मुंशी प्रेमचंद कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
Munshi Premchand (मुंशी प्रेमचंद)
منشی پریم چند
मुंशी प्रेमचंद आधुनिक भारतीय गद्य एवं मानवीय संवेदना के सम्राट हैं, जिन्होंने कृषक, शोषित और आम जनमानस की पीड़ा को अमर अभिव्यक्ति दी।
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‘मुंशी प्रेमचंद कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।’— मुंशी प्रेमचंद
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
मुंशी प्रेमचंद कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,

‘मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।’— मुंशी प्रेमचंद
शेर #2 • शाही पन्ना
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,

‘आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।’— मुंशी प्रेमचंद
शेr #3 • रूहानी शाम
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,
अमर शेर और ग़ज़लें
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
मुंशी प्रेमचंद कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
मुंशी प्रेमचंद कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
मुंशी प्रेमचंद कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
मुंशी प्रेमचंद कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
मुंशी प्रेमचंद कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
मुंशी प्रेमचंद (Munshi Premchand) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
मुंशी प्रेमचंद आधुनिक भारतीय गद्य एवं मानवीय संवेदना के सम्राट हैं, जिन्होंने कृषक, शोषित और आम जनमानस की पीड़ा को अमर अभिव्यक्ति दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
मुंशी प्रेमचंद ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Premchand Yug (1880–1936) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, मुंशी प्रेमचंद की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को मुंशी प्रेमचंद ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
मुंशी प्रेमचंद की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, मुंशी प्रेमचंद हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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पसंद का शेर चुनिए, मनपसंद टेम्पलेट लगाइए, फ़ॉन्ट और रंग सजाइए और एक क्लिक में सेव कर लीजिए।
- बिना साइन-अप
- बिना वॉटरमार्क
- हमेशा मुफ़्त
“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
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शेरों के पीछे की आवाज़ें पढ़िए, त्योहार की तैयारी कीजिए और स्टेटस के लिए छोटी पंक्ति उठाइए
मुंशी प्रेमचंद के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
मुंशी प्रेमचंद के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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मुंशी प्रेमचंद कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
मुंशी प्रेमचंद (1880–1936) Hindi/Hindustani साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं के केंद्र में किसान और शोषित वर्ग का संघर्ष, हृदयस्पर्शी मानवीय करुणा व प्रेम, सामाजिक असमानता का गहरा दंश, जीवन का यथार्थवादी सत्य, न्याय, त्याग और नैतिक दर्शन जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
मुंशी प्रेमचंद की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
मुंशी प्रेमचंद की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
मुंशी प्रेमचंद का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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मुंशी प्रेमचंद का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
तो फिर देर किस बात की?
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