मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
Narsinh Mehta (नरसिंह मेहता)
भक्त नरसिंह मेहता गुजराती साहित्य के 'आदि कवि' हैं, जिनके भजन 'वैष्णव जन तो' ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह और सार्वभौमिक करुणा को अमर आधार दिया।

मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
— नरसिंह मेहता • GUJARATI BHAKTI GOLDEN AGE (1414–1481)

मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
— नरसिंह मेहता • GUJARATI BHAKTI GOLDEN AGE (1414–1481)
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‘मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— नरसिंह मेहता
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।’— नरसिंह मेहता
शेर #2 • शाही पन्ना
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,

‘अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।’— नरसिंह मेहता
शेr #3 • रूहानी शाम
अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,
अमर शेर और ग़ज़लें
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य-अहिंसा की राहों पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम के इस पावन तीरथ में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Phaasale mit gaye jab dil se dil ko wo chain diyaa jo sadiyon ki ibaadat se bhi mayassar na hua,Prem ke is paavan teerath mein man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,अमर नाम जग में उसी का अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,भवसागर की लहरों से जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

तेरे मिलन की आस में बीते सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Tere milan ki aas mein beete sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Virah ka har ik aansoo banakar aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सदाचार की पावन वेदी पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,जीवन का यह पावन सूत्र जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मोह-निशा से जो जन जागा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह की रात जब ढलने लगी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Virah ki raat jab dhalane lagee ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,मन के मैल को जिसने धोया रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रेम की डोर में बंध गया जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अकेलेपन की इस राह पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Toote dil ki khaamoshi mein ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Akelepan ki is raah par tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,अहंकार का त्याग किया जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सत्य के पावन पथ पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
धरती की छाती पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

आशा का दीप जब बुझने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस आँधी ने जब पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Aashaa ka deep jab bujhane so peer virah ki gaave antar ghat ki peeraa ko koee samajh na paave,Gham ki is aandhee ne jab paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
नाम और दौलत तो माटी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
वाणी में जो अमृत घोले जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सदाचार की पावन वेदी पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे दिल की इस वीणा से अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Zakhm wo nahi jo jism jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Toote dil ki is veenaa se arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
नाम और दौलत तो माटी जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,मोह-निशा से जो जन जागा अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मन के मैल को जिसने धोया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
संतन की संगति में आकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हृदय में जिसके दया बसी है उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

हौसलों के तरकश में जब मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,सदाचार के पावन नियमों पर कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Hausalon ke tarakash mein jab mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Sadaachaar ke paavan niyamon par ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
धरती की छाती पर जिसने भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,अहंकार का त्याग किया जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

मन मंदिर में जो दीप हँसते-हँसते तय करना सीखो जो काँटों पे मुस्कुराया वही गुलाब बना,जीवन के इस महासमर में और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Man mandir mein jo deep hansate-hansate tay karanaa seekho jo kaanton pe muskuraayaa vahee gulaab banaa,Jeevan ke is mahaasamar mein aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
संतन की संगति में आकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हृदय में जिसके दया बसी है उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
वाणी वही जो घाव भरे और सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्संग की निर्मल गंगा में अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
धरती की छाती पर जिसने जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

धरती की छाती पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जिसने अहंकार को त्याग दिया उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,मन के मैल को जिसने धोया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
वाणी में जो अमृत घोले मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
वाणी वही जो घाव भरे और मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

मोह-निशा जब ढलती है कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,जब मन की सब तरंगें शांत हुईं निर्मल हुआ तो उसमें साक्षात परमात्मा का दिव्य स्वरूप प्रतिबिंबित होने लगा।
Moha-nishaa jab dhalatee hai kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Jab man ki sab tarangen shaant hueen nirmal hua to usamen saakshaat paramaatmaa ka divy svaroop pratibinbit hone lagaa.
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हृदय में जिसके दया बसी है उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
तेरे मिलन की आस में बीते जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह का हर इक आँसू बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम के इस पावन तीरथ में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे दीदार की एक झलक ने दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

साधु वो ही जो अंतर अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,सच्चा मोक्ष वही कहलाता है जहाँ तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Saadhu wo hi jo antar avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Sachchaa moksh vahee kahalaataa hai jahaan to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,हृदय के पावन सिंहासन पर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम की चाहत में जिसने सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम के इस पावन तीरथ में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

मन की चंचलता को जिसने मानुष की जात देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह जिसने अपना शीश नवाया उसने परम मुक्ति का अमर वरदान प्राप्त कर लिया।
Man ki chanchalataa ko jisane maanush ki jaat dekhat hi chhip jaaegaa jyon taaraa parabhaat,Jisane is nashvar shareer ka moh jisane apanaa sheesh navaayaa usane param mukti ka amar varadaan praapt kar liyaa.
तेरे रूप की पावन झांकी जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,विरह का हर इक आँसू बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अमर प्रेम की अमर कहानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम बिना सब सूना जग में पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,वाणी में जिसके मिठास घुली उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Vaanee mein jisake mithaas ghulee usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
तेरे रूप की पावन झांकी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम नगर का वासी बनकर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
मन की वीणा बज उठी जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अमर प्रेम की अमर कहानी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Parahit mein jisane jeevan saunpaa usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,मन मंदिर की पावन आरती नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,साँसों के हर तार पे जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

संतन की संगति में आकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,हृदय में जिसके दया बसी है उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Santan ki sangati mein aakar man ko seetal kar de shabd vahee jo amar aalok bane,Hriday mein jisake dayaa basee hai usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
तेरे मिलन की आस में बीते सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह का हर इक आँसू बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन धारा में अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रियतम की याद में जो नैना उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन घाटी में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
नैन मिले जब नैनन से तब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हृदय में जिसके दया बसी है उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Man mandir mein jo deep jale saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Hriday mein jisake dayaa basee hai use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम की चाहत में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम के इस पावन तीरथ में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम नगर का वासी बनकर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Prem rang mein jo rang gaya jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem nagar ka vaasee banakar utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम की चाहत में जिसने कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने प्रेम का मर्म समझ मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैनन आगे तू ही तू नाचे का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम सुधा का रस जो चखा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम के इस पावन तीरथ में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Prem galee ati saankaree jaamen dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem ke is paavan teerath mein motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
तेरी आँखों की झील में जो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह की रात जब ढलने लगी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अंतर में जब प्रेम समाया सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
मन की वीणा बज उठी जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Man ki veenaa baj uthee jab palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Prem ki mastee mein jo jhoomaa jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

घायल की गति घायल जाने जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
उम्र भर का सफ़र और सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई सहारा न बचा जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
सांस-सांस में याद तुम्हारी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ग़म के मारों की बस्ती में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

सपनों के महल जब टूटे किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Sapanon ke mahal jab toote kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
तन्हाई के अँधियारे में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
आशा का दीप जब बुझने सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ग़म की इस गहरी रात में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,अकेलेपन की इस राह पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
मन के कोने में सिमटी चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

विरह की अगन में जलता मन जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Virah ki agan mein jalataa man jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Dard ki is ekaant gufaa mein tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
आँखों में जो नमी है वो को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे दिल की इस वीणा से अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
विरह की अगन में जलता मन पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,इस दर्द भरे दिल की सदा तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
अकेलेपन की धूप जब साए रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म के मारों की बस्ती में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
भीतर-भीतर घुटता जाए हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

धैर्य और संतोष का धन मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,धैर्य की नौका पर सवार होकर जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Dhairy aur santosh ka dhan man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Dhairy ki naukaa par savaar hokar jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
घायल की गति घायल जाने जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
ग़म की तपती दुपहरी में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,अकेलेपन की इस राह पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म के मारों की बस्ती में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
दर्द की रात में जब कोई किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,अकेलेपन की इस राह पर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

नेकी की राह पे जो जन अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,जीवन के इस महासमर में जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Nekee ki raah pe jo jan agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Jeevan ke is mahaasamar mein jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
टूटी नाव भँवर में फँसी सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म के मारों की बस्ती में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
वक़्त की आँधी ने तोड़े लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस गहरी रात में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
अकेलेपन की धूप जब साए रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,टूटे हुए सपनों की किरचें सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
आशा का दीप जब बुझने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस आँधी ने जब पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,सदाचार के पावन नियमों पर जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Satkarmon ki amit poonjee chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Sadaachaar ke paavan niyamon par jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
सांस-सांस में याद तुम्हारी जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,दर्द का यह गहरा सागर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
नरसिंह मेहता (Narsinh Mehta) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
भक्त नरसिंह मेहता गुजराती साहित्य के 'आदि कवि' हैं, जिनके भजन 'वैष्णव जन तो' ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह और सार्वभौमिक करुणा को अमर आधार दिया।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
नरसिंह मेहता ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Gujarati Bhakti Golden Age (1414–1481) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, नरसिंह मेहता की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को नरसिंह मेहता ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
नरसिंह मेहता की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, नरसिंह मेहता हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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नरसिंह मेहता (1414–1481) Gujarati/Bhakti साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
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