दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
Hashim Shah (हाशिम शाह)
ہاشم شاہ
हाशिम शाह महाराजा रणजीत सिंह के दरबारी महाकवि थे, जिनका क़िस्सा 'सस्सी पुन्नूं' और दोहड़े पंजाबी साहित्य की अमर निधि हैं।

दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— हाशिम शाह • SIKH EMPIRE & PUNJAB GOLDEN AGE

दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
— हाशिम शाह • SIKH EMPIRE & PUNJAB GOLDEN AGE
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‘दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्संग की निर्मल गंगा में उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।’— हाशिम शाह
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,

‘कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।’— हाशिम शाह
शेर #2 • शाही पन्ना
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,

‘दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जीवन का यह पावन सूत्र जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।’— हाशिम शाह
शेr #3 • रूहानी शाम
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,
अमर शेर और ग़ज़लें
कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,जीवन का यह पावन सूत्र जो रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
अहंकार की दीवारें जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,धैर्य का दामन जिसने थामे अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

प्रेम गली अति साँकरी जामें जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
Prem galee ati saankaree jaamen jab se man mein samaayaa jeevan ki har tapatee dhoop sheetal chhaanv ban gayi,Prem ki is paavan dhaaraa mein prem ke paavan charanon mein usane eeshvar ka saakshaat darshan paa liyaa.
सत्य का दीप जब जलता है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,हृदय में जिसके दया बसी है अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
वाणी में जो अमृत घोले अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,वाणी में जिसके मिठास घुली जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
संतन की संगति में आकर स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,नेकी की राह पे जो जन रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अंतर में जब प्रेम समाया कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
Saanson ki saragam mein ghul gaya sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Antar mein jab prem samaayaa ki har haal mein raazee rahe sukh mein bhi aur duhkh mein bhi sheesh navaae.
नदिया की धारा बहती जावे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सदाचार की पावन वेदी पर अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,मन के मैल को जिसने धोया उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,हृदय में जिसके दया बसी है अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

प्रेम गली अति साँकरी जामें हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Prem galee ati saankaree jaamen haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Prem ke is paavan teerath mein use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
आशा तृष्णा सब छूटी जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,हृदय में जिसके दया बसी है उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
माटी का यह देह बना है का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
सत्य का दीप जब जलता है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

उम्र भर का सफ़र और यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म की इस आँधी ने जब केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Umr bhar ka safar aur yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Gham ki is aandhee ne jab keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सदाचार की पावन वेदी पर अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
अहंकार की दीवारें जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
वाणी वही जो घाव भरे और सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

आँखों में जो नमी है वो भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Aankhon mein jo namee hai wo bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Zindagi ki is soonee dagar par tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
वाणी वही जो घाव भरे और माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मोह-निशा से जो जन जागा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,अमर नाम जग में उसी का परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
धरती की छाती पर जिसने बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रेम की डोर में बंध गया जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
अहंकार की दीवारें जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

कोई न अपना इस जग में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,ग़म की इस लंबी यात्रा में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
Koee na apanaa is jag mein dina-rain tape angaar ki tarah koee sheetal boond na barase jo man ko thandak de,Gham ki is lanbee yaatraa mein akele hi chalanaa padta hai yahaan koee kisee ka bojh uthaane nahi aataa.
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सदाचार की पावन वेदी पर जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
माटी का यह देह बना है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,परहित में जिसने जीवन सौंपा लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
वाणी में जो अमृत घोले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

ठोकर खाकर जो संभलता चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,जिसने अहंकार को त्याग दिया जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Thokar khaakar jo sanbhalataa chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
माटी का यह देह बना है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्संग की निर्मल गंगा में परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,दीन-बंधु का सहारा बन के अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
मन मंदिर में जो दीप जले स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।

नेकी की राह पे जो जन कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,जो अपने वचन का पक्का है वही सच्चा इंसान है दूसरों को गिराने वाले तो पशु समान होते हैं।
Nekee ki raah pe jo jan kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Jo apane vachan ka pakkaa hai vahee sachchaa insaan hai doosaron ko giraane vaale to pashu samaan hote hain.
कर्म की खेती जो जन बोवे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,हरि की कृपा का पावन साया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सदाचार की पावन वेदी पर अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्य वचन जो मुख से बोले निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

जीवन का यह कठिन सफ़र जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,सदाचार के पावन नियमों पर कि संकट के समय ढाल बन जाए सुख में तो सारी दुनिया साथ चलती है।
Jeevan ka yeh kathin safar jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Sadaachaar ke paavan niyamon par ki sankat ke samay dhaal ban jaae sukh mein to saari duniya saath chalatee hai.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हरि की कृपा का पावन साया उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
धरती की छाती पर जिसने माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मोह-निशा से जो जन जागा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन मंदिर में जो दीप जले रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,भवसागर की लहरों से जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

पानी केरा बुदबुदा अस है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,जो जीवन-मुक्त होकर विचरता है है जो समस्त कर्तापन के भाव से मुक्त होकर केवल साक्षी भाव में जीता है।
Paani keraa budabudaa as hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Jo jeevana-mukt hokar vicharataa hai hai jo samast kartaapan ke bhaav se mukt hokar keval saakshee bhaav mein jeetaa hai.
सत्य का दीप जब जलता है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
मन की वीणा बज उठी जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,अमर प्रेम की अमर कहानी उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम नगर का वासी बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,मन मंदिर की पावन आरती जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

मैं और मेरा का भ्रम जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,अमृत स्वरूप उस परमात्मा में त्याग दिया वह इस संसार में रहते हुए भी विदेही की तरह विचरता है।
Main aur mera ka bhram jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Amrit svaroop us paramaatmaa mein tyaag diyaa woh is sansaar mein rahate hue bhi videhee ki tarah vicharataa hai.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,अमर प्रेम की अमर कहानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

आत्मा अजर-अमर अविनाशी है ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,जब प्रेम और ज्ञान का संगम हुआ तब 'सोऽहं' का दिव्य नाद अंतर में अनहद की तरह गूँजने लगा।
Aatmaa ajara-amar avinaashee hai jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Jab prem aur jnyaan ka sangam hua tab 'soऽhan' ka divy naad antar mein anahad ki tarah goonjane lagaa.
नैनों के दर्पण में बसा जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,मन मंदिर की पावन आरती और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,विरह की रात जब ढलने लगी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरी आँखों की झील में जो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,हृदय के पावन सिंहासन पर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

कर्म की खेती जो जन बोवे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Karm ki khetee jo jan bove jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Satya-ahinsaa ki raahon par jisane apane praan nyauchhaavar kie usakee keerti gaathaa yuga-yugaantar tak gaaee jaatee hai.
प्रियतम की याद में जो नैना तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रेम गली अति साँकरी जामें हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अंतर में जब प्रेम समाया कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
मन की वीणा बज उठी जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने प्रेम का मर्म समझ एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

सत्य का दीप जब जलता है तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Saty ka deep jab jalataa hai to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Prabhu charanon mein jisakaa dhyaan avichal kadam barhaataa hai usakaa yash teenon lokon mein sadaa phailataa hai.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जब से नैना रूप में उलझे उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,सच्चे प्रेम की यही निशानी उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम रंग में जो रंग गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम के इस पावन तीरथ में मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,सच्चे प्रेम की यही निशानी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

वाणी में जो अमृत घोले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,अमर नाम जग में उसी का मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
Vaanee mein jo amrit ghole nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Amar naam jag mein usee ka maanav dharm nibhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar dhaam ko jaataa hai.
साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अंतर में जब प्रेम समाया कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
बिरहा की आग में तप के कुंदन बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह का हर इक आँसू बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,विरह की रात जब ढलने लगी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

सत्य का दीप जब जलता है प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Saty ka deep jab jalataa hai prabhu charanon chit laagaa amar abhay pad soee paave jo jag se virakt jaagaa,Saadhu purush ki vaanee kabhee jisane apane praan nyauchhaavar kie usakee keerti gaathaa yuga-yugaantar tak gaaee jaatee hai.
तेरे रूप की पावन झांकी दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,जिसने प्रेम का मर्म समझ लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह का हर इक आँसू बनकर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन घाटी में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

प्रेम गली अति साँकरी जामें हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,अंतर में जब प्रेम समाया कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Prem galee ati saankaree jaamen haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Antar mein jab prem samaayaa ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
प्रेम बिना सब सूना जग में डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,विरह की रात जब ढलने लगी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
नैनन आगे तू ही तू नाचे अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,अमर प्रेम की अमर कहानी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,अंतर में जब प्रेम समाया उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

मन की वीणा बज उठी जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन घाटी में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Man ki veenaa baj uthee jab ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Prem ki is paavan ghaatee mein use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
इश्क़ जब रूह में उतरता है दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम का दीपक अंतर में जो युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम के इस पावन तीरथ में उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
मन की वीणा बज उठी जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम का अनुराग ही जिसका मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

मन मंदिर में बसा जो मूरति से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Man mandir mein basaa jo moorati se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Virah ka har ik aansoo banakar yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम सुधा का रस जो चखा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,जिसने प्रेम का मर्म समझ अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रियतम की याद में जो नैना दिल का भेद खुला मौन की भाषा में सब कुछ कह दिया कुछ न छुपाया,प्रेम का दीपक अंतर में जो युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
मन मंदिर में बसा जो मूरति से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

घायल की गति घायल जाने चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,आँसुओं की इस भाषा को तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Aansuon ki is bhaashaa ko to ghairon se kyaa shikavaa karanaa dil ne chupachaap sab kuchh sahanaa seekh liyaa.
फासले मिट गए जब दिल से बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन धारा में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे दीदार की एक झलक ने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तन्हाई के अँधियारे में कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
जिसके दिल पर बीत रही सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

ग़म की तपती दुपहरी में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब कोई चारासाज़ न मिला धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Gham ki tapatee dupaharee mein sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Jab koee chaaraasaaz na mila dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
विरह की अगन में जलता मन दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
अकेलेपन की धूप जब साए हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,जब नयनों के सब आँसू सूखे तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
उम्र भर का सफ़र और यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म की इस आँधी ने जब केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
तन्हाई के अँधियारे में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,इस दर्द भरे दिल की सदा तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

भीतर-भीतर घुटता जाए सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,ग़म की इस आँधी ने जब ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae sab matalab ke yaar sukh mein sab sang naachate duhkh mein munh mod lete hain,Gham ki is aandhee ne jab zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
ग़म का मारा पंछी जैसे जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ग़म की इस लंबी यात्रा में सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
तन्हाई के अँधियारे में लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
वक़्त की आँधी ने तोड़े रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
दर्द की रात में जब कोई दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब कोई सहारा न बचा पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

ज़िंदगी और कुछ नहीं बस उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,सत्य और धर्म की राहों पर पाता है जो दूसरों के काम आए केवल अपने लिए जीने वाले तो मृत समान हैं।
Zindagi aur kuchh nahi bas usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Saty aur dharm ki raahon par paataa hai jo doosaron ke kaam aae keval apane lie jeene vaale to mrit samaan hain.
घायल की गति घायल जाने चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,आँसुओं की इस भाषा को तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
तन्हाई के अँधियारे में बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जीवन के इस कठिन मोड़ पर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
छाले पड़े हैं पाँवों में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,अकेलेपन की इस राह पर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
छाले पड़े हैं पाँवों में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

सत्कर्मों की अमिट पूँजी अगर उठने का हौसला हो हर ठोकर इंसान को चलने का नया हुनर सिखाती है,जो अपने वचन का पक्का है और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Satkarmon ki amit poonjee agar uthane ka hausalaa ho har thokar insaan ko chalane ka naya hunar sikhaatee hai,Jo apane vachan ka pakkaa hai aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
सपनों के महल जब टूटे लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब आशा की हर किरण बुझी चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
दर्द की रात में जब कोई पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
घायल की गति घायल जाने हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,जब कोई चारासाज़ न मिला तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
आँखों में जो नमी है वो भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।

गिरने में कोई हार नहीं ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,जो अपने वचन का पक्का है तब केवल सत्कर्म ही साथ चलेंगे बाकी सब धन-दौलत यहीं धरा रह जाएगा।
Girane mein koee haar nahi hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Jo apane vachan ka pakkaa hai tab keval satkarm hi saath chalenge baakee sab dhana-daulat yaheen dharaa rah jaaegaa.
तन्हाई के अँधियारे में दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
हाशिम शाह (Hashim Shah) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
हाशिम शाह महाराजा रणजीत सिंह के दरबारी महाकवि थे, जिनका क़िस्सा 'सस्सी पुन्नूं' और दोहड़े पंजाबी साहित्य की अमर निधि हैं।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
हाशिम शाह ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Sikh Empire & Punjab Golden Age के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, हाशिम शाह की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को हाशिम शाह ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
हाशिम शाह की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, हाशिम शाह हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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हाशिम शाह के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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हाशिम शाह कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
हाशिम शाह (1735–1843) Punjabi/Classical साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
हाशिम शाह की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
हाशिम शाह की रचनाओं के केंद्र में सस्सी-पुन्नूं का अमर त्याग व विरह, तपती रेत और कठिन सफ़र का रूपक, सच्चे प्रेम की सर्वोच्च परीक्षा, सांसारिक नश्वरता का तीखा बोध, पंजाबी जुबान की मिठास जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
हाशिम शाह की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
हाशिम शाह की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
हाशिम शाह का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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