साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Mahjoor (ग़ुलाम अहमद महज़ूर)
غلام احمد مہجور
ग़ुलाम अहमद महज़ूर 'शायर-ए-कश्मीर' के नाम से विख्यात हैं, जिन्हें रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कश्मीरी साहित्य का पुनर्जागरण-दूत माना था।

साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
— ग़ुलाम अहमद महज़ूर • MODERN KASHMIRI AWAKENING (1887–1952)

साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
— ग़ुलाम अहमद महज़ूर • MODERN KASHMIRI AWAKENING (1887–1952)
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‘साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।’— ग़ुलाम अहमद महज़ूर
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
साधु-संगत की छाया में जो स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,

‘सत्य के पावन पथ पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सदाचार की पावन वेदी पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।’— ग़ुलाम अहमद महज़ूर
शेर #2 • शाही पन्ना
सत्य के पावन पथ पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,

‘माटी का यह देह बना है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— ग़ुलाम अहमद महज़ूर
शेr #3 • रूहानी शाम
माटी का यह देह बना है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,
अमर शेर और ग़ज़लें
सत्य के पावन पथ पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सदाचार की पावन वेदी पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
माटी का यह देह बना है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
माटी का यह देह बना है अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,हरि की कृपा का पावन साया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

नैनन आगे तू ही तू नाचे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम के इस पावन तीरथ में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Nainan aage too hi too naache se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Prem ke is paavan teerath mein aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
सत्य का दीप जब जलता है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,धैर्य का दामन जिसने थामे परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मोह-निशा से जो जन जागा मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
संतन की संगति में आकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,वाणी में जिसके मिठास घुली उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
धरती की छाती पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हृदय में जिसके दया बसी है अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Man mandir mein basaa jo moorati to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Jisane prem ka marm samajh apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रेम की डोर में बंध गया जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
नदिया की धारा बहती जावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्य-अहिंसा की राहों पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,प्रेम की डोर में बंध गया जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

तेरे दीदार की एक झलक ने उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अंतर में जब प्रेम समाया अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Tere deedaar ki ek jhalak ne us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Antar mein jab prem samaayaa ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अमर नाम जग में उसी का रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,मन के मैल को जिसने धोया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,माटी का चोला पाकर जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हृदय में जिसके दया बसी है उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

जिसके दिल पर बीत रही रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दिल के फफोलों को देखकर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Jisake dil par beet rahi ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Dil ke phapholon ko dekhakar jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
माटी का यह देह बना है सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,अहंकार का त्याग किया जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

तन्हाई के अँधियारे में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Tanhaaee ke andhiyaare mein soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Dard ki is ekaant gufaa mein chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,भवसागर की लहरों से जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
साधु-संगत की छाया में जो भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मन के मैल को जिसने धोया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,भवसागर की लहरों से जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

आँखों में जो नमी है वो जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अकेलेपन की इस राह पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Aankhon mein jo namee hai wo jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Akelepan ki is raah par tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,अमर नाम जग में उसी का उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

हौसलों के तरकश में जब जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,त्याग और सेवा की भावना से बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Hausalon ke tarakash mein jab jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
माटी का यह देह बना है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,धैर्य का दामन जिसने थामे अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,जिसने समय की चाल पहचानी चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Jisane samay ki chaal pahachaanee chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अमर नाम जग में उसी का के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

समय का पहिया चलता जाए जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,मेहनत और लगन से जिसने चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Mehanat aur lagan se jisane chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
साधु-संगत की छाया में जो बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मोह-निशा से जो जन जागा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हृदय में जिसके दया बसी है अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
वाणी वही जो घाव भरे और घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

काल का पहिया घूमता है एक वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,अमृत स्वरूप उस परमात्मा में जो पी लेता है उसे संसार के समस्त सुख तुच्छ और क्षणभंगुर लगने लगते हैं।
Kaal ka pahiyaa ghoomataa hai ek vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar hai aur sadaiv prakaashamaan rahegee,Amrit svaroop us paramaatmaa mein jo pee letaa hai use sansaar ke samast sukh tuchchh aur kshanabhangur lagane lagate hain.
दीन-दुखी का आसरा बनकर का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हरि की कृपा का पावन साया उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम नगर का वासी बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम के रंग में रंग कर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम सुधा का रस जो चखा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

सत्य-अहिंसा की राहों पर ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,अमृत स्वरूप उस परमात्मा में तो सारे बंधन टूट गए और वह परमब्रह्म में लीन होकर एक रूप हो गया।
Satya-ahinsaa ki raahon par jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Amrit svaroop us paramaatmaa mein to saare bandhan toot gaye aur woh paramabrahm mein leen hokar ek roop ho gaya.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम बिना सब सूना जग में हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम के इस पावन तीरथ में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

सत्य का दीप जब जलता कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,अमृत स्वरूप उस परमात्मा में हुआ उसे तीनों लोकों का कोई भी प्रलोभन अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता।
Saty ka deep jab jalataa kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Amrit svaroop us paramaatmaa mein hua use teenon lokon ka koee bhi pralobhan apanee or aakarshit nahi kar sakataa.
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,साँसों के हर तार पे जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,मन मंदिर की पावन आरती अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

सत्य के पावन पथ पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सदाचार की पावन वेदी पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Saty ke paavan path par jisane maatee mein mil jaanaa lobh moh mad tyaag ke nij svaroop cheenh le,Sadaachaar ki paavan vedee par usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी याद का पावन साया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,विरह की रात जब ढलने लगी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,अमर प्रेम की अमर कहानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

दीन-दुखी का आसरा बनकर निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,माटी का चोला पाकर जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Maatee ka cholaa paakar jisane rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन धारा में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
मन की वीणा बज उठी जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम की चाहत में जिसने संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम रंग में जो रंग गया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की मस्ती में जो झूमा युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने प्रेम का मर्म समझ अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,मन मंदिर की पावन आरती उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम की चाहत में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,साँसों के हर तार पे जिसका नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हरि की कृपा का पावन साया उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Hari ki kripaa ka paavan saaya use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने प्रेम का मर्म समझ कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम का दीपक अंतर में जो जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

प्रेम रंग में जो रंग गया सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Prem rang mein jo rang gaya sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Sachche aashiq ki pahachaan yahee ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम के चरणों में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम के रंग में रंग कर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन घाटी में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने प्रेम का मर्म समझ कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Roma-rom mein ram gaya preetam dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Jisane prem ka marm samajh ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
नैन मिले जब नैनन से तब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के रंग में रंग कर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अंतर में जब प्रेम समाया अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
नैनों के दर्पण में बसा जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रियतम के रंग में रंग कर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Sachche prem ki yahee nishaanee ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,हृदय के पावन सिंहासन पर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,अंतर में जब प्रेम समाया लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे मिलन की आस में बीते से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

ग़म की तपती दुपहरी में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,अकेलेपन की इस राह पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Gham ki tapatee dupaharee mein bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Akelepan ki is raah par tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
प्रियतम की याद में जो नैना बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे प्रेम की यही निशानी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,जिसने प्रेम का मर्म समझ जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
दिल का आईना जब टूटा यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,अकेलेपन की इस राह पर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
सपनों के महल जब टूटे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,इस दर्द भरे दिल की सदा ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Toote dil ki khaamoshi mein jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Is dard bhare dil ki sadaa zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
जिसके दिल पर बीत रही पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब कोई चारासाज़ न मिला अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
टूटी नाव भँवर में फँसी बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,दर्द का यह गहरा सागर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
जिसके दिल पर बीत रही रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दिल के फफोलों को देखकर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
अकेलेपन की धूप जब साए चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब सबने मुँह फेर लिया तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Zakhm wo nahi jo jism aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Jeevan ke is kathin mod par tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
अकेलेपन की धूप जब साए पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
वक़्त की आँधी ने तोड़े पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
अकेलेपन की धूप जब साए हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब धैर्य की सीमा टूट गई सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
टूटे दिल की ख़ामोशी में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।

धरती की छाती पर जिसने अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,हृदय में जिसके दया और करुणा का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
ग़म की तपती दुपहरी में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,अकेलेपन की इस राह पर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब सबने मुँह फेर लिया तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
दिल का आईना जब टूटा को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
दर्द की रात में जब कोई सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म की इस गहरी रात में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,विपदाओं से जो कभी न डरा उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Vipadaaon se jo kabhee na daraa usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
तन्हाई के अँधियारे में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,टूटे दिल की इस वीणा से केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
कोई न अपना इस जग में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,टूटे दिल की इस वीणा से केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
जिसके दिल पर बीत रही और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब कोई सहारा न बचा ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
तन्हाई के अँधियारे में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,त्याग और सेवा की भावना से बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
दर्द की रात में जब कोई पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब सबने मुँह फेर लिया अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
ग़ुलाम अहमद महज़ूर (Mahjoor) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
ग़ुलाम अहमद महज़ूर 'शायर-ए-कश्मीर' के नाम से विख्यात हैं, जिन्हें रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कश्मीरी साहित्य का पुनर्जागरण-दूत माना था।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
ग़ुलाम अहमद महज़ूर ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Modern Kashmiri Awakening (1887–1952) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, ग़ुलाम अहमद महज़ूर की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को ग़ुलाम अहमद महज़ूर ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
ग़ुलाम अहमद महज़ूर की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, ग़ुलाम अहमद महज़ूर हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
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ग़ुलाम अहमद महज़ूर के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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ग़ुलाम अहमद महज़ूर कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
ग़ुलाम अहमद महज़ूर (1887–1952) Kashmiri/National साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
ग़ुलाम अहमद महज़ूर की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
ग़ुलाम अहमद महज़ूर की रचनाओं के केंद्र में कश्मीर का प्राकृतिक सौन्दर्य, सामाजिक जागरण व देशभक्ति, किसानों व मज़दूरों का स्वाभिमान, भाईचारा और साझी विरासत, नूतन कश्मीर का स्वप्न जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
ग़ुलाम अहमद महज़ूर की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
ग़ुलाम अहमद महज़ूर की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
ग़ुलाम अहमद महज़ूर का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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ग़ुलाम अहमद महज़ूर की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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