सत्य का दीप जब जलता है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Irfan Siddiqui (इरफ़ान सिद्दीक़ी)
इरफ़ान सिद्दीक़ी (1939–2004) Master of Classical Grace & Modern Thought के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘सत्य का दीप जब जलता है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— इरफ़ान सिद्दीक़ी
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
सत्य का दीप जब जलता है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— इरफ़ान सिद्दीक़ी
शेर #2 • शाही पन्ना
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,

‘ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,शांति और संतोष का धन जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।’— इरफ़ान सिद्दीक़ी
शेr #3 • रूहानी शाम
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,

‘हरि सुमिरन में जिसका चित्त प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,भवसागर की लहरों से जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।’— इरफ़ान सिद्दीक़ी
शेर #4 • ज़मर्रद फ़लसफ़ा
हरि सुमिरन में जिसका चित्त प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,
अमर शेर और ग़ज़लें
कर्म की खेती जो जन बोवे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,शांति और संतोष का धन जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,भवसागर की लहरों से जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Ishq ki raah anokhee bande sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Prem ki is paavan ghaatee mein usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
धरती की छाती पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
वाणी में जो अमृत घोले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,धैर्य का दामन जिसने थामे अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
वाणी वही जो घाव भरे और अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

फासले मिट गए जब दिल से बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Phaasale mit gaye jab dil se banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Antar mein jab prem samaayaa jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
माटी का यह देह बना है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,शांति और संतोष का धन जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,माटी का चोला पाकर जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,नेकी की राह पे जो जन जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,साँसों के हर तार पे जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Roma-rom mein ram gaya preetam to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Saanson ke har taar pe jisakaa yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
साधु-संगत की छाया में जो अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
साधु-संगत की छाया में जो रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सदाचार की पावन वेदी पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
नाम और दौलत तो माटी सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हरि की कृपा का पावन साया परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

सांस-सांस में याद तुम्हारी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Waqt ke is kroor prahaar ne tab bheetar jnyaan ka amrit jharanaa phootaa jisane jeevan ko tript kar diyaa.
माटी का यह देह बना है तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,धैर्य का दामन जिसने थामे उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हृदय में जिसके दया बसी है उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,हरि की कृपा का पावन साया जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

वक़्त की आँधी ने तोड़े जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब धैर्य की सीमा टूट गई तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
Waqt ki aandhee ne tore jab saaya bhi saath na de tab dheeraj hi manushy ka ekamaatr sachchaa saathee bane,Jab dhairy ki seemaa toot gayi tanhaaee hi ab sang chalatee hai saaya bhi dhoop dhalate hi saath chhor jaataa hai.
सत्य के पावन पथ पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
अहंकार की दीवारें जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,अहंकार का त्याग किया जिसने अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य-अहिंसा की राहों पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,शांति और संतोष का धन जो वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

घायल की गति घायल जाने अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,ग़म की इस गहरी रात में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Gham ki is gaharee raat mein dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
नदिया की धारा बहती जावे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
वाणी वही जो घाव भरे और निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
अहंकार की दीवारें जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्य-अहिंसा की राहों पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

नेकी की राह पे जो जन करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्संगति का पावन प्रभाव चलने वाले के कदम कभी डगमगाते नहीं ईश्वर स्वयं उसका मार्गदर्शक बनता है।
Nekee ki raah pe jo jan karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Satsangati ka paavan prabhaav chalane vaale ke kadam kabhee dagamagaate nahi eeshvar svayan usakaa maargadarshak banataa hai.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्य का दीप जब जलता है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जीवन की सच्ची पूँजी वही मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jeevan ki sachchee poonjee vahee manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
साधु-संगत की छाया में जो भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,जीवन का यह पावन सूत्र जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
दीन-दुखी का आसरा बनकर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,भवसागर की लहरों से जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

जिसने मन को जीत लिया है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,जीवन का असली आनंद वही पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Jisane man ko jeet liyaa hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Jeevan ka asalee aanand vahee paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
संतन की संगति में आकर रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,सत्संग की निर्मल गंगा में उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
नाम और दौलत तो माटी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,भवसागर की लहरों से जो अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

अंतर्मन के सन्नाटे में जब व्यापक रूप से समाया हुआ है अज्ञानी बाहर ढूँढता ज्ञानी अंतर में पा लेता है,जिसने सर्वत्र एक ही परमात्मा देखा है जो समस्त कर्तापन के भाव से मुक्त होकर केवल साक्षी भाव में जीता है।
Antarman ke sannaate mein jab vyaapak roop se samaayaa hua hai ajnyaanee baahar dhoondhataa jnyaanee antar mein paa letaa hai,Jisane sarvatr ek hi paramaatmaa dekhaa hai jo samast kartaapan ke bhaav se mukt hokar keval saakshee bhaav mein jeetaa hai.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,अमर प्रेम की अमर कहानी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
मन की वीणा बज उठी जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन घाटी में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
तेरे मिलन की आस में बीते दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

मोह-निशा जब ढलती है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,जब 'अहं' का विसर्जन हो गया जो मुक्त हो गया उसे संसार की कोई भी चिंता कभी स्पर्श नहीं कर सकती।
Moha-nishaa jab dhalatee hai prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Jab 'ahan' ka visarjan ho gaya jo mukt ho gaya use sansaar ki koee bhi chintaa kabhee sparsh nahi kar sakatee.
मन मंदिर में बसा जो मूरति बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,मन मंदिर की पावन आरती मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अंतर में जब प्रेम समाया एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,सच्चे प्रेम की यही निशानी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की इस पावन घाटी में उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

मैं और मेरा का भ्रम है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,परम चेतना का आलोक जब फैला तो समस्त जगत उस एक ही अनंत परमात्मा का स्वरूप नज़र आने लगा।
Main aur mera ka bhram hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Param chetanaa ka aalok jab phailaa to samast jagat us ek hi anant paramaatmaa ka svaroop nazar aane lagaa.
तेरी याद का पावन साया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम के रंग में रंग कर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,अंतर में जब प्रेम समाया सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम रंग में जो रंग गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

कर्म की खेती जो जन बोवे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,साधु पुरुष की वाणी कभी अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Karm ki khetee jo jan bove antaratam mein andhakaar ka har paharaa pighal jaataa hai,Saadhu purush ki vaanee kabhee apane antar mein sanjoe woh is nashvar sansaar mein sabase baraa samraat hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जब से नैना रूप में उलझे उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम गली अति साँकरी जामें संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जब से नैना रूप में उलझे प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी याद का पावन साया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

साधु-संगत की छाया में जो रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,सदाचार की पावन वेदी पर व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo ramaa rahe har dam use sansaar ki koee chintaa kabhee sataa nahi sakatee,Sadaachaar ki paavan vedee par vyarth nahi jaatee woh sadiyon tak bhatake huon ko sahi raah dikhaatee hai.
नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,मन मंदिर की पावन आरती जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम सुधा का रस जो चखा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम रंग में जो रंग गया दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,जिसने प्रेम का मर्म समझ उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Satkarmon ki amit jyoti jab antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu rahataa hai jisane doosaron ke aansoo ponchh kar unake cheharon pe muskaan laa dee.
फासले मिट गए जब दिल से बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरे दीदार की एक झलक ने हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जब से नैना रूप में उलझे अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,साँसों के हर तार पे जिसका जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,वाणी में जिसके मिठास घुली उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Satkarmon ki amit jyoti jab sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Vaanee mein jisake mithaas ghulee use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
इश्क़ जब रूह में उतरता है बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम का दीपक अंतर में जो कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
तेरे रूप की पावन झांकी बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के रंग में रंग कर एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
मन की वीणा बज उठी जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अमर प्रेम की अमर कहानी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
तेरे दीदार की एक झलक ने अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।

प्रेम गली अति साँकरी जामें संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Prem galee ati saankaree jaamen sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Prem ki mastee mein jo jhoomaa use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
नैनों के दर्पण में बसा जब जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के चरणों में जिसने संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
नैनन आगे तू ही तू नाचे बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,हृदय के पावन सिंहासन पर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरी याद का पावन साया से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

मन की वीणा बज उठी जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अमर प्रेम की अमर कहानी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Man ki veenaa baj uthee jab haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Amar prem ki amar kahaanee man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
तेरे रूप की पावन झांकी से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,अंतर में जब प्रेम समाया जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,साँसों के हर तार पे जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे दीदार की एक झलक ने दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम सुधा का रस जो चखा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
तेरे दीदार की एक झलक ने जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

प्रेम रंग में जो रंग गया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अंतर में जब प्रेम समाया नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Prem rang mein jo rang gaya haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Antar mein jab prem samaayaa naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की मस्ती में जो झूमा कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,मन मंदिर की पावन आरती जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,अंतर में जब प्रेम समाया युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम रंग में जो रंग गया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अंतर में जब प्रेम समाया नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

टूटी नाव भँवर में फँसी रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस लंबी यात्रा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Tootee naav bhanvar mein phansee ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Gham ki is lanbee yaatraa mein akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
तेरे दीदार की एक झलक ने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह की रात जब ढलने लगी जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम रंग में जो रंग गया जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,मन मंदिर की पावन आरती सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
घायल की गति घायल जाने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई चारासाज़ न मिला जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
जिसके दिल पर बीत रही सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब नयनों के सब आँसू सूखे जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

ग़म का मारा पंछी जैसे सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ग़म के मारों की बस्ती में केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
Gham ka maaraa panchhee jaise sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Gham ke maaron ki bastee mein keval vahee samajh sakataa hai jisake seene mein kabhee aisaa hi ghaav lagaa ho.
उम्र भर का सफ़र और को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दिल के फफोलों को देखकर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
घायल की गति घायल जाने चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,इस दर्द भरे दिल की सदा सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
सांस-सांस में याद तुम्हारी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
आँखों के आँसू जब सूखे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,इस दर्द भरे दिल की सदा पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।

आँखों में जो नमी है वो बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,दर्द का यह गहरा सागर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Aankhon mein jo namee hai wo baahar hansataa jaae duniya ko kyaa khabar ki andar kitanee aag lagee hai,Dard ka yeh gaharaa saagar sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
सपनों के महल जब टूटे हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,दिल के फफोलों को देखकर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
भीतर-भीतर घुटता जाए चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,ग़म की इस गहरी रात में धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
वक़्त की आँधी ने तोड़े जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म के मारों की बस्ती में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

संतन की संगति में आकर मेहनत की राह पे चला उसने बंजर धरती से भी सोना उपजा के दिखा दिया,जो गिरतों को उठाना जानता है उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Santan ki sangati mein aakar mehanat ki raah pe chalaa usane banjar dharatee se bhi sonaa upajaa ke dikhaa diyaa,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
टूटी नाव भँवर में फँसी रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ग़म की इस लंबी यात्रा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
तन्हाई के अँधियारे में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,ग़म की इस आँधी ने जब तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
टूटी नाव भँवर में फँसी जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
टूटी नाव भँवर में फँसी कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ग़म की इस गहरी रात में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी जिसने मानव धर्म सँभाला उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है,संतोषी सदा सुखी रहता है अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Kshana-kshan beete aayu suhaanee jisane maanav dharm sanbhaalaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai,Santoshee sadaa sukhee rahataa hai apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
जिसके दिल पर बीत रही और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ग़म की इस गहरी रात में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
विरह की अगन में जलता मन लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
अकेलेपन की धूप जब साए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब नयनों के सब आँसू सूखे चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
वक़्त की आँधी ने तोड़े जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब धैर्य की सीमा टूट गई तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

माटी का यह चोला पाकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य और धर्म की राहों पर जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Maatee ka yeh cholaa paakar bhaj le raam ka naamaa ant samay jab aavegaa tab sang na aave dhaamaa,Saty aur dharm ki raahon par jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
उम्र भर का सफ़र और पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
इरफ़ान सिद्दीक़ी (Irfan Siddiqui) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
इरफ़ान सिद्दीक़ी (1939–2004) Master of Classical Grace & Modern Thought के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
इरफ़ान सिद्दीक़ी ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1939–2004 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, इरफ़ान सिद्दीक़ी की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को इरफ़ान सिद्दीक़ी ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
इरफ़ान सिद्दीक़ी की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, इरफ़ान सिद्दीक़ी हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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पसंद का शेर चुनिए, मनपसंद टेम्पलेट लगाइए, फ़ॉन्ट और रंग सजाइए और एक क्लिक में सेव कर लीजिए।
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“तेरी खामोशियों में भी एक कायनात बसती है...”
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इरफ़ान सिद्दीक़ी के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
इरफ़ान सिद्दीक़ी के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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इरफ़ान सिद्दीक़ी कौन थे?
इरफ़ान सिद्दीक़ी (1939–2004) Budaun, Uttar Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Master of Classical Grace & Modern Thought के अग्रदूत थे, जिन्हें VOICE OF DARIYA-E-GUMAN, TRANSLATOR OF KALIDASA INTO URDU, MASTER OF BUDAUNI POETIC HERITAGE के रूप में जाना जाता है।
इरफ़ान सिद्दीक़ी का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
इरफ़ान सिद्दीक़ी का मुख्य विचार Fusion of classical Sanskrit aesthetics with chaste Urdu Ghazal, quiet meditative poise, dignity amidst cultural decay पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
इरफ़ान सिद्दीक़ी की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
इरफ़ान सिद्दीक़ी की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
इरफ़ान सिद्दीक़ी का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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इरफ़ान सिद्दीक़ी का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
इरफ़ान सिद्दीक़ी की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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