान और अकबर के नवरत्नों में से थे, जिनके नीतिपरक दोहे मानवीय संबंधों और व्यावहारिक ज्ञान का अमूल्य खजाना हैं।
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‘अमर बेलि बिन मूल की, प्रति-पालत है ताहि,रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि।’— रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना)
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
अमर बेलि बिन मूल की, प्रति-पालत है ताहि,

‘अधम बचन तैं को फल्यो, बैठि तार की छाहिं,रहिमन काम न आवहीं, जे नीरस जग माहिं।’— रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना)
शेर #2 • शाही पन्ना
अधम बचन तैं को फल्यो, बैठि तार की छाहिं,

‘अनुचित-उचित रहीम लघु, करहिं बड़ेन के जोर,ज्यों ससि के संयोग तैं, पचवत आगि चकोर।’— रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना)
शेr #3 • रूहानी शाम
अनुचित-उचित रहीम लघु, करहिं बड़ेन के जोर,
अमर शेर और ग़ज़लें
अधम बचन तैं को फल्यो, बैठि तार की छाहिं,रहिमन काम न आवहीं, जे नीरस जग माहिं।
अनुचित-उचित रहीम लघु, करहिं बड़ेन के जोर,ज्यों ससि के संयोग तैं, पचवत आगि चकोर।
अनुचित बचन न मानिए, यदपि गुराइस गाढ़ि,है रहीम रघुनाथ तैं, सुजस भरत को बाढ़ि।

अब रहीम मुसकिल परी, गाढ़े दोऊ काम,साँचे तैं तो जग नहीं, झूठे मिलैं न राम।
अमी पियावत मान बिन, रहिमन मोहिं न सुहाइ,प्रेम सहित मरिबो भलो, जो बिष देइ बुलाइ।
अमृत ऐसे बचन में, रहिमन रिस की गाँस,जैसे मिसिरिहु में मिली, निरस बाँस की फाँस।
अरज-गरज मानैं नहीं, रहिमन ये जन चारि,रिनियाँ राजा माँगता , काम-आतुरी नारि।

असमय परे रहीम कहि, माँगिजात तजि लाज,ज्यों लछिमन माँगन गए, पाराशर के नाज।
आए राम रहीम सब, किए मुनिन को भेष,जब जापै बिपदा परै, सो जावै परदेश।
आवत काम रहीम है, गाढ़े बन्धु सनेह,जीरन पेड़हिं के भए, राखत बरहि बरोह।
आप न काहू काम के, डार पात फल मूर,औरन को रोकत फिरैं, रहिमन कूर बबूर।

उरग तुरँग नारी नृपति, नीच जाति हथियार,रहिमन इन्है सँभारिए, पलटत लगै न बार।
ऊगत जाही भाँति सों, अथवत ताही काँति,त्यों रहीम सुख-दुख सबै, बढ़त एक ही भाँति।
ओछे काम बड़े करैं, तौ न बड़ाई होइ,ज्यों रहीम हनुमन्त को, गिरिधर कहै न कोइ।
अंडन बौड़ रहीम कहि, देखि सचिक्कन पान,हस्ती धक्का कुल्हड़िन, सहैं ते तरुवर आन।

अंजन दीन्हे किरकिरी, सुरमा दियो न जाय,जिन आँखिनसों हरिलख्यो, रहिमन बलि-बलि जाय।
कदली सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन,जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन।
कमला थिर न रहीम कहि, यह जानत सब कोय,पुरुष पुरातन की बधू, क्यों न चंचला होय।
कमला थिर न रहीम कहि, लखत अधम जे कोय,प्रभु की सो अपनी कहै, क्यों न फजीहत होय।

करत निपुनई गुन बिना, रहिमन गुनी हजूर,मानौं टेरत बिटप चढ़ि, यहि समान हम कूर।
करम-हीन रहिमन लखौ, धँसो बड़े घर चोर,चिन्तत ही बड़ लाभ कों, जागत ह्वैगो भोर।
कहि रहीम इक दीपतैं, प्रगट सबै द्युति होइ,तनु-सनेह कैले दुरै, दृग-दीपक जरु दोह।
कहि रहीम धन बढ़ि घटै, जात धनिन की बात,घटै-बढ़ै उनको कहा, घास बेंचि जे खात।

कहि रहीम या जगत में, प्रीति गई है टेरि,रहि रहीम नर नीच में, स्वारथ-स्वारथ हेरि।
कहि रहीम सम्पति सगे, बनत बहुत बहु रीति,बिपति कसौटी जे कसे, तेई साँचे मीत।
कहु रहीम कैसे बनै, बेर -केर को संग,वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग।
कहु रहीम केतिक रही, केती गई बिहाइ,माया ममता मोह परि, अन्त चले पछिताइ।

कहु रहीम उत जायकै, गिरिधारी सों टेरि,राधे दृग-जल-झरन ते, अब ब्रज बूड़त फेरि।
कहु रहीम कैसे बनै, अनहोनी ह्वै जाइ,मिला रहै औ ना मिलै, तासों कहा बसाइ।
कागद को-सो पूतरा, सहजहिं में घुलि जाय,रहिमन यह अचरज लखौ, सोऊ खैंचत बाय।
काज परे कछु और है, काज सरे कछु और,रहिमन भाँवर के भए, नदी सिरावत मौर।

काम कछू आवै नहीं, मोल रहीम न लेइ,बाजू टूटे बाज को, साहब चारा देह।
काह कामरी पामरी, जाड़ु गए ते काज,रहिमन भूख बुझाइए, कैसो मिलै अनाज।
काह करब बैकुंठ लै, कलपबृच्छ की छाँह,रहिमन ढाक सुहावनी, जो गल पीतम-बाँह।
कुटिलन संग रहीम कहि, साधू बचते नाहिं,ज्यों नैना सैना करहिं, उरज उमेठे जाहिं।

कोउ रहीम जनि काहु के, द्वार गए पछिताय,सम्पति के सब जात हैं, बिपति सबै लै जाय।
कौन बड़ाई जलधि मिलि, गंग नाम भो धीम,काकी महिमा नहिं घटी, पर घर गए रहीम।
खर्चु बढ़ो रोजी घटी, नृपति निठुर मन कीन,रहिमन वे नर का करैं, ज्यों थोरे जल मीन।
खीरा सिर तें काटिए, मलिए लोन लगाइ,रहिमन करुए मुखन को, चहियत यही सजाइ।

खैर खून खाँसी खुसी, बैर प्रीति मद पान,रहिमन दाबे ना दबैं, जानत सकल जहान।
खैंचि चढ़नि ढीली ढरनि, कहहु कौन यह प्रीति,आजु काल्हि मोहन गही, बंस-दिया की रीति।
गगन चढ़ै फिर क्यों तिरै, रहिमन बहरी बाज,फेरि आइ बंधन परै, पेट अधम के काज।
गरज आपनी आप सों, कही रहीम न जाइ,जैसे कुल की कुल-बधू, पर घर जात लजाइ।

गहि सरनागत राम की, भवसागर की नाव,रहिमन जगत-उधार कर, और न कछू उपाव।
गुन ते लेत रहीम जन, सलिल कूप ते काढ़ि,कूपहुँ ते कहुँ होत हैं, मन काहू के बाढ़ि।
गुरुता फबै रहीम कहि, फबि आई है जाहि,उर पर कुच नीके लगैं, अनत बतौरी आहि।
चढ़िबो मैन-तुरंग पर, चलिबो पावक माँहिं,प्रेम-पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहत नाहि।

चरन छुए मस्तक छुए, तऊ न छाँड़त पानि,हियौ छुवत प्रभु छोंड़ि दै, कहु रहीम का जानि।
चारा प्यारा जगत में, छाला हित कर लेइ,ज्यों रहीम आटा लगै, त्यों मृदंग सुरु देइ।
छमा बड़ेन को चाहिए, छोटेन को उतपात,का रहीम हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात।
छोटेन सों सोहैं बड़े, कहि रहीम यहि लेख,सहसन को हय बाँधियत, लै दमरी की मेख।

जब लगि बित्त न आपने, तब लगि मित्त न कोइ,रहिमन अम्बुज अम्बु बिन, रबि ताकर रिपु होइ।
जलहिं मिलाइ रहीम ज्यों, कियो आपु सम छीर,अँगवै आपुहिं आप त्यों, सकल आँच की भीर।
जहाँ गाँठि तहँ रस नहीं, यह जानत सब कोइ,मड़ए-तर की गाँठि मैं, गाँठि-गाँठि रस होइ।
जानि अनीतिहिं जो करै, जागत ही रह सोइ,ताहि जगाइ बुझाइबो, रहिमन उचित न होइ।

जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह,रहिमन मछरी नीर को, तऊ न छाँड़त छोह।
चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध नरेस,जेहि पर बिपदा परत है, सो आवत यहि देस।
जे अनुचितकारी तिन्है, लगै अंक परिनाम,लखे उरज उर बेधिए, क्यों न होइ मुख स्याम।
जे गरीब पर हित करैं, ते रहीम बड़ लोग,कहाँ सुदामा बापुरो , कृष्ण-मिताई-जोग।

जेहिं रहीम तन-मन दियो, कियो हिए बिच भौन,तासों दुख-सुख कहन की, रही बात अब कौन।
जेहि रहीम चित आपनो, कीन्हो चतुर चकोर,निसि-बासर लागो रहै, कृष्ण-चन्द्र की ओर।
जेहिं अंचल दीपक दुरो , हन्यो सो ताही गात,रहिमन असमय के परे, मित्र सत्रु ह्वै जात।
जैसी तुम हमको करी, करी करी जो तीर,बाढ़े दिन के मीत हौ, गाढ़े दिन रघुबीर।

जैसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह,धरती ही पर परत सब, सीत घाम अरु मेह।
जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ तितही इतराइ,प्यादे से फरजी भयो, टेढ़ो-टेढ़ो जाइ।
जो विषया सन्तन तजी, मूढ़ ताहि लपटात,ज्यों नर डारत बमन करि, स्वान स्वाद सों खात।
जो रहीम दीपक दसा, तिय राखत पट ओट,समय परे ते होति है, वाही पट की चोट।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग,चन्दन बिष ब्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग।
जो बड़ेन को लघु कहौ, नहिं रहीम घटि जाहिं,गिरिधर मुरलीधर कहे, दुख कछु मानत नाहिं।
जो पुरुषारथ ते कहूँ, सम्पति मिलति रहीम,पेट लागि बैराट घर, तपत रसोंई भीम।
जो रहीम गति दीपकी, कुल कपूत की सोइ,बारे उजियारो लगै, बढ़े अँधेरो होइ।

जो रहीम होती कहूँ, प्रभु गति अपने हाथ,तौ को धौं केहि मानतो, आप बड़ाई साथ।
जो रहीम मन हाथ है, मनसा कहुँ किन जाहि,जल मैं ज्यों छाया परी, काया भीजति नाहिं।
जो रहीम बिधि बड़ किए, को कहि दूषन काढ़ि,चन्द्र दूबरो कूबरो, तऊ नखत तैं बाढ़ि।
जो रहीम करिबो हुतो, ब्रज को यही हवाल,तौ कत मातहिं दुखदियो, गिरिवर-धरि गोपाल।

जो नृप बासर निसि कहै, तौ कचपची देखाउ,रहिमन जो रहिबो चहौ, कहौ उसी को दाँउ।
जो रहीम पग तर परै, रगरि नाक अरु सीस,निठुरा आगे रोइबो, आँस गारिबो खीस।
जो रहीम कोटिन मिलै, धिक जीवन जग माहिं,आदर घटो नरेस ढिग, बसे रहे कछु नाहिं।
जो घरही मैं घुसि रहैं, कदली सुवन सुडील,तो रहीम तिनते भले, पथके अपत करील।

जो रहीम गति दीप की, कुल सपूत की सोइ,बड़ो उजेरो तेहि रहे, बढ़े अँधेरो होइ।
ज्यों नाचति कठपूतरी, करम नचावत साथ,अपनो हाथ रहीम त्यों, नहीं आपने हाथ।
टूटे सुजन मनाइए, जो टूटैं सौ बार,रहिमन फिरि-फिरि पोहिए, टूटे मुकता हार।
तनु रहीम है कर्म-बस, मन राखो वहि ओर,जल में उलटी नाव ज्यों, खैंचत गुन के जोर।

तबहीं लग जीबो भलो, दीबो परै न धीम,बिन दीबो जीबो जगत, हमहिं न रुचै रहीम।
तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान,कहि रहीम पर काज हित, सम्पति सँचाहिं सुजान।
तेहि प्रमान चलिबो भलो, जो सब दिन ठहराइ,उमँड़ि चलै जल पाट तैं, जो रहीम बढ़ि जाइ।
दादुर मोर किसान मन, लग्यो रहै घन माहिं,पै रहीम चातक-रटनि, सरवरि को कोउ नाहिं।

दिव्य दीनता के रसहिं, का जानै जग अन्धु,भली बिचारी दीनता, दीनबन्धु-से बन्धु।
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोइ,जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबन्धु सम होइ।
दुख नर सुनि हाँसी करैं, धरैं रहीम न धीर,कही सुनैं सुनि-सुनि करैं, ऐसे वे रघुवीर।
दुरदिन परे रहीम जग, दुरथल जैयत भागि,ठाढ़े हूजत घूर पर, जब घर लागति आगि।

दुर दिन परे रहीम कहि, भूलत सब पहिंचानि,सोच नहीं बित-हानि को, जो न होइ हित-हानि।
दोहा दीरघ अर्थ के, आखर थोरे आहिं,ज्यों रहीम नट कुण्डली, सिमिटि कूदि कढ़ि जाहिं।
देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन-रैन,लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन।
धन थोरो इज्जति बड़ी, कहु रहीम का बात,जैसे कुल की कुल-बधू, चिथरन माहिं समात।

धन दारा अरु सुतन मैं, रहत लगाए चित्त,क्यों रहीम खोजत नहीं, गाढ़े दिनको मित्त।
धनि रहीम गति मीन की, जल बिछुरत जिय जाय,जियत कंज तजि अन्त बसि, कहा भौंर को भाय।
धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पियत अघाइ,उदधि बड़ाई कौन है, जगत पियासो जाइ।
धूरि धरत नित सीस पै, कहु रहीम केहि काज,जेहि रज मुनि-पतनी तरी, सो ढूँढ़त गजराज।

नहिं रहीम कछु रूप गुन, नहिं मृगया अनुराग,देसी स्वान जो राखिए, भ्रमत भूख ही लाग।
रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना) (Abdul Rahim Khan-i-Khana) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना मुग़ल काल के प्रमुख सेनापति, विद्वान और अकबर के नवरत्नों में से थे, जिनके नीतिपरक दोहे मानवीय संबंधों और व्यावहारिक ज्ञान का अमूल्य खजाना हैं।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना) ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Mughal Golden Era & Bhakti Kal के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना) की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना) ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना) की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, रहीम (अब्दुर्रहीम ख़ान-ए-ख़ाना) हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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