प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Guru Nanak Dev (गुरु नानक देव)
गुरु नानक देव (1469–1539) Spiritual Master & Founder of Sikhism के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।’— गुरु नानक देव
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,

‘मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।’— गुरु नानक देव
शेर #2 • शाही पन्ना
मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,

‘मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।’— गुरु नानक देव
शेr #3 • रूहानी शाम
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,
अमर शेर और ग़ज़लें
मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,नेकी की राह पे जो जन जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

प्रियतम की याद में जो नैना बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम के इस पावन तीरथ में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ke is paavan teerath mein to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
सत्य के पावन पथ पर जिसने सागर से मिलन को मन पावन हो जाए जब हरि गुण दिन-रात सुनावे,साधु पुरुष की वाणी कभी निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,नेकी की राह पे जो जन अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,मन के मैल को जिसने धोया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
वाणी में जो अमृत घोले भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,साधु पुरुष की वाणी कभी अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

इश्क़ का सौदा जिसने किया वो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जब से नैना रूप में उलझे जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
Ishq ka saudaa jisane kiyaa wo ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Jab se nainaa roop mein ulajhe jo jan vicharaa usane sansaar ki saari chintaaon se mukti paa lee.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,हृदय में जिसके दया बसी है उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,साधु पुरुष की वाणी कभी वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,अमर नाम जग में उसी का रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Ishq ki raah anokhee bande dil ka taar juraa maun mein bhi har ek dharakan teri pukaar banee,Prem ki paavan jyoti jagaaee naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,माटी का चोला पाकर जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
नदिया की धारा बहती जावे निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य-अहिंसा की राहों पर वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

भीतर-भीतर घुटता जाए किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई सहारा न बचा सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab koee sahaaraa na bachaa sab kuchh ujaar diyaa tab toote tinakon se hi naya ghonsalaa banaanaa paraa.
माटी का यह देह बना है निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,हृदय में जिसके दया बसी है उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,माटी का चोला पाकर जिसने रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
सत्य के पावन पथ पर जिसने अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रेम की डोर में बंध गया जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।

टूटे दिल की ख़ामोशी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Toote dil ki khaamoshi mein ko bhi chheen le tab samajh aataa hai ki tanhaaee kise kahate hain,Jab apanon ne hi diye zakhm tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
वाणी वही जो घाव भरे और सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,दीन-बंधु का सहारा बन के अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,मन के मैल को जिसने धोया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,दीन-बंधु का सहारा बन के उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।

घायल की गति घायल जाने कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,इस दर्द भरे दिल की सदा चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane koee shikavaa nahi dil ke veeraane mein bas ek tootee aas ka diyaa hai,Is dard bhare dil ki sadaa chalate-chalate paanv ke chhaale bhi ab manzil ka pataa poochhane lage hain.
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
नाम और दौलत तो माटी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,माटी का चोला पाकर जिसने उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,वाणी में जिसके मिठास घुली अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
वाणी में जो अमृत घोले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।

अहंकार की दीवारें जब जले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सच्चे मित्र की पहचान यही जो आगे बढ़ा उसने असंभव को भी संभव करके दुनिया को दिखा दिया।
Ahankaar ki deevaaren jab jale to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Sachche mitr ki pahachaan yahee jo aage barhaa usane asanbhav ko bhi sanbhav karake duniya ko dikhaa diyaa.
अहंकार की दीवारें जब मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
आशा तृष्णा सब छूटी जब अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,माटी का चोला पाकर जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,माटी का चोला पाकर जिसने जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
नाम और दौलत तो माटी का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,हरि की कृपा का पावन साया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

जीवन की इस रणभूमि में जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,अंत समय जब निकट आएगा और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Jeevan ki is ranabhoomi mein jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Ant samay jab nikat aaegaa aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
सत्य के पावन पथ पर जिसने सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,मन के मैल को जिसने धोया जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
साधु-संगत की छाया में जो घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,दीन-बंधु का सहारा बन के उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
धरती की छाती पर जिसने जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,भवसागर की लहरों से जो व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

समय का पहिया चलता जाए जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,जिसने परोपकार का दीप जलाया और धर्म पे अडिग रहता है उसका मान-सम्मान तीनों लोकों में बढ़ता है।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa aur dharm pe adig rahataa hai usakaa maana-sammaan teenon lokon mein barhataa hai.
संतन की संगति में आकर अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,मोह-निशा से जो जन जागा उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
साधु-संगत की छाया में जो अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,जीवन का यह पावन सूत्र जो उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

साधु वो ही जो अंतर है उसने समस्त वेदों का सार जान लिया बाहर तो केवल माया की छाया है,परमात्मा के इस विराट स्वरूप में जिसने अपना शीश नवाया उसने परम मुक्ति का अमर वरदान प्राप्त कर लिया।
Saadhu wo hi jo antar hai usane samast vedon ka saar jaan liyaa baahar to keval maayaa ki chhaayaa hai,Paramaatmaa ke is viraat svaroop mein jisane apanaa sheesh navaayaa usane param mukti ka amar varadaan praapt kar liyaa.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम के इस पावन तीरथ में युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,आँखों के रस्ते दिल में उतरा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

साधु वो ही जो अंतर ज्ञान के अंकुश से वश में किया वही सच्चा योगी और आत्मवान पुरुष है,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं वह किसी से द्वेष नहीं करता और सब जीवों के कल्याण में रत रहता है।
Saadhu wo hi jo antar jnyaan ke ankush se vash mein kiyaa vahee sachchaa yogee aur aatmavaan purush hai,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen woh kisee se dvesh nahi karataa aur sab jeevon ke kalyaan mein rat rahataa hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,विरह की रात जब ढलने लगी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरे रूप की पावन झांकी डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रेम की इस पावन घाटी में और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम का दीपक अंतर में जो संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रियतम की याद में जो नैना बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम के इस पावन तीरथ में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

ज्ञान की पावन भोर भई अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,अंतःकरण जब दर्पण की तरह तब 'सोऽहं' का दिव्य नाद अंतर में अनहद की तरह गूँजने लगा।
Jnyaan ki paavan bhor bhaee avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Antahkaran jab darpan ki tarah tab 'soऽhan' ka divy naad antar mein anahad ki tarah goonjane lagaa.
साँसों की सरगम में घुल गया बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,अंतर में जब प्रेम समाया और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रियतम के रंग में रंग कर कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
नैन मिले जब नैनन से तब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,सच्चे प्रेम की यही निशानी जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

मन के निर्मल दर्पण में जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Man ke nirmal darpan mein jab to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,सच्चे आशिक़ की पहचान यही मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैनन आगे तू ही तू नाचे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की मस्ती में जो झूमा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
नैनों के दर्पण में बसा जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,अमर नाम जग में उसी का अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree bharam ka pardaa tore amrit ras ki varshaa hove jab moh mukh more,Amar naam jag mein usee ka ajnyaan andhera mitaa ke woh sansaar mein jnyaan ka amar prakaash phailaa jaataa hai.
फासले मिट गए जब दिल से बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम की चाहत में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रियतम की याद में जो नैना रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,विरह की रात जब ढलने लगी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
नैनों के दर्पण में बसा जब संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,विरह की रात जब ढलने लगी सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।

वाणी में जो अमृत घोले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,प्रेम की डोर में बंध गया जो रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
Vaanee mein jo amrit ghole to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Prem ki dor mein bandh gaya jo rahataa hai jisane doosaron ke aansoo ponchh kar unake cheharon pe muskaan laa dee.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,जब से नैना रूप में उलझे जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
तेरी याद का पावन साया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन धारा में जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
साँसों की सरगम में घुल गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैनों के दर्पण में बसा जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम के रंग में रंग कर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

प्रेम की भाषा सबसे न्यारी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Prem ki bhaashaa sabase nyaaree to saaraa jag apanaa laage paraayaa koee na rahe sab mein prabhu roop dikhe,Satkarmon ki amit kamaaee hi jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
नैन मिले जब नैनन से तब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,जिसने अपना सब कुछ सौंपा मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,अमर प्रेम की अमर कहानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन घाटी में अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने प्रेम का मर्म समझ युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

नैनन आगे तू ही तू नाचे जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की मस्ती में जो झूमा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Nainan aage too hi too naache jaise bin paani meen prem hi jeevan ka saar hai prem hi amrit ras,Prem ki mastee mein jo jhoomaa sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
नैनों के दर्पण में बसा जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
नैनों के दर्पण में बसा जब तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम का दीपक अंतर में जो अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
नैनन आगे तू ही तू नाचे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रियतम के रंग में रंग कर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम की इस पावन घाटी में अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Prem ki is paavan ghaatee mein apanee sudh bisaraaee usane janama-maran ke bandhan ko sadaa ke lie tor diyaa.
प्रेम की डोरी बाँध लई जब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,आँखों के रस्ते दिल में उतरा एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रियतम की याद में जो नैना बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,अंतर में जब प्रेम समाया प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

मन की वीणा बज उठी जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,विरह का हर इक आँसू बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
Man ki veenaa baj uthee jab raina-dinaa matavaare anga-ang mein jyoti jalaaee prem ke deepak baare,Virah ka har ik aansoo banakar motee chamakaa prem ki seepee mein anamol jnyaan ka ratn ban gaya.
प्रेम रंग में जो रंग गया अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,अमर प्रेम की अमर कहानी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरी आँखों की झील में जो रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रियतम की चाहत में जिसने जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
मन की वीणा बज उठी जब रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,विरह का हर इक आँसू बनकर मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।

टूटे दिल की ख़ामोशी में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई चारासाज़ न मिला तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Toote dil ki khaamoshi mein kinaaraa kaheen na soojhe prabhu binaa is sankat mein koee paar lagaane vaalaa na dikhe,Jab koee chaaraasaaz na mila tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
रोम-रोम में रम गया प्रीतम उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
तेरी याद का पावन साया रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
नैनों से जो नीर बहे बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,आँसुओं की इस भाषा को कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
मन के कोने में सिमटी किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,अकेलेपन की इस राह पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।

अकेलेपन की धूप जब साए हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,टूटे दिल की इस वीणा से केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Akelepan ki dhoop jab saae hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Toote dil ki is veenaa se keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
ग़म की तपती दुपहरी में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
तन्हाई के अँधियारे में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ग़म की इस लंबी यात्रा में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
भीतर-भीतर घुटता जाए किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई सहारा न बचा सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
छाले पड़े हैं पाँवों में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब सबने मुँह फेर लिया तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

वक़्त की आँधी ने तोड़े लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,जब धैर्य की सीमा टूट गई सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Waqt ki aandhee ne tore lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Jab dhairy ki seemaa toot gayi saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,टूटे दिल की इस वीणा से जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
कोई न अपना इस जग में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अंधेरी रात के सन्नाटे में जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
भीतर-भीतर घुटता जाए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,अंधेरी रात के सन्नाटे में केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
जिसके दिल पर बीत रही पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब नयनों के सब आँसू सूखे तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

हौसलों के तरकश में जब है वही मंज़िल पाता है गिरने वाले को दुनिया कायर कहती संभलने वाले को वीर,माटी के इस पुतले में जब वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Hausalon ke tarakash mein jab hai vahee manzil paataa hai girane vaale ko duniya kaayar kahatee sanbhalane vaale ko veer,Maatee ke is putale mein jab woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब कोई चारासाज़ न मिला तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
नैनों से जो नीर बहे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
उम्र भर का सफ़र और सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,टूटे हुए दिल का दर्द तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
उम्र भर का सफ़र और यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,ग़म के मारों की बस्ती में केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।

जिसने मन को जीत लिया बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जीवन की सच्ची पूँजी वही उसे कोई पराया नहीं लगता उसका हृदय विशाल सागर की तरह उदार होता है।
Jisane man ko jeet liyaa binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jeevan ki sachchee poonjee vahee use koee paraayaa nahi lagataa usakaa hriday vishaal saagar ki tarah udaar hotaa hai.
टूटी नाव भँवर में फँसी और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब नयनों के सब आँसू सूखे जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
आँखों के आँसू जब सूखे हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अंधेरी रात के सन्नाटे में तन्हाई ही अब संग चलती है साया भी धूप ढलते ही साथ छोड़ जाता है।
मन के कोने में सिमटी कोई शिकवा नहीं दिल के वीराने में बस एक टूटी आस का दिया है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।

कर्म की पावन वेदी पर मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,जीवन का असली आनंद वही सत्य का प्राण फूँक दिया वह नश्वर होकर भी अमरता को प्राप्त कर लेता है।
Karm ki paavan vedee par man ka mail dhulaave paaras ka paras paakar jaise lohaa kanchan ho jaave,Jeevan ka asalee aanand vahee saty ka praan phoonk diyaa woh nashvar hokar bhi amarataa ko praapt kar letaa hai.
विरह की अगन में जलता मन बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब कोई सहारा न बचा मनुष्य का आत्मबल निखरता है और वह सोने की तरह चमक उठता है।
गुरु नानक देव (Guru Nanak Dev) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
गुरु नानक देव (1469–1539) Spiritual Master & Founder of Sikhism के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
गुरु नानक देव ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1469–1539 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, गुरु नानक देव की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को गुरु नानक देव ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
गुरु नानक देव की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, गुरु नानक देव हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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गुरु नानक देव के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
गुरु नानक देव के जीवन, प्रसिद्ध ग़ज़लों और साहित्यिक विरासत से जुड़े प्रामाणिक उत्तर।
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गुरु नानक देव कौन थे?
गुरु नानक देव (1469–1539) Nankana Sahib (Talwandi), Punjab से ताल्लुक रखने वाले Spiritual Master & Founder of Sikhism के अग्रदूत थे, जिन्हें FIRST SIKH GURU, BABA NANAK, JAGAT GURU, UNIVERSAL PEACEMAKER के रूप में जाना जाता है।
गुरु नानक देव का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
गुरु नानक देव का मुख्य विचार Ik Onkar (One Creator), Kirat Karo (honest labor), Naam Japna (mindful meditation), Vand Chhako (selfless sharing), casteless equality पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
गुरु नानक देव की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
गुरु नानक देव की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
गुरु नानक देव का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
क्या Emotion Hub पर गुरु नानक देव के शेर कॉपी और शेयर किए जा सकते हैं?
हाँ, Emotion Hub पर आप एक क्लिक में शेर कॉपी कर सकते हैं और सीधे WhatsApp पर शेयर कर सकते हैं।
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गुरु नानक देव का मज़ार या ऐतिहासिक स्थल कहाँ स्थित है?
गुरु नानक देव की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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