आशा तृष्णा सब छूटी जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,वाणी में जिसके मिठास घुली अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
Ghananand (घनानन्द)
घनानन्द रीतिमुक्त काव्यधारा के सिरमौर कवि हैं, जिन्हें 'प्रेम की पीर' का अमर गायक कहा जाता है।
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,वाणी में जिसके मिठास घुली अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।’— घनानन्द
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
आशा तृष्णा सब छूटी जब अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,

‘साधु-संगत की छाया में जो तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।’— घनानन्द
शेर #2 • शाही पन्ना
साधु-संगत की छाया में जो तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,

‘साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— घनानन्द
शेr #3 • रूहानी शाम
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,
अमर शेर और ग़ज़लें
साधु-संगत की छाया में जो तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,मन के मैल को जिसने धोया जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo palakan moondoon to ghat mein paaoon aisaa alaukik prem jagaa jo kabhee mitataa nahi,Prem ki is paavan ghaatee mein jisane dubakee lagaaee woh bhavasaagar ki seemaa se pare amar ho gaya.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
माटी का यह देह बना है माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,साधु पुरुष की वाणी कभी उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,परहित में जिसने जीवन सौंपा जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हरि की कृपा का पावन साया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।

साँसों की सरगम में घुल गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Saanson ki saragam mein ghul gaya banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Prem ki is paavan dhaaraa mein to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
सत्य का दीप जब जलता है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्य का दीप जब जलता है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,भवसागर की लहरों से जो उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,हृदय में जिसके दया बसी है लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,नेकी की राह पे जो जन अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

प्रेम बिना सब सूना जग में उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
Prem binaa sab soonaa jag mein us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Prem nagar ka vaasee banakar usane donon jahaan bhulaa diye prem ke nashe mein woh mast kalandar hua.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,माटी का चोला पाकर जिसने उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मोह-निशा से जो जन जागा उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

आँखों के आँसू जब सूखे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
Aankhon ke aansoo jab sookhe jeevan ki veeraanee kisako dikhaaen apane dil ke ye gahare zakhm,Dard ki is ekaant gufaa mein arsh tak pahunchee jahaan eeshvar ne apane bande ke aansoo ponchh kar shaanti dee.
दीन-दुखी का आसरा बनकर सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्संग की निर्मल गंगा में उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
नदिया की धारा बहती जावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,मन के मैल को जिसने धोया व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

आशा का दीप जब बुझने अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द की भट्टी में तपकर ही ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Aashaa ka deep jab bujhane antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Dard ki bhattee mein tapakar hi zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,प्रेम की डोर में बंध गया जो मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्य-अहिंसा की राहों पर लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,सत्य-अहिंसा की राहों पर अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

आशा का दीप जब बुझने यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Aashaa ka deep jab bujhane yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Jab dhairy ki seemaa toot gayi keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
धरती की छाती पर जिसने अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,जीवन का यह पावन सूत्र जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
मन मंदिर में जो दीप जले घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हृदय में जिसके दया बसी है रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
मन मंदिर में जो दीप जले अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,नेकी की राह पे जो जन व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,जो गिरतों को उठाना जानता है उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Jo giraton ko uthaanaa jaanataa hai use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
साधु-संगत की छाया में जो जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मन के मैल को जिसने धोया उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
धरती की छाती पर जिसने मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य वचन जो मुख से बोले रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
वाणी वही जो घाव भरे और सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
दुःख में सुमिरन सब कोई करै सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।

गिरने में कोई हार नहीं जो जस करई सो तस फल चाखा कर्म ही पूजा है कर्म ही जीवन की पहचान है,जिसने अहंकार को त्याग दिया और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Girane mein koee haar nahi jo jas karaee so tas phal chaakhaa karm hi poojaa hai karm hi jeevan ki pahachaan hai,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,साधु पुरुष की वाणी कभी मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
अहंकार की दीवारें जब निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
धरती की छाती पर जिसने का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,साधु पुरुष की वाणी कभी रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,हृदय में जिसके दया बसी है अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

जिसने मन को जीत लिया ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,हृदय में जिसके दया और करुणा अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Jisane man ko jeet liyaa hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,धैर्य का दामन जिसने थामे व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
साधु-संगत की छाया में जो जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
वाणी वही जो घाव भरे और अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,सत्य वचन जो मुख से बोले रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।

कंचन और काँच में जिसने बरसी जब साधक ने ध्यान लगाया जनम-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,परमात्मा के इस विराट स्वरूप में तब आत्मा अपने मूल शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वरूप में प्रतिष्ठित हो गई।
Kanchan aur kaanch mein jisane barasee jab saadhak ne dhyaan lagaayaa janama-maran ka kathin pheraa sahaj hi kat gaya,Paramaatmaa ke is viraat svaroop mein tab aatmaa apane mool shuddh, buddh aur mukt svaroop mein pratishthit ho gayi.
आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हरि की कृपा का पावन साया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन घाटी में सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
तेरी आँखों की झील में जो तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,आँखों के रस्ते दिल में उतरा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।

भवसागर की लहरों से जो मानुष की जात देखत ही छिप जाएगा ज्यों तारा परभात,परमानंद का यह अलौकिक रस जिसने स्नान किया उसने संसार के समस्त दुःखों से मुक्ति पा ली।
Bhavasaagar ki laharon se jo maanush ki jaat dekhat hi chhip jaaegaa jyon taaraa parabhaat,Paramaanand ka yeh alaukik ras jisane snaan kiyaa usane sansaar ke samast duhkhon se mukti paa lee.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,जिसने प्रेम का मर्म समझ मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,प्रेम के इस पावन तीरथ में एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।

अमृत की बूँद अंतर में भेद मिटा के देखा उसने संसार के मिथ्या मोह से स्वयं को मुक्त कर लिया,अंतःकरण जब दर्पण की तरह जिसने अपना शीश नवाया उसने परम मुक्ति का अमर वरदान प्राप्त कर लिया।
Amrit ki boond antar mein bhed mitaa ke dekhaa usane sansaar ke mithyaa moh se svayan ko mukt kar liyaa,Antahkaran jab darpan ki tarah jisane apanaa sheesh navaayaa usane param mukti ka amar varadaan praapt kar liyaa.
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,जिसने प्रेम का मर्म समझ मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन धारा में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,हृदय के पावन सिंहासन पर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

साधु-संगत की छाया में जो तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।
Saadhu-sangat ki chhaayaa mein jo to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Jeevan ka yeh paavan sootr jo apane antar mein sanjoe woh is nashvar sansaar mein sabase baraa samraat hai.
नैनों के दर्पण में बसा जब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह की रात जब ढलने लगी प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
फासले मिट गए जब दिल से तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम के चरणों में जिसने सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
प्रेम बिना सब सूना जग में उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम की इस पावन धारा में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

प्रेम की गंगा अंतर में बहे रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,अहंकार का त्याग किया जिसने के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
Prem ki gangaa antar mein bahe ramaa rahe har dam use sansaar ki koee chintaa kabhee sataa nahi sakatee,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane ke charanon mein sheesh navaayaa usane sansaar ke samast bhayon se mukti paa lee.
प्रेम बिना सब सूना जग में तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,जब से नैना रूप में उलझे जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
साँसों की सरगम में घुल गया दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,मन मंदिर की पावन आरती तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
नैनों के दर्पण में बसा जब दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम की इस पावन धारा में कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,परहित में जिसने जीवन सौंपा परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Satkarmon ki amit jyoti jab to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Parahit mein jisane jeevan saunpaa paralok mein sang jaaegee baakee sab maayaa-moh yaheen dharaa rah jaaegaa.
साँसों की सरगम में घुल गया बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन धारा में तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,साँसों के हर तार पे जिसका लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,अंतर में जब प्रेम समाया और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
फासले मिट गए जब दिल से तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,विरह की रात जब ढलने लगी उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।

आशा तृष्णा सब छूटी जब जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,हरि की कृपा का पावन साया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
Aashaa trishnaa sab chhootee jab jo jeevan mahakaave usee manushy ka janam saphal jo parapeeraa apanaave,Hari ki kripaa ka paavan saaya usane paramaanand paayaa ahankaar mitate hi antar ka sachchaa sukh milataa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की पावन ज्योति जगाई जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
अंतर घट में जब ज्योति जगी संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,हृदय के पावन सिंहासन पर जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
बिरहा की आग में तप के कुंदन तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

फासले मिट गए जब दिल से तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की इस पावन घाटी में उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Phaasale mit gaye jab dil se tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Prem ki is paavan ghaatee mein utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
नैनों के दर्पण में बसा जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,विरह की रात जब ढलने लगी अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
नैन मिले जब नैनन से तब अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
तेरी आँखों की झील में जो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,साँसों के हर तार पे जिसका सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
फासले मिट गए जब दिल से दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,मन मंदिर की पावन आरती उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

बिरहा की आग में तप के कुंदन तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan tana-man vaar diyaa usane prem ke alaukik lok mein apanaa sthaan banaa liyaa,Prem ki mastee mein jo jhoomaa jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,मन मंदिर की पावन आरती कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
प्रेम बिना सब सूना जग में उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,प्रेम नगर का वासी बनकर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
तेरे दीदार की एक झलक ने डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,आँखों के रस्ते दिल में उतरा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,अंतर में जब प्रेम समाया उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

प्रेम की पावन वेदी पर जिसने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,मन मंदिर की पावन आरती युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
Prem ki paavan vedee par jisane sansaar luta baithaa magar prem ke baazaar mein usane anamol ratan paa liyaa,Man mandir ki paavan aaratee yuga-yug gaaee jaaegee jo prem ki raah par chale unakaa naam amar rahegaa.
नैनन आगे तू ही तू नाचे अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रियतम के रंग में रंग कर उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रियतम की याद में जो नैना हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,जिसने प्रेम का मर्म समझ एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
साँसों की सरगम में घुल गया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,जिसने अपना सब कुछ सौंपा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,मन मंदिर की पावन आरती युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।

मन के कोने में सिमटी यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब आशा की हर किरण बुझी ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
Man ke kone mein simatee yeh khaamoshi bakhshee varanaa kabhee hamaaree hansi bhi bahaaron ko jagaatee thi,Jab aashaa ki har kiran bujhee zamaane ne hansi uraaee magar yahee phaphole kal jnyaan ka kamal banenge.
मन मंदिर में बसा जो मूरति दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रेम नगर का वासी बनकर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
तेरी याद का पावन साया हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम के रंग में रंग कर संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
सांस-सांस में याद तुम्हारी को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
दर्द की रात में जब कोई चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।

छाले पड़े हैं पाँवों में हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस आँधी ने जब सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Chhaale pare hain paanvon mein hazaar tukaron mein bikhar gaya har tukare mein apanon ki bevafaaee ki tasveer dikhee,Gham ki is aandhee ne jab sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
वक़्त के थपेड़ों ने हमें सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द का यह गहरा सागर तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
मन के कोने में सिमटी जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,जब कोई चारासाज़ न मिला जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
आँखों के आँसू जब सूखे जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
घायल की गति घायल जाने सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द की इस एकांत गुफ़ा में ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

घायल की गति घायल जाने पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Ghaayal ki gati ghaayal jaane patharaa gaeen ye aankhen intazaar ki ghariyaan sadiyon jaisee lanbee ho gaeen,Jab dhairy ki seemaa toot gayi keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
जिसके दिल पर बीत रही सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म की इस गहरी रात में सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,आँसुओं की इस भाषा को चलते-चलते पाँव के छाले भी अब मंज़िल का पता पूछने लगे हैं।
तन्हाई के अँधियारे में सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

गिरने में कोई हार नहीं जिसने कर्तव्य निभाया उसके जीवन का हर क्षण यज्ञ की आहुति बन गया,अंत समय जब निकट आएगा और अडिग रहा पहाड़ की तरह तूफ़ान भी उसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं।
Girane mein koee haar nahi jisane kartavy nibhaayaa usake jeevan ka har kshan yajny ki aahuti ban gaya,Ant samay jab nikat aaegaa aur adig raha pahaar ki tarah toofaan bhi usake saamane natamastak ho jaate hain.
मन के कोने में सिमटी यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब आशा की हर किरण बुझी ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
सांस-सांस में याद तुम्हारी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,अकेलेपन की इस राह पर तब भीतर ज्ञान का अमृत झरना फूटा जिसने जीवन को तृप्त कर दिया।
नैनों से जो नीर बहे लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,टूटे हुए दिल का दर्द केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें जीवन की वीराणी किसको दिखाएँ अपने दिल के ये गहरे ज़ख़्म,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।

कर्म की पावन वेदी पर उसने सारा जग जीत लिया मन के जीते जीत है मन के हारे हार,सत्य और धर्म की राहों पर वह कभी पराजित नहीं होता समय के साथ चलने वाला ही विजेता बनता है।
Karm ki paavan vedee par usane saaraa jag jeet liyaa man ke jeete jeet hai man ke haare haar,Saty aur dharm ki raahon par woh kabhee paraajit nahi hotaa samay ke saath chalane vaalaa hi vijetaa banataa hai.
दर्द की रात में जब कोई हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस गहरी रात में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
आशा का दीप जब बुझने पर दिखाई दें असली ज़ख़्म तो वो हैं जो रूह पर रिसते हैं,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
कोई न अपना इस जग में जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,जब कोई सहारा न बचा तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
आशा का दीप जब बुझने अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,दर्द की भट्टी में तपकर ही ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।

जिसने मन को जीत लिया करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जिसने अहंकार को त्याग दिया अपना सुख त्याग देता है उसका नाम इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाता है।
Jisane man ko jeet liyaa karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa apanaa sukh tyaag detaa hai usakaa naam itihaas ke svarnim pannon mein likhaa jaataa hai.
दिल का आईना जब टूटा बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,अकेलेपन की इस राह पर तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
घनानन्द (Ghananand) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
घनानन्द रीतिमुक्त काव्यधारा के सिरमौर कवि हैं, जिन्हें 'प्रेम की पीर' का अमर गायक कहा जाता है।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
घनानन्द ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Riti-Mukt Kaal (1673–1760) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, घनानन्द की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को घनानन्द ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
घनानन्द की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, घनानन्द हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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- सालगिरह की बधाईजोड़ों के लिए मीठी-सी पंक्तियाँ
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घनानन्द के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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घनानन्द कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
घनानन्द (1673–1760) Hindi/Riti-Mukt साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
घनानन्द की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
घनानन्द की रचनाओं के केंद्र में विशुद्ध प्रेम व निश्छल समर्पण, विरह-वेदना का अंतस रुदन, प्रिय सुजान की स्मृति, अहंकार-त्याग का मार्ग, ईश्वरीय प्रेम में विलीनता जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
घनानन्द की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
घनानन्द की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
घनानन्द का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
क्या Emotion Hub पर घनानन्द के शेर कॉपी और शेयर किए जा सकते हैं?
हाँ, Emotion Hub पर आप एक क्लिक में शेर कॉपी कर सकते हैं और सीधे WhatsApp पर शेयर कर सकते हैं।
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घनानन्द की स्मृति में समर्पित स्मारक और ऐतिहासिक स्थल साहित्य प्रेमियों के लिए एक पवित्र धरोहर हैं।
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