जो तूफ़ानों में अपनी नाव घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अहंकार का त्याग किया जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Obaidullah Aleem (उबैदुल्लाह अलीम)
उबैदुल्लाह अलीम (1939–1998) Poet of Yearning & Fragile Grace के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,अहंकार का त्याग किया जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।’— उबैदुल्लाह अलीम
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
जो तूफ़ानों में अपनी नाव घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,

‘साधु-संगत की छाया में जो घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।’— उबैदुल्लाह अलीम
शेर #2 • शाही पन्ना
साधु-संगत की छाया में जो घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,

‘नदिया की धारा बहती जावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,मोह-निशा से जो जन जागा उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।’— उबैदुल्लाह अलीम
शेr #3 • रूहानी शाम
नदिया की धारा बहती जावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।’— उबैदुल्लाह अलीम
शेर #4 • ज़मर्रद फ़लसफ़ा
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,
अमर शेर और ग़ज़लें
साधु-संगत की छाया में जो घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
नदिया की धारा बहती जावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,मोह-निशा से जो जन जागा उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

अंतर घट में जब ज्योति जगी तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Antar ghat mein jab jyoti jagee tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
संतन की संगति में आकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य वचन जो मुख से बोले निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
धरती की छाती पर जिसने बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,वाणी में जिसके मिठास घुली परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्संग की निर्मल गंगा में वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

तेरी याद का पावन साया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Teri yaad ka paavan saaya ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Priyatam ka anuraag hi jisakaa ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
कर्म की खेती जो जन बोवे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,शांति और संतोष का धन जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Nainon ke darpan mein basaa jab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem nagar ka vaasee banakar jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
मन मंदिर में जो दीप जले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
नदिया की धारा बहती जावे माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
नाम और दौलत तो माटी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,शांति और संतोष का धन जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
नदिया की धारा बहती जावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,मोह-निशा से जो जन जागा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब धैर्य की सीमा टूट गई जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Toote dil ki khaamoshi mein cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Jab dhairy ki seemaa toot gayi jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
वाणी में जो अमृत घोले रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
माटी का यह देह बना है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हरि की कृपा का पावन साया अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

मन के कोने में सिमटी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Man ke kone mein simatee bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Waqt ke is kroor prahaar ne tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,भवसागर की लहरों से जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,अहंकार का त्याग किया जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,अमर नाम जग में उसी का अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Zakhm wo nahi jo jism hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Waqt ke is kroor prahaar ne pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
कर्म की खेती जो जन बोवे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
अहंकार की दीवारें जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,मोह-निशा से जो जन जागा परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,दीन-बंधु का सहारा बन के रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,समय की अमूल्य बूँदों को उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Samay ki amooly boondon ko use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
वाणी वही जो घाव भरे और मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,माटी का चोला पाकर जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
धरती की छाती पर जिसने जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मन के मैल को जिसने धोया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,समय की अमूल्य बूँदों को जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Samay ki amooly boondon ko jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नाम और दौलत तो माटी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

संतन की संगति में आकर हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,मेहनत और लगन से जिसने मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Santan ki sangati mein aakar hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Mehanat aur lagan se jisane manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,शांति और संतोष का धन जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,माटी का चोला पाकर जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी में जो अमृत घोले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,वाणी में जिसके मिठास घुली व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

जो बाहर ढूँढता रहा वो बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,वैराग्य की इस पावन धारा में त्याग दिया वह इस संसार में रहते हुए भी विदेही की तरह विचरता है।
Jo baahar dhoondhataa raha wo barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Vairaagy ki is paavan dhaaraa mein tyaag diyaa woh is sansaar mein rahate hue bhi videhee ki tarah vicharataa hai.
अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जब से नैना रूप में उलझे सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनों के दर्पण में बसा जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की मस्ती में जो झूमा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

पानी केरा बुदबुदा अस प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह अंतर में जागा तो अविद्या का सारा अंधकार पल भर में समाप्त हो गया।
Paani keraa budabudaa as prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Jisane is nashvar shareer ka moh antar mein jaagaa to avidyaa ka saaraa andhakaar pal bhar mein samaapt ho gaya.
प्रेम रंग में जो रंग गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह की रात जब ढलने लगी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
अंतर घट में जब ज्योति जगी तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस उम्र भर भटकता रहा जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Mrityu koee ant nahi bas umr bhar bhatakataa raha jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,हृदय के पावन सिंहासन पर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
फासले मिट गए जब दिल से पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,जब से नैना रूप में उलझे उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,हृदय के पावन सिंहासन पर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

साधु-संगत की छाया में जो घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo ghata-ghat mein pragat bhaee ajnyaan ka ghor andhera pal bhar mein bhaag gaya,Jeevan ka yeh paavan sootr jo usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम के चरणों में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम का दीपक अंतर में जो मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम नगर का वासी बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
साँसों की सरगम में घुल गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

नाम और दौलत तो माटी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,शांति और संतोष का धन जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Naam aur daulat to maatee jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Shaanti aur santosh ka dhan jo woh sabake man ko bhaataa hai katu vachan tyaag ke jo bole vahee sant kahaataa hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन धारा में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
फासले मिट गए जब दिल से हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की मस्ती में जो झूमा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
साँसों की सरगम में घुल गया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम नगर का वासी बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम की चाहत में जिसने कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,दीन-बंधु का सहारा बन के रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab man ko seetal kar de shabd vahee jo amar aalok bane,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
तेरी याद का पावन साया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम की चाहत में जिसने अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
मन की वीणा बज उठी जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम गली अति साँकरी जामें तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Ahankaar ki deevaaren jab nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Man ke mail ko jisane dhoyaa vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
फासले मिट गए जब दिल से बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह की रात जब ढलने लगी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह की रात जब ढलने लगी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,साँसों के हर तार पे जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम का दीपक अंतर में जो मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Prem binaa sab soonaa jag mein jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Prem ka deepak antar mein jo man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की इस पावन घाटी में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम नगर का वासी बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,साँसों के हर तार पे जिसका लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह की रात जब ढलने लगी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Prem ki doree baandh laee jab ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Virah ki raat jab dhalane lagee aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अमर प्रेम की अमर कहानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
अंतर घट में जब ज्योति जगी अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,मन मंदिर की पावन आरती नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

तेरी आँखों की झील में जो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Teri aankhon ki jheel mein jo sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Jisane prem ka marm samajh use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
तेरी याद का पावन साया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम का दीपक अंतर में जो युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
नैन मिले जब नैनन से तब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम के इस पावन तीरथ में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम बिना सब सूना जग में सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह की रात जब ढलने लगी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी आँखों की झील में जो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

दर्द की रात में जब कोई जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म की इस गहरी रात में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Dard ki raat mein jab koee jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Gham ki is gaharee raat mein keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
प्रियतम की याद में जो नैना जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की इस पावन धारा में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरी आँखों की झील में जो जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
वक़्त की आँधी ने तोड़े पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
टूटी नाव भँवर में फँसी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

छाले पड़े हैं पाँवों में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Chhaale pare hain paanvon mein baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Jeevan ke is kathin mod par tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
आँखों के आँसू जब सूखे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
तन्हाई के अँधियारे में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,टूटे हुए सपनों की किरचें तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब धैर्य की सीमा टूट गई जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
नैनों से जो नीर बहे सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।

विरह की अगन में जलता मन जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब नयनों के सब आँसू सूखे सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Virah ki agan mein jalataa man jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Jab nayanon ke sab aansoo sookhe saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
भीतर-भीतर घुटता जाए सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दिल के फफोलों को देखकर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
सांस-सांस में याद तुम्हारी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
आँखों में जो नमी है वो यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,अंधेरी रात के सन्नाटे में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
कोई न अपना इस जग में जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब कोई सहारा न बचा तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,जो सबको अपना मान के चले उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Jo sabako apanaa maan ke chale use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
दर्द की रात में जब कोई जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म की इस गहरी रात में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
छाले पड़े हैं पाँवों में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म के मारों की बस्ती में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
सपनों के महल जब टूटे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,अकेलेपन की इस राह पर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

वाणी में जो अमृत घोले करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जीवन के इस महासमर में उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Vaanee mein jo amrit ghole karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Jeevan ke is mahaasamar mein usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
दर्द की रात में जब कोई अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ग़म की इस लंबी यात्रा में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
अकेलेपन की धूप जब साए बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
मन के कोने में सिमटी लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
मन के कोने में सिमटी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

चंद साँसों की मोहलत में जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,समय की अमूल्य बूँदों को जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Chand saanson ki mohalat mein jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Samay ki amooly boondon ko jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
मन के कोने में सिमटी दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,आँसुओं की इस भाषा को तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
उबैदुल्लाह अलीम (Obaidullah Aleem) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
उबैदुल्लाह अलीम (1939–1998) Poet of Yearning & Fragile Grace के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
उबैदुल्लाह अलीम ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1939–1998 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, उबैदुल्लाह अलीम की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को उबैदुल्लाह अलीम ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
उबैदुल्लाह अलीम की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, उबैदुल्लाह अलीम हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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- सालगिरह की बधाईजोड़ों के लिए मीठी-सी पंक्तियाँ
- परिवार को सुप्रभातघर के ग्रुप के लिए सुबह की शुरुआत
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उबैदुल्लाह अलीम के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
उबैदुल्लाह अलीम के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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उबैदुल्लाह अलीम कौन थे?
उबैदुल्लाह अलीम (1939–1998) Bhopal, Madhya Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Poet of Yearning & Fragile Grace के अग्रदूत थे, जिन्हें POET OF 'CHAND CHEHRA SITARA AANKHEN', ADAMJEE PRIZE WINNER, MASTER OF TENDER MELANCHOLY के रूप में जाना जाता है।
उबैदुल्लाह अलीम का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
उबैदुल्लाह अलीम का मुख्य विचार Fragile beauty of youth, gentle acceptance of solitude, romantic yearning, longing for cosmic belonging पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
उबैदुल्लाह अलीम की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
उबैदुल्लाह अलीम की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
उबैदुल्लाह अलीम का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
क्या Emotion Hub पर उबैदुल्लाह अलीम के शेर कॉपी और शेयर किए जा सकते हैं?
हाँ, Emotion Hub पर आप एक क्लिक में शेर कॉपी कर सकते हैं और सीधे WhatsApp पर शेयर कर सकते हैं।
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हाँ, आप 300 DPI वॉलपेपर क्वालिटी में टेक्स्ट के साथ तैयार कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं या डिज़ाइन स्टूडियो में कस्टमाइज़ कर सकते हैं।
उबैदुल्लाह अलीम का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
उबैदुल्लाह अलीम की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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