मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Kashmir's Shamas Faqir (शमस फ़क़ीर)
شمس فقیر
शमस फ़क़ीर कश्मीर के 19वीं सदी के प्रमुख सूफ़ी संत हैं, जिनकी शायरी में सूफ़ी तसव्वुफ़ और कश्मीरी शैव-दर्शन का अनूठा आध्यात्मिक संगम देखने को मिलता है।

मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
— शमस फ़क़ीर • SUFI ERA OF KASHMIR (1843–1901)

मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
— शमस फ़क़ीर • SUFI ERA OF KASHMIR (1843–1901)
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‘मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— शमस फ़क़ीर
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,

‘सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।’— शमस फ़क़ीर
शेर #2 • शाही पन्ना
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,

‘धरती की छाती पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— शमस फ़क़ीर
शेr #3 • रूहानी शाम
धरती की छाती पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,
अमर शेर और ग़ज़लें
सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
धरती की छाती पर जिसने रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
संतन की संगति में आकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
Prem ki paavan vedee par jisane palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Priyatam ki chaahat mein jisane jo jan vicharaa usane sansaar ki saari chintaaon se mukti paa lee.
सत्य का दीप जब जलता है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
वाणी में जो अमृत घोले अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,जीवन का यह पावन सूत्र जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
सत्य का दीप जब जलता है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की इस पावन धारा में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Prem ki is paavan dhaaraa mein sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य-अहिंसा की राहों पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,नेकी की राह पे जो जन उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नाम और दौलत तो माटी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,दीन-बंधु का सहारा बन के लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम के इस पावन तीरथ में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Prem ki paavan vedee par jisane ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Prem ke is paavan teerath mein sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्य का दीप जब जलता है भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,माटी का चोला पाकर जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सत्य का दीप जब जलता है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,दीन-बंधु का सहारा बन के मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

टूटे दिल की ख़ामोशी में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब धैर्य की सीमा टूट गई सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Toote dil ki khaamoshi mein haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Jab dhairy ki seemaa toot gayi sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
सत्य के पावन पथ पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
अहंकार की दीवारें जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हरि की कृपा का पावन साया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सत्य का दीप जब जलता है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

आँखों के आँसू जब सूखे सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Aankhon ke aansoo jab sookhe soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Jab apanon ne hi diye zakhm tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,प्रेम की डोर में बंध गया जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
मन मंदिर में जो दीप जले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,सदाचार की पावन वेदी पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,परहित में जिसने जीवन सौंपा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

नैनों से जो नीर बहे सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब धैर्य की सीमा टूट गई सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Nainon se jo neer bahe soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Jab dhairy ki seemaa toot gayi saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,भवसागर की लहरों से जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,साधु पुरुष की वाणी कभी रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
धरती की छाती पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अंत समय जब निकट आएगा जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Ant samay jab nikat aaegaa jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
अहंकार की दीवारें जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
नदिया की धारा बहती जावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मन के मैल को जिसने धोया अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रेम की डोर में बंध गया जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

जीवन का यह कठिन सफ़र बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जो अपने वचन का पक्का है वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Jeevan ka yeh kathin safar binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jo apane vachan ka pakkaa hai vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
नदिया की धारा बहती जावे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,साधु पुरुष की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हरि की कृपा का पावन साया रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

गिरने में कोई हार नहीं उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,जीवन के इस महासमर में और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Girane mein koee haar nahi usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Jeevan ke is mahaasamar mein aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
कर्म की खेती जो जन बोवे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्संग की निर्मल गंगा में उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सदाचार की पावन वेदी पर उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
कर्म की खेती जो जन बोवे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,प्रेम की डोर में बंध गया जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

सत्य का दीप जब जलता जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,अंतःकरण जब दर्पण की तरह जीव और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाए और केवल अद्वैत ही शेष रहे।
Saty ka deep jab jalataa jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Antahkaran jab darpan ki tarah jeev aur brahm ka bhed samaapt ho jaae aur keval advait hi shesh rahe.
सत्य के पावन पथ पर जिसने सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रियतम की याद में जो नैना जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे आशिक़ की पहचान यही प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

मृत्यु कोई अंत नहीं बस मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जब द्वैत का सारा भ्रम मिट गया तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Mrityu koee ant nahi bas man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jab dvait ka saaraa bhram mit gaya to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
नैन मिले जब नैनन से तब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरी आँखों की झील में जो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

मैं और मेरा का भ्रम कर पाता है जो समस्त विकारों से मुक्त होकर समत्व भाव में स्थित हो गया,शाश्वत सत्य की इस पावन वेदी पर तब 'सोऽहं' का दिव्य नाद अंतर में अनहद की तरह गूँजने लगा।
Main aur mera ka bhram kar paataa hai jo samast vikaaron se mukt hokar samatv bhaav mein sthit ho gaya,Shaashvat saty ki is paavan vedee par tab 'soऽhan' ka divy naad antar mein anahad ki tarah goonjane lagaa.
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
नैन मिले जब नैनन से तब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने प्रेम का मर्म समझ जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम का अनुराग ही जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

सत्य का दीप जब जलता है घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Saty ka deep jab jalataa hai ghata-ghat mein pragat bhaee ajnyaan ka ghor andhera pal bhar mein bhaag gaya,Saadhu purush ki vaanee kabhee nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
नैन मिले जब नैनन से तब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की पावन ज्योति जगाई संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की पावन ज्योति जगाई प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे प्रेम की यही निशानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree svayan khete hain kinaaraa unake svaagat mein sir jhukaataa hai,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे रूप की पावन झांकी जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अमर प्रेम की अमर कहानी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे रूप की पावन झांकी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

धरती की छाती पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Dharatee ki chhaatee par jisane prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke usakaa janam saarthak hua paropakaar hi maanav jeevan ka sabase baraa dharm hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की इस पावन धारा में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
मन मंदिर में बसा जो मूरति उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
तेरी आँखों की झील में जो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जब से नैना रूप में उलझे अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

सत्य के पावन पथ पर जिसने सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Saty ke paavan path par jisane sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Maatee ka cholaa paakar jisane avichal kadam barhaataa hai usakaa yash teenon lokon mein sadaa phailataa hai.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैन मिले जब नैनन से तब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रियतम की याद में जो नैना का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जिसने प्रेम का मर्म समझ तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

प्रेम की डोरी बाँध लई जब प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की पावन ज्योति जगाई प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Prem ki doree baandh laee jab priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Prem ki paavan jyoti jagaaee prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
फासले मिट गए जब दिल से तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के चरणों में जिसने मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की इस पावन धारा में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

नैन मिले जब नैनन से तब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Nain mile jab nainan se tab barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Saanson ke har taar pe jisakaa sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम के इस पावन तीरथ में संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरी याद का पावन साया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने प्रेम का मर्म समझ लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,सच्चे प्रेम की यही निशानी मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

इश्क़ जब रूह में उतरता है सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,मन मंदिर की पावन आरती सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
Ishq jab rooh mein utarataa hai sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Man mandir ki paavan aaratee sukha-duhkh bhulaa diyaa usane jeevan ke har mod par aanand hi paayaa.
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,विरह की रात जब ढलने लगी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे मिलन की आस में बीते डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,विरह का हर इक आँसू बनकर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ जब रूह में उतरता है सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,मन मंदिर की पावन आरती सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

नैनों से जो नीर बहे बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Nainon se jo neer bahe baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Jeevan ke is kathin mod par jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
छाले पड़े हैं पाँवों में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दर्द का यह गहरा सागर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,अंधेरी रात के सन्नाटे में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

कोई न अपना इस जग में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,इस दर्द भरे दिल की सदा केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Koee na apanaa is jag mein antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Is dard bhare dil ki sadaa keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब नयनों के सब आँसू सूखे तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
ग़म का मारा पंछी जैसे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,टूटे दिल की इस वीणा से तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
टूटे दिल की ख़ामोशी में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब धैर्य की सीमा टूट गई सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
टूटी नाव भँवर में फँसी सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,ग़म की इस लंबी यात्रा में सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,आँसुओं की इस भाषा को केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Zakhm wo nahi jo jism kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Aansuon ki is bhaashaa ko keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
नैनों से जो नीर बहे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
ग़म की तपती दुपहरी में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दर्द की भट्टी में तपकर ही कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
आँखों के आँसू जब सूखे पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब नयनों के सब आँसू सूखे अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
विरह की अगन में जलता मन जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,आँसुओं की इस भाषा को तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

अहंकार की दीवारें जब है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,सदाचार के पावन नियमों पर जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Ahankaar ki deevaaren jab hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Sadaachaar ke paavan niyamon par jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
नैनों से जो नीर बहे बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
अकेलेपन की धूप जब साए जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस लंबी यात्रा में पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
टूटी नाव भँवर में फँसी दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब सबने मुँह फेर लिया सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
ग़म की तपती दुपहरी में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब सबने मुँह फेर लिया तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।

धैर्य और संतोष का धन कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,जो गिरतों को उठाना जानता है बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Dhairy aur santosh ka dhan kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
दर्द की रात में जब कोई पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब आशा की हर किरण बुझी तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
सपनों के महल जब टूटे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
सांस-सांस में याद तुम्हारी बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
आँखों के आँसू जब सूखे सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

संतन की संगति में आकर कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,अंत समय जब निकट आएगा कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Santan ki sangati mein aakar kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Ant samay jab nikat aaegaa ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
भीतर-भीतर घुटता जाए दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,टूटे हुए सपनों की किरचें केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
शमस फ़क़ीर (Kashmir's Shamas Faqir) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
शमस फ़क़ीर कश्मीर के 19वीं सदी के प्रमुख सूफ़ी संत हैं, जिनकी शायरी में सूफ़ी तसव्वुफ़ और कश्मीरी शैव-दर्शन का अनूठा आध्यात्मिक संगम देखने को मिलता है।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
शमस फ़क़ीर ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Sufi Era of Kashmir (1843–1901) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, शमस फ़क़ीर की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को शमस फ़क़ीर ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
शमस फ़क़ीर की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, शमस फ़क़ीर हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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पसंद का शेर चुनिए, मनपसंद टेम्पलेट लगाइए, फ़ॉन्ट और रंग सजाइए और एक क्लिक में सेव कर लीजिए।
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“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
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- पापा का जन्मदिनजिन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया
- सालगिरह की बधाईजोड़ों के लिए मीठी-सी पंक्तियाँ
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शमस फ़क़ीर के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
शमस फ़क़ीर के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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शमस फ़क़ीर कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
शमस फ़क़ीर (1843–1901) Kashmiri/Sufi साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
शमस फ़क़ीर की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
शमस फ़क़ीर की रचनाओं के केंद्र में आत्म-ज्ञान और ईश्वर की खोज, शैव-सूफ़ी समन्वय का दर्शन, सांसारिक मोह का त्याग, सच्ची रूहानी शांति, कश्मीरी सूफ़ी संगीत (सूफ़ियाना कलाम) जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
शमस फ़क़ीर की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
शमस फ़क़ीर की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
शमस फ़क़ीर का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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शमस फ़क़ीर का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
शमस फ़क़ीर की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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