सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Premanand Bhatt (प्रेमानंद भट्ट)
महाकवि प्रेमानंद भट्ट गुजराती आख्यान-काव्य के मुकुटमणि हैं, जिन्होंने तांबे की 'माण' बजाकर जन-जन तक रामायण, महाभारत और नल-दमयंती की कथाएँ पहुंचाईं।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
— प्रेमानंद भट्ट • GUJARATI AKHYAN GOLDEN AGE

सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
— प्रेमानंद भट्ट • GUJARATI AKHYAN GOLDEN AGE
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‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।’— प्रेमानंद भट्ट
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,

‘मन मंदिर में जो दीप जले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।’— प्रेमानंद भट्ट
शेर #2 • शाही पन्ना
मन मंदिर में जो दीप जले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,

‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— प्रेमानंद भट्ट
शेr #3 • रूहानी शाम
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,
अमर शेर और ग़ज़लें
मन मंदिर में जो दीप जले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
संतन की संगति में आकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

प्रेम बिना सब सूना जग में हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Prem binaa sab soonaa jag mein haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Virah ki raat jab dhalane lagee prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
धरती की छाती पर जिसने मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,शांति और संतोष का धन जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,अमर नाम जग में उसी का अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अहंकार का त्याग किया जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
धरती की छाती पर जिसने तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Sachche prem ki yahee nishaanee jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हृदय में जिसके दया बसी है लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,भवसागर की लहरों से जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,नेकी की राह पे जो जन अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

तेरी याद का पावन साया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जिसने अपना सब कुछ सौंपा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Teri yaad ka paavan saaya priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
वाणी वही जो घाव भरे और जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,नेकी की राह पे जो जन मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
माटी का यह देह बना है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

अकेलेपन की धूप जब साए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,आँसुओं की इस भाषा को तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Akelepan ki dhoop jab saae so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Aansuon ki is bhaashaa ko to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
धरती की छाती पर जिसने सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हृदय में जिसके दया बसी है उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
माटी का यह देह बना है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
मन मंदिर में जो दीप जले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सदाचार की पावन वेदी पर उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

कोई न अपना इस जग में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Koee na apanaa is jag mein ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Jeevan ke is kathin mod par sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,माटी का चोला पाकर जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

आँखों में जो नमी है वो हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Aankhon mein jo namee hai wo hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Jab koee chaaraasaaz na mila keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
संतन की संगति में आकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,अमर नाम जग में उसी का अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

जिसने मन को जीत लिया सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जिसने अहंकार को त्याग दिया अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Jisane man ko jeet liyaa saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
दीन-दुखी का आसरा बनकर बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,शांति और संतोष का धन जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

जीवन का यह कठिन सफ़र मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जिसने परोपकार का दीप जलाया उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Jeevan ka yeh kathin safar mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अमर नाम जग में उसी का जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
कर्म की खेती जो जन बोवे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

माटी का यह चोला पाकर अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,जीवन के इस महासमर में उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Maatee ka yeh cholaa paakar agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Jeevan ke is mahaasamar mein use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,साधु पुरुष की वाणी कभी रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,शांति और संतोष का धन जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

काल का पहिया घूमता है पार उतरना हो तो हरि नाम की पावन नौका का आश्रय लेना पड़ता है,अंतःकरण जब दर्पण की तरह का दर्शन होने लगा तब कोई शत्रु न रहा और न कोई पराया बचा।
Kaal ka pahiyaa ghoomataa hai paar utaranaa ho to hari naam ki paavan naukaa ka aashray lenaa padta hai,Antahkaran jab darpan ki tarah ka darshan hone lagaa tab koee shatru na raha aur na koee paraayaa bachaa.
कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मन के मैल को जिसने धोया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
मन की वीणा बज उठी जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अमर प्रेम की अमर कहानी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

साधु वो ही जो अंतर मानुष की जात देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात,जब द्वैत का सारा भ्रम मिट गया हुआ उसे तीनों लोकों का कोई भी प्रलोभन अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता।
Saadhu wo hi jo antar maanush ki jaat dekhat hi chhip jaaegaa jyon taaraa parabhaat,Jab dvait ka saaraa bhram mit gaya hua use teenon lokon ka koee bhi pralobhan apanee or aakarshit nahi kar sakataa.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे प्रेम की यही निशानी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम बिना सब सूना जग में हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

मैं और मेरा का भ्रम अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,परम पद की प्राप्ति उसी को होती उसी को प्राप्त होता है जो सुख-दुःख, लाभ-हानि में सदा समभाव रहता है।
Main aur mera ka bhram avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Param pad ki praapti usee ko hotee usee ko praapt hotaa hai jo sukha-duhkh, laabha-haani mein sadaa samabhaav rahataa hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
फासले मिट गए जब दिल से दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

मन मंदिर में जो दीप जले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Man mandir mein jo deep jale prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Sadaachaar ki paavan vedee par ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
तेरी याद का पावन साया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम का दीपक अंतर में जो जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरी आँखों की झील में जो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन घाटी में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रियतम की याद में जो नैना का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,नेकी की राह पे जो जन मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Man mandir mein jo deep jale man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Nekee ki raah pe jo jan maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी आँखों की झील में जो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम की चाहत में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने प्रेम का मर्म समझ सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab svayan khete hain kinaaraa unake svaagat mein sir jhukaataa hai,Amar naam jag mein usee ka usane paramaanand paayaa ahankaar mitate hi antar ka sachchaa sukh milataa hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम गली अति साँकरी जामें पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

कर्म की खेती जो जन बोवे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मन के मैल को जिसने धोया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Karm ki khetee jo jan bove bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Man ke mail ko jisane dhoyaa us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,साँसों के हर तार पे जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,हृदय के पावन सिंहासन पर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
अंतर घट में जब ज्योति जगी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह की रात जब ढलने लगी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
Ishq ki raah anokhee bande haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Jisane prem ka marm samajh jo jan vicharaa usane sansaar ki saari chintaaon se mukti paa lee.
बिरहा की आग में तप के कुंदन बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह का हर इक आँसू बनकर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,हृदय के पावन सिंहासन पर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Prem ki paavan vedee par jisane to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Hriday ke paavan sinhaasan par sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
नैनों के दर्पण में बसा जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,विरह का हर इक आँसू बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जिसने अपना सब कुछ सौंपा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह का हर इक आँसू बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
Prem ki doree baandh laee jab tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Priyatam ke rang mein rang kar jo roop salonaa usane jeevan ke har andhiyaare ko mitaa daalaa.
प्रियतम की याद में जो नैना दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे दीदार की एक झलक ने जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,साँसों के हर तार पे जिसका उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे मिलन की आस में बीते उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम के चरणों में जिसने नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

अकेलेपन की धूप जब साए लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Akelepan ki dhoop jab saae lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
नैनन आगे तू ही तू नाचे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम के चरणों में जिसने लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब धैर्य की सीमा टूट गई सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
ग़म का मारा पंछी जैसे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब सबने मुँह फेर लिया तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

कोई न अपना इस जग में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस आँधी ने जब ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Koee na apanaa is jag mein jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Gham ki is aandhee ne jab zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
विरह की अगन में जलता मन सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,इस दर्द भरे दिल की सदा केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
आशा का दीप जब बुझने हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब धैर्य की सीमा टूट गई सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
अकेलेपन की धूप जब साए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,आँसुओं की इस भाषा को तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

आँखों में जो नमी है वो किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,दर्द का यह गहरा सागर चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Aankhon mein jo namee hai wo kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Dard ka yeh gaharaa saagar chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
तन्हाई के अँधियारे में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे हुए सपनों की किरचें कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
आशा का दीप जब बुझने जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
दर्द की रात में जब कोई को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब कोई सहारा न बचा पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
तन्हाई के अँधियारे में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब आशा की हर किरण बुझी ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

अहंकार की दीवारें जब जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,समय की अमूल्य बूँदों को है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Ahankaar ki deevaaren jab jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Samay ki amooly boondon ko hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
अकेलेपन की धूप जब साए लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
आँखों के आँसू जब सूखे को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
उम्र भर का सफ़र और कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
कोई न अपना इस जग में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,जीवन का असली आनंद वही उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Jeevan ka asalee aanand vahee usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
टूटी नाव भँवर में फँसी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,टूटे दिल की इस वीणा से चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
ग़म की तपती दुपहरी में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस आँधी ने जब तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
टूटी नाव भँवर में फँसी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस आँधी ने जब तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
कोई न अपना इस जग में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

नदी की तरह बहते रहना जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,जो अपने वचन का पक्का है का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Nadee ki tarah bahate rahanaa jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Jo apane vachan ka pakkaa hai ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
टूटी नाव भँवर में फँसी दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,आँसुओं की इस भाषा को तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
प्रेमानंद भट्ट (Premanand Bhatt) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
महाकवि प्रेमानंद भट्ट गुजराती आख्यान-काव्य के मुकुटमणि हैं, जिन्होंने तांबे की 'माण' बजाकर जन-जन तक रामायण, महाभारत और नल-दमयंती की कथाएँ पहुंचाईं।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
प्रेमानंद भट्ट ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Gujarati Akhyan Golden Age के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, प्रेमानंद भट्ट की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को प्रेमानंद भट्ट ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
प्रेमानंद भट्ट की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, प्रेमानंद भट्ट हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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प्रेमानंद भट्ट कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
प्रेमानंद भट्ट (1649–1714) Gujarati/Akhyan साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
प्रेमानंद भट्ट की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
प्रेमानंद भट्ट की रचनाओं के केंद्र में आख्यान कथा व मानवीय संवेदना, पतिव्रत, मर्यादा और धर्म-पालन, हास्य, करुणा और वीर रस का समन्वय, गुजराती भाषा का स्वाभिमान, भक्ति व लोक-संस्कृति का उत्सव जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
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