सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Piyush Mishra (पीयूष मिश्रा)
पीयूष मिश्रा (Born 1963) Actor, Balladeer & Raw Lyricist के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।’— पीयूष मिश्रा
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— पीयूष मिश्रा
शेर #2 • शाही पन्ना
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,

‘धरती की छाती पर जिसने अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हृदय में जिसके दया बसी है उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।’— पीयूष मिश्रा
शेr #3 • रूहानी शाम
धरती की छाती पर जिसने अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,
अमर शेर और ग़ज़लें
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
धरती की छाती पर जिसने अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हृदय में जिसके दया बसी है उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,वाणी में जिसके मिठास घुली परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,साँसों के हर तार पे जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Prem ki paavan vedee par jisane tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Saanson ke har taar pe jisakaa ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सदाचार की पावन वेदी पर मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
नाम और दौलत तो माटी प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,मोह-निशा से जो जन जागा रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,परहित में जिसने जीवन सौंपा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अंतर में जब प्रेम समाया मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Antar mein jab prem samaayaa man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हरि की कृपा का पावन साया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

नैनन आगे तू ही तू नाचे बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Nainan aage too hi too naache banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ki is paavan ghaatee mein ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अहंकार का त्याग किया जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
नाम और दौलत तो माटी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

तन्हाई के अँधियारे में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Tanhaaee ke andhiyaare mein ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Toote hue sapanon ki kirachen manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,धैर्य का दामन जिसने थामे जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,नेकी की राह पे जो जन जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

घायल की गति घायल जाने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब सबने मुँह फेर लिया मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Jab sabane munh pher liyaa manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य वचन जो मुख से बोले उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,शांति और संतोष का धन जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
नदिया की धारा बहती जावे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अमर नाम जग में उसी का रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

ग़म की तपती दुपहरी में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Gham ki tapatee dupaharee mein patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Jab dhairy ki seemaa toot gayi keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हृदय में जिसके दया बसी है निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अहंकार का त्याग किया जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
नदिया की धारा बहती जावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,मेहनत और लगन से जिसने चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Zindagi aur kuchh nahi bas jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Mehanat aur lagan se jisane chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
माटी का यह देह बना है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य-अहिंसा की राहों पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,भवसागर की लहरों से जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
संतन की संगति में आकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जीवन की सच्ची पूँजी वही उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Satkarmon ki amit poonjee jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Jeevan ki sachchee poonjee vahee usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,वाणी में जिसके मिठास घुली व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
नाम और दौलत तो माटी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
माटी का यह देह बना है अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

नदी की तरह बहते रहना भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य और धर्म की राहों पर जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Nadee ki tarah bahate rahanaa bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Saty aur dharm ki raahon par jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,नेकी की राह पे जो जन जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,नेकी की राह पे जो जन अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

आत्मा अजर-अमर अविनाशी है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Aatmaa ajara-amar avinaashee hai prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
सत्य के पावन पथ पर जिसने अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
बिरहा की आग में तप के कुंदन हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की इस पावन घाटी में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम रंग में जो रंग गया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,अंतर में जब प्रेम समाया उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की पावन ज्योति जगाई तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

संतन की संगति में आकर भेद मिटा के देखा उसने संसार के मिथ्या मोह से स्वयं को मुक्त कर लिया,अंतःकरण जब दर्पण की तरह त्याग दिया वह इस संसार में रहते हुए भी विदेही की तरह विचरता है।
Santan ki sangati mein aakar bhed mitaa ke dekhaa usane sansaar ke mithyaa moh se svayan ko mukt kar liyaa,Antahkaran jab darpan ki tarah tyaag diyaa woh is sansaar mein rahate hue bhi videhee ki tarah vicharataa hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम सुधा का रस जो चखा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन धारा में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,साँसों के हर तार पे जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

साधु वो ही जो अंतर बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परम शांति का यह पावन धाम जो विलीन हो गया उसकी नदियाँ सागर में मिलकर सदा के लिए अमर हो गईं।
Saadhu wo hi jo antar barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Param shaanti ka yeh paavan dhaam jo vileen ho gaya usakee nadiyaan saagar mein milakar sadaa ke lie amar ho gaeen.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरी आँखों की झील में जो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,अमर प्रेम की अमर कहानी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar soee phal paave re kaayar baithe bhaagy gine dheer kar dikhalaave,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
तेरे रूप की पावन झांकी तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन धारा में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे रूप की पावन झांकी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने प्रेम का मर्म समझ सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
नैनन आगे तू ही तू नाचे रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,आँखों के रस्ते दिल में उतरा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

नाम और दौलत तो माटी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Naam aur daulat to maatee sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Maatee ka cholaa paakar jisane jisane dubakee lagaaee usake janma-janmaantar ke sab paap dhul jaate hain.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,साँसों के हर तार पे जिसका और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम रंग में जो रंग गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Prem ki gangaa antar mein bahe antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अंतर में जब प्रेम समाया मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की इस पावन घाटी में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
फासले मिट गए जब दिल से तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के चरणों में जिसने एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
फासले मिट गए जब दिल से जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,मन मंदिर की पावन आरती एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

सत्य के पावन पथ पर जिसने अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
Saty ke paavan path par jisane amrit ras ki varshaa bhaee janma-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Moha-nishaa se jo jan jaagaa jisane dubakee lagaaee usake janma-janmaantar ke sab paap dhul jaate hain.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,साँसों के हर तार पे जिसका और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम की चाहत में जिसने सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

तेरे रूप की पावन झांकी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने प्रेम का मर्म समझ सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Tere roop ki paavan jhaankee sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Jisane prem ka marm samajh sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के चरणों में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
तेरे रूप की पावन झांकी से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम के इस पावन तीरथ में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम की चाहत में जिसने सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Roma-rom mein ram gaya preetam raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Priyatam ki chaahat mein jisane sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
नैन मिले जब नैनन से तब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जब से नैना रूप में उलझे एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
नैनन आगे तू ही तू नाचे बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

तेरी याद का पावन साया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,साँसों के हर तार पे जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Teri yaad ka paavan saaya jisane ik baar lakhee use sansaar ka koee doosaraa roop suhaataa nahi,Saanson ke har taar pe jisakaa ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
मन की वीणा बज उठी जब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के रंग में रंग कर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
तेरी याद का पावन साया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,साँसों के हर तार पे जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

जिसके दिल पर बीत रही दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Jisake dil par beet rahi dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Jeevan ke is kathin mod par pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
प्रेम रंग में जो रंग गया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम नगर का वासी बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरी याद का पावन साया अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
सपनों के महल जब टूटे सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,टूटे दिल की इस वीणा से तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
ग़म की तपती दुपहरी में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

तन्हाई के अँधियारे में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Tanhaaee ke andhiyaare mein soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Jab koee chaaraasaaz na mila keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
जिसके दिल पर बीत रही हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस गहरी रात में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
मन के कोने में सिमटी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,आँसुओं की इस भाषा को सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
तन्हाई के अँधियारे में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

ग़म का मारा पंछी जैसे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Gham ka maaraa panchhee jaise hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Zindagi ki is soonee dagar par tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
वक़्त की आँधी ने तोड़े दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब नयनों के सब आँसू सूखे तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
कोई न अपना इस जग में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब कोई चारासाज़ न मिला धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
अकेलेपन की धूप जब साए चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे दिल की इस वीणा से तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
ग़म का मारा पंछी जैसे हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब कोई चारासाज़ न मिला पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

समय का पहिया चलता जाए जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,माटी के इस पुतले में जब जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Maatee ke is putale mein jab jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
जिसके दिल पर बीत रही दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
टूटी नाव भँवर में फँसी और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दिल के फफोलों को देखकर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
आँखों के आँसू जब सूखे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म की इस लंबी यात्रा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
विरह की अगन में जलता मन हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,अकेलेपन की इस राह पर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

समय का पहिया चलता जाए कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,सदाचार के पावन नियमों पर तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Sadaachaar ke paavan niyamon par tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,अकेलेपन की इस राह पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
सपनों के महल जब टूटे रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
अकेलेपन की धूप जब साए दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द की भट्टी में तपकर ही तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
घायल की गति घायल जाने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब सबने मुँह फेर लिया मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

नेकी की राह पे जो जन अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जो गिरतों को उठाना जानता है सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Nekee ki raah pe jo jan agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
सांस-सांस में याद तुम्हारी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,इस दर्द भरे दिल की सदा मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
पीयूष मिश्रा (Piyush Mishra) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
पीयूष मिश्रा (Born 1963) Actor, Balladeer & Raw Lyricist के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
पीयूष मिश्रा ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Born 1963 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, पीयूष मिश्रा की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को पीयूष मिश्रा ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
पीयूष मिश्रा की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, पीयूष मिश्रा हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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पीयूष मिश्रा कौन थे?
पीयूष मिश्रा (Born 1963) Gwalior, Madhya Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Actor, Balladeer & Raw Lyricist के अग्रदूत थे, जिन्हें ACTOR-WRITER-BALLADEER, NSD ALUMNUS, CREATOR OF 'AARAMBH HAI PRACHAND', BALLIMAARAAN FOUNDER के रूप में जाना जाता है।
पीयूष मिश्रा का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
पीयूष मिश्रा का मुख्य विचार Raw unfiltered existential angst, bohemian honesty, relentless questioning of mediocrity, artistic fire पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
पीयूष मिश्रा की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
पीयूष मिश्रा की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
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उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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