जो दिल इश्क़ की आग से ज़िंदा हुआ, उसकी मौत का कोई नाम-ओ-निशान नहीं।
Hafez (Hafiz Shirazi) (हाफ़िज़ शीराज़ी)
हाफ़िज़ शीराज़ी (1315–1390) World/Classical Persian साहित्य के एक अत्यंत प्रतिष्ठित एवं कालजयी रचनाकार हैं, जिनकी कृतियाँ मानवीय संवेदना और दर्शन का अनुपम उदाहरण हैं।
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‘जो दिल इश्क़ की आग से ज़िंदा हुआ, उसकी मौत का कोई नाम-ओ-निशान नहीं।’— हाफ़िज़ शीराज़ी
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
जो दिल इश्क़ की आग से ज़िंदा हुआ, उसकी मौत का कोई नाम-ओ-निशान नहीं।

‘हरगिज़ न मीरद आँ कि दिलश ज़िन्दा शुद ब-इश्क़,जो दिल इश्क़ से ज़िंदा हुआ, उसकी हयात को ज़वाल नहीं।’— हाफ़िज़ शीराज़ी
शेर #2 • शाही पन्ना
हरगिज़ न मीरद आँ कि दिलश ज़िन्दा शुद ब-इश्क़,

‘जो दिल इश्क़ की आग से ज़िंदा हुआ, उसकी मौत का कोई नाम-ओ-निशान नहीं,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।’— हाफ़िज़ शीराज़ी
शेr #3 • रूहानी शाम
जो दिल इश्क़ की आग से ज़िंदा हुआ, उसकी मौत का कोई नाम-ओ-निशान नहीं,
अमर शेर और ग़ज़लें
हरगिज़ न मीरद आँ कि दिलश ज़िन्दा शुद ब-इश्क़,जो दिल इश्क़ से ज़िंदा हुआ, उसकी हयात को ज़वाल नहीं।
जो दिल इश्क़ की आग से ज़िंदा हुआ, उसकी मौत का कोई नाम-ओ-निशान नहीं,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,। Hafez,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।

निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,। Hafez,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,। Hafez,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,। Hafez,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Hafez,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Hafez,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,। Hafez,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Hafez,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Hafez,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,। Hafez,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,। Hafez,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,। Hafez,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Hafez,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Hafez,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,। Hafez,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Hafez,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Hafez,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,। Hafez,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Hafez,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,। Hafez,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,। Hafez,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Hafez,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Hafez,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Hafez,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,। Hafez,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,। Hafez,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Hafez,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Hafez,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Hafez,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,। Hafez,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Hafez,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,। Hafez,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Hafez,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Hafez,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,। Hafez,हज़ार सदियों की तारीकियाँ पिघलने लगीं।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Hafez,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,। Hafez,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,। Hafez,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Hafez,दुआ की शक्ल में जब कोई लफ़्ज़ उभरा था।
सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,। Hafez,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Hafez,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
हज़ार बार ज़माने ने आज़माया हमें,। Hafez,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

हवा का रुख़ था मुख़ालिफ़ मगर चराग़ जला,। Hafez,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Hafez,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।

ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,। Hafez,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Hafez,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,। Hafez,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।

तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
सफ़र की गर्द ने चेहरों के रंग बदल डाले,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,। Hafez,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,। Hafez,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।

तिरी तलाश में भटके तो ये सबक़ सीखा,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
ग़म-ए-हयात के तूफ़ान से गुज़र के भी,। Hafez,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,। Hafez,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,। Hafez,कि हमने रात की आँखों में ख़्वाब देखे हैं।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Hafez,कोई पुकार न थी बस ख़ामोश साया था।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Hafez,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Hafez,ख़ुदी को पा लिया जब सब कुछ लुटा दिया हमने।

हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,। Hafez,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
हुजूम-ए-शहर में तन्हाई साथ चलती है,। Hafez,दिलों के आईने लेकिन कभी ग़ुबार न थे।
निगाह-ए-शौक़ ने हर मंज़र पहचान लिया,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।
ज़मीं की गोद में हर दर्द सो गया चुपचाप,। Hafez,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
वफ़ा की राह में पत्थर बहुत मिले लेकिन,। Hafez,यक़ीं की लौ को बुझाना किसी के बस न रहा।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,। Hafez,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।

सुख़न के आईने में सच की रौशनी देखी,। Hafez,कोई भी शख़्स यहाँ अपने घर नहीं पहुँचा।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Hafez,तिरे बग़ैर ये दुनिया अजब वीराना थी।
तिरी गली से जो गुज़रे तो ये गुमाँ गुज़रा,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,। Hafez,तिरी रज़ा पे मगर सर झुका दिया हमने।

शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
तिरे करम का सहारा जो मिल गया दिल को,। Hafez,फिर उसके बाद ज़माने का कोई डर न रहा।
शब-ए-फ़िराक़ के तारे गवाही देते हैं,। Hafez,कि जैसे हम किसी बिछड़े हुए ज़माने से थे।
नसीब में जो लिखा था वही मिला हमको,। Hafez,क़दम-ब-क़दम तिरा नक़्श-ए-वफ़ा नज़र आया।

दिलों की बस्ती में जब भी कोई चराग़ जला,। Hafez,हम अपने अहद की तस्वीर बन के उभरे हैं।
हाफ़िज़ शीराज़ी (Hafez (Hafiz Shirazi)) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
हाफ़िज़ शीराज़ी (1315–1390) World/Classical Persian साहित्य के एक अत्यंत प्रतिष्ठित एवं कालजयी रचनाकार हैं, जिनकी कृतियाँ मानवीय संवेदना और दर्शन का अनुपम उदाहरण हैं।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
हाफ़िज़ शीराज़ी ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Classical Persian Ghazal (1315–1390) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, हाफ़िज़ शीराज़ी की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को हाफ़िज़ शीराज़ी ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
हाफ़िज़ शीराज़ी की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, हाफ़िज़ शीराज़ी हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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