हरि सुमिरन में जिसका चित्त भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Jean-Paul Sartre (ज्यां-पॉल सार्त्र)
ज्यां-पॉल सार्त्र (1905–1980) Father of Existentialism & Nobel Decliner के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।

हरि सुमिरन में जिसका चित्त भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
— ज्यां-पॉल सार्त्र • 1905–1980

हरि सुमिरन में जिसका चित्त भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
— ज्यां-पॉल सार्त्र • 1905–1980
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‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,मन के मैल को जिसने धोया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— ज्यां-पॉल सार्त्र
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
हरि सुमिरन में जिसका चित्त भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,

‘आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,भवसागर की लहरों से जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।’— ज्यां-पॉल सार्त्र
शेर #2 • शाही पन्ना
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।’— ज्यां-पॉल सार्त्र
शेr #3 • रूहानी शाम
हरि सुमिरन में जिसका चित्त स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,
अमर शेर और ग़ज़लें
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,भवसागर की लहरों से जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,अमर नाम जग में उसी का उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
माटी का यह देह बना है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,शांति और संतोष का धन जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

तेरी याद का पावन साया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Teri yaad ka paavan saaya raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Prem ki is paavan ghaatee mein naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,माटी का चोला पाकर जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,धैर्य का दामन जिसने थामे मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
संतन की संगति में आकर तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हृदय में जिसके दया बसी है रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

मन की वीणा बज उठी जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,मन मंदिर की पावन आरती उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Man ki veenaa baj uthee jab dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Man mandir ki paavan aaratee usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
सत्य के पावन पथ पर जिसने जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्संग की निर्मल गंगा में जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
अहंकार की दीवारें जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मन के मैल को जिसने धोया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
वाणी में जो अमृत घोले घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Sachche aashiq ki pahachaan yahee prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
संतन की संगति में आकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,नेकी की राह पे जो जन लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
मन मंदिर में जो दीप जले प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Waqt ke thaperon ne hamen ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Jab aashaa ki har kiran bujhee tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
वाणी में जो अमृत घोले भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,माटी का चोला पाकर जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
माटी का यह देह बना है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मन के मैल को जिसने धोया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,आँसुओं की इस भाषा को ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Waqt ke thaperon ne hamen patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Aansuon ki is bhaashaa ko zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,भवसागर की लहरों से जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

नैनों से जो नीर बहे सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
Nainon se jo neer bahe soee jaane peer paraaee duniya to tamaashaa dekhatee hai koee dard nahi baantataa,Waqt ke is kroor prahaar ne tab paramaatmaa hi sabase baraa vaidy banaa aur usane rooh ke zakhm bhar diye.
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अमर नाम जग में उसी का जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सदाचार की पावन वेदी पर उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,अहंकार का त्याग किया जिसने उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मोह-निशा से जो जन जागा उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।

समय का पहिया चलता जाए अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,माटी के इस पुतले में जब तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Maatee ke is putale mein jab tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
वाणी वही जो घाव भरे और सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,माटी का चोला पाकर जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

जिसने मन को जीत लिया जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,त्याग और सेवा की भावना से चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Jisane man ko jeet liyaa jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रेम की डोर में बंध गया जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हृदय में जिसके दया बसी है जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
साधु-संगत की छाया में जो जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

धैर्य और संतोष का धन धूप-छाँव का सफ़र है आज ग़म कल उम्मीद का नया सूरज चमकेगा,जिसने समय की चाल पहचानी और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Dhairy aur santosh ka dhan dhoopa-chhaanv ka safar hai aaj gham kal ummeed ka naya sooraj chamakegaa,Jisane samay ki chaal pahachaanee aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,मन के मैल को जिसने धोया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

मोह-निशा जब ढलती है से निर्मल हो बाहर के पाखंड से मुक्त होकर प्रभु भक्ति में लीन रहे,जब आत्मा ने जाना अपना सत्य स्वरूप जहाँ ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय का भेद मिट जाता है और केवल ब्रह्म रहता है।
Moha-nishaa jab dhalatee hai se nirmal ho baahar ke paakhand se mukt hokar prabhu bhakti mein leen rahe,Jab aatmaa ne jaanaa apanaa saty svaroop jahaan jnyaataa, jnyaan aur jnyey ka bhed mit jaataa hai aur keval brahm rahataa hai.
वाणी वही जो घाव भरे और का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
तेरी आँखों की झील में जो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,हृदय के पावन सिंहासन पर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम गली अति साँकरी जामें डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अंतर में जब प्रेम समाया संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम का दीपक अंतर में जो जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

माया के इस झूठे जग परमात्मा की आवाज़ सुनाई दे वही सच्चा उपदेश है जो मोक्ष का द्वार खोलता है,परमानंद का यह अलौकिक रस तब साधना पूर्ण हुई और भक्त भगवान के स्वरूप में ही विलीन हो गया।
Maayaa ke is jhoothe jag paramaatmaa ki aavaaz sunaaee de vahee sachchaa upadesh hai jo moksh ka dvaar kholataa hai,Paramaanand ka yeh alaukik ras tab saadhanaa poorn hui aur bhakt bhagavaan ke svaroop mein hi vileen ho gaya.
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम बिना सब सूना जग में बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के चरणों में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी याद का पावन साया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की इस पावन घाटी में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

साधु वो ही जो अंतर उसी को होता है जो समस्त वासनाओं और कामनाओं का त्याग कर देता है,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब तो सारे बंधन टूट गए और वह परमब्रह्म में लीन होकर एक रूप हो गया।
Saadhu wo hi jo antar usee ko hotaa hai jo samast vaasanaaon aur kaamanaaon ka tyaag kar detaa hai,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab to saare bandhan toot gaye aur woh paramabrahm mein leen hokar ek roop ho gaya.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन धारा में नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम सुधा का रस जो चखा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,सच्चे प्रेम की यही निशानी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,भवसागर की लहरों से जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Bhavasaagar ki laharon se jo usane nirmal darpan paayaa jahaan paramaatmaa ka saakshaat svaroop dikhataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अमर प्रेम की अमर कहानी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
नैन मिले जब नैनन से तब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

आशा तृष्णा सब छूटी जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab saagar se milan ko man paavan ho jaae jab hari gun dina-raat sunaave,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,विरह का हर इक आँसू बनकर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम सुधा का रस जो चखा उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरी आँखों की झील में जो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम की चाहत में जिसने प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैन मिले जब नैनन से तब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने अपना सब कुछ सौंपा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,मोह-निशा से जो जन जागा उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
Prem ki gangaa antar mein bahe nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Moha-nishaa se jo jan jaagaa usane alaukik bhor dekhaa jahaan keval saty aur aanand ka prakaash hai.
मन की वीणा बज उठी जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,मन मंदिर की पावन आरती उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम गली अति साँकरी जामें अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,मन मंदिर की पावन आरती और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

वाणी वही जो घाव भरे और का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
Vaanee vahee jo ghaav bhare aur ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Jeevan ka yeh paavan sootr jo use sansaar ka koee lobh baandh nahi sakataa woh prabhu prem mein magn rahataa hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम के इस पावन तीरथ में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,मन मंदिर की पावन आरती कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रियतम की याद में जो नैना जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,साँसों के हर तार पे जिसका अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Prem ka deepak antar mein jo use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
नैनों के दर्पण में बसा जब से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अमर प्रेम की अमर कहानी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैनों के दर्पण में बसा जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम नगर का वासी बनकर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

प्रियतम की याद में जो नैना जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa jisane ik baar lakhee use sansaar ka koee doosaraa roop suhaataa nahi,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
मन मंदिर में बसा जो मूरति बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी याद का पावन साया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

नैन मिले जब नैनन से तब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Nain mile jab nainan se tab antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की इस पावन घाटी में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे दीदार की एक झलक ने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जब से नैना रूप में उलझे जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैन मिले जब नैनन से तब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

तन्हाई के अँधियारे में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दिल के फफोलों को देखकर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
Tanhaaee ke andhiyaare mein sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Dil ke phapholon ko dekhakar manushy ka aatmabal nikharataa hai aur woh sone ki tarah chamak uthataa hai.
मन की वीणा बज उठी जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे प्रेम की यही निशानी युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे दीदार की एक झलक ने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जिसने अपना सब कुछ सौंपा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
जिसके दिल पर बीत रही पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,अकेलेपन की इस राह पर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
घायल की गति घायल जाने रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,टूटे दिल की इस वीणा से तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

आशा का दीप जब बुझने दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब कोई चारासाज़ न मिला तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
Aashaa ka deep jab bujhane doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Jab koee chaaraasaaz na mila tab antaryaamee prabhu ne baahan pakaree aur is sankat se ubaar liyaa.
ग़म की तपती दुपहरी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस आँधी ने जब चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
घायल की गति घायल जाने पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,दिल के फफोलों को देखकर तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
मन के कोने में सिमटी हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।

घायल की गति घायल जाने रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दिल के फफोलों को देखकर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Dil ke phapholon ko dekhakar keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
कोई न अपना इस जग में हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,आँसुओं की इस भाषा को कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
उम्र भर का सफ़र और हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,टूटे दिल की इस वीणा से सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
दिल का आईना जब टूटा पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,टूटे हुए सपनों की किरचें तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
आशा का दीप जब बुझने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

जीवन की इस रणभूमि में तक उम्मीद का तीर ज़िंदा है हार कर भी जीतने का जज़्बा कभी कम न होगा,जीवन के इस महासमर में और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Jeevan ki is ranabhoomi mein tak ummeed ka teer zinda hai haar kar bhi jeetane ka jazbaa kabhee kam na hogaa,Jeevan ke is mahaasamar mein aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
तन्हाई के अँधियारे में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,दिल के फफोलों को देखकर मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
घायल की गति घायल जाने हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब कोई चारासाज़ न मिला केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
दिल का आईना जब टूटा यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब आशा की हर किरण बुझी केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

जीवन का यह कठिन सफ़र सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,माटी के इस पुतले में जब चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Jeevan ka yeh kathin safar saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Maatee ke is putale mein jab chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,आँसुओं की इस भाषा को तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
ग़म का मारा पंछी जैसे जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,इस दर्द भरे दिल की सदा धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
कोई न अपना इस जग में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,आँसुओं की इस भाषा को ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

चंद साँसों की मोहलत में अगर किसी के काम आ सको तो समझो ज़िंदगी का हर क़र्ज़ अदा हो गया,जो अपने वचन का पक्का है तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Chand saanson ki mohalat mein agar kisee ke kaam aa sako to samajho zindagi ka har qarz adaa ho gaya,Jo apane vachan ka pakkaa hai tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
आशा का दीप जब बुझने लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
ज्यां-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
ज्यां-पॉल सार्त्र (1905–1980) Father of Existentialism & Nobel Decliner के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
ज्यां-पॉल सार्त्र ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1905–1980 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, ज्यां-पॉल सार्त्र की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
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प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को ज्यां-पॉल सार्त्र ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
ज्यां-पॉल सार्त्र की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
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ज्यां-पॉल सार्त्र कौन थे?
ज्यां-पॉल सार्त्र (1905–1980) Paris, France से ताल्लुक रखने वाले Father of Existentialism & Nobel Decliner के अग्रदूत थे, जिन्हें LEADER OF FRENCH EXISTENTIALISM, AUTHOR OF BEING AND NOTHINGNESS, WINNER (WHO DECLINED) OF 1964 NOBEL PRIZE IN LITERATURE के रूप में जाना जाता है।
ज्यां-पॉल सार्त्र का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
ज्यां-पॉल सार्त्र का मुख्य विचार Existence precedes essence; humanity is condemned to be free; radical personal responsibility for choices; refusal of institutional honours पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
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