सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,भवसागर की लहरों से जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
Kedarnath Singh (केदारनाथ सिंह)
केदारनाथ सिंह (1934–2018) Jnanpith Laureate & Poet of Earthy Reality के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,भवसागर की लहरों से जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।’— केदारनाथ सिंह
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,

‘धरती की छाती पर जिसने अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।’— केदारनाथ सिंह
शेर #2 • शाही पन्ना
धरती की छाती पर जिसने अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘धरती की छाती पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— केदारनाथ सिंह
शेr #3 • रूहानी शाम
धरती की छाती पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,
अमर शेर और ग़ज़लें
धरती की छाती पर जिसने अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
धरती की छाती पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,हृदय में जिसके दया बसी है उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,साधु पुरुष की वाणी कभी वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम नगर का वासी बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Saanson ki saragam mein ghul gaya to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Prem nagar ka vaasee banakar sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
वाणी में जो अमृत घोले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सदाचार की पावन वेदी पर उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

साँसों की सरगम में घुल गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Saanson ki saragam mein ghul gaya barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Prem sudhaa ka ras jo chakhaa jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
धरती की छाती पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,साधु पुरुष की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
मन मंदिर में जो दीप जले सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सदाचार की पावन वेदी पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,शांति और संतोष का धन जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

नैन मिले जब नैनन से तब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Nain mile jab nainan se tab doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Sachche prem ki yahee nishaanee liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,शांति और संतोष का धन जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
कर्म की खेती जो जन बोवे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सदाचार की पावन वेदी पर उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मोह-निशा से जो जन जागा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

कोई न अपना इस जग में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दिल के फफोलों को देखकर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Koee na apanaa is jag mein jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Dil ke phapholon ko dekhakar keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
मन के निर्मल दर्पण में जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,भवसागर की लहरों से जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

कोई न अपना इस जग में जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दिल के फफोलों को देखकर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Koee na apanaa is jag mein jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Dil ke phapholon ko dekhakar koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,नेकी की राह पे जो जन के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,नेकी की राह पे जो जन के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
मन मंदिर में जो दीप जले सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,माटी का चोला पाकर जिसने अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

टूटी नाव भँवर में फँसी हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,टूटे हुए सपनों की किरचें तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Tootee naav bhanvar mein phansee hamadard na mila takiye ko seene se lagaa ke saari raat rote rahe,Toote hue sapanon ki kirachen tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
मन के निर्मल दर्पण में जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मोह-निशा से जो जन जागा जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हृदय में जिसके दया बसी है उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,नेकी की राह पे जो जन जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

नेकी की राह पे जो जन जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,समय की अमूल्य बूँदों को उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Nekee ki raah pe jo jan jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Samay ki amooly boondon ko use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हृदय में जिसके दया बसी है अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जीवन का यह पावन सूत्र जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,भवसागर की लहरों से जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

जिसने मन को जीत लिया उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,जो अपने वचन का पक्का है उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Jisane man ko jeet liyaa usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Jo apane vachan ka pakkaa hai usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

धैर्य और संतोष का धन उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,जिसने समय की चाल पहचानी उसने सब कुछ पा लिया नम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण और गुण है।
Dhairy aur santosh ka dhan usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Jisane samay ki chaal pahachaanee usane sab kuchh paa liyaa namrataa hi sabase baraa aabhooshan aur gun hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्संग की निर्मल गंगा में परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

साधु वो ही जो अंतर में जिसने मन समझाया उसने वैराग्य के पावन दीप को अंतर में जलाए रखा,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Saadhu wo hi jo antar mein jisane man samajhaayaa usane vairaagy ke paavan deep ko antar mein jalaae rakhaa,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
सत्य के पावन पथ पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हृदय में जिसके दया बसी है लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जिसने प्रेम का मर्म समझ मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

घट-घट में वह एक अनंता अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में अंतर में जागा तो अविद्या का सारा अंधकार पल भर में समाप्त हो गया।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein antar mein jaagaa to avidyaa ka saaraa andhakaar pal bhar mein samaapt ho gaya.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,साँसों के हर तार पे जिसका और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
मन मंदिर में बसा जो मूरति जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की मस्ती में जो झूमा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम नगर का वासी बनकर सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

मैं और मेरा का भ्रम मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ निर्मल हुआ तो उसमें साक्षात परमात्मा का दिव्य स्वरूप प्रतिबिंबित होने लगा।
Main aur mera ka bhram man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua nirmal hua to usamen saakshaat paramaatmaa ka divy svaroop pratibinbit hone lagaa.
तेरी याद का पावन साया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरे मिलन की आस में बीते तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
साँसों की सरगम में घुल गया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन धारा में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

धरती की छाती पर जिसने अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
Dharatee ki chhaatee par jisane antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Prem ki dor mein bandh gaya jo jisane sevaa ka vrat liyaa usakaa jeevan chandan ki tarah mahak uthataa hai.
फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,हृदय के पावन सिंहासन पर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

कर्म की खेती जो जन बोवे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सदाचार की पावन वेदी पर उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Karm ki khetee jo jan bove baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Sadaachaar ki paavan vedee par use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
प्रेम रंग में जो रंग गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह की रात जब ढलने लगी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,सच्चे प्रेम की यही निशानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी आँखों की झील में जो तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के चरणों में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane usakaa janam saarthak hua paropakaar hi maanav jeevan ka sabase baraa dharm hai.
साँसों की सरगम में घुल गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम सुधा का रस जो चखा सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम के रंग में रंग कर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

सत्य के पावन पथ पर जिसने स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हृदय में जिसके दया बसी है लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
Saty ke paavan path par jisane svayan khete hain kinaaraa unake svaagat mein sir jhukaataa hai,Hriday mein jisake dayaa basee hai lagaa sadaa ke lie woh bhavasaagar ki bheeshan laharon se paar utar jaataa hai.
तेरे रूप की पावन झांकी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,मन मंदिर की पावन आरती जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी आँखों की झील में जो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम के इस पावन तीरथ में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अंतर में जब प्रेम समाया मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Priyatam ka anuraag hi jisakaa jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
तेरे मिलन की आस में बीते दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,हृदय के पावन सिंहासन पर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जिसने प्रेम का मर्म समझ मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम के इस पावन तीरथ में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

तेरी आँखों की झील में जो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम के इस पावन तीरथ में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Teri aankhon ki jheel mein jo to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Prem ke is paavan teerath mein motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
प्रेम बिना सब सूना जग में से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैन मिले जब नैनन से तब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे मिलन की आस में बीते तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रियतम की चाहत में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जिसने प्रेम का मर्म समझ लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Jisane prem ka marm samajh liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
तेरे रूप की पावन झांकी तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
फासले मिट गए जब दिल से बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के रंग में रंग कर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे दीदार की एक झलक ने तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के चरणों में जिसने जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जिसने प्रेम का मर्म समझ लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

टूटी नाव भँवर में फँसी कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब कोई चारासाज़ न मिला पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Tootee naav bhanvar mein phansee koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Jab koee chaaraasaaz na mila pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम का अनुराग ही जिसका उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे रूप की पावन झांकी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह का हर इक आँसू बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
विरह की अगन में जलता मन सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब सबने मुँह फेर लिया तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
मन के कोने में सिमटी पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,आँसुओं की इस भाषा को जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

भीतर-भीतर घुटता जाए पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,टूटे हुए दिल का दर्द मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae par dikhaaee den asalee zakhm to wo hain jo rooh par risate hain,Toote hue dil ka dard manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
सपनों के महल जब टूटे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
विरह की अगन में जलता मन सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस लंबी यात्रा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
कोई न अपना इस जग में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,दिल के फफोलों को देखकर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
नैनों से जो नीर बहे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब आशा की हर किरण बुझी केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

नैनों से जो नीर बहे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे हुए सपनों की किरचें केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Nainon se jo neer bahe patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Toote hue sapanon ki kirachen keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
वक़्त की आँधी ने तोड़े को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
छाले पड़े हैं पाँवों में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,दर्द का यह गहरा सागर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
उम्र भर का सफ़र और जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस लंबी यात्रा में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
छाले पड़े हैं पाँवों में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म की इस लंबी यात्रा में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

अहंकार की दीवारें जब अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जो अपने वचन का पक्का है बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Ahankaar ki deevaaren jab agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jo apane vachan ka pakkaa hai bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
टूटी नाव भँवर में फँसी कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब कोई चारासाज़ न मिला पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
आशा का दीप जब बुझने यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म के मारों की बस्ती में तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
सपनों के महल जब टूटे लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,इस दर्द भरे दिल की सदा पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
दर्द की रात में जब कोई सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,इस दर्द भरे दिल की सदा तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

ठोकर खाकर जो संभलता है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,हृदय में जिसके दया और करुणा और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Thokar khaakar jo sanbhalataa hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
जिसके दिल पर बीत रही पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,अकेलेपन की इस राह पर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
तन्हाई के अँधियारे में और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
नैनों से जो नीर बहे भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दिल के फफोलों को देखकर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
कोई न अपना इस जग में जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दिल के फफोलों को देखकर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

सच्ची लगन से जो जन मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,समय की अमूल्य बूँदों को जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Sachchee lagan se jo jan man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Samay ki amooly boondon ko jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
उम्र भर का सफ़र और सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस आँधी ने जब जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
केदारनाथ सिंह (Kedarnath Singh) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
केदारनाथ सिंह (1934–2018) Jnanpith Laureate & Poet of Earthy Reality के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
केदारनाथ सिंह ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1934–2018 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, केदारनाथ सिंह की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को केदारनाथ सिंह ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
केदारनाथ सिंह की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, केदारनाथ सिंह हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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केदारनाथ सिंह कौन थे?
केदारनाथ सिंह (1934–2018) Chakia, Ballia, Uttar Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Jnanpith Laureate & Poet of Earthy Reality के अग्रदूत थे, जिन्हें JNANPITH LAUREATE (2013), POET OF 'AKAAL MEIN SARAS', MASTER OF RURAL SIMPLICITY AND URBAN LONGING के रूप में जाना जाता है।
केदारनाथ सिंह का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
केदारनाथ सिंह का मुख्य विचार Living heartbeat of the soil, organic language of peasants and artisans, spiritual eternity of Banaras, quiet emotional resonance पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
केदारनाथ सिंह की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
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