आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Potana (बम्मेरा पोतना)
बम्मेरा पोतना तेलुगु साहित्य के 'सहज कवि' हैं, जिन्होंने राज-आश्रय ठुकरा कर अपनी रचना 'आंध्र महा भागवतम' को ईश्वर के चरणों में समर्पित किया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— बम्मेरा पोतना • TELUGU BHAKTI GOLDEN AGE (1450–1510)

आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— बम्मेरा पोतना • TELUGU BHAKTI GOLDEN AGE (1450–1510)
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— बम्मेरा पोतना
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— बम्मेरा पोतना
शेर #2 • शाही पन्ना
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,

‘दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।’— बम्मेरा पोतना
शेr #3 • रूहानी शाम
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,
अमर शेर और ग़ज़लें
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,मोह-निशा से जो जन जागा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

प्रेम बिना सब सूना जग में दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह की रात जब ढलने लगी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Prem binaa sab soonaa jag mein dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Virah ki raat jab dhalane lagee sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
साधु-संगत की छाया में जो माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,जीवन का यह पावन सूत्र जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
अहंकार की दीवारें जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,मन के मैल को जिसने धोया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,परहित में जिसने जीवन सौंपा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का यह पावन सूत्र जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,हृदय के पावन सिंहासन पर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Hriday ke paavan sinhaasan par jalaae rakhegaa usake jeevan path par kabhee andhakaar nahi aa sakataa.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सदाचार की पावन वेदी पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
वाणी में जो अमृत घोले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,नेकी की राह पे जो जन जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
नाम और दौलत तो माटी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,परहित में जिसने जीवन सौंपा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,शांति और संतोष का धन जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,हृदय के पावन सिंहासन पर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Ishq ki raah anokhee bande to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Hriday ke paavan sinhaasan par prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रेम की डोर में बंध गया जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मोह-निशा से जो जन जागा रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

मन के कोने में सिमटी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,अकेलेपन की इस राह पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Man ke kone mein simatee so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Akelepan ki is raah par koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
मन के निर्मल दर्पण में जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हरि की कृपा का पावन साया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,मन के मैल को जिसने धोया अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हृदय में जिसके दया बसी है उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
नदिया की धारा बहती जावे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब कोई सहारा न बचा केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Zakhm wo nahi jo jism doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Jab koee sahaaraa na bachaa keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,दीन-बंधु का सहारा बन के रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
साधु-संगत की छाया में जो प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,धैर्य का दामन जिसने थामे वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
नदिया की धारा बहती जावे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्संग की निर्मल गंगा में उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

टूटे दिल की ख़ामोशी में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Toote dil ki khaamoshi mein kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
संतन की संगति में आकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,वाणी में जिसके मिठास घुली जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
दीन-दुखी का आसरा बनकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हृदय में जिसके दया बसी है मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

ठोकर खाकर जो संभलता है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,जिसने परोपकार का दीप जलाया चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Thokar khaakar jo sanbhalataa hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,हृदय में जिसके दया बसी है रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
संतन की संगति में आकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हरि की कृपा का पावन साया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

धैर्य और संतोष का धन जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Dhairy aur santosh ka dhan jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Karmanyataa ka paavan vrat lekar chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,माटी का चोला पाकर जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
वाणी में जो अमृत घोले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अहंकार का त्याग किया जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,परहित में जिसने जीवन सौंपा के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,हृदय में जिसके दया और करुणा चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,वाणी में जिसके मिठास घुली के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,भवसागर की लहरों से जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,भवसागर की लहरों से जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस एक वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,जब द्वैत का सारा भ्रम मिट गया जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Mrityu koee ant nahi bas ek vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar hai aur sadaiv prakaashamaan rahegee,Jab dvait ka saaraa bhram mit gaya jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
माटी का यह देह बना है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह का हर इक आँसू बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह की रात जब ढलने लगी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
बिरहा की आग में तप के कुंदन उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम का दीपक अंतर में जो मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

अहंकार की दीवारें जब अंतर है उसने समस्त वेदों का सार जान लिया बाहर तो केवल माया की छाया है,वैराग्य की इस पावन धारा में त्याग दिया वह इस संसार में रहते हुए भी विदेही की तरह विचरता है।
Ahankaar ki deevaaren jab antar hai usane samast vedon ka saar jaan liyaa baahar to keval maayaa ki chhaayaa hai,Vairaagy ki is paavan dhaaraa mein tyaag diyaa woh is sansaar mein rahate hue bhi videhee ki tarah vicharataa hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रियतम की याद में जो नैना तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,अंतर में जब प्रेम समाया तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह की रात जब ढलने लगी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

घट-घट में वह एक अनंता में जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को अंतर में जलाए रखा,परमात्मा के इस विराट स्वरूप में जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa mein jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko antar mein jalaae rakhaa,Paramaatmaa ke is viraat svaroop mein jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम की चाहत में जिसने सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम बिना सब सूना जग में डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जब से नैना रूप में उलझे जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
साँसों की सरगम में घुल गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Hari sumiran mein jisakaa chitt bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Satkarmon ki amit kamaaee hi apane antar mein sanjoe woh is nashvar sansaar mein sabase baraa samraat hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अंतर में जब प्रेम समाया जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,साँसों के हर तार पे जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम बिना सब सूना जग में दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम नगर का वासी बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
मन की वीणा बज उठी जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रेम की डोर में बंध गया जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Prem ki dor mein bandh gaya jo maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,अंतर में जब प्रेम समाया मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हरि की कृपा का पावन साया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai soee phal paave re kaayar baithe bhaagy gine dheer kar dikhalaave,Hari ki kripaa ka paavan saaya apane antar mein sanjoe woh is nashvar sansaar mein sabase baraa samraat hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,हृदय के पावन सिंहासन पर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैनन आगे तू ही तू नाचे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
अंतर घट में जब ज्योति जगी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

माटी का यह देह बना है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Maatee ka yeh deh banaa hai antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Satsang ki nirmal gangaa mein use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
तेरे दीदार की एक झलक ने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम के रंग में रंग कर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अमर प्रेम की अमर कहानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे मिलन की आस में बीते अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,हृदय के पावन सिंहासन पर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,साँसों के हर तार पे जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Man ki veenaa baj uthee jab palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Saanson ke har taar pe jisakaa yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
तेरी आँखों की झील में जो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम के इस पावन तीरथ में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम की चाहत में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम नगर का वासी बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

तेरे मिलन की आस में बीते अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,हृदय के पावन सिंहासन पर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Tere milan ki aas mein beete antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Hriday ke paavan sinhaasan par aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के चरणों में जिसने कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,हृदय के पावन सिंहासन पर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह की रात जब ढलने लगी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Prem ki paavan jyoti jagaaee liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की मस्ती में जो झूमा नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रियतम की याद में जो नैना तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Zakhm wo nahi jo jism aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Jab apanon ne hi diye zakhm saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अंतर में जब प्रेम समाया तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
जिसके दिल पर बीत रही लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
दिल का आईना जब टूटा हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म के मारों की बस्ती में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

टूटे दिल की ख़ामोशी में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दिल के फफोलों को देखकर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Toote dil ki khaamoshi mein soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Dil ke phapholon ko dekhakar jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
छाले पड़े हैं पाँवों में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब नयनों के सब आँसू सूखे चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
टूटी नाव भँवर में फँसी हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब सबने मुँह फेर लिया ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
मन के कोने में सिमटी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,अकेलेपन की इस राह पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,टूटे हुए सपनों की किरचें तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

ग़म का मारा पंछी जैसे कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,अंधेरी रात के सन्नाटे में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Gham ka maaraa panchhee jaise koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Andheree raat ke sannaate mein tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
सांस-सांस में याद तुम्हारी जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
आँखों में जो नमी है वो और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस गहरी रात में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब कोई सहारा न बचा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

सच्ची लगन से जो जन तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,जीवन के इस महासमर में मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Sachchee lagan se jo jan tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Jeevan ke is mahaasamar mein manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,इस दर्द भरे दिल की सदा सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
मन के कोने में सिमटी रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब कोई सहारा न बचा धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
आँखों के आँसू जब सूखे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,टूटे दिल की इस वीणा से तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Karmanyataa ka paavan vrat lekar hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
जिसके दिल पर बीत रही को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अकेलेपन की इस राह पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
आँखों के आँसू जब सूखे दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,अंधेरी रात के सन्नाटे में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
आँखों में जो नमी है वो और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब कोई सहारा न बचा केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

समय का पहिया चलता जाए मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,हृदय में जिसके दया और करुणा अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
उम्र भर का सफ़र और अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे दिल की इस वीणा से पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
बम्मेरा पोतना (Potana) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
बम्मेरा पोतना तेलुगु साहित्य के 'सहज कवि' हैं, जिन्होंने राज-आश्रय ठुकरा कर अपनी रचना 'आंध्र महा भागवतम' को ईश्वर के चरणों में समर्पित किया।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
बम्मेरा पोतना ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Telugu Bhakti Golden Age (1450–1510) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, बम्मेरा पोतना की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को बम्मेरा पोतना ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
बम्मेरा पोतना की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, बम्मेरा पोतना हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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बम्मेरा पोतना कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
बम्मेरा पोतना (1450–1510) Telugu/Bhakti साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
बम्मेरा पोतना की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
बम्मेरा पोतना की रचनाओं के केंद्र में अनन्य ईश्वर-भक्ति व समर्पण, सांसारिक मोह-माया का तिरस्कार, स्वाभिमान व सत्यनिष्ठा, माधुर्य रस व भक्ति-रस, मानव कल्याण व मुक्ति जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
बम्मेरा पोतना की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
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उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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