आशा तृष्णा सब छूटी जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,दीन-बंधु का सहारा बन के व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई)
हरिशंकर परसाई (1924–1995) Emperor of Hindi Satire (Vyangya) के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,दीन-बंधु का सहारा बन के व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।’— हरिशंकर परसाई
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
आशा तृष्णा सब छूटी जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,

‘दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।’— हरिशंकर परसाई
शेर #2 • शाही पन्ना
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,

‘आशा तृष्णा सब छूटी जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हरि की कृपा का पावन साया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।’— हरिशंकर परसाई
शेr #3 • रूहानी शाम
आशा तृष्णा सब छूटी जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,
अमर शेर और ग़ज़लें
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हरि की कृपा का पावन साया उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,अमर नाम जग में उसी का जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

नैनों के दर्पण में बसा जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अमर प्रेम की अमर कहानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Nainon ke darpan mein basaa jab jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Amar prem ki amar kahaanee naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
धरती की छाती पर जिसने सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सदाचार की पावन वेदी पर उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
कर्म की खेती जो जन बोवे स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,हृदय में जिसके दया बसी है अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
नदिया की धारा बहती जावे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

नैनों के दर्पण में बसा जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Nainon ke darpan mein basaa jab sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Prem ki paavan jyoti jagaaee apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
वाणी में जो अमृत घोले माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,नेकी की राह पे जो जन उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
वाणी में जो अमृत घोले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,धैर्य का दामन जिसने थामे लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

तेरे मिलन की आस में बीते पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के रंग में रंग कर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Tere milan ki aas mein beete palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Priyatam ke rang mein rang kar ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
वाणी में जो अमृत घोले घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मन के मैल को जिसने धोया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
अहंकार की दीवारें जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
संतन की संगति में आकर सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस लंबी यात्रा में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Waqt ki aandhee ne tore hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Gham ki is lanbee yaatraa mein arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी का चोला पाकर जिसने उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य वचन जो मुख से बोले जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्य का दीप जब जलता है बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

सांस-सांस में याद तुम्हारी दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए दिल का दर्द पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
Saansa-saans mein yaad tumhaaree doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Toote hue dil ka dard pairon ko lahooluhaan karatee raheen magar musaafir chalataa raha rukanaa na seekhaa.
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,परहित में जिसने जीवन सौंपा अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,अमर नाम जग में उसी का व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
माटी का यह देह बना है सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

आशा का दीप जब बुझने हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,अकेलेपन की इस राह पर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Aashaa ka deep jab bujhane hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Akelepan ki is raah par keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
दीन-दुखी का आसरा बनकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,भवसागर की लहरों से जो उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
वाणी में जो अमृत घोले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,मन के मैल को जिसने धोया लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी का चोला पाकर जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।

समय का पहिया चलता जाए मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,कर्म की खेती में जो पसीना का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Karm ki khetee mein jo paseenaa ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,सत्य वचन जो मुख से बोले अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,साधु पुरुष की वाणी कभी अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,प्रेम की डोर में बंध गया जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

संतन की संगति में आकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हृदय में जिसके दया और करुणा उसकी राह में कभी अंधेरा नहीं होता वह स्वयं भी तरता है औरों को भी तारता है।
Santan ki sangati mein aakar jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa usakee raah mein kabhee andhera nahi hotaa woh svayan bhi tarataa hai auron ko bhi taarataa hai.
सत्य का दीप जब जलता है मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,मन के मैल को जिसने धोया अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
वाणी में जो अमृत घोले सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,भवसागर की लहरों से जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
नाम और दौलत तो माटी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,शांति और संतोष का धन जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

जिसने मन को जीत लिया जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,जिसने परोपकार का दीप जलाया अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Jisane man ko jeet liyaa jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
नदिया की धारा बहती जावे सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
कर्म की खेती जो जन बोवे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,परहित में जिसने जीवन सौंपा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,भवसागर की लहरों से जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
वाणी वही जो घाव भरे और स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

पानी केरा बुदबुदा अस बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,वैराग्य की इस पावन धारा में तब आत्मा अपने मूल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गई।
Paani keraa budabudaa as barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Vairaagy ki is paavan dhaaraa mein tab aatmaa apane mool shuddh, buddh aur mukt svaroop mein pratishthit ho gayi.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मन के मैल को जिसने धोया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
बिरहा की आग में तप के कुंदन का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की इस पावन धारा में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम गली अति साँकरी जामें सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
साँसों की सरगम में घुल गया संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

कंचन और काँच में जिसने अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,आत्मज्ञान का यह पावन प्रकाश जब अंतर में जागा तो अविद्या का सारा अंधकार पल भर में समाप्त हो गया।
Kanchan aur kaanch mein jisane avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Aatmajnyaan ka yeh paavan prakaash jab antar mein jaagaa to avidyaa ka saaraa andhakaar pal bhar mein samaapt ho gaya.
नैनन आगे तू ही तू नाचे प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,मन मंदिर की पावन आरती जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम रंग में जो रंग गया तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,विरह की रात जब ढलने लगी जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम बिना सब सूना जग में दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
नैनों के दर्पण में बसा जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अमर प्रेम की अमर कहानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

मैं और मेरा का भ्रम उम्र भर भटकता रहा जिसने भीतर झाँक लिया उसने समूचा ब्रह्मांड पा लिया,परमात्मा के इस विराट स्वरूप में जीव और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाए और केवल अद्वैत ही शेष रहे।
Main aur mera ka bhram umr bhar bhatakataa raha jisane bheetar jhaank liyaa usane samoochaa brahmaand paa liyaa,Paramaatmaa ke is viraat svaroop mein jeev aur brahm ka bhed samaapt ho jaae aur keval advait hi shesh rahe.
मन की वीणा बज उठी जब अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
नैन मिले जब नैनन से तब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,जब से नैना रूप में उलझे जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम बिना सब सूना जग में सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अंतर में जब प्रेम समाया जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Duhkh mein sumiran sab koee karai saty ka roop samaayaa jeevan ki har ulajhan ka sahaj samaadhaan paayaa,Amar naam jag mein usee ka ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरी आँखों की झील में जो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,जब से नैना रूप में उलझे जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरे मिलन की आस में बीते तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,हृदय के पावन सिंहासन पर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

सतगुरु मिले तो राह दिखावे मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
Sataguru mile to raah dikhaave man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Aatma-samarpan kiyaa jisane prabhu us par sadaa banaa rahataa hai jo nishkaam bhaav se sab jeevon se prem karataa hai.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
नैनों के दर्पण में बसा जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,जिसने प्रेम का मर्म समझ कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
मन की वीणा बज उठी जब प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,जब से नैना रूप में उलझे तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

अहंकार की दीवारें जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,माटी का चोला पाकर जिसने अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Ahankaar ki deevaaren jab jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Maatee ka cholaa paakar jisane avichal kadam barhaataa hai usakaa yash teenon lokon mein sadaa phailataa hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की पावन ज्योति जगाई अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,आँखों के रस्ते दिल में उतरा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अमर प्रेम की अमर कहानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
साँसों की सरगम में घुल गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,मन के मैल को जिसने धोया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Duhkh mein sumiran sab koee karai to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Man ke mail ko jisane dhoyaa rahataa hai jisane doosaron ke aansoo ponchh kar unake cheharon pe muskaan laa dee.
मन मंदिर में बसा जो मूरति का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम बिना सब सूना जग में तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,विरह की रात जब ढलने लगी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरे रूप की पावन झांकी पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

तेरी आँखों की झील में जो अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Teri aankhon ki jheel mein jo antar ghat mein saanchee duniya ki sudha-budh bisaraaee man ki veenaa baajee,Man mandir ki paavan aaratee to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
नैन मिले जब नैनन से तब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम का दीपक अंतर में जो नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,साँसों के हर तार पे जिसका उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम की इस पावन धारा में प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

तेरे रूप की पावन झांकी पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,हृदय के पावन सिंहासन पर युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Tere roop ki paavan jhaankee palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Hriday ke paavan sinhaasan par yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
मन की वीणा बज उठी जब उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरे मिलन की आस में बीते पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के रंग में रंग कर कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम का दीपक अंतर में जो सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रेम बिना सब सूना जग में जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,जिसने अपना सब कुछ सौंपा कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

तेरे मिलन की आस में बीते सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
Tere milan ki aas mein beete sundar shyaam sanehee usakee ek jhalak pe vaaroon yeh nashvar tana-dehee,Jisane apanaa sab kuchh saunpaa sansaar ki sudha-budh bisaraaee keval preetam ki soorat yaad rahi.
बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,सच्चे आशिक़ की पहचान यही एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रियतम की याद में जो नैना अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की इस पावन धारा में जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
तेरे मिलन की आस में बीते सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।

दिल का आईना जब टूटा हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस आँधी ने जब तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
Dil ka aaina jab tootaa haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Gham ki is aandhee ne jab tab prabhu kripaa ki varshaa hui aur jalate hue man ko shaanti mil gayi.
नैन मिले जब नैनन से तब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम का दीपक अंतर में जो जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के रंग में रंग कर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
आशा का दीप जब बुझने पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ग़म की इस आँधी ने जब ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
टूटे दिल की ख़ामोशी में सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,टूटे हुए दिल का दर्द तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।

आँखों के आँसू जब सूखे अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द का यह गहरा सागर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Aankhon ke aansoo jab sookhe antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Dard ka yeh gaharaa saagar sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
छाले पड़े हैं पाँवों में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दर्द की भट्टी में तपकर ही केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
नैनों से जो नीर बहे जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,टूटे हुए दिल का दर्द अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
वक़्त की आँधी ने तोड़े हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस लंबी यात्रा में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
मन के कोने में सिमटी और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।

ग़म की तपती दुपहरी में दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब आशा की हर किरण बुझी सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Gham ki tapatee dupaharee mein doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Jab aashaa ki har kiran bujhee sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
विरह की अगन में जलता मन जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,ग़म की इस आँधी ने जब धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
विरह की अगन में जलता मन किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
सांस-सांस में याद तुम्हारी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब नयनों के सब आँसू सूखे पार करना ही पड़ेगा किनारे पर बैठ कर रोने से कोई पार नहीं होता।
सांस-सांस में याद तुम्हारी पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।

वाणी में जो अमृत घोले जिसके पास है संचित वह संसार के समस्त वैभवों से अधिक सुखी और शांत है,जीवन की सच्ची पूँजी वही विजय उसी की होती है जो सत्य और न्याय के पक्ष में अविचल खड़ा रहता है।
Vaanee mein jo amrit ghole jisake paas hai sanchit woh sansaar ke samast vaibhavon se adhik sukhee aur shaant hai,Jeevan ki sachchee poonjee vahee vijay usee ki hotee hai jo saty aur nyaay ke paksh mein avichal kharaa rahataa hai.
दिल का आईना जब टूटा हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस आँधी ने जब तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
दर्द की रात में जब कोई अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,आँसुओं की इस भाषा को केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
भीतर-भीतर घुटता जाए को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,ग़म की इस लंबी यात्रा में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
जिसके दिल पर बीत रही यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,दिल के फफोलों को देखकर अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

मन मंदिर में जो दीप सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य और धर्म की राहों पर जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Man mandir mein jo deep saty ka beej ugaayaa usakee keerti amar rahegee jab tak gagan mein chhaayaa,Saty aur dharm ki raahon par jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,टूटे हुए दिल का दर्द पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
अकेलेपन की धूप जब साए हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अकेलेपन की इस राह पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
भीतर-भीतर घुटता जाए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
सांस-सांस में याद तुम्हारी दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,टूटे हुए दिल का दर्द पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

धरती की छाती पर जिसने ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,जीवन के इस महासमर में जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Dharatee ki chhaatee par jisane hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Jeevan ke is mahaasamar mein jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
दिल का आईना जब टूटा भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
हरिशंकर परसाई (Harishankar Parsai) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
हरिशंकर परसाई (1924–1995) Emperor of Hindi Satire (Vyangya) के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
हरिशंकर परसाई ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1924–1995 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, हरिशंकर परसाई की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को हरिशंकर परसाई ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
हरिशंकर परसाई की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, हरिशंकर परसाई हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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हरिशंकर परसाई के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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हरिशंकर परसाई कौन थे?
हरिशंकर परसाई (1924–1995) Jamani, Hoshangabad, Madhya Pradesh से ताल्लुक रखने वाले Emperor of Hindi Satire (Vyangya) के अग्रदूत थे, जिन्हें FATHER OF MODERN HINDI LITERARY SATIRE, SAHITYA AKADEMI AWARDEE, FEARLESS SOCIAL CRITIC के रूप में जाना जाता है।
हरिशंकर परसाई का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
हरिशंकर परसाई का मुख्य विचार Satire as an instrument of social surgery, puncturing political hypocrisy, exposing institutional corruption and moral rot पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
हरिशंकर परसाई की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
हरिशंकर परसाई की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
हरिशंकर परसाई का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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हरिशंकर परसाई की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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