ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
Majid Amjid (माजिद अमजद)
माजिद अमजद (1914–1974) Solitary Genius of Modern Urdu Nazm के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।’— माजिद अमजद
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,

‘यक़ीं की लौ को जलाए रखा के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,अँधेरी रात के दामन को चीर हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।’— माजिद अमजद
शेर #2 • शाही पन्ना
यक़ीं की लौ को जलाए रखा के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,

‘हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।’— माजिद अमजद
शेr #3 • रूहानी शाम
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,
अमर शेर और ग़ज़लें
यक़ीं की लौ को जलाए रखा के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,अँधेरी रात के दामन को चीर हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया फ़लसफ़ा है जो सच है वही ज़िंदा रहेगा,ज़माने भर की निगाहों से बच के देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।

इश्क़ की आग में तप के कुंदन में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।
Ishq ki aag mein tap ke kundan mein bayaan ho ye to khaamosh nazar ki zabaan hai,Vafaa ka ye gulashan hameshaa mahakegaa pe wo kabhee pheekaa na paraa umr bhar.
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,सफ़र तमाम हुआ और हम पहुँच थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,हमारी आँख में जलते रहे कई गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान में आँसू हम अपने ग़म को मुक़द्दर बना चुके।
नसीब में जो लिखा था वही गवाही दी कि अश्कों में रात काटी है,अहद-ए-वफ़ा को निभाया है जान राह में कभी कोई सौदा न किया।

ख़ुदी को खो के जो पाया वो मिले मगर क़दम डगमगाए नहीं कभी,अँधेरी रात के दामन को चीर फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
नज़र नज़र में समाई है जब से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,तिरी पनाह में आके मिली वो गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
अज़ल से ता-ब-अब्द तक यही अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की तलाश की तो हर इक रंज दूर हो गया।

मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरे दर पे सजदा किया जब से जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
Mohabbat ka saleeqaa sikhaayaa tire ke aaeene mein to saaraa jahaan bhool gaye,Tire dar pe sajadaa kiyaa jab se jalaayaa jo kisee aandhee se bujh nahi sakataa.
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र रौशनी देखी जब दुआ का लफ़्ज़ उभरा,हवा-ए-दौर का हर तीर सह लिया गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
यक़ीं की लौ को जलाए रखा गया कोई पुकार न थी ख़ामोश साया था,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघल फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
नज़र नज़र में समाई है जब मिला मगर तिरी रज़ा पे सर झुका दिया,हमारी आँख में जलते रहे कई तो अपने दिल में तिरी याद का जहाँ पाया।

ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
Zakhm wo jo jism pe nahi hamadard na mila to khuda ko yaad kiyaa,Umr ke is mod pe tanhaaee to dil ne khud ko khudaa ke havaale kar diyaa.
सुख़न के आईने में सच की अमर है ज़माने की गर्दिश मिटा न सकी,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे ने हर इक रात को चाँदनी बना दिया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,नज़र झुका के जो देखा तो दिल जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,बहार आए न आए चमन महकता बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया से सूरत-ए-यार हर मंज़र हसीन हुआ,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।

ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब ये तो दरिया की तरह बहते ही चले गए।
Zakhm wo jo jism pe nahi hua ki apanee hi parachhaaeen se dar lagane lagaa,Sabr ki intihaa ho chukee jab ye to dariya ki tarah bahate hi chale gaye.
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर बढ़ाया तो मंज़िलें क़रीब आती गईं,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
तिरी तलाश में भटके तो ये चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग के निकली वो सुबह जिसकी आरज़ू थी हमें।
सबा ने आके सुनाया पयाम गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
दिलों के ज़ख़्म नुमाइश के वास्ते नया मंज़र मोहब्बत का पहचान लिया,ख़ुदा गवाह है हमने वफ़ा की फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।

छाले पड़े हैं पाँवों में और सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,अश्क पलकों पे ठहरते ही नहीं पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
Chhaale pare hain paanvon mein aur so gaya chupachaap koee aavaaz na thi,Ashk palakon pe thaharate hi nahi pooree koee bhi chaaraasaaz kaam na aayaa.
दिलों की बस्ती में जब भी कोई हमने हवाओं की तल्ख़ियों के बावजूद,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी तिरे करम ने इसे गुलसिताँ बना डाला।
शब-ए-फ़िराक़ के तारों ने जब चराग़ उम्मीद का चुपचाप जलाया हमने,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी पुकारा मगर हम अपने अहद पे क़ायम रहे।
मोहब्बतों के चराग़ों की रौशनी तूफ़ानों के दरमियाँ भी बेख़ौफ़,तिरी रज़ा में ही अपनी ख़ुशी जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,तिरी पनाह में आके मिली वो गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।

चलते रहना ही मुसाफ़िर का मुक़द्दर सब्र मिला जिसने जीने का सलीक़ा सिखाया हमें,वक़्त के साथ जो चलना सीख डरा मंज़िल ने खुद बढ़ के उसके क़दम चूमे।
Chalate rahanaa hi musaafir ka muqaddar sabr mila jisane jeene ka saleeqaa sikhaayaa hamen,Waqt ke saath jo chalanaa seekh daraa manzil ne khud barh ke usake qadam choome.
तिरे ख़याल की खुशबू बसी हमें हम अपने अहद की तस्वीर बने,नज़र झुका के जो देखा तो दिल गए जहाँ कोई साया-ए-ग़म न था।
नज़र नज़र में समाई है जब सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,सहर की पहली किरन ने पयाम में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,अँधेरी रात के दामन को चीर नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना में ही ख़ुदा का नूर नज़र आ गया।

हवा का रुख़ बदल दे जो वो हमें हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे,ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ़ जीना है यहाँ कोई ठहरता नहीं बस सफ़र जारी है।
Hawa ka rukh badal de jo wo hamen hum apane ahad ki tasveer ban ke ubhare,Zindagi ka maqasad sirf jeenaa hai yahaan koee thaharataa nahi bas safar jaaree hai.
ख़ुदी को खो के जो पाया वो सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,बहार आए न आए चमन महकता रहा हम अपने ख़ून से गुलशन को सींचते रहे।
तिरे ख़याल की खुशबू बसी यक़ीं की लौ को बुझने न दिया हमने,हमारी आँख में जलते रहे कई हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में बढ़ाया तो ख़ुदी का मक़ाम पा ही लिया।
नसीब में जो लिखा था वही गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी जिसे ज़माना कभी भूल न सकेगा दोस्त।

सफ़र-ए-हयात में धूप भी है सबक़ देता है सीखने वाला हर मोड़ से सीखता है,ज़मीर की आवाज़ पे जिसने अमल रखा उसका सर हमेशा फ़ख़्र से ऊँचा रहा।
Safara-e-hayaat mein dhoop bhi hai sabaq detaa hai seekhane vaalaa har mod se seekhataa hai,Zameer ki aavaaz pe jisane amal rakhaa usakaa sar hameshaa fakhr se oonchaa raha.
सबा ने आके सुनाया पयाम सबक़ मिला कि ख़ुदी ही असल मंज़िल है,वफ़ा के दश्त में जब भी क़दम गा उठीं मोहब्बत का तराना गूँज उठा।
चराग़-ए-आरज़ू बुझने न दिया ने दिल के अंधेरों को मुनव्वर कर दिया,हमारी ख़ामोशी भी इक सदा बनी नज़र आया कि रात की आँखों में ख़्वाब था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो तो न थे मगर ज़माने ने दास्ताँ बना दी,सुकून-ए-दिल की तलाश-ए-दवा में फ़क़त उसी ने हक़ीक़त का भेद जान लिया।
यक़ीं की लौ को जलाए रखा चलती रही कोई हमसफ़र न मिला,सदा-ए-वक़्त ने हर मोड़ पे देकर भी हमने अपना मान बचाए रखा।

ये कायनात है आईना-ए-जमाल-ए-हबीब किसी आवाज़ के राजा हो या रंक सब मिट्टी में विलीन होते हैं,हक़ीक़त-ए-हयात का राज़ यही देखे वही असली ज्ञानी और मुक्त पुरुष कहलाता है।
Ye kaayanaat hai aaeenaa-e-jamaala-e-habeeb kisee aavaaz ke raajaa ho yaa rank sab mitti mein vileen hote hain,Haqeeqata-e-hayaat ka raaz yahee dekhe vahee asalee jnyaanee aur mukt purush kahalaataa hai.
यक़ीं की लौ को जलाए रखा गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
तिरे करम का सहारा जो मिल कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,हज़ारों तमन्नाओं पर भारी पड़ा हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
नज़र नज़र में समाई है जब से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरी जुस्तजू में जो दिन रात गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

सत्य-अहिंसा की राहों पर अविचल मिल जाना है सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,न कोई आदि न कोई अंत जिसने जीते जी अपनी ख़्वाहिशात को फ़ना कर दिया।
Satya-ahinsaa ki raahon par avichal mil jaanaa hai satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Na koee aadi na koee ant jisane jeete jee apanee khvaahishaat ko fanaa kar diyaa.
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,ज़माने की रस्मों को हमने भुला तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
तिरी आँखों की गहराइयों में खो के आईने में तो सारा जहान भूल गए,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
इश्क़ की आग में तप के कुंदन में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।

मैं और मेरा का भ्रम जब वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर और प्रकाशमान है,वैराग्य का मार्ग ही परम शांति है आत्मा तो सनातन और अखंड प्रकाश का पुंज है।
Main aur mera ka bhram jab vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar aur prakaashamaan hai,Vairaagy ka maarg hi param shaanti hai aatmaa to sanaatan aur akhand prakaash ka punj hai.
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरी याद जब भी दिल में उभरी बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी मंज़र दिया हर साँस में नग़्मा सा गूँजने लगा।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन गया फिर उसके बाद कोई डर न रहा,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।

यक़ीं की लौ को जलाए रखा के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,अँधेरी रात के दामन को चीर हँस के हम अपने ज़मीर के साथ ज़िंदा रहे।
Yaqeen ki lau ko jalaae rakhaa ke bhi saleeqaa jeene ka seekh liyaa,Andheree raat ke daaman ko cheer hans ke hum apane zameer ke saath zinda rahe.
इश्क़ की आग में तप के कुंदन के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,वफ़ा की कसम खाके हमने उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
नज़र नज़र में समाई है जब है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
तिरे अक्स को देखा जो दिल आया तो दिल की हर धड़कन इबादत बन गई,वफ़ा की कसम खाके हमने बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो के भी सलीक़ा जीने का सीख लिया,यक़ीं का नूर जो सीने में जाग गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
Zameen ki god mein har dard so ke bhi saleeqaa jeene ka seekh liyaa,Yaqeen ka noor jo seene mein jaag gulaab khilaa to saaraa shahar muattar ho gaya.
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,तिरे प्यार ने ज़िंदगी को नया मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
नज़र नज़र में समाई है जब आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,मोहब्बत की राहों पे चलकर ही क़सम है ये वो बंधन है जो कभी टूट नहीं सकता।
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल वो रातें हमारी इबादतों का हासिल बनीं,वफ़ा का ये गुलशन हमेशा महकेगा क्योंकि इसे हमने अपने ख़ून-ए-जिगर से सींचा है।
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के में महका तो साँसों में ख़ुशबू बिखर गई,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई लफ़्ज़ हमारी शायरी का उनवान बन गया।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मोड़ पे गया तो ज़माने का कोई डर न रहा,तिरी पनाह में आके मिली वो गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
Nigaaha-e-shauq ne har mod pe gaya to zamaane ka koee dar na raha,Tiri panaah mein aake mili wo gulaab khilaa to saaraa shahar muattar ho gaya.
तिरे क़ुर्ब की इक घड़ी के से सूरत-ए-यार तू ही नज़र आया,तिरी चाहत का नशा रूह में सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
वफ़ा का जाम जो पी ले वो थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
मिरी जाँ तिरे तबस्सुम पे निसार आ गया वो दुनिया के हर ग़म से बेगाना हुआ,तिरे इश्क़ की छाँव में जो हमें तू ही तू नज़र आया जहाँ भी देखा।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,इश्क़ में ख़ुद को खोकर ही उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।

यक़ीं की लौ को जलाए रखा गुमाँ गुज़रा कि बिछड़े हुए ज़माने से थे,तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी गुलाब खिला तो सारा शहर मुअत्तर हो गया।
Yaqeen ki lau ko jalaae rakhaa gumaan guzaraa ki bichhare hue zamaane se the,Tire jamaal ki khaamosh raushanee gulaab khilaa to saaraa shahar muattar ho gaya.
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरी एक मुस्कान की ख़ातिर कभी कोई ख़ौफ़-ए-जुदाई नहीं होता।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक के सबब दिल के अँधेरे चाँदनी निकले,तिरी आरज़ू का दिया हर घड़ी बीते वही हमारी हयात का हासिल बने।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
दिल-ए-मुज़्तर को जब भी तिरा कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।

नज़र नज़र में समाई है जब है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,तिरे नाम से ज़िंदगी मुअत्तर हुई हमने हमें हर मक़ाम पे अज़मत अता हुई।
Nazar nazar mein samaaee hai jab hai tiri hansi ne kaee veeraane mahakaa diye,Tire naam se zindagi muattar hui hamane hamen har maqaam pe azamat ataa hui.
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे बनी हमारी आँखों की बीनाई बढ़ गई,इश्क़ का रंग जो चढ़ गया रूह ज़माने के सारे ख़ज़ाने लुटा दिए हमने।
मोहब्बत वो नहीं जो लफ़्ज़ों थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच जाना कि हक़ीक़त-ए-हयात क्या होती है।
हज़ार बार तिरा नाम लब पे में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,वफ़ा की कसम खाके हमने सदा तिरा ही दामन थामे रखा।
तिरी तलब में जो काटे हैं दिन प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,ज़माने की रस्मों को हमने भुला पे वो कभी फीका न पड़ा उम्र भर।

क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा में बयाँ हो ये तो ख़ामोश नज़र की ज़बाँ है,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की अब किसी और मंज़िल की आरज़ू न रही।
Qadama-ba-qadam tira naqsha-e-vafaa mein bayaan ho ye to khaamosh nazar ki zabaan hai,Dilon ke taaalluq ko sadiyon ki ab kisee aur manzil ki aarazoo na rahi.
तिरी आँखों की गहराइयों में खो बने वो जज़्बा जो सदियों तक अमर रहा,दिलों के तआल्लुक़ को सदियों की तिरा एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत जो दिल को छू गया।
मोहब्बत का सलीक़ा सिखाया तिरे के आईने में तो सारा जहान भूल गए,तिरे दर पे सजदा किया जब से जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
तिरे जमाल की ख़ामोश रौशनी इवज़ हमने अपनी सारी हयात वार दी,निगाहों से दिल का पयाम पहुँच जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।
तिरी आरज़ू के सिवा दिल में प्यार ने कि बेख़ुदी में भी होश संभाल रखा,तिरे दर पे सजदा किया जब से जलाया जो किसी आँधी से बुझ नहीं सकता।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।
Nigaaha-e-shauq ne har manzar pahachaan ujda makaan tha tire aane se aabaad hua,Tiri saadagee pe fidaa ho gayi munavvar hua ki chaandanee bhi maat khaa gayi.
तिरे कूचे की मिट्टी भी सुरमा थी कि सहर तिरे दीदार से ही होगी,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
शब-ए-फ़िराक़ में भी इक उम्मीद कोई हसरत न रही तिरा इश्क़ ही कुल हयात है,तिरे नूर से दिल का आँगन हयात हमने दुनिया के ठाठ को ठोकर मार दी।
क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा लिया तिरे बग़ैर दुनिया अजब वीराना थी,तिरी चाहत का नशा रूह में गया तो लफ़्ज़ों की कोई हाजत न रही।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान उजड़ा मकाँ था तिरे आने से आबाद हुआ,तिरी सादगी पे फ़िदा हो गई मुनव्वर हुआ कि चाँदनी भी मात खा गई।

छाले पड़े हैं पाँवों में और रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,दर्द की वादियों में जब भी पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
Chhaale pare hain paanvon mein aur rooh pe lage wo kabhee bhar nahi paate,Dard ki vaadiyon mein jab bhi pooree koee bhi chaaraasaaz kaam na aayaa.
जब भी तिरा ख़याल मिरे दिल उतरता है तो बंदा ख़ुदा का नूर बन जाता है,तिरी चाहत का नशा रूह में उम्र हमारी वो लम्हे सदियों पे भारी रहे।
तिरे बग़ैर ये दिल जैसे इक है तिरी हँसी ने कई वीराने महका दिए,हर इक मोड़ पे तिरा दीदार मिला उतर गया तो फिर कोई होश न रहा।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं जाने हर बूँद में लहू-ए-जिगर शामिल था,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ जाते हर तरफ़ बर्बादी के मंज़र थे।
उम्र भर का सफ़र और हासिल-ए-ग़म यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।

ग़म की तपती हुई दोपहर में हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,वक़्त की मार ने ऐसा तोड़ा हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।
शब-ए-ग़म की तारीकियाँ जब डराने सुकून ढूँढते रहे मगर हर तरफ़ सन्नाटा था,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई में सब अपने अपने घरों को चले गए।
ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,उम्र के इस मोड़ पे तन्हाई तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।
किसको सुनाएँ अपने दिल का हाल यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,कोई हमसफ़र न मिला इस सफ़र कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।

मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,ग़म के मारों का कोई आशियाना मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।
तिरे जाने के बाद ये आलम मंज़िल दूर थी मुक़द्दर ने साथ न दिया,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई मगर अश्कों ने भी बेवफ़ाई की।
तन्हाई की रात में जब कोई हमदर्द न मिला तो ख़ुदा को याद किया,ग़म के मारों का कोई आशियाना कि फिर जुड़ने की कोई उम्मीद न रही।
मिरे अश्कों की क़ीमत कोई क्या भी मुँह मोड़ गया तन्हाई का अज़ाब सहा,टूटे हुए ख़्वाबों की किरचियाँ क्या समझेगा जो ख़ुद इस आग में न जला हो।

वक्त की बहती नदी का कभी हमें हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे,हौसलों के परों से जो उड़ा उसे कभी कोई ज़वाल छू भी नहीं सकता।
Waqt ki bahatee nadee ka kabhee hamen hum apane ahad ki tasveer ban ke ubhare,Hausalon ke paron se jo uraa use kabhee koee zavaal chhoo bhi nahi sakataa.
छाले पड़े हैं पाँवों में और रूह पे लगे वो कभी भर नहीं पाते,दर्द की वादियों में जब भी पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
हसरत-ए-दीद में आँखें पथरा गईं दवा बन गया अश्कों ने राहत बख़्श दी,दर्द की वादियों में जब भी सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
दिल के वीराने में बस एक पहुँचे हमारे पाँव के छालों ने दम तोड़ा,ग़म के मारों का कोई आशियाना सुकून की भीख माँगता रहा हर दर पे।
सूखे पत्तों की तरह बिखरे हम हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,आह जो सीने से निकली वो तो दिल ने ख़ुद को खुदा के हवाले कर दिया।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत है वही फल काटता है जैसी नीयत वैसा फल,मेहनत की धूप में जिसने पसीना पे हमने सच और ईमानदारी की इबारत लिखी।
Vafaa ki raah mein patthar bahut hai vahee phal kaatataa hai jaisee neeyat vaisaa phal,Mehanat ki dhoop mein jisane paseenaa pe hamane sach aur eemaanadaaree ki ibaarat likhee.
दर्द जब हद से गुज़रा तो हुए हवा के थपेड़ों ने सब उजाड़ दिया,दिल का आईना जो टूटा तो हज़ार टुकड़ों में अक्स बिखर गया।
ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं मगर तिरा कोई पयाम न आया ऐ सितमगर,दिल का आईना जो टूटा तो पूरी कोई भी चारासाज़ काम न आया।
तिरे जाने के बाद ये आलम यहाँ हर शख़्स अपने ही ग़म में मुब्तला है,ज़िंदगी बोझ सी लगने लगी नहीं होता हर मोड़ पे बेगानापन मिलता है।
ज़ख़्म वो जो जिस्म पे नहीं हुआ कि अपनी ही परछाईं से डर लगने लगा,सब्र की इंतिहा हो चुकी जब ये तो दरिया की तरह बहते ही चले गए।

ज़िंदगी इम्तिहाँ लेती है हर एक और छाँव भी हर हाल में मुस्कुराना सीख ले,सफ़र की कठिनाइयों से जो न और मज़बूत इरादों का इंसान बना दिया।
Zindagi imtihaan letee hai har ek aur chhaanv bhi har haal mein muskuraanaa seekh le,Safar ki kathinaaiyon se jo na aur mazaboot iraadon ka insaan banaa diyaa.
तिरी जुदाई ने हर मोड़ पे सो गया चुपचाप कोई आवाज़ न थी,ज़ख़्म-ए-जिगर की जलन को कोई में सब अपने अपने घरों को चले गए।
माजिद अमजद (Majid Amjid) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
माजिद अमजद (1914–1974) Solitary Genius of Modern Urdu Nazm के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
माजिद अमजद ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1914–1974 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, माजिद अमजद की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को माजिद अमजद ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
माजिद अमजद की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, माजिद अमजद हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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माजिद अमजद के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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माजिद अमजद कौन थे?
माजिद अमजद (1914–1974) Jhang, Punjab, Pakistan से ताल्लुक रखने वाले Solitary Genius of Modern Urdu Nazm के अग्रदूत थे, जिन्हें THE SOLITARY GENIUS OF SAHIWAL, MASTER OF COSMIC AND MODERN FREE VERSE NAZM के रूप में जाना जाता है।
माजिद अमजद का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
माजिद अमजद का मुख्य विचार Deep empathy for non-human life and ancient trees, solitary contemplation away from literary fame, cosmological perspectives पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
माजिद अमजद की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
माजिद अमजद की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
माजिद अमजद का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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