नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Mustafa Zaidi (मुस्तफ़ा ज़ैदी)
मुस्तफ़ा ज़ैदी (1930–1970) Tragic Romantic Poet & Civil Servant के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।’— मुस्तफ़ा ज़ैदी
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,

‘माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।’— मुस्तफ़ा ज़ैदी
शेर #2 • शाही पन्ना
माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।’— मुस्तफ़ा ज़ैदी
शेr #3 • रूहानी शाम
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।’— मुस्तफ़ा ज़ैदी
शेर #4 • ज़मर्रद फ़लसफ़ा
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,
अमर शेर और ग़ज़लें
माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

नैनों के दर्पण में बसा जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,अमर प्रेम की अमर कहानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Nainon ke darpan mein basaa jab barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Amar prem ki amar kahaanee prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,नेकी की राह पे जो जन अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जीवन का यह पावन सूत्र जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
साधु-संगत की छाया में जो अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

नैनन आगे तू ही तू नाचे अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Nainan aage too hi too naache amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
अहंकार की दीवारें जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,शांति और संतोष का धन जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सत्य का दीप जब जलता है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,धैर्य का दामन जिसने थामे अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

मन की वीणा बज उठी जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम के इस पावन तीरथ में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Man ki veenaa baj uthee jab jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem ke is paavan teerath mein sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
माटी का यह देह बना है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,भवसागर की लहरों से जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

कोई न अपना इस जग में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब सबने मुँह फेर लिया कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Koee na apanaa is jag mein hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Jab sabane munh pher liyaa koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हृदय में जिसके दया बसी है उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
धरती की छाती पर जिसने अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

तन्हाई के अँधियारे में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द की भट्टी में तपकर ही मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Tanhaaee ke andhiyaare mein soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Dard ki bhattee mein tapakar hi manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
मन के निर्मल दर्पण में जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
धरती की छाती पर जिसने सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,अमर नाम जग में उसी का अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

घायल की गति घायल जाने अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,इस दर्द भरे दिल की सदा तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Is dard bhare dil ki sadaa tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
वाणी में जो अमृत घोले मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अमर नाम जग में उसी का जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
वाणी में जो अमृत घोले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

नदी की तरह बहते रहना मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जिसने परोपकार का दीप जलाया है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Nadee ki tarah bahate rahanaa man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
नाम और दौलत तो माटी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
माटी का यह देह बना है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,शांति और संतोष का धन जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,समय की अमूल्य बूँदों को अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Zindagi aur kuchh nahi bas binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Samay ki amooly boondon ko apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,मोह-निशा से जो जन जागा रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
अहंकार की दीवारें जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

माटी का यह चोला पाकर अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,मेहनत और लगन से जिसने वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Maatee ka yeh cholaa paakar agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Mehanat aur lagan se jisane vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य-अहिंसा की राहों पर उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हृदय में जिसके दया बसी है जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

सत्य-अहिंसा की राहों पर व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,मिथ्या संसार की इस मायावी छाया से तब 'सोऽहं' का दिव्य नाद अंतर में अनहद की तरह गूँजने लगा।
Satya-ahinsaa ki raahon par vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Mithyaa sansaar ki is maayaavee chhaayaa se tab 'soऽhan' ka divy naad antar mein anahad ki tarah goonjane lagaa.
दीन-दुखी का आसरा बनकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
मन मंदिर में बसा जो मूरति रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के रंग में रंग कर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन घाटी में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रियतम की याद में जो नैना पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

आत्मा अजर-अमर अविनाशी है जब टूटता है तभी उस परमसत्य का अमर द्वार खुलता है,जब द्वैत का सारा भ्रम मिट गया निर्मल हुआ तो उसमें साक्षात परमात्मा का दिव्य स्वरूप प्रतिबिंबित होने लगा।
Aatmaa ajara-amar avinaashee hai jab tootataa hai tabhee us paramasaty ka amar dvaar khulataa hai,Jab dvait ka saaraa bhram mit gaya nirmal hua to usamen saakshaat paramaatmaa ka divy svaroop pratibinbit hone lagaa.
अंतर घट में जब ज्योति जगी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जिसने प्रेम का मर्म समझ तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के रंग में रंग कर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
फासले मिट गए जब दिल से संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम का दीपक अंतर में जो अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
नैनों के दर्पण में बसा जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,अमर प्रेम की अमर कहानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

काल का पहिया घूमता है ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,परमानंद का यह अलौकिक रस समस्त चराचर जगत लीन है जो इसे जान लेता है वह अमरता को प्राप्त होता है।
Kaal ka pahiyaa ghoomataa hai jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Paramaanand ka yeh alaukik ras samast charaachar jagat leen hai jo ise jaan letaa hai woh amarataa ko praapt hotaa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
नैन मिले जब नैनन से तब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम का दीपक अंतर में जो उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे दीदार की एक झलक ने सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह का हर इक आँसू बनकर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Maatee ka yeh deh banaa hai to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम की चाहत में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने प्रेम का मर्म समझ एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरे दीदार की एक झलक ने हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम बिना सब सूना जग में जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्संग की निर्मल गंगा में अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Saty ka deep jab jalataa hai antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Satsang ki nirmal gangaa mein apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
तेरे मिलन की आस में बीते से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की इस पावन धारा में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,अमर प्रेम की अमर कहानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,साँसों के हर तार पे जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैन मिले जब नैनन से तब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,हृदय के पावन सिंहासन पर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Prem ki gangaa antar mein bahe soee phal paave re kaayar baithe bhaagy gine dheer kar dikhalaave,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे रूप की पावन झांकी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरी आँखों की झील में जो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम नगर का वासी बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Satsang ki nirmal gangaa mein usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
तेरे मिलन की आस में बीते सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम सुधा का रस जो चखा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अंतर में जब प्रेम समाया मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
साँसों की सरगम में घुल गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह का हर इक आँसू बनकर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने प्रेम का मर्म समझ एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Roma-rom mein ram gaya preetam se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Jisane prem ka marm samajh ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,मन मंदिर की पावन आरती उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम की चाहत में जिसने एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
नैन मिले जब नैनन से तब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी आँखों की झील में जो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

नैनों के दर्पण में बसा जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अंतर में जब प्रेम समाया मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Nainon ke darpan mein basaa jab jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Antar mein jab prem samaayaa man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
मन की वीणा बज उठी जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम के इस पावन तीरथ में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

मन की वीणा बज उठी जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Man ki veenaa baj uthee jab us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Prem ke is paavan teerath mein ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की मस्ती में जो झूमा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

मन के कोने में सिमटी सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द का यह गहरा सागर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Man ke kone mein simatee soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Dard ka yeh gaharaa saagar koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,मन मंदिर की पावन आरती कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
आशा का दीप जब बुझने कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब आशा की हर किरण बुझी तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
आँखों के आँसू जब सूखे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

मन के कोने में सिमटी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब कोई सहारा न बचा ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Man ke kone mein simatee bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Jab koee sahaaraa na bachaa zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
भीतर-भीतर घुटता जाए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
कोई न अपना इस जग में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जब कोई सहारा न बचा ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
कोई न अपना इस जग में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब सबने मुँह फेर लिया कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
भीतर-भीतर घुटता जाए रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

छाले पड़े हैं पाँवों में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब कोई चारासाज़ न मिला ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Chhaale pare hain paanvon mein hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Jab koee chaaraasaaz na mila zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,टूटे हुए सपनों की किरचें सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
सांस-सांस में याद तुम्हारी यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब सबने मुँह फेर लिया तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
ग़म की तपती दुपहरी में पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,अकेलेपन की इस राह पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
आँखों में जो नमी है वो सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

चंद साँसों की मोहलत में भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,जो सबको अपना मान के चले वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Chand saanson ki mohalat mein bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Jo sabako apanaa maan ke chale vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
मन के कोने में सिमटी सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द का यह गहरा सागर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,इस दर्द भरे दिल की सदा तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
सपनों के महल जब टूटे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब सबने मुँह फेर लिया पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
वक़्त की आँधी ने तोड़े सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

माटी का यह चोला पाकर बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,समय की अमूल्य बूँदों को जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Maatee ka yeh cholaa paakar binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Samay ki amooly boondon ko jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
मन के कोने में सिमटी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,दिल के फफोलों को देखकर धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
ग़म का मारा पंछी जैसे भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब सबने मुँह फेर लिया केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
घायल की गति घायल जाने पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
तन्हाई के अँधियारे में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द की भट्टी में तपकर ही मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

जीवन की इस रणभूमि में जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,कर्म की खेती में जो पसीना है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Jeevan ki is ranabhoomi mein jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Karm ki khetee mein jo paseenaa hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
नैनों से जो नीर बहे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,आँसुओं की इस भाषा को तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
मुस्तफ़ा ज़ैदी (Mustafa Zaidi) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
मुस्तफ़ा ज़ैदी (1930–1970) Tragic Romantic Poet & Civil Servant के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
मुस्तफ़ा ज़ैदी ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1930–1970 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, मुस्तफ़ा ज़ैदी की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को मुस्तफ़ा ज़ैदी ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
मुस्तफ़ा ज़ैदी की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, मुस्तफ़ा ज़ैदी हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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मुस्तफ़ा ज़ैदी के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
मुस्तफ़ा ज़ैदी के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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मुस्तफ़ा ज़ैदी कौन थे?
मुस्तफ़ा ज़ैदी (1930–1970) Allahabad, Uttar Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Tragic Romantic Poet & Civil Servant के अग्रदूत थे, जिन्हें AUTHOR OF 'KOH-E-NIDA', CSP OFFICER-POET, CHRONICLER OF TRAGIC GRANDEUR AND PASSION के रूप में जाना जाता है।
मुस्तफ़ा ज़ैदी का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
मुस्तफ़ा ज़ैदी का मुख्य विचार Aristocratic melancholy, tragic intensity of unfulfilled passion, modern alienation of the intellectual civil servant पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
मुस्तफ़ा ज़ैदी की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
मुस्तफ़ा ज़ैदी की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
मुस्तफ़ा ज़ैदी का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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मुस्तफ़ा ज़ैदी की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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