सतगुरु मिले तो राह दिखावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Mahatma Gandhi (महात्मा गांधी)
महात्मा गांधी (1869–1948) Rashtranayak & Father of the Nation के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— महात्मा गांधी
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,

‘अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,भवसागर की लहरों से जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।’— महात्मा गांधी
शेर #2 • शाही पन्ना
अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,

‘दुःख में सुमिरन सब कोई करै का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।’— महात्मा गांधी
शेr #3 • रूहानी शाम
दुःख में सुमिरन सब कोई करै का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,
अमर शेर और ग़ज़लें
अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,भवसागर की लहरों से जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,माटी का चोला पाकर जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

नैन मिले जब नैनन से तब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,मन मंदिर की पावन आरती उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Nain mile jab nainan se tab amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Man mandir ki paavan aaratee utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
वाणी वही जो घाव भरे और सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हृदय में जिसके दया बसी है अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

प्रेम गली अति साँकरी जामें संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Prem galee ati saankaree jaamen sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Prem nagar ka vaasee banakar liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
नदिया की धारा बहती जावे प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
वाणी वही जो घाव भरे और बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,हृदय के पावन सिंहासन पर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Nain mile jab nainan se tab priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Hriday ke paavan sinhaasan par usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
संतन की संगति में आकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सत्य का दीप जब जलता है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हृदय में जिसके दया बसी है रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

सांस-सांस में याद तुम्हारी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे हुए दिल का दर्द तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Toote hue dil ka dard tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,वाणी में जिसके मिठास घुली जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
साधु-संगत की छाया में जो सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,भवसागर की लहरों से जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

सांस-सांस में याद तुम्हारी लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,अकेलेपन की इस राह पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Akelepan ki is raah par to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
माटी का यह देह बना है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हृदय में जिसके दया बसी है उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
सत्य के पावन पथ पर जिसने अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

कोई न अपना इस जग में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब आशा की हर किरण बुझी कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Koee na apanaa is jag mein bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Jab aashaa ki har kiran bujhee koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,हरि की कृपा का पावन साया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

नदी की तरह बहते रहना चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,हृदय में जिसके दया और करुणा सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Nadee ki tarah bahate rahanaa chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
अहंकार की दीवारें जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,समय की अमूल्य बूँदों को और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Samay ki amooly boondon ko aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
वाणी वही जो घाव भरे और सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
धरती की छाती पर जिसने अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
वाणी में जो अमृत घोले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,भवसागर की लहरों से जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

गिरने में कोई हार नहीं धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जिसने परोपकार का दीप जलाया है जो दूसरों के चेहरे पे मुस्कान लाए दौलत तो हाथ का मैल है।
Girane mein koee haar nahi dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa hai jo doosaron ke chehare pe muskaan laae daulat to haath ka mail hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य-अहिंसा की राहों पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
संतन की संगति में आकर का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,भवसागर की लहरों से जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
नाम और दौलत तो माटी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सदाचार की पावन वेदी पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

सत्य-अहिंसा की राहों पर ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Satya-ahinsaa ki raahon par jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
कर्म की खेती जो जन बोवे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,शांति और संतोष का धन जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जब से नैना रूप में उलझे अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम के इस पावन तीरथ में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
बिरहा की आग में तप के कुंदन रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे प्रेम की यही निशानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

अमृत की बूँद अंतर में उसी को होता है जो समस्त वासनाओं और कामनाओं का त्याग कर देता है,परमानंद का यह अलौकिक रस जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Amrit ki boond antar mein usee ko hotaa hai jo samast vaasanaaon aur kaamanaaon ka tyaag kar detaa hai,Paramaanand ka yeh alaukik ras jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की पावन ज्योति जगाई एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम रंग में जो रंग गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम सुधा का रस जो चखा अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम बिना सब सूना जग में तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जब से नैना रूप में उलझे मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैन मिले जब नैनन से तब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,मन मंदिर की पावन आरती उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

परमसत्य का पावन दर्शन जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,परमानंद का यह अलौकिक रस तो सारे बंधन टूट गए और वह परमब्रह्म में लीन होकर एक रूप हो गया।
Paramasaty ka paavan darshan jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Paramaanand ka yeh alaukik ras to saare bandhan toot gaye aur woh paramabrahm mein leen hokar ek roop ho gaya.
प्रेम रंग में जो रंग गया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,साँसों के हर तार पे जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे मिलन की आस में बीते जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,साँसों के हर तार पे जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अमर प्रेम की अमर कहानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,भवसागर की लहरों से जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Ahankaar ki deevaaren jab antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Bhavasaagar ki laharon se jo paralok mein sang jaaegee baakee sab maayaa-moh yaheen dharaa rah jaaegaa.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम नगर का वासी बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अमर प्रेम की अमर कहानी कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम की इस पावन घाटी में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हरि की कृपा का पावन साया निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Hari ki kripaa ka paavan saaya nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जब से नैना रूप में उलझे उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे मिलन की आस में बीते पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

वाणी में जो अमृत घोले मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Vaanee mein jo amrit ghole man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Dhairy ka daaman jisane thaame nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम नगर का वासी बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह का हर इक आँसू बनकर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम सुधा का रस जो चखा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

कर्म की खेती जो जन बोवे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,शांति और संतोष का धन जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
Karm ki khetee jo jan bove svayan khete hain kinaaraa unake svaagat mein sir jhukaataa hai,Shaanti aur santosh ka dhan jo apane man mein utaaregaa woh donon jahaan mein aadar aur sammaan paaegaa.
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम नगर का वासी बनकर अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अमर प्रेम की अमर कहानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Prem ki doree baandh laee jab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Saanson ke har taar pe jisakaa ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
तेरी आँखों की झील में जो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम नगर का वासी बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम नगर का वासी बनकर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।

फासले मिट गए जब दिल से सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Phaasale mit gaye jab dil se sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Sachche aashiq ki pahachaan yahee utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,हृदय के पावन सिंहासन पर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम नगर का वासी बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

प्रियतम की याद में जो नैना सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,हृदय के पावन सिंहासन पर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Hriday ke paavan sinhaasan par liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
नैन मिले जब नैनन से तब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन घाटी में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम नगर का वासी बनकर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
तेरी याद का पावन साया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के रंग में रंग कर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रियतम की याद में जो नैना सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,हृदय के पावन सिंहासन पर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

दिल का आईना जब टूटा लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
Dil ka aaina jab tootaa lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Jeevan ke is kathin mod par paar karanaa hi paregaa kinaare par baith kar rone se koee paar nahi hotaa.
प्रियतम की याद में जो नैना अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम नगर का वासी बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम का अनुराग ही जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
जिसके दिल पर बीत रही भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
भीतर-भीतर घुटता जाए पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

आँखों के आँसू जब सूखे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म के मारों की बस्ती में पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Aankhon ke aansoo jab sookhe patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Gham ke maaron ki bastee mein pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
दर्द की रात में जब कोई सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दिल के फफोलों को देखकर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
वक़्त की आँधी ने तोड़े सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द का यह गहरा सागर तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
सांस-सांस में याद तुम्हारी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे हुए दिल का दर्द तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
अकेलेपन की धूप जब साए सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई सहारा न बचा अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।

जिसके दिल पर बीत रही हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस लंबी यात्रा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Jisake dil par beet rahi haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Gham ki is lanbee yaatraa mein akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
ग़म का मारा पंछी जैसे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
आँखों में जो नमी है वो बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,टूटे हुए दिल का दर्द सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
आँखों के आँसू जब सूखे यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब आशा की हर किरण बुझी तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
उम्र भर का सफ़र और पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दर्द की भट्टी में तपकर ही धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

मन मंदिर में जो दीप तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,त्याग और सेवा की भावना से जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Man mandir mein jo deep tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
दिल का आईना जब टूटा लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,जब धैर्य की सीमा टूट गई सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म के मारों की बस्ती में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
वक़्त की आँधी ने तोड़े लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब सबने मुँह फेर लिया मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

ठोकर खाकर जो संभलता कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,कर्म की खेती में जो पसीना और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Thokar khaakar jo sanbhalataa kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Karm ki khetee mein jo paseenaa aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
दर्द की रात में जब कोई दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,आँसुओं की इस भाषा को अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,टूटे दिल की इस वीणा से केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
भीतर-भीतर घुटता जाए यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म की इस गहरी रात में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
सांस-सांस में याद तुम्हारी लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,अकेलेपन की इस राह पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जीवन का असली आनंद वही जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jeevan ka asalee aanand vahee jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब कोई चारासाज़ न मिला तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
महात्मा गांधी (1869–1948) Rashtranayak & Father of the Nation के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
महात्मा गांधी ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1869–1948 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, महात्मा गांधी की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को महात्मा गांधी ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
महात्मा गांधी की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, महात्मा गांधी हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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महात्मा गांधी कौन थे?
महात्मा गांधी (1869–1948) Porbandar, Gujarat, India से ताल्लुक रखने वाले Rashtranayak & Father of the Nation के अग्रदूत थे, जिन्हें FATHER OF THE NATION, APOSTLE OF NON-VIOLENCE (AHIMSA), BAPU के रूप में जाना जाता है।
महात्मा गांधी का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
महात्मा गांधी का मुख्य विचार Satyagraha (truth-force), Ahimsa (non-violence), Sarvodaya (welfare of all), Swadeshi, moral purity in politics पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
महात्मा गांधी की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
महात्मा गांधी की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
महात्मा गांधी का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
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