दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,बहार आए न आए चमन महकता हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
Mir Dard (ख़्वाजा मीर दर्द)
خواجہ میر درد
ख़्वाजा मीर दर्द उर्दू शायरी के चार बुनियादी सुतूनों में से एक हैं, जिन्होंने जीवन भर सूफ़ी साधना, ईश्वर-प्रेम और आध्यात्मिक शांति की शायरी की।

दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,बहार आए न आए चमन महकता हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
— ख़्वाजा मीर दर्द • DELHI CLASSICAL ERA (1721–1785)

दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,बहार आए न आए चमन महकता हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
— ख़्वाजा मीर दर्द • DELHI CLASSICAL ERA (1721–1785)
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‘दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,बहार आए न आए चमन महकता हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।’— ख़्वाजा मीर दर्द
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,

‘ज़मीं की गोद में हर दर्द सो से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,दुआ का हाथ उठा तो करम का फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।’— ख़्वाजा मीर दर्द
शेर #2 • शाही पन्ना
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,

‘मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।’— ख़्वाजा मीर दर्द
शेr #3 • रूहानी शाम
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,
अमर शेर और ग़ज़लें
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,दुआ का हाथ उठा तो करम का फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते है रूह में किसी और की तलब न रही,बहार आए न आए चमन महकता के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।

तिरी तलाश में भटके तो ये गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे उठा तो फिर चिराग़-ए-यक़ीं कभी न बुझा।
ख़ुदी को खो के जो पाया वो तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,सहर की पहली किरन ने पयाम राह में कभी कोई सौदा न किया।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,न कोई शिकवा ज़बाँ पर न आँख दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।

तिरी तलाश में भटके तो ये बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,बहार आए न आए चमन महकता नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,सुख़न की शाख़ पे जब भी कोई गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,तिरी पनाह में आके मिली वो गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।

तिरी यादों के गुलशन में जब में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,मोहब्बत के पावन सफ़र में क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
Tiri yaadon ke gulashan mein jab mein bayaan ho ye to khaamosh nazar ki zabaan hai,Mohabbat ke paavan safar mein qasam hai ye wo bandhan hai jo kabhee toot nahi sakataa.
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,हमारी आँख में जलते रहे कई राह में कभी कोई सौदा न किया।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।

नज़र नज़र में समाई है जब गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,तिरी पनाह में आके मिली वो दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
नसीब में जो लिखा था वही से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सहर की पहली किरन ने पयाम के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
सबा ने आके सुनाया पयाम के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।

ख़्वाबों के महल सब रेज़ा रेज़ा लगीं तो सब्र का दामन थाम लिया हमने,आह जो सीने से निकली वो तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
Khvaabon ke mahal sab rezaa rezaa lageen to sabr ka daaman thaam liyaa hamane,Aah jo seene se nikalee wo to dil ne khud ko khudaa ke havaale kar diyaa.
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,दुआ का हाथ उठा तो करम का तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया भेजा कि नूर-ए-हक़ कभी मिट नहीं सकता।
तिरे करम का सहारा जो मिल ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।

ज़मीं की गोद में हर दर्द दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र तक पहुँची जहाँ ख़ुदा ने सुनी हमारी फ़रियाद।
Zameen ki god mein har dard davaa ban gaya ashkon ne raahat bakhsh dee,Koee hamasafar na mila is safar tak pahunchee jahaan khuda ne sunee hamaaree fariyaad.
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,बहार आए न आए चमन महकता आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
सबा ने आके सुनाया पयाम चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,बहार आए न आए चमन महकता आबगीने जो सच की गवाही देते रहे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।

हौसलों के तरकश में तीर ज़िंदा सब्र मिला जिसने जीने का सलीक़ा सिखाया हमें,वक़्त की क़द्र जिसने पहचानी डरा मंज़िल ने खुद बढ़ के उसके क़दम चूमे।
Hausalon ke tarakash mein teer zinda sabr mila jisane jeene ka saleeqaa sikhaayaa hamen,Waqt ki qadr jisane pahachaanee daraa manzil ne khud barh ke usake qadam choome.
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
सुख़न के आईने में सच की हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान के निकलीं जब कोई बात सच की उठी।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते बदल डाले मगर आईने साफ़ रखे,बहार आए न आए चमन महकता दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,सहर की पहली किरन ने पयाम के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।

सुख़न के आईने में सच की पहचान है कायर तो मुक़द्दर का रोना रोते हैं,हर ठोकर ने हमें चलना सिखाया ओर बढ़ा रास्ता खुद उसके लिए आसान हो गया।
Sukhan ke aaeene mein sach ki pahachaan hai kaayar to muqaddar ka ronaa rote hain,Har thokar ne hamen chalanaa sikhaayaa or barhaa raasta khud usake lie aasaan ho gaya.
नज़र नज़र में समाई है जब अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।
तिरी तलाश में भटके तो ये गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।

सफ़र-ए-हयात में धूप भी है है वही फल काटता है जैसी नीयत वैसा फल,ज़िंदगी का कारवाँ चलता ही रहता और मज़बूत इरादों का इंसान बना दिया।
Safara-e-hayaat mein dhoop bhi hai hai vahee phal kaatataa hai jaisee neeyat vaisaa phal,Zindagi ka kaaravaan chalataa hi rahataa aur mazaboot iraadon ka insaan banaa diyaa.
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,ज़माने भर की निगाहों से बच के आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।
तिरे करम का सहारा जो मिल सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे आसाइश जो सल्तनत के ख़ज़ानों में भी न थी।

जो बाहर ढूँढता रहा वो उम्र जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को जलाए रखा,परम चैतन्य का आलोक जब फैला यहाँ जो बोएगा वही इंसान कल काटेगा।
Jo baahar dhoondhataa raha wo umr jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko jalaae rakhaa,Param chaitany ka aalok jab phailaa yahaan jo boegaa vahee insaan kal kaategaa.
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,हमारी आँख में जलते रहे कई दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,तिरे दर पे सजदा किया जब से मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
तिरी यादों के गुलशन में जब अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,वफ़ा की कसम खाके हमने लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।

संतन की संगति में आकर जिसने यहाँ जो देख सका उसने राज़ पा ही लिया,सत्य की खोज में जिसने सब जिसने जीते जी अपनी ख़्वाहिशात को फ़ना कर दिया।
Santan ki sangati mein aakar jisane yahaan jo dekh sakaa usane raaz paa hi liyaa,Saty ki khoj mein jisane sab jisane jeete jee apanee khvaahishaat ko fanaa kar diyaa.
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरे नूर से दिल का आँगन सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरी चाहत का नशा रूह में क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया तो हर इक अश्क सितारा बन गया।

भवसागर की लहरों से जो पार चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो विरक्त जागा,अमृत की धारा अंतर में बहती नहीं सकता ये तो अफ़लाक से परे का सफ़र है।
Bhavasaagar ki laharon se jo paar charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo virakt jaagaa,Amrit ki dhaaraa antar mein bahatee nahi sakataa ye to afalaak se pare ka safar hai.
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
इश्क़ जब रूह की गहराई में उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरे नूर से दिल का आँगन उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,मोहब्बत के पावन सफ़र में कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।

इश्क़ जब रूह की गहराई में से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
इश्क़ जब रूह की गहराई में कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला हमने असली ज़िंदगी का राज़ पा लिया।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,ज़माने की रस्मों को हमने भुला बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।

जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
नज़र नज़र में समाई है जब उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
Ghama-e-hayaat ke toofaan se guzar mila magar tiri razaa pe sar jhukaa diyaa,Vafaa ke dasht mein jab bhi qadam raha hum apane khoon se gulashan ko seenchate rahe.
तिरे करम का सहारा जो मिल गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,तिरी याद जब भी दिल में उभरी सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी ख़याल आया तो हर इक ज़ख़्म मुस्कुरा उठा,मोहब्बत की चाशनी से धुला हर तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा के आईने में तो सारा जहान भूल गए,वफ़ा की कसम खाके हमने तो हर इक अश्क सितारा बन गया।

दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,हमारी आँख में जलते रहे कई दरिया बहा जो दामन-ए-उम्मीद भर गया।
Dilon ke zakhm numaayish ke vaaste chalatee rahi koee hamasafar na mila,Hamaaree aankh mein jalate rahe kaee dariya bahaa jo daamana-e-ummeed bhar gaya.
तिरी आँखों की गहराइयों में खो वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरे इश्क़ की छाँव में जो तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।

इश्क़ जब रूह की गहराई में कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
Ishq jab rooh ki gaharaaee mein koee hasarat na rahi tira ishq hi kul hayaat hai,Tiri aarazoo ka diyaa har gharee ab kisee aur manzil ki aarazoo na rahi.
तिरी यादों के गुलशन में जब के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
मोहब्बत की गली में जो भी कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
तिरी यादों के गुलशन में जब नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब थे,तिरे दर पे सजदा किया जब से अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक के जाना कि दरिया-ए-इश्क़ की हद कोई नहीं,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।

तिरी यादों के गुलशन में जब भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरी ख़ामोशी में छुपा प्यार देखा तो हर इक अश्क सितारा बन गया।
तिरी यादों के गुलशन में जब में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,मोहब्बत के पावन सफ़र में क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,ज़माने की रस्मों को हमने भुला क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा सदा तिरा ही दामन थामे रखा।

हज़ार बार तिरा नाम लब पे भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
Hazaar baar tira naam lab pe bhi qadam rakhaa to har gham khaar banake bikhar gaya,Tiri justajoo mein jo din raat pe wo kabhee pheekaa na paraa umr bhar.
नज़र नज़र में समाई है जब प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,तिरी चाहत का नशा रूह में जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे भी क़दम रखा तो हर ग़म ख़ार बनके बिखर गया,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।

क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन अमर हो गया ज़माने की मौत उसे छू न सकी,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह सुकून पाया वो सल्तनत के तख़्त पे भी न था।
दिल के वीराने में बस एक यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।
दर्द जब हद से गुज़रा तो पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ मगर साँसों का सफ़र जारी रहा।

उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,दर्द का दरिया पार करना था नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
Umr bhar ka safar aur haasila-e-gham manzil door thi muqaddar ne saath na diyaa,Dard ka dariya paar karanaa tha nahi hotaa har mod pe begaanaapan milataa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,आँखों की नमी ने बयाँ कर तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले तक पहुँची जहाँ ख़ुदा ने सुनी हमारी फ़रियाद।
तिरे जाने के बाद ये आलम टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,ग़म-ए-फ़िराक़ का मारा हुआ दिल कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या हैं कि हमने अश्कों की बारिश में रात काटी,ग़म के तूफ़ान से बच के कहाँ तक पहुँची जहाँ ख़ुदा ने सुनी हमारी फ़रियाद।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे में सब अपने अपने घरों को चले गए।
Shaba-e-firaaq ke taare gavaahee dete magar shikavaa labon pe aane na diyaa hamane,Dil ke zakhmon ko chhupaate rahe mein sab apane apane gharon ko chale gaye.
छाले पड़े हैं पाँवों में और मगर शिकवा लबों पे आने न दिया हमने,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।
ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,तन्हाई के साए में कटी उम्र ज़माने से मगर आँखें सच कह गईं।
दामन-ए-सब्र भी छूटने लगा जाने हर बूँद में लहू-ए-जिगर शामिल था,ख़ामोश लबों की पुकार अर्श मगर लबों पे मुस्कान सजाए रखी।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वो दर्द दिया कि अपनी ही सदा से काँप उठे,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।

चलते रहना ही मुसाफ़िर का मुक़द्दर गया मंज़िलें खुद ब खुद रास्ता बनाती चली गईं,इंसानियत का फ़र्ज़ जिसने निभाया चला उसे दोनों जहाँ में इज़्ज़त नसीब हुई।
Chalate rahanaa hi musaafir ka muqaddar gaya manzilen khud ba khud raasta banaatee chalee gaeen,Insaaniyat ka farz jisane nibhaayaa chalaa use donon jahaan mein izzat naseeb hui.
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं इबारत-ए-ग़म थे जिसे कोई पढ़ न सका,दिल के ज़ख़्मों को छुपाते रहे कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के छुपी है भारी जो अर्श को भी हिला दे,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले तो वहाँ भी दर्द का गुलशन खिल उठा।
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश वास्ते तो न थे ज़माने भर को सुनाई गई,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब मगर लबों पे मुस्कान सजाए रखी।
सफ़र तमाम हुआ और हम नहीं टूटी आस बची जो बुझने के क़रीब थी,आँसू जो गिरे मिट्टी में मिले क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।

चलते रहना ही मुसाफ़िर का मुक़द्दर गया मंज़िलें खुद ब खुद रास्ता बनाती चली गईं,सच्ची लगन से जो मंज़िल की काँटे दोनों हैं काँटों पे चलके ही मंज़िल मिलती है।
Chalate rahanaa hi musaafir ka muqaddar gaya manzilen khud ba khud raasta banaatee chalee gaeen,Sachchee lagan se jo manzil ki kaante donon hain kaanton pe chalake hi manzil milatee hai.
कोई पुकार न थी बस ख़ामोश यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,आँखों की नमी ने बयाँ कर नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
किसको सुनाएँ अपने दिल का हाल साया था जो दर्द की शिद्दत बढ़ा रहा था,रात की स्याही में घुला दर्द कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी क़दम रखा तो चारों तरफ़ काँटे ही मिले।
ख़्वाबों के महल सब रेज़ा रेज़ा लगीं तो सब्र का दामन थाम लिया हमने,आह जो सीने से निकली वो तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।

ज़िंदगी का हर लम्हा इक नया मोड़ पे जो साबित क़दम रहा वही सुरख़रू हुआ,ज़िंदगी का कारवाँ चलता ही रहता नहीं किसी के दर्द को बाँटना ही असल हयात है।
Zindagi ka har lamhaa ik naya mod pe jo saabit qadam raha vahee surakharoo hua,Zindagi ka kaaravaan chalataa hi rahataa nahi kisee ke dard ko baantanaa hi asal hayaat hai.
अकेलेपन की धूप में जब साया रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ दिया वो दर्द जो लफ़्ज़ों में न समा सका।
ख़्वाजा मीर दर्द (Mir Dard) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
ख़्वाजा मीर दर्द उर्दू शायरी के चार बुनियादी सुतूनों में से एक हैं, जिन्होंने जीवन भर सूफ़ी साधना, ईश्वर-प्रेम और आध्यात्मिक शांति की शायरी की।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
ख़्वाजा मीर दर्द ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Delhi Classical Era (1721–1785) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, ख़्वाजा मीर दर्द की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को ख़्वाजा मीर दर्द ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
ख़्वाजा मीर दर्द की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, ख़्वाजा मीर दर्द हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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ख़्वाजा मीर दर्द के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
ख़्वाजा मीर दर्द के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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ख़्वाजा मीर दर्द कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
ख़्वाजा मीर दर्द (1721–1785) Urdu/Sufi साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
ख़्वाजा मीर दर्द की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
ख़्वाजा मीर दर्द की रचनाओं के केंद्र में वहदत-उल-वुजूद व ईश्वरीय एकता, रूहानी इश्क़ और विनम्रता, दुनिया की क्षणभंगुरता, संगीत और सूफ़ी समा, आंतरिक शुद्धि और सब्र जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
ख़्वाजा मीर दर्द की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
ख़्वाजा मीर दर्द की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
ख़्वाजा मीर दर्द का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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ख़्वाजा मीर दर्द का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
ख़्वाजा मीर दर्द की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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