दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
Karaikkal Ammaiyar (Punitavati) (कारैक्काल अम्मैयार)
कारैक्काल अम्मैयार Tamil/Shaiva साहित्य परंपरा के अमर रचनाकार हैं, जिनकी कृतियों ने समाज, संस्कृति और मानवीय संवेदना को नया आयाम दिया।
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‘दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।’— कारैक्काल अम्मैयार
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,

‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।’— कारैक्काल अम्मैयार
शेर #2 • शाही पन्ना
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,

‘सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।’— कारैक्काल अम्मैयार
शेr #3 • रूहानी शाम
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,
अमर शेर और ग़ज़लें
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Karaikkal Ammaiyar,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Karaikkal Ammaiyar,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Karaikkal Ammaiyar,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Karaikkal Ammaiyar,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Karaikkal Ammaiyar,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
कारैक्काल अम्मैयार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Karaikkal Ammaiyar,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Karaikkal Ammaiyar,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।

धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,। Karaikkal Ammaiyar,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Karaikkal Ammaiyar,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
कारैक्काल अम्मैयार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। Karaikkal Ammaiyar,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Karaikkal Ammaiyar,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Karaikkal Ammaiyar,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Karaikkal Ammaiyar,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Karaikkal Ammaiyar,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Karaikkal Ammaiyar,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,। Karaikkal Ammaiyar,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

कारैक्काल अम्मैयार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Karaikkal Ammaiyar,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। Karaikkal Ammaiyar,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।

नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Karaikkal Ammaiyar,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Karaikkal Ammaiyar,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Karaikkal Ammaiyar,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Karaikkal Ammaiyar,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Karaikkal Ammaiyar,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।

दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,। Karaikkal Ammaiyar,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Karaikkal Ammaiyar,क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Karaikkal Ammaiyar,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
कारैक्काल अम्मैयार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Karaikkal Ammaiyar,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
कारैक्काल अम्मैयार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।

कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Karaikkal Ammaiyar,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।

मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Karaikkal Ammaiyar,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे,अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह निशा मुख मोड़े।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Karaikkal Ammaiyar,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

कारैक्काल अम्मैयार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,लोभ मोह मद त्यागि के निज स्वरूप को चीन्है।
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।
वाणी में जो अमृत घोले जग में सोई प्यारा,। Karaikkal Ammaiyar,उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया।
कारैक्काल अम्मैयार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,। Karaikkal Ammaiyar,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,। Karaikkal Ammaiyar,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,। Karaikkal Ammaiyar,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
नदिया की धारा बहती जावे सागर से मिलन को,। Karaikkal Ammaiyar,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती।

संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Karaikkal Ammaiyar,कायर बैठे भाग्य गिने और धीर पुरुष कर दिखलावे।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
कारैक्काल अम्मैयार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे,जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े,। Karaikkal Ammaiyar,आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Karaikkal Ammaiyar,सत्कर्मों की पूंजी ही बस संग तुम्हारे जाना।
अहंकार की दीवारें जब अंतर में गिर जातीं,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।

कारैक्काल अम्मैयार कहें सुनो भई साधो मन को निर्मल कीजै,अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,। Karaikkal Ammaiyar,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सुख में करै न कोय,। Karaikkal Ammaiyar,उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा,पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।
संतन की संगति में आकर मन का मैल धुलावे,। Karaikkal Ammaiyar,अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा।
मन मंदिर में जो दीप जले तो बाहर तम न सतावे,। Karaikkal Ammaiyar,कोटि ग्रंथ का सार यही है घट में हरि को ध्यावै।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा,। Karaikkal Ammaiyar,मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे।
कारैक्काल अम्मैयार (Karaikkal Ammaiyar (Punitavati)) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
कारैक्काल अम्मैयार Tamil/Shaiva साहित्य परंपरा के अमर रचनाकार हैं, जिनकी कृतियों ने समाज, संस्कृति और मानवीय संवेदना को नया आयाम दिया।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
कारैक्काल अम्मैयार ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Tamil/Shaiva (6th Century CE–Ancient Era) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, कारैक्काल अम्मैयार की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को कारैक्काल अम्मैयार ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
कारैक्काल अम्मैयार की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, कारैक्काल अम्मैयार हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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