मन के निर्मल दर्पण में जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Lal Bahadur Shastri (लाल बहादुर शास्त्री)
लाल बहादुर शास्त्री (1904–1966) Statesman of Simplicity & Integrity के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘मन के निर्मल दर्पण में जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।’— लाल बहादुर शास्त्री
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
मन के निर्मल दर्पण में जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,

‘ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हृदय में जिसके दया बसी है अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— लाल बहादुर शास्त्री
शेर #2 • शाही पन्ना
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,

‘वाणी में जो अमृत घोले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,साधु पुरुष की वाणी कभी वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।’— लाल बहादुर शास्त्री
शेr #3 • रूहानी शाम
वाणी में जो अमृत घोले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,
अमर शेर और ग़ज़लें
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हृदय में जिसके दया बसी है अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
वाणी में जो अमृत घोले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,साधु पुरुष की वाणी कभी वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

तेरी याद का पावन साया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Teri yaad ka paavan saaya tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Sachche aashiq ki pahachaan yahee jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हरि की कृपा का पावन साया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,शांति और संतोष का धन जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
वाणी वही जो घाव भरे और अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन मंदिर में जो दीप जले स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

नैन मिले जब नैनन से तब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Nain mile jab nainan se tab jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Prem ka deepak antar mein jo jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
माटी का यह देह बना है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,शांति और संतोष का धन जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
नाम और दौलत तो माटी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सदाचार की पावन वेदी पर परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

मन की वीणा बज उठी जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Man ki veenaa baj uthee jab sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Priyatam ka anuraag hi jisakaa jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सदाचार की पावन वेदी पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्य का दीप जब जलता है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मन के मैल को जिसने धोया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
दीन-दुखी का आसरा बनकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,वाणी में जिसके मिठास घुली रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

टूटी नाव भँवर में फँसी चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,अकेलेपन की इस राह पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Tootee naav bhanvar mein phansee cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Akelepan ki is raah par tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,वाणी में जिसके मिठास घुली परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अमर नाम जग में उसी का मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सत्य का दीप जब जलता है सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

टूटी नाव भँवर में फँसी हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Tootee naav bhanvar mein phansee hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Jeevan ke is kathin mod par tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
धरती की छाती पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
वाणी वही जो घाव भरे और अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मन के मैल को जिसने धोया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

विरह की अगन में जलता मन जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म के मारों की बस्ती में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Virah ki agan mein jalataa man jab koee raah na soojhe tab toote dil se nikalee dua hi raasta dikhaatee hai,Gham ke maaron ki bastee mein tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
धरती की छाती पर जिसने सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हृदय में जिसके दया बसी है उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

सच्ची लगन से जो जन अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,जो गिरतों को उठाना जानता है उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Sachchee lagan se jo jan agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
कर्म की खेती जो जन बोवे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,नेकी की राह पे जो जन अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मन के मैल को जिसने धोया अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,जीवन का यह पावन सूत्र जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सदाचार के पावन नियमों पर पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Sadaachaar ke paavan niyamon par paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
अहंकार की दीवारें जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सदाचार की पावन वेदी पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
मन मंदिर में जो दीप जले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,अहंकार का त्याग किया जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

दुःख में सुमिरन सब कोई जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Duhkh mein sumiran sab koee jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Karmanyataa ka paavan vrat lekar manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
धरती की छाती पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,धैर्य का दामन जिसने थामे परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,माटी का चोला पाकर जिसने जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
मन मंदिर में जो दीप जले सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

जो बाहर ढूँढता रहा वो एक वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,जब काल की सीमाएँ समाप्त हुईं जिसने स्नान किया उसने संसार के समस्त दुःखों से मुक्ति पा ली।
Jo baahar dhoondhataa raha wo ek vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar hai aur sadaiv prakaashamaan rahegee,Jab kaal ki seemaaen samaapt hueen jisane snaan kiyaa usane sansaar ke samast duhkhon se mukti paa lee.
सत्य का दीप जब जलता है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का यह पावन सूत्र जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे प्रेम की यही निशानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के रंग में रंग कर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

माटी का यह देह बना अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,जो जीवन-मुक्त होकर विचरता है तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Maatee ka yeh deh banaa avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Jo jeevana-mukt hokar vicharataa hai tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
तेरी याद का पावन साया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
साँसों की सरगम में घुल गया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने प्रेम का मर्म समझ और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम का दीपक अंतर में जो कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी याद का पावन साया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

माया के इस झूठे जग कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,जिसने इस नश्वर शरीर का मोह तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Maayaa ke is jhoothe jag kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Jisane is nashvar shareer ka moh to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
प्रेम बिना सब सूना जग में सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,हृदय के पावन सिंहासन पर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन धारा में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरी याद का पावन साया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,सच्चे आशिक़ की पहचान यही कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जब से नैना रूप में उलझे सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हृदय में जिसके दया बसी है अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Hriday mein jisake dayaa basee hai apane antar mein sanjoe woh is nashvar sansaar mein sabase baraa samraat hai.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह की रात जब ढलने लगी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
मन की वीणा बज उठी जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन धारा में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,मन मंदिर की पावन आरती लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

सत्य के पावन पथ पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मन के मैल को जिसने धोया के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Saty ke paavan path par jisane saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Man ke mail ko jisane dhoyaa ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
नैनों के दर्पण में बसा जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के रंग में रंग कर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
बिरहा की आग में तप के कुंदन तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,मन मंदिर की पावन आरती कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी आँखों की झील में जो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के चरणों में जिसने उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Satkarmon ki amit jyoti jab saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Satkarmon ki amit kamaaee hi paralok mein sang jaaegee baakee sab maayaa-moh yaheen dharaa rah jaaegaa.
नैन मिले जब नैनन से तब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,मन मंदिर की पावन आरती जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
साँसों की सरगम में घुल गया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम सुधा का रस जो चखा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

सत्य का दीप जब जलता है जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का यह पावन सूत्र जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Saty ka deep jab jalataa hai jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Jeevan ka yeh paavan sootr jo rakhaa vipadaa ki gharee mein bhi woh jeevan ke har sangraam mein vijayee hotaa hai.
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम का दीपक अंतर में जो उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम बिना सब सूना जग में का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,सच्चे प्रेम की यही निशानी एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम की चाहत में जिसने युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,विरह की रात जब ढलने लगी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa priyatam ka roop anoop chaaron or usee ki paavan leelaa nazar aane lagee,Virah ki raat jab dhalane lagee motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
फासले मिट गए जब दिल से से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम के इस पावन तीरथ में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम की चाहत में जिसने युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Roma-rom mein ram gaya preetam ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Priyatam ki chaahat mein jisane yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम की चाहत में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
मन की वीणा बज उठी जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जब से नैना रूप में उलझे एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
अंतर घट में जब ज्योति जगी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की इस पावन घाटी में जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Prem ki doree baandh laee jab dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Saanson ke har taar pe jisakaa liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,साँसों के हर तार पे जिसका लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

छाले पड़े हैं पाँवों में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,अकेलेपन की इस राह पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Chhaale pare hain paanvon mein haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Akelepan ki is raah par tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
नैनन आगे तू ही तू नाचे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम के इस पावन तीरथ में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम रंग में जो रंग गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,विरह का हर इक आँसू बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
आशा का दीप जब बुझने दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ग़म के मारों की बस्ती में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
कोई न अपना इस जग में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ग़म की इस आँधी ने जब केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

विरह की अगन में जलता मन हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,ग़म की इस आँधी ने जब तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Virah ki agan mein jalataa man hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Gham ki is aandhee ne jab tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
टूटी नाव भँवर में फँसी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,टूटे हुए सपनों की किरचें धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
आँखों के आँसू जब सूखे हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,इस दर्द भरे दिल की सदा तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
टूटी नाव भँवर में फँसी चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,अकेलेपन की इस राह पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
ग़म का मारा पंछी जैसे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ग़म की इस आँधी ने जब तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

तन्हाई के अँधियारे में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Tanhaaee ke andhiyaare mein ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Dard ki is ekaant gufaa mein zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
मन के कोने में सिमटी पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
घायल की गति घायल जाने बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म की इस आँधी ने जब जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
छाले पड़े हैं पाँवों में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
आँखों में जो नमी है वो जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दिल के फफोलों को देखकर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

नेकी की राह पे जो जन चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,जिसने समय की चाल पहचानी जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Nekee ki raah pe jo jan chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Jisane samay ki chaal pahachaanee jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
छाले पड़े हैं पाँवों में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,अकेलेपन की इस राह पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब कोई चारासाज़ न मिला सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
ग़म की तपती दुपहरी में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
विरह की अगन में जलता मन और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दिल के फफोलों को देखकर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

जिसने मन को जीत लिया मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जिसने समय की चाल पहचानी बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Jisane man ko jeet liyaa mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jisane samay ki chaal pahachaanee bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म के मारों की बस्ती में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
दर्द की रात में जब कोई किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ग़म के मारों की बस्ती में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
विरह की अगन में जलता मन हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,इस दर्द भरे दिल की सदा धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
टूटी नाव भँवर में फँसी हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

माटी का यह चोला पाकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,कर्म की खेती में जो पसीना वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Maatee ka yeh cholaa paakar jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Karm ki khetee mein jo paseenaa woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
सपनों के महल जब टूटे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
लाल बहादुर शास्त्री (1904–1966) Statesman of Simplicity & Integrity के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
लाल बहादुर शास्त्री ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1904–1966 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, लाल बहादुर शास्त्री की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को लाल बहादुर शास्त्री ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
लाल बहादुर शास्त्री की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, लाल बहादुर शास्त्री हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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लाल बहादुर शास्त्री कौन थे?
लाल बहादुर शास्त्री (1904–1966) Mughalsarai, Uttar Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Statesman of Simplicity & Integrity के अग्रदूत थे, जिन्हें 2ND PRIME MINISTER OF INDIA, MAN OF PEACE, CREATOR OF 'JAI JAWAN JAI KISAN', BHARAT RATNA के रूप में जाना जाता है।
लाल बहादुर शास्त्री का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
लाल बहादुर शास्त्री का मुख्य विचार Self-reliance in food (Green Revolution), moral integrity in public life, defense strength, unparalleled simplicity पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
लाल बहादुर शास्त्री की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
लाल बहादुर शास्त्री की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
लाल बहादुर शास्त्री का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
क्या Emotion Hub पर लाल बहादुर शास्त्री के शेर कॉपी और शेयर किए जा सकते हैं?
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लाल बहादुर शास्त्री का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
लाल बहादुर शास्त्री की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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