वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Kalapi (कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल))
कवि कलापी लाठी राज्य के संवेदनशील राजकुमार थे, जिन्होंने मात्र 26 वर्ष की अल्पायु में प्रेम, विरह और प्रकृति की ऐसी अमर कविताएँ रचीं जो गुजराती साहित्य की धरोहर हैं।

वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
— कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल) • ROMANTIC GUJARATI ERA (1874–1900)

वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
— कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल) • ROMANTIC GUJARATI ERA (1874–1900)
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‘वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।’— कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल)
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,

‘सत्य के पावन पथ पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल)
शेर #2 • शाही पन्ना
सत्य के पावन पथ पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,

‘प्रेम की गंगा अंतर में बहे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल)
शेr #3 • रूहानी शाम
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,

‘संतन की संगति में आकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।’— कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल)
शेर #4 • ज़मर्रद फ़लसफ़ा
संतन की संगति में आकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,
अमर शेर और ग़ज़लें
सत्य के पावन पथ पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
संतन की संगति में आकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
Tere roop ki paavan jhaankee priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Virah ka har ik aansoo banakar jisane snaan kiyaa usake saare santaap aur taap sadaa ke lie mit gaye.
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सदाचार की पावन वेदी पर उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
साधु-संगत की छाया में जो निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

तेरे दीदार की एक झलक ने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Tere deedaar ki ek jhalak ne tera naam sanehee har ek dharakan mein teri hi vandanaa goonjatee hai,Priyatam ke rang mein rang kar utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
सत्य के पावन पथ पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सदाचार की पावन वेदी पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नाम और दौलत तो माटी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मोह-निशा से जो जन जागा वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
साधु-संगत की छाया में जो अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,धैर्य का दामन जिसने थामे परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

मन की वीणा बज उठी जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Man ki veenaa baj uthee jab doob gaya ik baar use kinaare ki koee aarazoo baaqee na rahi,Aankhon ke raste dil mein utaraa liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,धैर्य का दामन जिसने थामे वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
नाम और दौलत तो माटी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,माटी का चोला पाकर जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
मन मंदिर में जो दीप जले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
मन के निर्मल दर्पण में जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

आँखों के आँसू जब सूखे कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Aankhon ke aansoo jab sookhe koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Andheree raat ke sannaate mein tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
मन मंदिर में जो दीप जले तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,साधु पुरुष की वाणी कभी अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,परहित में जिसने जीवन सौंपा परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,भवसागर की लहरों से जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

घायल की गति घायल जाने और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Dard ki is ekaant gufaa mein tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य-अहिंसा की राहों पर उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,नेकी की राह पे जो जन अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

टूटी नाव भँवर में फँसी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ग़म के मारों की बस्ती में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Tootee naav bhanvar mein phansee antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Gham ke maaron ki bastee mein jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हरि की कृपा का पावन साया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,सदाचार की पावन वेदी पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मोह-निशा से जो जन जागा रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

धैर्य और संतोष का धन अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,मेहनत और लगन से जिसने जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Dhairy aur santosh ka dhan antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Mehanat aur lagan se jisane jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
दीन-दुखी का आसरा बनकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,परहित में जिसने जीवन सौंपा अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

दुःख में सुमिरन सब कोई भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,जीवन की सच्ची पूँजी वही और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Duhkh mein sumiran sab koee bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Jeevan ki sachchee poonjee vahee aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
दीन-दुखी का आसरा बनकर का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,शांति और संतोष का धन जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,माटी का चोला पाकर जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।

ठोकर खाकर जो संभलता है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,माटी के इस पुतले में जब पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Thokar khaakar jo sanbhalataa hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Maatee ke is putale mein jab paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,हरि की कृपा का पावन साया जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,शांति और संतोष का धन जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
सत्य का दीप जब जलता है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हरि की कृपा का पावन साया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

घट-घट में वह एक अनंता है उसने समस्त वेदों का सार जान लिया बाहर तो केवल माया की छाया है,शाश्वत सत्य की इस पावन वेदी पर जो विलीन हो गया उसकी नदियाँ सागर में मिलकर सदा के लिए अमर हो गईं।
Ghata-ghat mein woh ek anantaa hai usane samast vedon ka saar jaan liyaa baahar to keval maayaa ki chhaayaa hai,Shaashvat saty ki is paavan vedee par jo vileen ho gaya usakee nadiyaan saagar mein milakar sadaa ke lie amar ho gaeen.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
नैन मिले जब नैनन से तब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,हृदय के पावन सिंहासन पर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम बिना सब सूना जग में तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।

मन की चंचलता को जिसने एक वस्त्र बदलने का नाम है आत्मा अजर-अमर है और सदैव प्रकाशमान रहेगी,निर्विकल्प समाधि की उस अवस्था में जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Man ki chanchalataa ko jisane ek vastr badalane ka naam hai aatmaa ajara-amar hai aur sadaiv prakaashamaan rahegee,Nirvikalp samaadhi ki us avasthaa mein jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
मन की वीणा बज उठी जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम की चाहत में जिसने जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
मन मंदिर में बसा जो मूरति संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह का हर इक आँसू बनकर जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

पानी केरा बुदबुदा अस इसे शस्त्र काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकती जल गला नहीं सकता,परम चेतना का आलोक जब फैला तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Paani keraa budabudaa as ise shastr kaat nahi sakate agni jalaa nahi sakatee jal galaa nahi sakataa,Param chetanaa ka aalok jab phailaa to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरी याद का पावन साया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जिसने अपना सब कुछ सौंपा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम की चाहत में जिसने सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

सत्य के पावन पथ पर जिसने प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Saty ke paavan path par jisane prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Prem ki dor mein bandh gaya jo jisane apane praan nyauchhaavar kie usakee keerti gaathaa yuga-yugaantar tak gaaee jaatee hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरी आँखों की झील में जो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के चरणों में जिसने उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
साँसों की सरगम में घुल गया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,साँसों के हर तार पे जिसका उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

मन मंदिर में जो दीप जले का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Man mandir mein jo deep jale ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Jeevan ka yeh paavan sootr jo usakaa janam saarthak hua paropakaar hi maanav jeevan ka sabase baraa dharm hai.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,विरह की रात जब ढलने लगी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,साँसों के हर तार पे जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Amar naam jag mein usee ka us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम के रंग में रंग कर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह का हर इक आँसू बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरी आँखों की झील में जो दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Satsang ki nirmal gangaa mein usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम की चाहत में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम सुधा का रस जो चखा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन धारा में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरे मिलन की आस में बीते से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

तेरी आँखों की झील में जो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम का दीपक अंतर में जो जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Teri aankhon ki jheel mein jo amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Prem ka deepak antar mein jo jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरे मिलन की आस में बीते दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम रंग में जो रंग गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,साँसों के हर तार पे जिसका जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे प्रेम की यही निशानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

तेरे रूप की पावन झांकी दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम की इस पावन धारा में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Tere roop ki paavan jhaankee dil ka bhed khulaa maun ki bhaashaa mein sab kuchh kah diyaa kuchh na chhupaayaa,Prem ki is paavan dhaaraa mein naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,साँसों के हर तार पे जिसका तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अंतर में जब प्रेम समाया नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

नैनन आगे तू ही तू नाचे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम नगर का वासी बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
Nainan aage too hi too naache antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Prem nagar ka vaasee banakar aur milan ki bhor hui to aatmaa ka paramaatmaa se ekaatm ho gaya.
तेरी आँखों की झील में जो डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जब से नैना रूप में उलझे प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी आँखों की झील में जो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जब से नैना रूप में उलझे प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
प्रेम रंग में जो रंग गया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम नगर का वासी बनकर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,आँसुओं की इस भाषा को कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Waqt ke thaperon ne hamen ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Aansuon ki is bhaashaa ko koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रेम नगर का वासी बनकर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
दिल का आईना जब टूटा रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस लंबी यात्रा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
टूटे दिल की ख़ामोशी में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,टूटे हुए दिल का दर्द तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।

आशा का दीप जब बुझने बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म के मारों की बस्ती में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Aashaa ka deep jab bujhane baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Gham ke maaron ki bastee mein tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
तन्हाई के अँधियारे में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म की इस आँधी ने जब तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
दिल का आईना जब टूटा दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए सपनों की किरचें केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
आँखों के आँसू जब सूखे कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
विरह की अगन में जलता मन जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अकेलेपन की इस राह पर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।

सपनों के महल जब टूटे पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दिल के फफोलों को देखकर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Sapanon ke mahal jab toote patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Dil ke phapholon ko dekhakar pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
कोई न अपना इस जग में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,टूटे हुए दिल का दर्द केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
मन के कोने में सिमटी हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस आँधी ने जब तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
तन्हाई के अँधियारे में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
भीतर-भीतर घुटता जाए कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

धैर्य और संतोष का धन करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जिसने समय की चाल पहचानी विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Dhairy aur santosh ka dhan karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Jisane samay ki chaal pahachaanee vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,आँसुओं की इस भाषा को कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
दिल का आईना जब टूटा अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
मन के कोने में सिमटी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस लंबी यात्रा में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

वाणी में जो अमृत घोले है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,सदाचार के पावन नियमों पर कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Vaanee mein jo amrit ghole hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Sadaachaar ke paavan niyamon par ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब कोई चारासाज़ न मिला तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
अकेलेपन की धूप जब साए यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब धैर्य की सीमा टूट गई जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
घायल की गति घायल जाने और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,त्याग और सेवा की भावना से अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
तन्हाई के अँधियारे में अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द का यह गहरा सागर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल) (Kalapi) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
कवि कलापी लाठी राज्य के संवेदनशील राजकुमार थे, जिन्होंने मात्र 26 वर्ष की अल्पायु में प्रेम, विरह और प्रकृति की ऐसी अमर कविताएँ रचीं जो गुजराती साहित्य की धरोहर हैं।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल) ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Romantic Gujarati Era (1874–1900) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल) की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल) ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल) की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, कवि कलापी (सुरसिंहजी तख्तसिंहजी गोहिल) हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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