दीन-दुखी का आसरा बनकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मोह-निशा से जो जन जागा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
Gajanan Madhav Muktibodh (गजानन माधव मुक्तिबोध)
गजानन माधव मुक्तिबोध (1917–1964) Pioneer of Modern Hindi Poetry & Deep Thinker के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
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‘दीन-दुखी का आसरा बनकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,मोह-निशा से जो जन जागा अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।’— गजानन माधव मुक्तिबोध
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
दीन-दुखी का आसरा बनकर प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,

‘मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,दीन-बंधु का सहारा बन के जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।’— गजानन माधव मुक्तिबोध
शेर #2 • शाही पन्ना
मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,

‘माटी का यह देह बना है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।’— गजानन माधव मुक्तिबोध
शेr #3 • रूहानी शाम
माटी का यह देह बना है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,
अमर शेर और ग़ज़लें
मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,दीन-बंधु का सहारा बन के जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
माटी का यह देह बना है जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,दीन-बंधु का सहारा बन के व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।

अंतर घट में जब ज्योति जगी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह का हर इक आँसू बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
Antar ghat mein jab jyoti jagee do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Virah ka har ik aansoo banakar naam likhaa hai woh har shvaas mein apane priyatam ka hi gun gaataa hai.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
नदिया की धारा बहती जावे तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,भवसागर की लहरों से जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,साधु पुरुष की वाणी कभी लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,माटी का चोला पाकर जिसने अपने अंतर में संजोए वह इस नश्वर संसार में सबसे बड़ा सम्राट है।

प्रेम का प्याला जिसने पिया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
Prem ka pyaalaa jisane piyaa wo se roop salonaa roma-rom mein ram gaya preetam ka paavan konaa,Sachche prem ki yahee nishaanee liyaa usane saare vedon aur shaastron ka saar sahaj mein paa liyaa.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,दीन-बंधु का सहारा बन के परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
आशा तृष्णा सब छूटी जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,मोह-निशा से जो जन जागा उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
दीन-दुखी का आसरा बनकर भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

तेरी याद का पावन साया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अंतर में जब प्रेम समाया कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
Teri yaad ka paavan saaya us par doojaa rang na charhe woh to keval apane priyatam ka hokar rah gaya,Antar mein jab prem samaayaa ki khud ko mitaa ke priyatam ki khushee mein apanee khushee dhoondhataa hai.
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,माटी का चोला पाकर जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,प्रभु चरणों में जिसका ध्यान उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,परहित में जिसने जीवन सौंपा निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

अकेलेपन की धूप जब साए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Akelepan ki dhoop jab saae haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Zindagi ki is soonee dagar par tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
संतन की संगति में आकर सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्संग की निर्मल गंगा में जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।
धरती की छाती पर जिसने मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,सत्य वचन जो मुख से बोले उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
माटी का यह देह बना है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,साधु पुरुष की वाणी कभी जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
नाम और दौलत तो माटी अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्य वचन जो मुख से बोले निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

भीतर-भीतर घुटता जाए रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,टूटे हुए सपनों की किरचें सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Toote hue sapanon ki kirachen sahanasheelataa hi sabase baree poonjee banee jisane har toofaan se bachaa liyaa.
अहंकार की दीवारें जब सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,साधु पुरुष की वाणी कभी अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्य का दीप जब जलता है भज ले राम का नामा अंत समय जब आवेगा तब संग न आवे धामा,हरि की कृपा का पावन साया मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
नदिया की धारा बहती जावे अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,साधु पुरुष की वाणी कभी उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
क्षण-क्षण बीते आयु सुहानी सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,नेकी की राह पे जो जन उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।

आँखों में जो नमी है वो दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
Aankhon mein jo namee hai wo doojaa bhed na paave jo is aag mein jalaa vahee isakaa dard jaan paave,Zindagi ki is soonee dagar par koee khushee ka geet nahi gaataa yahaan to har saans mein virah ki raaginee bajatee hai.
अहंकार की दीवारें जब स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,शांति और संतोष का धन जो जिसने सेवा का व्रत लिया उसका जीवन चंदन की तरह महक उठता है।
कर्म की खेती जो जन बोवे घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,हृदय में जिसके दया बसी है उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
वाणी वही जो घाव भरे और तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,हरि की कृपा का पावन साया अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
सत्य के पावन पथ पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।

जीवन का यह कठिन सफ़र बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,विपदाओं से जो कभी न डरा मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Jeevan ka yeh kathin safar binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Vipadaaon se jo kabhee na daraa manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,भवसागर की लहरों से जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मोह-निशा से जो जन जागा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
सत्य का दीप जब जलता है अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सदाचार की पावन वेदी पर निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा जले तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,कर्म की खेती में जो पसीना जिसने जीवन जिया उसका हर दिन उत्सव और हर रात शांति की गोद बन गई।
Karm pradhaan vishv rachi raakhaa jale to baahar tam na sataave aatmajnyaan ki paavan gangaa bhavasaagar tar jaave,Karm ki khetee mein jo paseenaa jisane jeevan jiyaa usakaa har din utsav aur har raat shaanti ki god ban gayi.
सतगुरु मिले तो राह दिखावे तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,साधु पुरुष की वाणी कभी उसका जनम सार्थक हुआ परोपकार ही मानव जीवन का सबसे बड़ा धर्म है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,दीन-बंधु का सहारा बन के निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
नाम और दौलत तो माटी अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने रखा विपदा की घड़ी में भी वह जीवन के हर संग्राम में विजयी होता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,शांति और संतोष का धन जो अज्ञान अंधेरा मिटा के वह संसार में ज्ञान का अमर प्रकाश फैला जाता है।

समय का पहिया चलता जाए कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,हृदय में जिसके दया और करुणा का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Samay ka pahiyaa chalataa jaae kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
दीन-दुखी का आसरा बनकर जो जीवन महकावे उसी मनुष्य का जनम सफल जो परपीड़ा अपनावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
साधु-संगत की छाया में जो तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने लगा सदा के लिए वह भवसागर की भीषण लहरों से पार उतर जाता है।
साधु-संगत की छाया में जो सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,जीवन का यह पावन सूत्र जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

मैं और मेरा का भ्रम जब हृदय के कपाट खुले अज्ञान का घोर तिमिर पल भर में मिट गया,जब समस्त वासनाएँ भस्म हो गईं तो केवल एक ही अखंड चैतन्य सत्ता सर्वत्र प्रकाशित नज़र आने लगी।
Main aur mera ka bhram jab hriday ke kapaat khule ajnyaan ka ghor timir pal bhar mein mit gaya,Jab samast vaasanaaen bhasm ho gaeen to keval ek hi akhand chaitany sattaa sarvatr prakaashit nazar aane lagee.
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,मोह-निशा से जो जन जागा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की इस पावन धारा में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरे दीदार की एक झलक ने बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ जब रूह में उतरता है प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,मन मंदिर की पावन आरती जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।

कंचन और काँच में जिसने में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,अमृत स्वरूप उस परमात्मा में तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Kanchan aur kaanch mein jisane mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Amrit svaroop us paramaatmaa mein tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
मन मंदिर में बसा जो मूरति जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,सच्चे प्रेम की यही निशानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।
मन की वीणा बज उठी जब पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम के चरणों में जिसने उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
अंतर घट में जब ज्योति जगी दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह का हर इक आँसू बनकर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।

अहंकार की दीवारें जब अंतर इसे शस्त्र काट नहीं सकते अग्नि जला नहीं सकती जल गला नहीं सकता,परमात्मा के इस विराट स्वरूप में तब वह निस्पंद, प्रशांत और असीम आनंद के सागर में निमग्न हो गया।
Ahankaar ki deevaaren jab antar ise shastr kaat nahi sakate agni jalaa nahi sakatee jal galaa nahi sakataa,Paramaatmaa ke is viraat svaroop mein tab woh nispand, prashaant aur aseem aanand ke saagar mein nimagn ho gaya.
तेरी आँखों की झील में जो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रेम का दीपक अंतर में जो उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,प्रियतम के चरणों में जिसने जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
तेरी याद का पावन साया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
फासले मिट गए जब दिल से बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम नगर का वासी बनकर जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।

मन मंदिर में जो दीप जले बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,दीन-बंधु का सहारा बन के जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Man mandir mein jo deep jale baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Deena-bandhu ka sahaaraa ban ke jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
फासले मिट गए जब दिल से प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
तेरे रूप की पावन झांकी अंतर घट में सांची दुनिया की सुध-बुध बिसराई मन की वीणा बाजी,प्रेम की मस्ती में जो झूमा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,प्रेम के इस पावन तीरथ में मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

दीन-दुखी का आसरा बनकर बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,ज्ञान की ज्योति जलाई जिसने निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
Deena-dukhee ka aasaraa banakar baithaa jan nij bhaav se usakaa jeevan dhany hua prabhu kripaa sadaa barasatee,Jnyaan ki jyoti jalaaee jisane nirbhay hokar paar hua jnyaan ki naukaa use param kinaare pahunchaa detee hai.
फासले मिट गए जब दिल से जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,जिसने अपना सब कुछ सौंपा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
तेरी याद का पावन साया दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह का हर इक आँसू बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
प्रियतम की याद में जो नैना जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रेम के इस पावन तीरथ में अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,अंतर में जब प्रेम समाया अपनी सुध बिसराई उसने जनम-मरण के बंधन को सदा के लिए तोड़ दिया।

सत्य के पावन पथ पर जिसने निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Saty ke paavan path par jisane nirbhay paanv dhare kaal ki kathin chaal bhi usakaa kuchh na bigaar sake,Jeevan ka yeh paavan sootr jo jisane apane praan nyauchhaavar kie usakee keerti gaathaa yuga-yugaantar tak gaaee jaatee hai.
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,सच्चे प्रेम की यही निशानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब जैसे बिन पानी मीन प्रेम ही जीवन का सार है प्रेम ही अमृत रस,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,प्रियतम की चाहत में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,साँसों के हर तार पे जिसका उसने दोनों जहाँ भुला दिए प्रेम के नशे में वह मस्त कलंदर हुआ।

सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब का खिलौना है इंसान वही जो रोते हुए को हँसा सके,मोह-निशा से जो जन जागा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।
Satkarmon ki amit jyoti jab ka khilaunaa hai insaan vahee jo rote hue ko hansaa sake,Moha-nishaa se jo jan jaagaa usakaa maan kabhee ghatataa nahi saty ki shakti se woh parvat ko bhi jhukaataa hai.
प्रेम गली अति साँकरी जामें प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,जब से नैना रूप में उलझे जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,मन मंदिर की पावन आरती जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम बिना सब सूना जग में दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह की रात जब ढलने लगी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम का अनुराग ही जिसका अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

इश्क़ जब रूह में उतरता है बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह की रात जब ढलने लगी जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
Ishq jab rooh mein utarataa hai banaa yeh jeev prem ki alaukik chamak se dason dishaaen jagamagaa utheen,Virah ki raat jab dhalane lagee jisane ghat ke andar woh sansaar ke har praanee mein usee ka roop dekhataa hai.
तेरे दीदार की एक झलक ने दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,आँखों के रस्ते दिल में उतरा और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
बिरहा की आग में तप के कुंदन से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,प्रियतम के चरणों में जिसने कि हर हाल में राज़ी रहे सुख में भी और दुःख में भी शीश नवाए।
फासले मिट गए जब दिल से से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,हृदय के पावन सिंहासन पर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,अमर प्रेम की अमर कहानी मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।

प्रेम बिना सब सूना जग में दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,विरह की रात जब ढलने लगी उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
Prem binaa sab soonaa jag mein do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Virah ki raat jab dhalane lagee use indr ka amrit bhi pheekaa lage woh to prem ras mein tript ho gaya.
प्रेम बिना सब सूना जग में का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,सच्चे प्रेम की यही निशानी संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरी याद का पावन साया उस पर दूजा रंग न चढ़े वह तो केवल अपने प्रियतम का होकर रह गया,अंतर में जब प्रेम समाया कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
प्रेम का प्याला जिसने पिया वो हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रियतम का अनुराग ही जिसका युग-युग गाई जाएगी जो प्रेम की राह पर चले उनका नाम अमर रहेगा।
तेरे मिलन की आस में बीते डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,प्रियतम की चाहत में जिसने अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

मन मंदिर में बसा जो मूरति अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह की रात जब ढलने लगी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
Man mandir mein basaa jo moorati amar ho gaya jag mein use duniya ka koee lobh baandh na sakaa kabhee,Virah ki raat jab dhalane lagee ahankaar ki koee jagah nahi yahaan to keval samarpan ki sugandh bahatee hai.
बिरहा की आग में तप के कुंदन तन-मन वार दिया उसने प्रेम के अलौकिक लोक में अपना स्थान बना लिया,सच्चे प्रेम की यही निशानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
इश्क़ की राह अनोखी बंदे दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,आँखों के रस्ते दिल में उतरा जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
प्रेम बिना सब सूना जग में प्रियतम का रूप अनूप चारों ओर उसी की पावन लीला नज़र आने लगी,सच्चे प्रेम की यही निशानी और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
मन मंदिर में बसा जो मूरति अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,विरह की रात जब ढलने लगी अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।

मन के कोने में सिमटी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,आँसुओं की इस भाषा को तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Man ke kone mein simatee antar ghat ko tore akelepan ki dhoop mein jab saaya bhi munh more,Aansuon ki is bhaashaa ko tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
बिरहा की आग में तप के कुंदन पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रियतम का अनुराग ही जिसका संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
बिरहा की आग में तप के कुंदन प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,सच्चे प्रेम की यही निशानी कि ख़ुद को मिटा के प्रियतम की ख़ुशी में अपनी ख़ुशी ढूँढता है।
विरह की अगन में जलता मन हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म के मारों की बस्ती में अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।
सपनों के महल जब टूटे दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,जीवन के इस कठिन मोड़ पर तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।

वक़्त की आँधी ने तोड़े हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,टूटे दिल की इस वीणा से सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
Waqt ki aandhee ne tore haasila-e-zindagee yeh akelaapan raahon mein bhatakate rahe koee kinaaraa na mila,Toote dil ki is veenaa se saare bhram tor daale aur jeevan ki nagn sachchaaee se saamanaa karaa diyaa.
ग़म की तपती दुपहरी में भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,अकेलेपन की इस राह पर तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।
अकेलेपन की धूप जब साए सो पीर विरह की गावे अंतर घट की पीड़ा को कोई समझ न पावे,दर्द का यह गहरा सागर पैरों को लहूलुहान करती रहीं मगर मुसाफ़िर चलता रहा रुकना न सीखा।
अकेलेपन की धूप जब साए हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में पथरा गईं ये आँखें इंतज़ार की घड़ियाँ सदियों जैसी लंबी हो गईं,जब सबने मुँह फेर लिया सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

वक़्त के थपेड़ों ने हमें और मंज़िल दूर सुहानी आँखों के कोने में सिमटी जीवन की वीराणी,जब धैर्य की सीमा टूट गई केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
Waqt ke thaperon ne hamen aur manzil door suhaanee aankhon ke kone mein simatee jeevan ki veeraanee,Jab dhairy ki seemaa toot gayi keval vahee parh sakataa hai jisane khud raata-raat bhar jaag kar dard sahaa ho.
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
आँखों के आँसू जब सूखे हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
मन के कोने में सिमटी दिन-रैन तपे अंगार की तरह कोई शीतल बूँद न बरसे जो मन को ठंडक दे,टूटे दिल की इस वीणा से सारे भ्रम तोड़ डाले और जीवन की नग्न सच्चाई से सामना करा दिया।
जिसके दिल पर बीत रही जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म के मारों की बस्ती में तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

ठोकर खाकर जो संभलता चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,कर्म की खेती में जो पसीना जो भवसागर में उतरा वह भीषण तूफ़ानों से भी सुरक्षित पार निकल गया।
Thokar khaakar jo sanbhalataa chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Karm ki khetee mein jo paseenaa jo bhavasaagar mein utaraa woh bheeshan toofaanon se bhi surakshit paar nikal gaya.
मन के कोने में सिमटी अंतर घट को तोड़े अकेलेपन की धूप में जब साया भी मुँह मोड़े,आँसुओं की इस भाषा को तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
उम्र भर का सफ़र और को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब आशा की हर किरण बुझी सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
दर्द की रात में जब कोई जब कोई राह न सूझे तब टूटे दिल से निकली दुआ ही रास्ता दिखाती है,ग़म के मारों की बस्ती में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
ग़म की तपती दुपहरी में को भी छीन ले तब समझ आता है कि तन्हाई किसे कहते हैं,जब धैर्य की सीमा टूट गई तब परमात्मा ही सबसे बड़ा वैद्य बना और उसने रूह के ज़ख़्म भर दिए।

जिसने मन को जीत लिया ही जीवन का नियम है जो रुक गया वो अपनी सीमाओं में खो गया,हृदय में जिसके दया और करुणा अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Jisane man ko jeet liyaa hi jeevan ka niyam hai jo ruk gaya wo apanee seemaaon mein kho gaya,Hriday mein jisake dayaa aur karunaa apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
विरह की अगन में जलता मन लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,ग़म की इस गहरी रात में तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
दर्द की रात में जब कोई हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,ग़म की इस आँधी ने जब ज़माने ने हँसी उड़ाई मगर यही फफोले कल ज्ञान का कमल बनेंगे।
नैनों से जो नीर बहे हमदर्द न मिला तकिये को सीने से लगा के सारी रात रोते रहे,अंधेरी रात के सन्नाटे में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,टूटे हुए सपनों की किरचें सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

जीवन की इस रणभूमि में चलता है अविचल होकर उसके कदम चूमती हैं मंज़िलें बाधाएँ दूर भागती हैं,जिसने अहंकार को त्याग दिया चलने वाले का जीवन निष्कलंक रहता है और समाज उसका आदर करता है।
Jeevan ki is ranabhoomi mein chalataa hai avichal hokar usake kadam choomatee hain manzilen baadhaaen door bhaagatee hain,Jisane ahankaar ko tyaag diyaa chalane vaale ka jeevan nishkalank rahataa hai aur samaaj usakaa aadar karataa hai.
सांस-सांस में याद तुम्हारी रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,इस दर्द भरे दिल की सदा जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
गजानन माधव मुक्तिबोध (Gajanan Madhav Muktibodh) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
गजानन माधव मुक्तिबोध (1917–1964) Pioneer of Modern Hindi Poetry & Deep Thinker के शीर्ष व्यक्तित्व थे, जिनकी प्रमुख कृतियों और विचारों ने समाज को नई दिशा दी।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
गजानन माधव मुक्तिबोध ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
1917–1964 के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, गजानन माधव मुक्तिबोध की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को गजानन माधव मुक्तिबोध ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
गजानन माधव मुक्तिबोध की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, गजानन माधव मुक्तिबोध हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
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गजानन माधव मुक्तिबोध के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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गजानन माधव मुक्तिबोध कौन थे?
गजानन माधव मुक्तिबोध (1917–1964) Sheopur, Madhya Pradesh, India से ताल्लुक रखने वाले Pioneer of Modern Hindi Poetry & Deep Thinker के अग्रदूत थे, जिन्हें PIONEER OF NAYI KAVITA, MARXIST AESTHETICIAN, AUTHOR OF 'ANDHERE MEIN' के रूप में जाना जाता है।
गजानन माधव मुक्तिबोध का मुख्य दर्शन व संदेश क्या है?
गजानन माधव मुक्तिबोध का मुख्य विचार Self-interrogation, critique of middle-class compromises, fantasy as reality, intense struggle with alienation and conscience पर केंद्रित है, जो आज भी प्रेरणा का प्रकाशस्तंभ है।
गजानन माधव मुक्तिबोध की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
गजानन माधव मुक्तिबोध की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
गजानन माधव मुक्तिबोध का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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