आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
Dulla Bhatti (दुल्ला भट्टी)
दुल्ला भट्टी पंजाब के महान लोक-नायक और स्वतंत्रता सेनानी हैं, जिन्होंने मुग़ल अत्याचारों का डटकर मुक़ाबला किया और लोहड़ी के लोक-पर्व के अमर प्रतीक बने।

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
— दुल्ला भट्टी • MUGHAL RESISTANCE ERA (16TH CENTURY)

आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।
— दुल्ला भट्टी • MUGHAL RESISTANCE ERA (16TH CENTURY)
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‘आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,हृदय में जिसके दया बसी है परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।’— दुल्ला भट्टी
शेर #1 • कॉस्मिक कलाम
आशा तृष्णा सब छूटी जब प्रभु चरणों चित लागा अमर अभय पद सोई पावे जो जग से विरक्त जागा,

‘जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।’— दुल्ला भट्टी
शेर #2 • शाही पन्ना
जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,

‘वाणी में जो अमृत घोले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।’— दुल्ला भट्टी
शेr #3 • रूहानी शाम
वाणी में जो अमृत घोले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,
अमर शेर और ग़ज़लें
जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
वाणी में जो अमृत घोले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,जीवन का यह पावन सूत्र जो अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
दीन-दुखी का आसरा बनकर अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,अहंकार का त्याग किया जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।

प्रियतम की याद में जो नैना दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम सुधा का रस जो चखा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।
Priyatam ki yaad mein jo nainaa do na samaahin jab main tha tab hari nahi ab hari hain main naahin,Prem sudhaa ka ras jo chakhaa to baahar ka saaraa baira-bhaav aur dvesh pal bhar mein samaapt ho gaya.
अहंकार की दीवारें जब भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,वाणी में जिसके मिठास घुली वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्संग की निर्मल गंगा में उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जीवन का यह पावन सूत्र जो उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी तो सारा जग अपना लागे पराया कोई न रहे सब में प्रभु रूप दिखे,प्रेम की डोर में बंध गया जो जिसने डुबकी लगाई उसके जन्म-जन्मांतर के सब पाप धुल जाते हैं।

बिरहा की आग में तप के कुंदन बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे प्रेम की यही निशानी उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
Birahaa ki aag mein tap ke kundan barase din aur raat virah ki agni mein tapakar paavan ho gaya man ka dhaam,Sachche prem ki yahee nishaanee utaaroon har pal main to apane salone shyaam ki daasee ban gayi.
हरि सुमिरन में जिसका चित्त माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,दीन-बंधु का सहारा बन के उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
धरती की छाती पर जिसने जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,सत्य-अहिंसा की राहों पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,धैर्य का दामन जिसने थामे उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,दीन-बंधु का सहारा बन के उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।

नैनों के दर्पण में बसा जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
Nainon ke darpan mein basaa jab haradam sheesh navaanaa khud ko khokar priyatam paanaa jag ka bharam bhulaanaa,Prem sudhaa ka ras jo chakhaa jo jan vicharaa usane sansaar ki saari chintaaon se mukti paa lee.
वाणी में जो अमृत घोले अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सदाचार की पावन वेदी पर रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सत्य का रूप समाया जीवन की हर उलझन का सहज समाधान पाया,सत्संग की निर्मल गंगा में उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।
मन के निर्मल दर्पण में जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
नदिया की धारा बहती जावे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,शांति और संतोष का धन जो परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

ग़म का मारा पंछी जैसे रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द का यह गहरा सागर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
Gham ka maaraa panchhee jaise ret ki deewar ki tarah tab samajh aayaa ki sansaar ki maayaa sab jhoothee hai,Dard ka yeh gaharaa saagar jo cheekh dabee rah gayi woh khudaa ke darabaar mein sabase baree gavaahee banee.
दुःख में सुमिरन सब कोई करै रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,धैर्य का दामन जिसने थामे व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
साधु-संगत की छाया में जो अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,दीन-बंधु का सहारा बन के जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव बैठा जन निज भाव से उसका जीवन धन्य हुआ प्रभु कृपा सदा बरसती,मोह-निशा से जो जन जागा व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
जो तूफ़ानों में अपनी नाव मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,भवसागर की लहरों से जो के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।

भीतर-भीतर घुटता जाए लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,आँसुओं की इस भाषा को धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।
Bheetara-bheetar ghutataa jaae lage tab jeevan mein ghor niraashaa chhaae paramaatmaa ka hi aasaraa shesh rahe,Aansuon ki is bhaashaa ko dheeraj ka deepak jalaae rakhaa subah ki pahalee kiran ki aas kabhee na chhoree.
नदिया की धारा बहती जावे अमृत रस की वर्षा भई जन्म-मरण का कठिन फेरा सहज ही कट गया,हृदय में जिसके दया बसी है मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
नाम और दौलत तो माटी सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य-अहिंसा की राहों पर उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
सत्कर्मों की अमिट ज्योति जब तो बाहर तम न सतावे आत्मज्ञान की पावन गंगा भवसागर तर जावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही अविचल कदम बढ़ाता है उसका यश तीनों लोकों में सदा फैलता है।
सत्य के पावन पथ पर जिसने सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,आत्म-समर्पण किया जिसने प्रभु निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।

ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,जब कोई सहारा न बचा तब अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वर के चरणों तक पहुँची और धीरज मिला।
Zakhm wo nahi jo jism bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Jab koee sahaaraa na bachaa tab antaraatmaa ki pukaar hi eeshvar ke charanon tak pahunchee aur dheeraj mila.
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी रमा रहे हर दम उसे संसार की कोई चिंता कभी सता नहीं सकती,मन के मैल को जिसने धोया उसने निर्मल दर्पण पाया जहाँ परमात्मा का साक्षात स्वरूप दिखता है।
प्रेम की भाषा सबसे न्यारी घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,मोह-निशा से जो जन जागा जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
माटी का यह देह बना है मन का मैल धुलावे पारस का परस पाकर जैसे लोहा कंचन हो जावे,मन के मैल को जिसने धोया उसने परमानंद पाया अहंकार मिटते ही अंतर का सच्चा सुख मिलता है।
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।

नदी की तरह बहते रहना अंतर में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,त्याग और सेवा की भावना से जिसने व्यर्थ नहीं गँवाया उसने जीवन के हर संग्राम में सफलता प्राप्त की।
Nadee ki tarah bahate rahanaa antar mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Tyaag aur sevaa ki bhaavanaa se jisane vyarth nahi ganvaayaa usane jeevan ke har sangraam mein saphalataa praapt ki.
वाणी में जो अमृत घोले सत्य का बीज उगाया उसकी कीर्ति अमर रहेगी जब तक गगन में छाया,मन के मैल को जिसने धोया रहता है जिसने दूसरों के आँसू पोंछ कर उनके चेहरों पे मुस्कान ला दी।
माटी का यह देह बना है सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य वचन जो मुख से बोले अपने मन में उतारेगा वह दोनों जहाँ में आदर और सम्मान पाएगा।
अहंकार की दीवारें जब जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,मोह-निशा से जो जन जागा उस पर सदा बना रहता है जो निष्काम भाव से सब जीवों से प्रेम करता है।
धरती की छाती पर जिसने अंतरतम में अंधकार का हर पहरा पिघल जाता है,सत्य वचन जो मुख से बोले परलोक में संग जाएगी बाकी सब माया-मोह यहीं धरा रह जाएगा।

अहंकार की दीवारें जब जो अपने साथ सँजोए रखेगा वही परलोक में सच्चा संगी और साथी बनेगा,सदाचार के पावन नियमों पर का वास है वह साक्षात परमात्मा का पावन मंदिर कहलाता है।
Ahankaar ki deevaaren jab jo apane saath sanjoe rakhegaa vahee paralok mein sachchaa sangee aur saathee banegaa,Sadaachaar ke paavan niyamon par ka vaas hai woh saakshaat paramaatmaa ka paavan mandir kahalaataa hai.
जो तूफ़ानों में अपनी नाव निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,शांति और संतोष का धन जो निर्भय होकर पार हुआ ज्ञान की नौका उसे परम किनारे पहुँचा देती है।
प्रेम की गंगा अंतर में बहे सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
संतन की संगति में आकर स्वयं खेते हैं किनारा उनके स्वागत में सिर झुकाता है,भवसागर की लहरों से जो उसने अलौकिक भोर देखा जहाँ केवल सत्य और आनंद का प्रकाश है।
वाणी में जो अमृत घोले निर्भय पाँव धरे काल की कठिन चाल भी उसका कुछ न बिगाड़ सके,शांति और संतोष का धन जो उसे संसार का कोई लोभ बाँध नहीं सकता वह प्रभु प्रेम में मग्न रहता है।

गिरने में कोई हार नहीं बिना रुके रात और दिन राजा हो या रंक सबको एक दिन मिट्टी में मिलना है,जो सबको अपना मान के चले उसे किसी वैभव की चाह नहीं उसका मन सदा शांत सरोवर की तरह रहता है।
Girane mein koee haar nahi binaa ruke raat aur din raajaa ho yaa rank sabako ek din mitti mein milanaa hai,Jo sabako apanaa maan ke chale use kisee vaibhav ki chaah nahi usakaa man sadaa shaant sarovar ki tarah rahataa hai.
ज्ञान का पावन भोर हुआ जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,माटी का चोला पाकर जिसने व्यर्थ नहीं जाती वह सदियों तक भटके हुओं को सही राह दिखाती है।
हरि सुमिरन में जिसका चित्त मन को सीतल कर दे शब्द वही जो अमर आलोक बने,सत्य वचन जो मुख से बोले के चरणों में शीश नवाया उसने संसार के समस्त भयों से मुक्ति पा ली।
सतगुरु मिले तो राह दिखावे भरम का पर्दा तोड़े अमृत रस की वर्षा होवे जब मोह मुख मोड़े,हृदय में जिसके दया बसी है मानव धर्म निभाया उसका जनम सफल जग जाने अमर धाम को जाता है।
धरती की छाती पर जिसने घट-घट में प्रगट भई अज्ञान का घोर अंधेरा पल भर में भाग गया,परहित में जिसने जीवन सौंपा उसका मान कभी घटता नहीं सत्य की शक्ति से वह पर्वत को भी झुकाता है।

कंचन और काँच में जिसने अविचल क़दम बढ़ाया उसका जनम सफल जग जाने अमर नाम कर गया,सृष्टि के कण-कण में जब प्रभु तो सारे बंधन टूट गए और वह परमब्रह्म में लीन होकर एक रूप हो गया।
Kanchan aur kaanch mein jisane avichal qadam barhaayaa usakaa janam saphal jag jaane amar naam kar gaya,Srishti ke kana-kan mein jab prabhu to saare bandhan toot gaye aur woh paramabrahm mein leen hokar ek roop ho gaya.
माटी का यह देह बना है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,भवसागर की लहरों से जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
प्रेम गली अति साँकरी जामें दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम की चाहत में जिसने जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम के चरणों में जिसने मोती चमका प्रेम की सीपी में अनमोल ज्ञान का रत्न बन गया।
तेरे मिलन की आस में बीते जब से मन में समाया जीवन की हर तपती धूप शीतल छाँव बन गई,प्रियतम के चरणों में जिसने तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

जो बाहर ढूँढता रहा वो है माटी में मिल जाना सत्कर्मों की पूँजी ही संग तुम्हारे जाना है,परम पद की प्राप्ति उसी को होती उसे न मृत्यु का भय होता है और न जीवन की कोई आस, वह सदा मुक्त है।
Jo baahar dhoondhataa raha wo hai maatee mein mil jaanaa satkarmon ki poonjee hi sang tumhaare jaanaa hai,Param pad ki praapti usee ko hotee use na mrityu ka bhay hotaa hai aur na jeevan ki koee aas, woh sadaa mukt hai.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रेम की मस्ती में जो झूमा प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,अंतर में जब प्रेम समाया जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रेम सुधा का रस जो चखा लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।
प्रियतम की याद में जो नैना दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,प्रेम सुधा का रस जो चखा तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

ज्ञान की पावन भोर भई में गिर जातीं घट-घट में तब एक अनंता ज्योति नज़र है आती,सच्चा मोक्ष वही कहलाता है जहाँ जीव और ब्रह्म का भेद समाप्त हो जाए और केवल अद्वैत ही शेष रहे।
Jnyaan ki paavan bhor bhaee mein gir jaateen ghata-ghat mein tab ek anantaa jyoti nazar hai aatee,Sachchaa moksh vahee kahalaataa hai jahaan jeev aur brahm ka bhed samaapt ho jaae aur keval advait hi shesh rahe.
प्रेम गली अति साँकरी जामें तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रेम नगर का वासी बनकर उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम की डोरी बाँध लई जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,आँखों के रस्ते दिल में उतरा उसे इंद्र का अमृत भी फीका लगे वह तो प्रेम रस में तृप्त हो गया।
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,हृदय के पावन सिंहासन पर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
मन की वीणा बज उठी जब जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रेम की इस पावन धारा में सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

जो तूफ़ानों में अपनी नाव माटी में मिल जाना लोभ मोह मद त्याग के निज स्वरूप चीन्ह ले,अहंकार का त्याग किया जिसने वह सबके मन को भाता है कटु वचन त्याग के जो बोले वही संत कहाता है।
Jo toofaanon mein apanee naav maatee mein mil jaanaa lobh moh mad tyaag ke nij svaroop cheenh le,Ahankaar ka tyaag kiyaa jisane woh sabake man ko bhaataa hai katu vachan tyaag ke jo bole vahee sant kahaataa hai.
अंतर घट में जब ज्योति जगी का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रेम नगर का वासी बनकर उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
नैनों के दर्पण में बसा जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम की मस्ती में जो झूमा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।
प्रेम की पावन वेदी पर जिसने संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम के रंग में रंग कर तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

मन के निर्मल दर्पण में जब सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,सत्य-अहिंसा की राहों पर जिसने अपने प्राण न्यौछावर किए उसकी कीर्ति गाथा युग-युगांतर तक गाई जाती है।
Man ke nirmal darpan mein jab sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Satya-ahinsaa ki raahon par jisane apane praan nyauchhaavar kie usakee keerti gaathaa yuga-yugaantar tak gaaee jaatee hai.
नैन मिले जब नैनन से तब दो न समाहिं जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि हैं मैं नाहिं,जब से नैना रूप में उलझे उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो संसार लुटा बैठा मगर प्रेम के बाज़ार में उसने अनमोल रतन पा लिया,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
इश्क़ जब रूह में उतरता है रैन-दिना मतवारे अंग-अंग में ज्योति जलाई प्रेम के दीपक बारे,प्रियतम के रंग में रंग कर और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।
नैन मिले जब नैनन से तब दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,विरह की रात जब ढलने लगी तो बाहर का सारा बैर-भाव और द्वेष पल भर में समाप्त हो गया।

ज्ञान का पावन भोर हुआ जब अंतर नैन उघारे घट में ही परमात्मा का दीदार कराए,सत्कर्मों की अमिट कमाई ही जो धीर चला उसका कदम कभी सत्य के मार्ग से डगमगा नहीं सकता।
Jnyaan ka paavan bhor hua jab antar nain ughaare ghat mein hi paramaatmaa ka deedaar karaae,Satkarmon ki amit kamaaee hi jo dheer chalaa usakaa kadam kabhee saty ke maarg se dagamagaa nahi sakataa.
बिरहा की आग में तप के कुंदन बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,सच्चे प्रेम की यही निशानी उतारूँ हर पल मैं तो अपने सलोने श्याम की दासी बन गई।
मन की वीणा बज उठी जब बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,प्रेम की इस पावन घाटी में जिसने स्नान किया उसके सारे संताप और ताप सदा के लिए मिट गए।
प्रेम रंग में जो रंग गया प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रियतम की चाहत में जिसने सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
तेरी याद का पावन साया जिसने इक बार लखी उसे संसार का कोई दूसरा रूप सुहाता नहीं,प्रियतम की चाहत में जिसने और मिलन की भोर हुई तो आत्मा का परमात्मा से एकात्म हो गया।

माटी का यह देह बना है सोई फल पावे रे कायर बैठे भाग्य गिने धीर कर दिखलावे,भवसागर की लहरों से जो उसे किसी तीरथ जाने की आवश्यकता नहीं प्रभु स्वयं उसके घट बसते हैं।
Maatee ka yeh deh banaa hai soee phal paave re kaayar baithe bhaagy gine dheer kar dikhalaave,Bhavasaagar ki laharon se jo use kisee teerath jaane ki aavashyakataa nahi prabhu svayan usake ghat basate hain.
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो सुंदर श्याम सनेही उसकी एक झलक पे वारूँ यह नश्वर तन-देही,जिसने अपना सब कुछ सौंपा संसार की सुध-बुध बिसराई केवल प्रीतम की सूरत याद रही।
तेरी याद का पावन साया तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,विरह का हर इक आँसू बनकर सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।
मन की वीणा बज उठी जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,प्रेम सुधा का रस जो चखा जिसने घट के अंदर वह संसार के हर प्राणी में उसी का रूप देखता है।

नैनों के दर्पण में बसा जब का सुंदर वास संसार की सारी माया फीकी लगने लगी उसके आगे,प्रियतम के रंग में रंग कर मन ऐसा निर्मल हुआ कि दर्पण भी उसके सामने लजा जाए।
Nainon ke darpan mein basaa jab ka sundar vaas sansaar ki saari maayaa pheekee lagane lagee usake aage,Priyatam ke rang mein rang kar man aisaa nirmal hua ki darpan bhi usake saamane lajaa jaae.
प्रेम गली अति साँकरी जामें डूब गया इक बार उसे किनारे की कोई आरज़ू बाक़ी न रही,सच्चे आशिक़ की पहचान यही एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
प्रेम रंग में जो रंग गया पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,सच्चे आशिक़ की पहचान यही जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
नैनन आगे तू ही तू नाचे से रूप सलोना रोम-रोम में रम गया प्रीतम का पावन कोना,विरह का हर इक आँसू बनकर जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
इश्क़ जब रूह में उतरता है बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,मन मंदिर की पावन आरती सुख-दुःख भुला दिया उसने जीवन के हर मोड़ पर आनंद ही पाया।

मन की वीणा बज उठी जब तो इबादत बन जाता है हुस्न जब सादगी ओढ़ ले तो ख़ुदा नज़र आता है,प्रेम की पावन ज्योति जगाई सदा प्रीतम का वास रहे वहाँ किसी दूसरे का प्रवेश कभी न हो।
Man ki veenaa baj uthee jab to ibaadat ban jaataa hai husn jab saadagee orh le to khuda nazar aataa hai,Prem ki paavan jyoti jagaaee sadaa preetam ka vaas rahe wahaan kisee doosare ka pravesh kabhee na ho.
मन मंदिर में बसा जो मूरति हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,विरह का हर इक आँसू बनकर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
नैनों के दर्पण में बसा जब हरदम शीश नवाना ख़ुद को खोकर प्रियतम पाना जग का भरम भुलाना,प्रेम सुधा का रस जो चखा जो जन विचरा उसने संसार की सारी चिंताओं से मुक्ति पा ली।
बिरहा की आग में तप के कुंदन तेरा नाम सनेही हर एक धड़कन में तेरी ही वंदना गूँजती है,प्रियतम का अनुराग ही जिसका जो रूप सलोना उसने जीवन के हर अंधियारे को मिटा डाला।
रोम-रोम में रम गया प्रीतम दिल का तार जुड़ा मौन में भी हर एक धड़कन तेरी पुकार बनी,अमर प्रेम की अमर कहानी लिया उसने सारे वेदों और शास्त्रों का सार सहज में पा लिया।

तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की पावन ज्योति जगाई एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।
Tere roop ki paavan jhaankee priyatam ka naam sunaa anahad naad ka sangeet antar mein goonjane lagaa,Prem ki paavan jyoti jagaaee ekamaatr sahaaraa ban gaya use loka-laaj ka koee bhay na raha.
बिरहा की आग में तप के कुंदन दिल को वो चैन दिया जो सदियों की इबादत से भी मयस्सर न हुआ,प्रियतम के रंग में रंग कर जलाए रखेगा उसके जीवन पथ पर कभी अंधकार नहीं आ सकता।
फासले मिट गए जब दिल से पलकन मूँदूँ तो घट में पाऊँ ऐसा अलौकिक प्रेम जगा जो कभी मिटता नहीं,जब से नैना रूप में उलझे जिसने डुबकी लगाई वह भवसागर की सीमा से परे अमर हो गया।
प्रियतम की याद में जो नैना अमर हो गया जग में उसे दुनिया का कोई लोभ बाँध न सका कभी,हृदय के पावन सिंहासन पर नाम लिखा है वह हर श्वास में अपने प्रियतम का ही गुण गाता है।
तेरे रूप की पावन झांकी प्रियतम का नाम सुना अनहद नाद का संगीत अंतर में गूँजने लगा,प्रेम की पावन ज्योति जगाई एकमात्र सहारा बन गया उसे लोक-लाज का कोई भय न रहा।

टूटी नाव भँवर में फँसी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दिल के फफोलों को देखकर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
Tootee naav bhanvar mein phansee bhatake soone van mein jisakaa koee ghonsalaa na bachaa daala-daal rotaa phire,Dil ke phapholon ko dekhakar tab vishvaas ka ek nanhaa taaraa chamakaa jisane doobane se bachaa liyaa.
तेरी आँखों की झील में जो बना यह जीव प्रेम की अलौकिक चमक से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं,विरह का हर इक आँसू बनकर अहंकार की कोई जगह नहीं यहाँ तो केवल समर्पण की सुगंध बहती है।
इश्क़ का सौदा जिसने किया वो बरसे दिन और रात विरह की अग्नि में तपकर पावन हो गया मन का धाम,प्रियतम के रंग में रंग कर प्रेम के पावन चरणों में उसने ईश्वर का साक्षात दर्शन पा लिया।
टूटे दिल की ख़ामोशी में जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,वक़्त के इस क्रूर प्रहार ने सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
दिल का आईना जब टूटा सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जब सबने मुँह फेर लिया केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

ग़म का मारा पंछी जैसे चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,टूटे हुए दिल का दर्द केवल विरह का सुर निकलता है जो सुनने वालों के दिल को चीर देता है।
Gham ka maaraa panchhee jaise cheekh chhupee hai bhaaree kisako apanaa haal sunaaen duniya matalabee saari,Toote hue dil ka dard keval virah ka sur nikalataa hai jo sunane vaalon ke dil ko cheer detaa hai.
टूटे दिल की ख़ामोशी में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,इस दर्द भरे दिल की सदा तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
भीतर-भीतर घुटता जाए सोई जाने पीर पराई दुनिया तो तमाशा देखती है कोई दर्द नहीं बाँटता,ग़म के मारों की बस्ती में तब अंतर्यामी प्रभु ने बाहँ पकड़ी और इस संकट से उबार लिया।
ग़म का मारा पंछी जैसे रेत की दीवार की तरह तब समझ आया कि संसार की माया सब झूठी है,दर्द का यह गहरा सागर जो चीख़ दबी रह गई वह खुदा के दरबार में सबसे बड़ी गवाही बनी।
मन के कोने में सिमटी हज़ार टुकड़ों में बिखर गया हर टुकड़े में अपनों की बेवफ़ाई की तस्वीर दिखी,दिल के फफोलों को देखकर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।

छाले पड़े हैं पाँवों में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,जब कोई सहारा न बचा तपस्या का ऐसा दीप जला जिसने आत्मा को अमर प्रकाश से भर दिया।
Chhaale pare hain paanvon mein hain kitane sundar sapane bebas hokar dekhaa hamane rooth gaye sab apane,Jab koee sahaaraa na bachaa tapasyaa ka aisaa deep jalaa jisane aatmaa ko amar prakaash se bhar diyaa.
जिसके दिल पर बीत रही दूजा भेद न पावे जो इस आग में जला वही इसका दर्द जान पावे,जब अपनों ने ही दिए ज़ख़्म तब प्रभु कृपा की वर्षा हुई और जलते हुए मन को शांति मिल गई।
दर्द की रात में जब कोई जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,अकेलेपन की इस राह पर सब कुछ उजाड़ दिया तब टूटे तिनकों से ही नया घोंसला बनाना पड़ा।
ग़म की तपती दुपहरी में चीख़ छुपी है भारी किसको अपना हाल सुनाएँ दुनिया मतलबी सारी,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
आशा का दीप जब बुझने किनारा कहीं न सूझे प्रभु बिना इस संकट में कोई पार लगाने वाला न दिखे,जब नयनों के सब आँसू सूखे केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।

माटी का यह चोला पाकर जग में सोई प्यारा क्रोध-अग्नि को शांत करे जो शील-सरोवर धारा,जिसने परोपकार का दीप जलाया मनुष्य को देव बना देता है दुर्जन भी उसकी संगति से सज्जन हो जाते हैं।
Maatee ka yeh cholaa paakar jag mein soee pyaaraa krodha-agni ko shaant kare jo sheela-sarovar dhaaraa,Jisane paropakaar ka deep jalaayaa manushy ko dev banaa detaa hai durjan bhi usakee sangati se sajjan ho jaate hain.
टूटी नाव भँवर में फँसी भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दिल के फफोलों को देखकर तब विश्वास का एक नन्हा तारा चमका जिसने डूबने से बचा लिया।
तन्हाई के अँधियारे में हैं कितने सुंदर सपने बेबस होकर देखा हमने रूठ गए सब अपने,टूटे हुए दिल का दर्द तो ग़ैरों से क्या शिकवा करना दिल ने चुपचाप सब कुछ सहना सीख लिया।
छाले पड़े हैं पाँवों में सब मतलब के यार सुख में सब संग नाचते दुःख में मुँह मोड़ लेते हैं,जीवन के इस कठिन मोड़ पर केवल वही पढ़ सकता है जिसने ख़ुद रात-रात भर जाग कर दर्द सहा हो।
अकेलेपन की धूप जब साए यह ख़ामोशी बख़्शी वरना कभी हमारी हँसी भी बहारों को जगाती थी,जब आशा की हर किरण बुझी अकेले ही चलना पड़ता है यहाँ कोई किसी का बोझ उठाने नहीं आता।

नदी की तरह बहते रहना कायर मैदान छोड़ भागते हैं धीर पुरुष डटे रहते हैं और विजय का वरण करते हैं,कर्मण्यता का पावन व्रत लेकर अपने भाग्य को गढ़ा उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर दिखाए।
Nadee ki tarah bahate rahanaa kaayar maidaan chhor bhaagate hain dheer purush date rahate hain aur vijay ka varan karate hain,Karmanyataa ka paavan vrat lekar apane bhaagy ko garhaa usane saphalataa ke naye keertimaan sthaapit kar dikhaae.
दिल का आईना जब टूटा जब साया भी साथ न दे तब धीरज ही मनुष्य का एकमात्र सच्चा साथी बने,ज़िंदगी की इस सूनी डगर पर केवल वही समझ सकता है जिसके सीने में कभी ऐसा ही घाव लगा हो।
ज़ख़्म वो नहीं जो जिस्म बाहर हँसता जाए दुनिया को क्या ख़बर कि अंदर कितनी आग लगी है,जब सबने मुँह फेर लिया अर्श तक पहुँची जहाँ ईश्वर ने अपने बंदे के आँसू पोंछ कर शांति दी।
वक़्त के थपेड़ों ने हमें भटके सूने वन में जिसका कोई घोंसला न बचा डाल-डाल रोता फिरे,दिल के फफोलों को देखकर सहनशीलता ही सबसे बड़ी पूँजी बनी जिसने हर तूफ़ान से बचा लिया।
भीतर-भीतर घुटता जाए लगे तब जीवन में घोर निराशा छाए परमात्मा का ही आसरा शेष रहे,आँसुओं की इस भाषा को धीरज का दीपक जलाए रखा सुबह की पहली किरण की आस कभी न छोड़ी।

धैर्य और संतोष का धन करै सुख में करै न कोय जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय,जो सबको अपना मान के चले बहाता है दिन-रात वही सुनहरी फसल काट कर आनंद से तृप्त होता है।
Dhairy aur santosh ka dhan karai sukh mein karai na koy jo sukh mein sumiran karai to duhkh kaahe ko hoy,Jo sabako apanaa maan ke chale bahaataa hai dina-raat vahee sunaharee phasal kaat kar aanand se tript hotaa hai.
कोई न अपना इस जग में हासिल-ए-ज़िंदगी यह अकेलापन राहों में भटकते रहे कोई किनारा न मिला,ग़म की इस गहरी रात में कोई खुशी का गीत नहीं गाता यहाँ तो हर साँस में विरह की रागिनी बजती है।
दुल्ला भट्टी (Dulla Bhatti) — साहित्यिक महानायक एवं कालजयी विरासत
दुल्ला भट्टी पंजाब के महान लोक-नायक और स्वतंत्रता सेनानी हैं, जिन्होंने मुग़ल अत्याचारों का डटकर मुक़ाबला किया और लोहड़ी के लोक-पर्व के अमर प्रतीक बने।
साहित्यिक विधा और मौलिक शैली
दुल्ला भट्टी ने भाषा और उपमानों की सीमाओं को पार कर ऐसी संजीदा शैली विकसित की, जो सीधे पाठक के अंतर्मन से संवाद करती है।
ऐतिहासिक युग एवं विश्व सम्मान
Mughal Resistance Era (16th Century) के महान रचनाकार के रूप में सम्मानित, दुल्ला भट्टी की कृतियाँ आज कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में सराही और अनुवादित की जाती हैं।
दार्शनिक गहराई और आत्मिक अनुभूति
प्रेम, विरह, मानवीय कमज़ोरी और जीवन के गूढ़ रहस्यों को दुल्ला भट्टी ने अपनी शायरी में अमर सत्य की तरह संजोया है।
दुल्ला भट्टी की शायरी पीढ़ियों के दिलों को क्यों छूती है?
कॉलेज के युवाओं से लेकर दशकों पुरानी यादों में खोए बुज़ुर्गों तक, दुल्ला भट्टी हर पीढ़ी को जोड़ते हैं। दिल टूटने पर उनके शेर कड़वाहट नहीं घोलते, बल्कि मानवीय भावना को एक नाज़ुक, पवित्र अनुभूति की तरह स्वीकार करते हैं। आज भी सोशल मीडिया, शास्त्रीय संगीत और मुशायरों में इनके शेर हर रोज़ लाखों दिलों की धड़कन बनते हैं।
अन्य महान ग़ज़लकार एवं कवि
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- पापा का जन्मदिनजिन्होंने उँगली पकड़कर चलना सिखाया
- सालगिरह की बधाईजोड़ों के लिए मीठी-सी पंक्तियाँ
- परिवार को सुप्रभातघर के ग्रुप के लिए सुबह की शुरुआत
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दुल्ला भट्टी के बारे में ज़रूरी सवाल-जवाब
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दुल्ला भट्टी कौन थे और उनका साहित्यिक योगदान क्या है?
दुल्ला भट्टी (16th Century CE–16th Century CE) Punjabi/Folk साहित्य के शीर्ष हस्ताक्षर हैं, जिनकी रचनाओं ने मानवीय संवेदना, जीवन दर्शन और आध्यात्मिक प्रेम को अमर अभिव्यक्ति दी।
दुल्ला भट्टी की रचनाओं के मुख्य विषय क्या हैं?
दुल्ला भट्टी की रचनाओं के केंद्र में अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध, बहनों-बेटियों की मर्यादा की रक्षा, पंजाब का शौर्य व लोक-विद्रोह, लोहड़ी पर्व का अमर उल्लास, गरीबों और मजलूमों का सहारा जैसे विषय हैं, जो हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति और गहरे जीवन-सत्य से परिपूर्ण हैं।
दुल्ला भट्टी की शायरी और रचनाओं की मुख्य विशेषता क्या है?
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, विरह और गहरे जीवन दर्शन को अत्यंत मार्मिक भाषा में प्रस्तुत करती हैं।
दुल्ला भट्टी की सबसे प्रसिद्ध रचनाएँ कौन सी हैं?
इनकी प्रमुख कृतियों में कालजयी शेर, ग़ज़लें और नज़्में शामिल हैं जो आज भी विश्वभर के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं।
दुल्ला भट्टी का साहित्यिक योगदान और प्रभाव क्या है?
उन्होंने अपनी भाषा शैली और नए उपमानों के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रेरित किया।
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